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Wednesday, March 11, 2026

सूबेदार : घर वापसी के बाद भी खत्म नहीं होता युद्ध

हाल ही में अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई फिल्म सूबेदार एक ऐसी फिल्म है जो एक साथ कई कहानियों, सामाजिक मुद्दों और मानवीय भावनाओं को समेटने का प्रयास करती है। सुरेश त्रिवेणी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में वरिष्ठ अभिनेता अनिल कपूर मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म की कहानी मुख्य रूप से एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी, सूबेदार अर्जुन मौर्य के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है।

अर्जुन अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा देश की सीमा पर और सेना के कठोर अनुशासन के बीच बिताने के बाद अपने घर वापस लौटता है। उसका यह घर मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में स्थित है। वह अपने पीछे एक शानदार सैन्य जीवन छोड़कर आया है, लेकिन उसके भीतर एक गहरा अपराधबोध और दुख भी है। जब वह अपनी ड्यूटी पर तैनात था, तब एक हादसे में उसकी पत्नी की मौत हो गई थी। इस कारण से वह अपनी बेटी श्यामा से भावनात्मक रूप से बहुत दूर हो चुका है।
फिल्म की शुरुआत इसी पारिवारिक अलगाव और एक पिता के अपनी युवा बेटी से जुड़ने के संघर्ष से होती है। फिल्म में अर्जुन मौर्य की पत्नी के किरदार में खुशबू सुंदर भी दिखाई देती हैं, जिनकी स्मृति और अनुपस्थिति कहानी के भावनात्मक आधार को और गहरा बनाती है।
दूसरी तरफ, उसी कस्बे में एक स्थानीय रेत माफिया का जबरदस्त आतंक है, जिसे प्रिंस और उसकी जेल में बंद बहन बबली दीदी चलाते हैं। जब एक छोटी-सी बात पर इस भ्रष्ट और बेलगाम माफिया का सामना उस अनुशासित और दुखी सूबेदार से होता है, तो कहानी में असल तनाव पैदा होता है।
फिल्म की पटकथा को बहुत ही यथार्थवादी और सीधे ढंग से लिखा गया है। शुरुआत में फिल्म एक बेहतरीन माहौल बनाती है, जहाँ आपको महसूस होता है कि कहानी धीरे-धीरे एक बड़े टकराव की तरफ बढ़ रही है। लेखक और निर्देशक ने एक पूर्व सैनिक की मानसिक स्थिति को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ परदे पर उतारने की कोशिश की है। अर्जुन मौर्य सिर्फ एक मारधाड़ वाला नायक नहीं है, वह एक ऐसा इंसान है जो अंदर से टूट चुका है और अपने परिवार को फिर से जोड़ना चाहता है।
वह समाज की गुंडागर्दी से दूर एक शांत जीवन जीना चाहता है, लेकिन जिस समाज में वह वापस आया है, वह भ्रष्टाचार, अराजकता और ताकत के नशे से भरा हुआ है। कहानी का मुख्य विषय यही है कि कैसे सेना का अनुशासित नियम आम नागरिक जीवन की बेतरतीब और भ्रष्ट व्यवस्था से टकराता है। जब सूबेदार की पत्नी की आखिरी निशानी, उसकी लाल रंग की जिप्सी कार—को प्रिंस के गुंडे नुकसान पहुँचाते हैं, तो सूबेदार का संयम टूट जाता है।


पटकथा में कुछ कमजोरियाँ भी हैं, जिन पर बात करना जरूरी है। कहानी में एक साथ बहुत सारे मुद्दे उठाने की कोशिश की गई है। एक तरफ सूबेदार और उसकी बेटी का तनावपूर्ण रिश्ता है, दूसरी तरफ बेटी श्यामा का अपने महाविद्यालय के लड़कों से संघर्ष है जो उसे परेशान करते हैं। फिल्म यह भी दिखाने की कोशिश करती है कि कैसे महिलाओं को पुरुषों के वर्चस्व वाले इस समाज में अपने सम्मान के लिए लगातार लड़ना पड़ता है।
इसके अलावा रेत माफिया का पूरा साम्राज्य और सत्ता का दुरुपयोग भी कहानी का बड़ा हिस्सा है। ये सारी बातें अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन फिल्म इन सभी को एक साथ अच्छी तरह से जोड़ नहीं पाती है। ऐसा लगता है कि कई अलग-अलग कहानियाँ एक साथ चल रही हैं, जो कभी-कभी मुख्य कहानी की रफ्तार को धीमा कर देती हैं। फिल्म को अलग-अलग अध्यायों में बाँटा गया है, लेकिन यह विभाजन कहानी को जोड़ने के बजाय कई बार उसके प्रवाह को तोड़ देता है। फ़िल्म के अंत को और बेहतर बनाया जा सकता था। लगता है जैसे निर्देशक ने किसी वजह से सैनिक एकता वाला पुट देने का काम किया है। 
अभिनय के मामले में यह फिल्म पूरी तरह से अनिल कपूर के कंधों पर टिकी हुई है। उन्होंने जिस ऊर्जा और संयम के साथ सूबेदार अर्जुन मौर्य का किरदार निभाया है, वह बहुत ही प्रभावशाली है। उन्होंने इस किरदार के गुस्से और हताशा को बहुत ही खामोशी के साथ पेश किया है। उनके चेहरे के भाव, उनकी चाल और उनकी खामोशी उनके संवादों से ज्यादा बहुत कुछ कह जाते हैं।
वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बहुत ही स्वाभाविक लगते हैं, जो दुश्मनों से तो लड़ सकता है, लेकिन अपनी बेटी से सामान्य बातचीत करने में उसे बहुत हिचकिचाहट होती है। एक्शन दृश्यों में भी उनका शारीरिक संतुलन और फुर्ती देखने लायक है। उन्होंने एक ऐसे उम्रदराज सैनिक की भूमिका को पूरी ईमानदारी से जिया है, जो अपनी वर्दी का गर्व और अपनी पारिवारिक गलतियों का बोझ एक साथ ढो रहा है।
राधिका मदान ने सूबेदार की बेटी श्यामा का किरदार निभाया है। श्यामा अपनी माँ की मौत के सदमे और अपने पिता की गैरमौजूदगी के कारण बहुत ही गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गई है। राधिका ने इस मानसिक उलझन को बहुत ही सादगी और सच्चाई के साथ परदे पर उतारा है। पिता और बेटी के बीच जो एक अजीब-सी दूरी और खामोशी होती है, उसे दोनों कलाकारों ने बहुत ही बेहतरीन ढंग से निभाया है।
दूसरी ओर, फिल्म के मुख्य खलनायक प्रिंस के रूप में आदित्य रावल ने बहुत अच्छा काम किया है। प्रिंस एक ऐसा युवा है जिसे अपनी ताकत का बहुत घमंड है। वह बहुत तेज बोलता है, बिना सोचे-समझे फैसले लेता है और उसके अंदर एक अजीब-सा अभिमान है। आदित्य रावल ने इस चिड़चिड़े और अभिमानी किरदार को इतनी अच्छी तरह से निभाया है कि दर्शक के रूप में आपको उससे सच में चिढ़ होने लगती है। उनके इस शोरगुल वाले अभिनय से सूबेदार की खामोशी के बीच एक बहुत अच्छा विरोधाभास पैदा होता है।
फिल्म के बाकी सहायक कलाकारों ने भी कहानी को आगे बढ़ाने में अच्छी भूमिका निभाई है। सौरभ शुक्ला ने सूबेदार के दोस्त प्रभाकर का किरदार निभाया है। वह कहानी में एक ठहराव और समझदारी लेकर आते हैं और सूबेदार को आम जिंदगी जीने की सलाह देते हैं। उनका अनुभव और उनकी सहजता हर दृश्य में साफ नजर आती है।

फैसल मलिक ने सॉफ्टी के रूप में हमेशा की तरह अपना बेहतरीन काम किया है, जो प्रिंस के गिरोह का हिस्सा होने के बावजूद अपनी एक अलग पहचान बनाता है और ज्यादा समझदार नजर आता है। लेकिन मोना सिंह के किरदार बबली दीदी के साथ न्याय नहीं हो पाया है। कहानी के अनुसार बबली दीदी एक बहुत ही खतरनाक और चालाक महिला डॉन है, लेकिन पूरी फिल्म में उसे ऐसा कुछ भी करने का मौका नहीं मिलता जिससे उसका खौफ साबित हो सके।
निर्देशन और तकनीकी पहलुओं की बात करें तो सुरेश त्रिवेणी ने एक बहुत ही अलग तरह की दुनिया रचने की कोशिश की है। उन्होंने मध्य प्रदेश के इस छोटे से कस्बे के माहौल को बहुत ही असली और कच्चा रखा है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत ही शानदार है। धूल भरे रास्ते, पुरानी इमारतें और वहाँ का पूरा रहन-सहन कहानी के मूड से बिल्कुल मेल खाता है। फिल्म के एक्शन दृश्यों को भी बहुत ही असली रखा गया है।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि सूबेदार एक ऐसी फिल्म है जिसका इरादा बहुत साफ है। यह सिर्फ एक मारधाड़ वाली फिल्म नहीं है, बल्कि एक इंसान के अपने अतीत, अपने परिवार और एक भ्रष्ट समाज से लड़ने की साधारण कहानी है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका मुख्य विचार और अनिल कपूर का शानदार अभिनय है। अपनी कुछ खामियों के बावजूद यह फिल्म अपनी सादगी और संवेदनशीलता के कारण एक बार देखने लायक अनुभव जरूर प्रदान करती है।

समीक्षक : महेश सिंह
गिरिडीह, झारखंड

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Saturday, February 21, 2026

पहचान और वैचारिक आज़ादी का जरिया हैं मातृभाषाएँ


पहचान और वैचारिक आज़ादी का जरिया हैं मातृभाषाएँ

-महेश सिंह

मातृभाषा हमारे भीतर की वह पहली आवाज़ है जिससे हम दुनिया को समझना शुरू करते हैं। हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और हमारी पहचान क्या है, यह सब हमें हमारी भाषा ही बताती है। जब एक छोटा बच्चा अपनी माँ की गोद में होता है, तो वह सबसे पहले अपनी भाषा के शब्द ही सुनता है। वह इसी भाषा में पहली बार अपनी ज़रूरतें बताता है, सपने देखता है। सच तो यह है कि हर कोई अपनी भाषा में ही खुद को सबसे ज्यादा सहज महसूस करता है। इसीलिए दुनिया भर के जानकारों का कहना है कि किसी भी बच्चे के दिमाग का सही विकास उसकी अपनी भाषा में ही हो सकता है। वस्तुतः मातृभाषा हमारे होने का सबसे गहरा अहसास है।

नेल्सन मंडेला ने एक बार बहुत पते की बात कही थी, "अगर आप किसी आदमी से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह सिर्फ समझता है, तो आपकी बात उसके दिमाग तक पहुँचती है। लेकिन अगर आप उससे उसकी अपनी भाषा में बात करते हैं, तो वह बात सीधे उसके दिल में उतरती है।" इस तरह किसी भी भाषा का असली काम जानकारी देना तो है ही, लोगों को एक-दूसरे से जोड़ना भी है। जब हम अपनी भाषा में बात कर रहे होते हैं तो हम अपना पूरा इतिहास और अपनी भावनाएं साझा करने में सहज महसूस करते हैं। यही कारण है कि दुनिया के किसी भी कोने में जब दो अनजान लोग अपनी मातृभाषा में बात करते मिलते हैं, तो उनके बीच की दूरी तुरंत खत्म हो जाती है।

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज को कमजोर करना चाहा गया, सबसे पहले उसकी भाषा छीनी गई। असली गुलामी तब शुरू होती है जब हम अपनी भाषा छोड़कर दूसरों की सांस्कृतिक पहचान अपनाने को मजबूर हो जाते हैं। फ्रांसीसी लेखक अल्फांसो डौडेट ने अपनी मशहूर कहानी 'द लास्ट लेसन' में प्रतिरोध की महत्ता बताते हुए लिखा है, "जब किसी कौम को गुलाम बनाया जाता है, तो जब तक वहां के लोग अपनी भाषा को मजबूती से पकड़े रहते हैं, तब तक उनके पास अपनी जेल की चाबी रहती है।" यह चाबी वह भरोसा है जो हमें अपनी जड़ों से मिलता है। अगर भाषा बच गई, तो समाज अपनी आज़ादी और सम्मान वापस पा सकता है। भाषा की इसी ताकत को दुनिया ने 1952 के भाषा आंदोलन में देखा था, जब पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने 'बांग्ला' के लिए शहादत दी थी। इसी बलिदान के सम्मान में यूनेस्को ने 1999 में घोषणा की और तब से पूरी दुनिया 21 फरवरी को 'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाती है।

भारत में महात्मा गांधी ने भी इसी बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया था। उन्होंने 1921 में लिखा था, "जैसे बच्चे के शरीर के लिए माँ का दूध जरूरी है, वैसे ही उसके दिमाग के विकास के लिए मातृभाषा जरूरी है।" गांधी जी का मानना था कि विदेशी भाषा में शिक्षा पाकर हम शायद कुछ जानकारी जुटा लें, पर हम अपने ही लोगों के बीच अजनबी बन जाते हैं। जब हम अपनी भाषा में पढ़ते-लिखते हैं, तो हमारा दिमाग ज्यादा खुलकर सोचता है और हम कुछ नया करने का साहस जुटा पाते हैं। गांधी जी ने हमें चेताया था कि अपनी भाषा को कमतर आंकना आत्मसम्मान खोने जैसा है। उन्होंने एक बार बहुत सुंदर बात कही थी, "मैं चाहता हूँ कि दुनिया भर की संस्कृतियों की हवा मेरे घर में आए, पर मैं यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करूँगा कि वह हवा मुझे मेरे पैरों से ही उखाड़ दे।" यह सांस्कृतिक मजबूती हमें हमारी अपनी भाषा ही दे सकती है।

आज का आधुनिक विज्ञान और न्यूरोसाइंस भी यही कहता है कि बच्चा अपनी मातृभाषा में सबसे जल्दी और बेहतर संज्ञानात्मक विकास करता है। तमाम शिक्षा वैज्ञानिकों ने बार-बार इस बात पर मुहर लगाई है कि बच्चों को उनकी अपनी भाषा में पढ़ाना ही सबसे वैज्ञानिक तरीका है। रवींद्रनाथ टैगोर ने मातृभाषा के संबंध में कहा था, "मातृभाषा एक दृष्टि की तरह है, जिसके माध्यम से हम दुनिया को देख सकते हैं और समझ सकते हैं। अपनी भाषा का त्याग करना अपनी आँखों को खोने जैसा है।" बिना अपनी भाषा के, हम दुनिया को वैसा नहीं देख पाते जैसी वह असल में है, हम दूसरों के चश्मे से चीजें देखने लगते हैं। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक ओलिवर वेंडेल होम्स ने कहा था, "हर भाषा एक मंदिर की तरह है जिसमें उस समाज की आत्मा रहती है।" जब हम अपनी भाषा से दूर होते हैं, तो हम उस मंदिर को ही उजाड़ देते हैं।

जापान का उदाहरण इस संदर्भ में बहुत प्रेरक है। द्वितीय विश्व युद्ध के कई सालों बाद उन्होंने पश्चिमी तकनीक को अपनाना शुरू किया लेकिन अपनी भाषा का त्याग नहीं किया। उन्होंने 'वाकोन-योसाई' यानी जापानी भावना और पश्चिमी तकनीक के मंत्र पर चलते हुए विज्ञान की हर बड़ी किताब का अनुवाद किया। आज जापान तकनीक में दुनिया का सिरमौर है, और वह भी अपनी मातृभाषा की बदौलत। उन्होंने साबित कर दिया कि आधुनिक होने के लिए अपनी जड़ें काटना जरूरी नहीं है। इसी तरह इजराइल ने भी हिब्रू भाषा को फिर से जिंदा करके दिखाया। सदियों तक जो भाषा केवल किताबों में सीमित थी, उसे लोगों के प्यार और जिद ने रोजमर्रा की बातचीत की भाषा बना दिया।

हमारी संस्कृति का असली खजाना हमारी भाषा के मुहावरों, कहावतों और गानों में छिपा होता है। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ हज़ारों साल का तजुर्बा भी खत्म हो जाता है। दार्शनिक जोहान गॉटफ्राइड वॉन हर्डर का मानना था कि किसी राष्ट्र की असलियत उसकी भाषा में ही बसती है। प्रसिद्ध कवि गोपालदास 'नीरज' से जब एक बार पूछा गया कि वे हिंदी में ही क्यों लिखते हैं, तो उन्होंने सादगी से जवाब दिया, "अंग्रेजी मेरी 'ब्रेड' हो सकती है, लेकिन हिंदी मेरा 'ब्लड' है।" यह बात हर उस इंसान पर लागू होती है जो रोजी-रोटी के लिए दूसरी भाषाएं तो सीखता है, लेकिन जीता अपनी मातृभाषा में है। बिना अपनी भाषा के, इंसान के भीतर का कलाकार कभी जिंदा नहीं रह सकता।

रूस के महान कथाकार इवान तुर्गनेव ने भी मुश्किल वक्त में अपनी मातृभाषा को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत माना था। उन्होंने कहा था, "संदेह और कष्ट के दिनों में, ओ महान और मुक्त रूसी भाषा, तुम ही मेरा एकमात्र सहारा हो!" दक्षिण भारत के महान कवि सुब्रमण्यम भारती ने भी अपनी रचनाओं के जरिए यही संदेश दिया। वे कई भाषाओं के जानकार थे, पर उन्होंने तमिल को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम चुना क्योंकि उनका मानना था कि अपनी भाषा में कही गई बात ही समाज में क्रांति ला सकती है। मातृभाषा वह बिजली है जो सोए हुए समाज को एक झटके में जगा सकती है।

शिक्षा के क्षेत्र में 'मूंछों वाली माँ' कहे जाने वाले गीजूभाई बधेका ने अद्भुत प्रयोग किए। उन्होंने देखा कि जब बच्चों को पराई भाषा में सिखाया जाता है, तो वे डरे-सहमे रहते हैं। लेकिन जैसे ही शिक्षक उनकी अपनी बोली में बात करना शुरू करता है, बच्चों की आँखों में चमक आ जाती है। मातृभाषा बच्चों के डर को खत्म कर देती है और उनमें सवाल पूछने की हिम्मत पैदा करती है। अपनी भाषा में सोचना हमें एक 'सर्जक' यानी कुछ नया रचने वाला बनाता है, जबकि उधार की भाषा में हम केवल नकलची बनकर रह जाते हैं। टैगोर ने शांतिनिकेतन में इसीलिए मातृभाषा पर जोर दिया था क्योंकि वे चाहते थे कि भारतीय बच्चे अपनी मिट्टी से जुड़कर विश्व के साथ संवाद करें। इसी संदर्भ में एक अपना भी अनुभव याद आ रहा है। मेरी क्लास में आधे से ज्यादा विद्यार्थी संथाली हैं। एक दिन मैंने सबसे कहा कि स्वेच्छा से हिंदी में किसी भी विषय पर सामने आकर दो मिनट बोलना है। बहुत बच्चे सामने आए और बोले भी। मैंने नोटिस किया कि इनमें एक भी संथाली छात्र नहीं आया है। अंत मे मैंने यह छूट दी कि वह अपनी भाषा में भी बोल सकते हैं। यकीन मानिए, अब मेरे पास समय की कमी थी।

आज के समय में दूसरी भाषाओं को सीखना एक जरूरत हो सकती है, पर अपनी भाषा को भूलकर नहीं। भारत की नई शिक्षा नीति में भी इसीलिए मातृभाषा को अहमियत दी गई है क्योंकि यह हमारे सोचने के तरीके को मजबूत बनाती है। अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन कहते थे कि भाषा की ताकत उसकी सादगी में होती है। उन्होंने हमेशा बड़े और बनावटी शब्दों के बजाय उन शब्दों को चुना जो आम आदमी अपने खेतों या घर में बोलता है। उनका मानना था कि जो बात अपनी सहज बोली में कही जा सकती है, वह किसी भी विदेशी शब्द से नहीं कही जा सकती।

दार्शनिक विट्गेन्स्टाइन ने कहा था, "मेरी भाषा की सीमाएं ही मेरे संसार की सीमाएं हैं।" इसका मतलब है कि अगर हम अपनी भाषा खो देते हैं, तो हम उस विशाल संसार को भी खो देते हैं जिसे सिर्फ उस भाषा के जरिए समझा जा सकता था। हमारी मातृभाषा ही वह खिड़की है जिससे हम इस कायनात को सबसे साफ देख सकते हैं। अपनी भाषा में बात करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात होनी चाहिए। अक्सर देखा गया है कि आधुनिकता के नाम पर हम अपनी बोलियों को बोलने में हिचकते हैं। यह एक किस्म की हीनभावना है जो हमें मानसिक रूप से कमजोर बनाती है। दुनिया का कोई भी महान साहित्य, चाहे वह होमर की 'इलियड' हो, दांते की 'डिवाइन कॉमेडी' हो या तुलसीदास की 'रामचरितमानस', सब अपनी मातृभाषा की कोख से ही निकले हैं।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने बहुत पहले कहा था, "निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल॥" इसका सीधा मतलब है कि अपनी भाषा की तरक्की ही हर तरह की तरक्की का आधार है। अपनी भाषा के बिना हम खुद को कभी पूरा महसूस नहीं कर सकते। मातृभाषा का सम्मान करना खुद का सम्मान करना है। यह वह विरासत है जो हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपी है और जिसे हमें अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है। इसमें हमारे पुरखों की मेहनत, उनकी हँसी, उनके आँसू और उनकी बुद्धिमानी छिपी है।

अपनी मातृभाषा को बचाए रखना अपनी पहचान को बचाए रखना है। जब हम अपनी भाषा बोलते हैं, तो हम अपने पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। आइए, हम अपनी भाषा को केवल बोलने तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन, अपनी शिक्षा और अपने भविष्य का आधार बनाएं। अपनी भाषा में बात करना, सोचना और रचना ही असल में आज़ाद होने का प्रमाण है। मातृभाषा वह संगीत है जो हमारे भीतर हमेशा गूंजता रहता है। यह वह प्रकाश है जो हमें भीड़ में खोने नहीं देता। अपनी भाषा का गौरव गान करना दरअसल अपनी मानवता के स्वाभिमान को आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मशाल की तरह प्रज्ज्वलित रखना है, ताकि वे अपनी पहचान के साथ गर्व से जी सकें और दुनिया को अपनी बात अपनी भाषा में सुना सकें।


संपर्क : mahesh.pu14@gmail.com

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Sunday, February 1, 2026

तिमिर में सूर्य-नाद : संत रविदास

तिमिर में सूर्य-नाद : संत रविदास
-महेश सिंह

मध्यकालीन इतिहास में जब रूढ़ियों की काई जमने लगी थी और धर्म के नाम पर मनुष्यता शर्मसार हो रही थी तब काशी के घाटों से एक आवाज पाखंड के महलों की नींव हिलाने का काम कर रही थी। वह आवाज संत शिरोमणि रविदास की थी। उस समय छुआछूत और भेदभाव की वजह से आदमी को आदमी की परछाई से भी भय लगता था। सन्त रविदास ने निर्भीक होकर उस 'एक बूंद' की बात की, जिससे हम सब बने हैं। उन्होंने अपमान के विष को पीकर उसे समता के अमृत में बदलने का काम किया। उनका प्रयास बिना शस्त्र उठाए, केवल 'सूत और धागे' से समाज के फटे हुए आंचल को रफू करने का था।


संत रविदास का जन्म विरोधाभासों के युग में हुआ। एक ओर क्रूर सामंती व्यवस्था थी, तो दूसरी ओर भक्ति आंदोलन की शीतल बयार बह रही थी। ऐसे में, चर्मकार कुल में जन्में रविदास ने सिद्ध किया कि कमल कीचड़ में ही खिलता है। उन्होंने अपने पुश्तैनी काम अर्थात जूते बनाने को कभी छोटा नहीं माना। वे इसे एक 'साधना' मानते थे। उनकी दृष्टि में श्रम करने वाला हाथ पूजा करने वाले हाथ से कहीं अधिक पवित्र है। 'श्रम की गरिमा' का ऐसा उदात्त दर्शन विश्व के किसी अन्य चिंतक में इतनी सहजता से नहीं मिलता।

उनका वैराग्य उनके आचरण का सत्य था। 'पारस पत्थर' की लोकप्रसिद्ध कथा उनके इसी निस्पृह व्यक्तित्व का प्रमाण है। किंवदंती है कि एक सिद्ध योगी ने उनकी गरीबी देखकर उन्हें पारस मणि दी, जिससे लोहा सोना बन सकता था। योगी को लगा कि वे उपकार कर रहे हैं, किंतु रविदास के लिए वह पत्थर रास्ते के कंकड़ समान था। उन्होंने योगी से कहा, "इसे छप्पर में खोंस दीजिए।" वर्षों बाद जब योगी लौटे तो पत्थर वहीं जालों में लिपटा पड़ा था। रविदास ने उसे स्पर्श तक नहीं किया था। वे क्यों छूते भला! जिसका मन 'हरि-रस' से भरा हो, उसके लिए दुनिया का सारा सोना मिट्टी है। "साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि" यही तो उनके जीवन का सार था।

संत रविदास की अध्यात्म-यात्रा 'बाहरी दिखावे' से 'आंतरिक शुद्धि' की ओर जाने वाली थी। उनकी यह प्रसिद्ध उक्ति है- "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। इसके पीछे का मनोविज्ञान गहरा है। वे काशी में रहते थे। वही काशी, जहाँ गंगा स्नान को मोक्ष का द्वार माना जाता था। लेकिन रविदास ने 'जल' को चुनौती दी और 'भाव' को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने कहा- तीर्थों का जल शरीर को तो धो सकता है लेकिन आत्मा को नहीं। यदि मन पवित्र है तो चमड़ा भिगोने वाली कठौती का जल भी पतितपावनी गंगा है। और यदि चित्त में मैल है तो उसे किसी भी तीर्थ का पानी नहीं धो सकता। उनका यह 'चित्त-शुद्धि' का सिद्धांत, धर्म को पुजारियों की मुट्ठी से निकालकर आम आदमी के हृदय में स्थापित किया। उनके राम, दशरथ के पुत्र नहीं बल्कि 'निर्गुण राम' थे, जो हर घट में रमते हैं।

सन्त रविदास की चेतना धरती के यथार्थ को बदलने के लिए व्याकुल थी। उनकी 'बेगमपुरा' की संकल्पना राजनीति-शास्त्र का दुर्लभ दस्तावेज है। यहाँ 'राज्य' का अर्थ 'शासन' की बजाय 'समता' है। जब दुनिया के दार्शनिक 'आदर्श राज्य' की जटिल परिभाषाएं गढ़ रहे थे, तब उन्होंने 'दुःख-विहीन समाज' का नक्शा खींचा। बेगमपुरा की संकल्पना में 'मानवाधिकार' है। यह एक ऐसा लोक है जहाँ प्रेम का बंधन है। सह-अस्तित्व का उत्सव है। उन्होंने सदियों पहले उद्घोष किया था कि सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ "छोट-बड़ो सब सम बसै।" यानी अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी प्रथम पंक्ति के बराबर सम्मान का अधिकारी हो।

जाति-व्यवस्था पर रविदास ने जो प्रहार किए वे तर्क और विज्ञान की कसौटी पर आज भी खरे उतरते हैं। वे किसी से उलझते नहीं थे लेकिन तर्क के साथ उदाहरण देकर तथाकथित उच्च समाज को लज्जित कर देते थे। "जाति-जाति में जाति है, ज्यों केलन में पात।" केले के तने का यह रूपक अत्यंत सटीक है। जैसे तने को छीलते जाओ तो परतों के सिवा कुछ नहीं मिलता, वैसे ही जाति भी एक खोखली व्यवस्था है। उन्होंने पूछा कि यदि सृजनकर्ता ने भेद नहीं किया तो हम कौन होते हैं लकीरें खींचने वाले? सुल्तान सिकंदर लोदी के साथ उनका संवाद इतिहास का एक ऐतिहासिक तथ्य है। जब सत्ता के मद में चूर सुल्तान ने उन्हें धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया, तो रविदास जी ने निर्भीकता से उत्तर दिया- "वेद-कतेब से परे है वह, जो सबका सिरजनहार।" उन्होंने बता दिया कि एक फकीर की कुटिया, बादशाह के महल से ऊंची होती है क्योंकि वहाँ भय का कोई स्थान नहीं होता।

संत रविदास की वाणी में वह चुंबकत्व था जिसने चित्तौड़ की महारानी मीराबाई को भी महलों का सुख त्यागकर एक चर्मकार के चरणों में बैठने पर विवश कर दिया। मीराबाई और रविदास का गुरु-शिष्य संबंध भारतीय संस्कृति की सबसे क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है। इसे कुलीनता पर ज्ञान का विजय कह सकते हैं। "गुरु मिलिया रैदास, दीन्हीं ज्ञान की गुटकी।" यह स्वीकारोक्ति प्रमाण है कि मीरा को जो तृप्ति कृष्ण की मूर्ति में नहीं मिली, वह रविदास के शब्दों में मिली। चित्तौड़ के भोज में जब ब्राह्मणों ने रविदास के साथ बैठने से इनकार किया, तब हर ब्राह्मण ने अपनी बगल में एक रविदास को पाया। यह एक प्रतीकात्मक प्रसंग है जो दर्शाता है कि ईश्वर 'जनेऊ' में नहीं, 'जन' में बसता है।  

उनकी साहित्यिक साधना का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वे 'शब्द-ब्रह्म' के उपासक थे। कबीर यदि 'खंडन' के कवि हैं, तो रविदास 'मंडन' के कवि हैं। कबीर की भाषा में आग है, तो रविदास की भाषा में मरहम। उन्होंने संस्कृत के वर्चस्व को चुनौती देते हुए 'लोकवाणी' को अध्यात्म की भाषा बनाया। उनकी कविताएं 'सधुक्कड़ी' होते हुए भी अत्यंत लयात्मक हैं। उनमें संगीत और साहित्य का मणिकांचन संयोग है। वे जटिल वेदांत को भी "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी" जैसे सरल रूपकों में ढाल देते थे। यहाँ चंदन और पानी का मिलन 'अद्वैत' का सबसे सुंदर उदाहरण है। पानी की अपनी कोई गंध नहीं होती, लेकिन चंदन के संपर्क में आते ही वह सुगंधित हो उठता है। यही जीवात्मा की स्थिति है। उन्होंने शरीर को नश्वर मानकर उपेक्षा नहीं की बल्कि उसे 'हरि का मंदिर' माना।

संत रविदास के कृतित्व का मूल्यांकन करते समय, साहित्य के मर्मज्ञ विद्वानों ने भी उनकी 'सहजता' को स्वीकार किया है। गोस्वामी नाभादास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'भक्तमाल' में रविदास जी की वाणी की शक्ति को रेखांकित करते हुए लिखा है— "संदेह ग्रंथि खंडन-निपुन बानि विमल रैदास की।" अर्थात, रैदास की वाणी इतनी निर्मल और प्रभावशाली है कि वह मनुष्य के मन में बैठे संदेह की जटिल गांठों को क्षण भर में काट देती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जो अपनी कठोर आलोचनात्मक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने भी संत रविदास के प्रभाव को स्वीकार किया है। शुक्ल जी लिखते हैं— "संत मत के अनुयायियों में कबीर के बाद रैदास का ही स्थान है... इनकी साखी में प्रेम की निरीहता और आत्म-समर्पण का भाव अधिक है।"

इसी क्रम में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संत रविदास को 'सहजता का संत' कहा है। द्विवेदी जी का मानना था कि रविदास जी का क्रोध भी करुणा में लिपटा हुआ था। वे कहते हैं— "रविदास की भक्ति में एक प्रकार की ऐसी आकुलता है जो सीधे हृदय में प्रवेश कर जाती है। उनमें कबीर जैसा अक्खड़पन नहीं, बल्कि एक विनम्र दृढ़ता है।" वहीं, आधुनिक विमर्श और दलित साहित्य चिंतन में डॉ. धर्मवीर ने उन्हें एक 'समाज-वैज्ञानिक' माना है। डॉ. धर्मवीर के अनुसार, रविदास जी का 'बेगमपुरा' मार्क्स के साम्यवाद से सदियों पहले की गई एक ऐसी परिकल्पना है, जिसने शोषित समाज को 'राजसत्ता' में हिस्सेदारी का सपना दिखाया।

संत रविदास ने गृहस्थ और संन्यास के बीच की कृत्रिम दीवार को ढहा दिया। उन्होंने पलायनवाद को कभी प्रश्रय नहीं दिया। वे मानते थे कि संसार से भागना कायरता है, संसार में रहकर उसे बदलना ही असली वीरता है। "नेक कमाई जौ करै, कबहूँ न निहफल जाय।" यह आर्थिक स्वावलंबन का मंत्र है। वे जानते थे कि आर्थिक दासता ही मानसिक दासता की जननी है, इसलिए उन्होंने अपने अनुयायियों को 'किरत' (श्रम) करने की प्रेरणा दी। उनका जीवन संदेश देता है कि मोक्ष के लिए जंगल जाने की आवश्यकता नहीं, बस अपनी नीयत और नीति साफ रखो।

आज, जब हम इक्कीसवीं सदी में स्वयं को सभ्य कहते हैं, तब भी हमारे भीतर का आदिम अहंकार जाति और धर्म के नाम पर तांडव करता है। ऐसे समय में संत रविदास की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। वे आज भी हमारे लिए एक 'प्रकाश-स्तंभ' हैं। उनका 'बेगमपुरा' आज भी हमारा अधूरा सपना है। आज की राजनीति जो बांटने का काम करती है, उसके सामने रविदास का दर्शन जोड़ने का काम करता है। वे भारत की साझी संस्कृति के सच्चे संवाहक हैं। उनकी दृष्टि में शांत रहकर, स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, सत्य पर अडिग रहना सबसे बड़ा प्रतिरोध है।
  
निष्कर्षतः, संत रविदास काल की सीमाओं से परे एक शाश्वत विचार हैं। वे उस भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो विविधता में एकता और विषमता में समता की बात करता है। वे एक समतामूलक, भयमुक्त और प्रेमपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते थे, जहाँ मनुष्य की पहचान उसकी 'मनुष्यता' हो। अंत में यही कहना है कि सन्त रविदास की वाणी का सूर्य-नाद अनंत काल तक मानवता के पथ को आलोकित करता रहेगा।

संपर्क : महेश सिंह, mahesh.pu14@gmail.com
 
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Thursday, January 29, 2026

एक संविधान फिर भी इतने हिंदुस्तान ?

एक संविधान फिर भी इतने हिंदुस्तान ?

हिंदुस्तान का नक्शा उठाइये, उसे गौर से देखिये, देश के बीचों-बीच एक लकीर दिखेगी, पहाड़ों की लकीर। इस लकीर का नाम है विंध्याचल। भूगोल की किताब में यह सिर्फ एक पहाड़ है। मतलब, पत्थर और जंगल। लेकिन रुकिए! अगर आप एक लड़की हैं, तो इसे पहाड़ की तरह नहीं देख सकते। यह एक दीवार है, चीन की महान दीवार जैसी। यह बॉर्डर है आपकी किस्मत का। सच कहूँ? विंध्याचल के उस पार एक दुनिया है, जिसे साउथ इंडिया कहते हैं। विंध्याचल के इस पार भी एक दूसरी दुनिया है, जिसे नॉर्थ इंडिया कहते हैं। दोनों तरफ लड़कियों की कहानी जुदा है। स्क्रिप्ट बिलकुल अलग है। इतना ही नहीं, पूरब में जाइए, पहाड़ों में बसे नॉर्थ-ईस्ट को देखिये। पश्चिम में जाइए, समंदर किनारे बसे गुजरात और महाराष्ट्र को देखिये। या फिर उतर जाइये देश के दिल में। आदिवासियों के जंगलों में। हर जगह कहानी बदल जाती है। ऐसा लगता ही नहीं कि यह एक देश है और एक संविधान है। सवाल बहुत सीधा है दोस्त। आखिर एक लड़की के लिए लाइफ कहाँ आसान है? कहाँ उसे ज्यादा आज़ादी है? और कहाँ उसे साँस लेने के लिए भी लड़ना पड़ता है? दुनियाँ घूमने और देखने का असल नफा यही है कि आप कुछ सवालों के जवाब जानते हैं। तो, आइए, कुछ विचार किया जाय।


शुरुआत आज से नहीं होगी। हमें पीछे जाना होगा, सैकड़ों साल पीछे। हमारे आज के जो हालात हैं उनकी जड़ें वहां तक जाती हैं। आखिर इतना फर्क आया कहाँ से? इसका जवाब हमारे इतिहास में है। हमारी धार्मिक मान्यताओं में है। समाज की रीतियों में है। पहले नॉर्थ इंडिया को देखते हैं। मतलब पुराने ज़माने का आर्यावर्त, जहाँ वैदिक काल के बाद भारी बदलाव आया। स्मृतियों जैसी किताबों का असर बढ़ा। धर्म को 'बेटे' से जोड़ दिया गया। एक बहुत गहरी बात मन में बैठा दी गई। कहा गया कि पिता को मोक्ष चाहिए? तो बेटा ज़रूरी है। मुखाग्नि वही देगा, पिंडदान वही करेगा, तभी आत्मा को शांति मिलेगी। बस! यहीं से खेल बिगड़ गया। बेटे की चाहत जन-जन में जूनून बन गई और बेटी अचानक 'पराया धन' हो गई। लोगों को लगा यह तो दूसरे के घर जाएगी। वहां का दीया जलाएगी। इसे पालना मतलब पड़ोसी के बगीचे में पानी देना। यह सोच धर्म के नाम पर पक्की हुई।



फिर इतिहास ने करवट ली। विदेशी हमले हुए। दर्रे से दुश्मन आए। उन्होंने सबसे पहले उत्तर भारत को रौंदा। लूटपाट हुई। समाज डर गया। अपनी बहु-बेटियों को बचाना था। उपाय क्या था? उन्हें घर में बंद कर दो, पर्दा डाल दो और इसतरह घर की चारदीवारी ही उनकी सेफ्टी बन गई। बाल विवाह शुरू हो गए। सती प्रथा आई। यह सब कोई शौक नहीं था, यह डर था दोस्त डर। लेकिन अफ़सोस! वक्त बीत गया, डर भी चला गया, लेकिन 'पर्दा' रह गया। अब वह हमारी 'परंपरा' में है, रूढ़ होकर बेड़ियों की तरह। यह बेड़ियाँ लोहे की नहीं थीं, रिवाज़ों की थीं।


अब चलते हैं विंध्याचल के उस पार यानी साउथ इंडिया। वहां का मामला अलग था। वहां द्रविड़ संस्कृति थी। वहां मंदिरों का बोलबाला था। औरतों को ईश्वर की सेविका माना गया। (हालाँकि इसका अपना एक काला सच है, उधर जाना विषयांतर हो जाएगा) उन्हें कला और संगीत में जगह मिली। और सबसे बड़ी बात। केरल को देखिये, कर्नाटक के तटीय इलाकों को देखिये। वहां 'मरुमकतायम' जैसी परंपरा थी। नाम मुश्किल है, पर मतलब आसान है। इस मतलब है मातृसत्ता। यानी घर की मुखिया माँ होगी, यानी वंश माँ के नाम से चलेगा, यानी जायदाद बेटी को मिलेगी। ज़रा सोचिये, जिस वक्त नॉर्थ में औरतें घूंघट में थीं, उसी वक्त साउथ की औरतें ज़मीन की मालकिन थीं। वे फैसले ले रही थीं। एक और कारण था। साउथ तीन तरफ से समंदर से घिरा है। इसलिए वहां लड़ाइयाँ कम हुईं और व्यापार ज्यादा हुआ। समंदर किनारे के लोगों का दिमाग खोल देता है। ऐसा कहा जा सकता है। क्योंकि दुनियां खोजने वाले पहले-पहल समुद्री मार्ग से ही आये। तो, वे दुनिया से मिलते हैं। नई बातें सीखते हैं। इसलिए वहां कट्टरपन कम पनपा।


अब पूर्वोत्तर चलिए मतलब नॉर्थ-ईस्ट। या फिर आदिवासी इलाके। दोनों जगह कबीलाई जीवन था। लोग पेड़ों को पूजते थे। नदियों को पूजते थे। पहाड़ों को मानते थे। प्रकृति में नर और मादा बराबर होते हैं। इसलिए वहां धर्म के नाम पर औरतों को दबाया नहीं गया। उन्हें कभी 'अशुद्ध' नहीं कहा गया। तो, यह था हमारा इतिहास, जिसने हमारी आज की नींव रखी।


अब थ्योरी और इतिहास को यहीं छोड़ते हैं। आज की बात करते हैं। रियल लाइफ की। इन अलग-अलग जगहों पर एक लड़की का दिन कैसा गुजरता है? चलिए, चेन्नई चलते हैं। मान लीजिए वहां लक्ष्मी रहती है। उसकी सुबह सुकून भरी होती है। वह सात बजे उठती है। बालों में गजरा लगाती है। गजरा वहां यह शुभ माना जाता है। वह स्कूटी उठाती है। या बस स्टॉप जाती है। बस में भीड़ होती है। धक्के भी लगते हैं। मगर उसे डर नहीं लगता। कोई उसे गलत तरीके से नहीं छुएगा। कोई उसे जज नहीं करेगा। वह अपने ऑफिस पहुँचती है। फैक्ट्री में काम करती है। शाम को दोस्तों के साथ कॉफ़ी पीती है। रात नौ बजे घर लौटती है। घर वाले टीवी देख रहे होते हैं। कोई टेंशन नहीं। कोई सवाल नहीं। उन्हें वहां के सिस्टम पर भरोसा है। माहौल पर भी।


अब सीन बदलिये। मेरठ चलिए या दिल्ली के पास किसी शहर में। मान लीजिए यहाँ सुमन रहती है। सुमन घर से निकलती है। सबसे पहले अपना दुपट्टा कसती है। उसे पता है, नुक्कड़ पर लड़के खड़े होंगे। वे उसे घूरेंगे। वह हर पल डरती है। अलर्ट रहती है। बस में चढ़ती है तो नज़रें नीची रखती है। फ्री माइंड होकर कानों में ईयरफोन नहीं लगाती। उसे आहटें सुननी होती हैं। शाम के पांच बजते हैं। फ़ोन बजने लगता है। घर का कॉल है। "कहाँ हो? अँधेरा होने वाला है। जल्दी घर आओ।" सुमन को चिंता कैरियर नहीं है लेकिन सेफ्टी की है, इज्जत की है। यह एक बोझ की तरह है, दिमागी बोझ जो तमाम सुमनों को थका देता है। अंदर से तोड़ देता है।


लेकिन भारत सिर्फ उत्तर और दक्षिण नहीं है। एक तीसरी दुनिया भी है यानी मुंबई, यानी पश्चिम का भारत। मान लीजिए यहाँ राधिका रहती है। उसकी लाइफ रफ़्तार वाली है। वह लोकल ट्रेन पकड़ती है। लेडीज़ डिब्बे में धक्के खाती है। लेकिन वहां औरतों का एक ग्रुप है। वे एक-दूसरे का सहारा हैं। उसे रात के ग्यारह बजे भी डर नहीं लगता। वह कैब लेकर घर जाती है। मुंबई की हवा में एक अलग बात है जिसे कहते हैं प्रोफेशनलिज्म। वहां कोई नहीं पूछता कि तुम बाहर क्या कर रही हो। सब अपने-अपने काम से मतलब रखते हैं।


अब पहाड़ों पर चलिए यानी नार्थ-ईस्ट, यानी शिलांग और मेघालय। मान लीजिए यहाँ मर्लिन रहती है। उसकी दुनिया तो बिलकुल अलग है। एक जादुई दुनिया। वह अपनी मर्जी के कपड़े पहनती है। शॉर्ट्स हों या साड़ी। कोई उसे नहीं घूरता। कोई जज नहीं करता। वह शाम को माँ की दुकान पर बैठती है। गिटार बजाती है। उसके समाज में रीत उल्टी है। वहां कई जगह शादी के बाद लड़का अपना घर छोड़ेगा। वह मर्लिन के घर आएगा। मर्लिन के लिए आज़ादी कोई मांग नहीं है। यह उसकी आदत है, उसकी साँस है। और फिर आती हैं जंगल की बेटियाँ यानी झारखंड और छत्तीसगढ़। मान लीजिए यहाँ सुमी रहती है। वह आदिवासी है। सुमी के गाँव में भेद नहीं है। लड़का-लड़की साथ नाचते हैं। साथ काम करते हैं। वहां दहेज़ का लालच नहीं है। बहुओं को जलाया नहीं जाता। लेकिन सुमी की लड़ाई बड़ी है। उसकी लड़ाई समाज से नहीं है। हालात से है। उसके जंगल कट रहे हैं। खदानें बन रही हैं। उसे घर छोड़ना पड़ता है। उसकी आधी मौत तो तभी हो जाती है जब उसे शहर जाना पड़ता है। वहां उसे डर लगता है। मानव तस्करी का डर। डायन बता दिए जाने का डर। उसकी लड़ाई अस्तित्व की है। 


चलिए आज बढ़ते हैं और एक लड़की की जन्म से लेकर विवाह होने तक की बात करते हैं। सबसे पहले बात जन्म की। तो, यहाँ भी ज़मीन-आसमान का फर्क है। साउथ इंडिया में देखिये। केरल में बेटी पैदा होती है। खुशियाँ मनती हैं। कोई मातम नहीं होता। आंकड़े झूठ नहीं बोलते। केरल में एक हज़ार लड़कों पर ग्यारह सौ लड़कियाँ हैं। अब नॉर्थ की ट्रेन पकड़िये। यूपी-हरियाणा आइये। यहाँ की हवा में जन्म से टेंशन है। हाँ, अब नारे जरूर लग रहे हैं। 'बेटी बचाओ' का डीजे ऑन है। कुछ-कुछ सुधार भी हो रहा है। लेकिन दिमाग बदलना आसान नहीं। याद करिए वह धार्मिक बात, कि "बेटा ही कुल तारेगा"। इधर यह सोच अभी गई नहीं है। नॉर्थ में लड़की को पैदा होने के लिए लड़ना पड़ता है। यह उसकी पहली जंग है।

फिर स्कूल का टाइम आता है। फर्क और गहरा हो जाता है। साउथ में पढ़ाई 'ऑप्शन' नहीं है। 'कम्पलसरी' है। केरल में सब पढ़े-लिखे हैं। तमिलनाडु सरकार लड़कियों को पैसे देती है, ताकि वो कॉलेज जाएं। लेकिन नॉर्थ इंडिया? यहाँ का सीन 'हार्डकोर' वाला है। इधर के गाँव में लड़की का स्कूल जाना ही एक बड़ी क्रांति है। उसे बैग टांगकर निकलना पड़ता है। उसे लड़ना पड़ता है घर वालों की ना-नुकुर से। पड़ोसियों के तानों से। रास्ते की छेड़खानी से। लाखों लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। क्यों? क्योंकि स्कूल दूर है। रास्ता सेफ नहीं है। भेड़िये बैठे हैं घात लगाए। व्यक्तिगत तौर पर सैकडों लड़कियों से मैने दो सवाल पूछे - 'क्या घर से स्कूल/कॉलेज जाने और आने में जो पुरुष मिलते हैं वे तुम्हें देखते हैं ? उनका जवाब है - 'हाँ, सब के सब।' दूसरा सवाल यह कि- 'क्या वे तुम्हे एक बेटी, एक बहन, एक भतीजी की तरह देखते हैं? उनका जवाब था - 'नहीं' (90%)। आप भी चाहें तो यह सवाल पूछ सकते हैं। बहरहाल, कुल मिलाकर साउथ में शिक्षा एक सिस्टम है तो नॉर्थ में यह एक जंग है। 


लड़कियों के जीवन मे असली फर्क पैसे कमाने में दिखता है। करियर में दिखता है। फैक्ट्रियों में जाइये। तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में देखिये। वहां औरतों की फौज है। तैंतालीस प्रतिशत वर्कर महिलाएं हैं। वहां कमाना 'नॉर्मल' है। महाराष्ट्र-गुजरात में भी यही हाल है। वहां लक्ष्मी का मतलब 'कमाऊ बेटी' है। लेकिन नॉर्थ इंडिया? यहाँ ईगो है। झूठी शान है। लोग कहते हैं, "हमारे घर की औरतें काम नहीं करतीं।" पैसा आते ही औरतों को घर में बैठा देते हैं। यह शान लड़कियों के सपनों को खा जाती है। अगर कोई करना भी चाहे? तो सेफ्टी का भूत खड़ा हो जाता है। नोएडा और गुरुग्राम जैसी जगहों में शाम को आठ बजे कोहराम मच जाता है। अगर बेटी घर न आए। साउथ और मुंबई में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेफ है। लड़कियाँ बेधड़क घूमती हैं। नॉर्थ में करियर के लिए जिगर चाहिए। बहुत बड़ा जिगर।

अब शादी की बात करते हैं। साउथ कोई स्वर्ग नहीं है। वहां भी मुसीबत है। सबसे बड़ी मुसीबत है 'सोना' यानी कि गोल्ड। वहां सोने को लक्ष्मी मानते हैं। यह आस्था मुसीबत बन गई है। शादियों में पागलपन है। लड़की को सोने से लाद देते हैं। लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो। उसकी वैल्यू उसके दिमाग से नहीं होती। उसके गले के हार से होती है। यह एक प्रकार का टॉर्चर है। नॉर्थ में दहेज़ अलग है। वहां कैश चाहिए। गाड़ी चाहिए। लेकिन नॉर्थ में एक चीज़ और डराती है- जाति और गोत्र। अपनी मर्जी से शादी करना पाप है। दूसरी जाति में शादी? मतलब मौत यानी ऑनर किलिंग। खाप पंचायतों का डर है। धर्म और जाति की शुद्धता के नाम पर जान ले ली जाती है। यानी नॉर्थ की लड़की 'च्वाइस' के लिए जान लगाती है। साउथ की लड़की 'सोने' के बोझ तले दबी है।


लेकिन नॉर्थ-ईस्ट को मत भूलिए। वह कहानी अधूरी रह जाएगी। मेघालय की खासी जनजाति को देखिये। वहां आज भी मातृसत्ता है। जायदाद सबसे छोटी बेटी को मिलती है। बच्चे माँ का सरनेम लगाते हैं। मणिपुर में 'इमा कैथेल' एक बाज़ार है। इसे सिर्फ औरतें चलाती हैं। यह नॉर्थ इंडिया के पितृसत्तात्मक मुंह पर तमाचा है। लेकिन एक दुःख भी है। जब ये लड़कियाँ दिल्ली या बैंगलोर आती हैं। तो भेदभाव होता है। नस्लीय टिप्पणी होती है। जो अपने घर में रानी हैं। उन्हें हमारे शहरों में घर नहीं मिलता। यह शर्म की बात है।


अब आप सोचेंगे। क्या नॉर्थ इंडिया इतना बेकार है? क्या यहां पूरा का पूरा अँधेरा ही है? नहीं, यहीं तो ट्विस्ट है। असली कहानी यहीं है। कहते हैं न, हीरा कोयले की खान में मिलता है। नॉर्थ इंडिया की लड़कियों को देखिये। पिछले कुछ सालों में उन्होंने गदर काट दिया है। खेल का मैदान देखिये। कुश्ती हो, बॉक्सिंग हो, क्रिकेट हो, मेडल कौन ला रहा है? वही लड़कियाँ। उन्हीं इलाकों से, जहाँ सबसे ज्यादा बंदिशें थीं। हरियाणा की फोगाट बहनें, साक्षी मलिक, मणिपुर की मैरी कॉम भी। ये सब उसी माहौल से निकलीं। जहाँ घर से निकलना मना था। नॉर्थ की लड़कियों में एक एटीट्यूड आ गया है। गज़ब का एटीट्यूड। उन्हें हर छोटी चीज़ के लिए लड़ना पड़ा। जींस पहनने के लिए, फ़ोन रखने के लिए, दोस्तों से मिलने के लिए। इसलिए वो अंदर से लोहे जैसी हो गई हैं। उनमें आग है। साउथ की लड़कियाँ स्टेबल हैं, उन्हें सिस्टम मिला। नॉर्थ की लड़कियाँ फाइटर हैं क्योंकि उन्हें हालात मिले।


आज का दौर डिजिटल है। हाथ में स्मार्टफ़ोन है। गेम बदल गया है। बिहार के गाँव की लड़की रील्स देख रही है। वह शिलांग की लड़की को देखती है। मुंबई की लड़की को देखती है। वह सीख रही है। मतलब, दीवारें गिर रही हैं। वह सोचती है, "अगर वो आज़ाद है, तो मैं क्यों नहीं?" लेकिन एक काला सच भी है। साइबर बुलिंग। अब खतरा सड़क से उठकर स्क्रीन पर आ गया है। गंदी बातें, न्यूड पिक्चर और ब्लैकमेलिंग। इससे हर भारतीय लड़की लड़ रही है। चाहे वो साउथ की हो, नॉर्थ की हो या नॉर्थ-ईस्ट की।


तो निचोड़ क्या है? हमें क्या चाहिए? बात बहुत साफ़ है। हमें एक नया इंडिया चाहिए। एक मिक्स इंडिया। हमें साउथ जैसा सिस्टम चाहिए। अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, सेफ सड़कें। हमें नॉर्थ जैसा भी जज़्बा चाहिए, हार न मानने की ज़िद। हमें मुंबई जैसा काम का माहौल चाहिए, जहाँ लोग काम से काम रखें। हमें नॉर्थ-ईस्ट जैसा कल्चर चाहिए, जहाँ बेटी बोझ न हो, घर की मालिक हो और हमें आदिवासी समाज जैसी बराबरी चाहिए।


सोचिए, जिस दिन यह सब मिल जाएगा, उस दिन क्या होगा? हमारी बेटियाँ उड़ेंगी फाईटर प्लेन की तरह। बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से तेज होगी उनकी रफ़्तार। इस बालिका दिवस उन्हें शुभकामनाओं के साथ बस इतना ही। 


(नोट : इन बातों को मुकम्मल न माना जाय, यह महज, एक पॉइंट ऑफ व्यू है)


संपर्क : महेश सिंह

गिरिडीह, झारखंड


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Friday, January 23, 2026

निराला का गद्य: महाप्राण से लोकप्राण की यात्रा


डॉ. विजय कुमार 

"साकी कुछ आज तुझे खबर है बसंत की
  हर सुबह पेश-ए-नज़र है बसंत की”      
                                                -  उफ़्फ़ुक़ु लखनवी

वसंत के आगमन के साथ जब प्रकृति अपना रूप धारण करती है, तब निराला का स्मरण अनायास ही हो जाता है। वर्णित पंक्तियाँ जिस उल्लास का संकेत करती हैं, निराला का जीवन और साहित्य उस उल्लास को पाने के लिए 'जीवन-संग्राम' की गाथा है। निराला का गद्य लेखन की कविता से कतिपय कमतर नहीं है. बल्कि यहां वे अधिक यथार्थवादी, अधिक आक्रामक और समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिक निकट दिखाई देते हैं। निराला का समय भारतीय इतिहास में उगला-स्ट्रेट का समय था। एक ओर औपनिवेशिक दासता की बेदियाँ थीं, तो दूसरी ओर आंतरिक कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ और सामंती ढाँचा भारतीय समाज को स्थापित किये गये थे। निराला का गद्य इसी तरह मराठा मोर्चा पर संघर्ष करने वाली भाषा है। जब हम उनके उपन्यासों- अप्सरा (1931), अलका (1933), प्रभावती (1936), और निरुपमा (1936) की बात करते हैं, तो हम उसमें वह केवल काल्पनिक रूमानी दुनिया नहीं रच रहे थे, बल्कि वे एक नए समाज का सपना देख रहे थे।
       अप्सरा और निरूपमा उपन्यासों में निराला ने नारी अस्मिता और अपनी स्वतंत्रता के प्रश्न को प्रमुखता से उठाया। उस दौर में, जब स्त्री का व्यक्तित्व घर की चारदीवारी तक सीमित था, निराला की कथा नायिकाएं में अपनी प्रतिभा और अधिकार का डंका बजता था। यहाँ स्वतंत्रता ,केवल राजनितिक स्वतंत्रता तक सीमित नही हैं बल्कि वह व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की छटपटाहट भी है। निराला के गद्य पाठक को केवल सूचना नहीं है, बल्कि उन्हें उस संघर्ष का हिस्सा बताया गया है जो निराला ने अपने निजी जीवन में भी झेला था। निराला के गद्य का सबसे जीवंत और अनोखा पक्ष उनके रेखाचित्र और यादगार उपन्यासों में निखरता है। निराला के उपन्यासों, 'अप्सरा' और 'अलका' में स्वाधीनता का एक और आयाम उभरता है वह है 'सांस्कृतिक स्वाधीनता' जो आगे चलकर हमें स्पस्ट रूप में दिखलाई पड़ता हैं। निराला ये देख रहे थे कि भारतीय समाज पश्चिम की अंधी नकल और अपनी ही रूढ़ियों के बीच में फंसा हुआ है। उनके गद्य में जहां एक ओर सामंती सोच पर तीखा प्रभाव है, वहीं दूसरी ओर भारतीय मंदी के उस उदात्त रूप की खोज भी है, जो मनुष्य वास्तव में स्वतंत्र रचनाएं है। निराला की 'स्वाधीनता स्वयं' का एक राजनितिक और सामाजिक अर्थ है। 
      कुल्लीभाट और बिल्लेसुर बकरिहा हिंदी साहित्य की वे कृतियाँ हैं, प्रश्न यथार्थवाद को एक नई शुरुआत दी। कुल्लीभाट (1938-39) और बिल्लेसुर जैसे पात्र अपने स्मारकीय साहस के साथ जीवन जीते हैं, वह निराला की "जीवन-संग्राम भाषा की" का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। कुल्लीभाट में निराला ने जिस बेबाकी से ब्राह्मणवादी कट्टरता और सामाजिक पाखंड पर प्रहार किया, उसमें उनके विद्रोही अनूठेपन का ही विस्तार था। निराला जब 'कुल्लीभाट' रचते हैं, तो वे केवल एक व्यक्ति का चरित्र चित्रण नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे उस सामाजिक संरचना को चुनौती दे रहे हैं जो प्रतिभा को जाति और कुल के विशिष्ट गुणों में वर्गीकृत कर देता है। कुल्लीभाट का चरित्र अपने स्थान पर बने रहने के बावजूद जिस तरह से शिक्षित होना और समाज में अपना स्थान बनाना की जिद करता है, वह निराला की अपनी जिद का ही एक अक्स है।
        बिल्लेसुर बकरिहा (1942) को देखें तो इसमें एक निम्नतम मध्यवर्गीय किसान और पशुपालक के संघर्ष की कथा है। बिल्लेसुर का अपना ज़मीन के लिए टुकड़ा, अपना शिकार बनाना और हार न मानना, स्वाधीनता के उस सूक्ष्म रूप का विवरण है जिसे आर्थिक स्वावलंबन कहते हैं। निराला यह भली-भांति जानते थे कि जब तक व्यक्तिगत और मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होंगे, देश की राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। इसलिए उनके गद्य में "स्वाधीनता स्वयं" का एक व्यापक अर्थ ग्रहण किया गया है, जिसमें जाति, धर्म और वर्ग की शिक्षाएँ दिखाई देती हैं। निराला की गद्य शैली की एक और विशेषता उनकी सादगी और देशीपन है। जहाँ उस समय के कई रचनाकार संस्कृतनिष्ठ या अति क्लिष्ट भाषा का प्रयोग कर रहे थे, वहीं निराला नेचाल की ज़बान को साहित्य का गौरव प्रदान किया। उनकी भाषा में वह कुर्दरापन है जो वास्तविक जीवन में घटित होता है। यह उनका "जीवन-संग्राम की भाषा" रचना है। वे सजे-धजे महलों की कहानी नहीं सुनाते, बल्कि उन किताबों और किताबों की बातें करते हैं जहां जीवन हर दिन एक नई लड़ाई लड़ता है।
           निराला की कविता उनकी कविता का सार नहीं है, बल्कि उनकी क्रांतिकारी क्रांति का मुख्य हथियार है। निराला के गद्य में स्वाधीनता निहित है। अगर वह अप्सरा की नारी हो या बिल्लेसुर , संघर्षशील ग्रामीण के रूप में, निराला के गीतों के माध्यम से जो स्वर गूंजता है, वह 'मुक्ति' का स्वर है। बसंत की वह बहार, निराला के लिए केवलमौसम परिवर्तन नहीं था, बल्कि वह समाज में आने वाले उस बदलाव का प्रतीक था, नयेपन का प्रतीक था जिसको निराला अपनी साहित्यिक दृष्टि से देख रहें थे, जिसके लिए उन्होंने कलम को तलवार की तरह की शैली दी। निराला का गद्य आज भी मौलिक पतन है, क्योंकि "जीवन-संग्राम" आज भी जारी है और स्वाधीनता की रक्षा हर युग की अनिवार्य आवश्यकता है। 'बिल्लेसुर बकरिहा' की कथावस्तु में जिस तरह का यथार्थवाद निराला ने पिरोया है, वह प्रेमचंद के यथार्थवाद से थोड़ा अलग और अधिक आक्रामक है। बिल्लेसुर का संघर्ष केवल पेट भरने का संघर्ष नहीं है, बल्कि वह अपनी अस्मिता को बचाये रखने का संघर्ष है। 
          निराला ने गद्य को जो "जीवन-संग्राम की भाषा" कहा, उसका एक बड़ा आधार यह भी है कि निराला ने गद्य में उस भाषा को प्रतिष्ठित किया जो 'पसीने की गंध' से सराबोर है। इसमें मजबूती नहीं है; वह सच है कि इसमें जो पाठक शामिल होते हैं और विचारों पर जबरदस्ती करते हैं। साथ ही, निराला के यादगार गद्य में जिस तरह का आत्म-दर्शन होता है, वह वायरल है। वे अपने दोषों को भी उसी निर्भीकता से स्वीकार करते हैं, जिस निर्भीकता से वे दस्तावेजों की आलोचना करते हैं। यह 'सत्य' के प्रति उनकी निष्ठा ही है जो उनके गद्य को एक नैतिक शक्ति प्रदान करता है। स्वाधीनता चेतना का यह सर्वोच्च रूप है, जहाँ रचनाकार किसी भी प्रकार के भय या लोभ से मुक्त होकर बात अपनी कहता है। निराला का गद्य इसी अर्थ में स्वाधीनता है, वह न तो किसी वैजचारिक गुटबाज़ी का हिस्सा है और न ही किसी सिद्धांत चर्चा के दबाव में लिखा गया है। अंततः, निराला का गद्य साहित्य उनकी विरासत है जो हमें सिखाया जाता है कि उनकी रचना केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं है, बल्कि वह "स्वतंत्रता का रंगघोष" है। उनकी रचनाएँ आज भी हमें सिखाती हैं कि संकटपूर्ण परिस्थितियाँ इतनी विषम हैं परन्तु मनुष्य की जिजीविषा और उसकी स्वतंत्रता की इच्छा को वसंत में खिलने वाले फूलों की तरह कभी कुचला नहीं जा सकता। निराला का गद्य उनके साहित्य का विस्तार है। जहां कविता में वे 'महाप्राण' हैं, वहीं गद्य में वे 'लोकप्राण' के रूप में उभरते हैं।

संपर्क : हिंदी विभाग शास. तिलक महाविद्यालय

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Monday, January 12, 2026

युवा दिवस पर आज के युवाओं की हालत


लेखक : महेश सिंह

आज 12 जनवरी है, यानी राष्ट्रीय युवा दिवस। स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन। पूरा देश आज युवाओं की बात कर रहा है। वादों और दावों का दौर चल रहा है। कई मंचों से बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे होंगे कि भारत एक युवा देश है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और यही आबादी हमें एकदिन 'विश्वगुरु' बनाएगी। यह सब सुनना बहुत अच्छा लगता है, कानों को सुकून देता है। लेकिन जब हम हकीकत से रूबरू होते हैं तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। युवा दिवस का उत्सव मनाना है, मनाइए, लेकिन क्या केवल उत्सव मना लेने भर से आज के युवाओं दशा सुधर जाएगी? क्या हमारे पास ऐसी आँखें हैं जो उनकी मनोदशा को, आदतों को, मजबूरियों और निराशा को साफ-साफ देख सकें? स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए," लेकिन आज का युवा न तो ठीक से जाग पा रहा है और न ही उसे अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा है। वह तो एक अजीब से धुंधलके में जी रहा है।

सबसे पहले अगर हम आज के युवा की दिनचर्या और आदतों पर गौर करें, तो एक बहुत बड़ा बदलाव नजर आता है। उसके हाथ में किताबों की जगह स्मार्टफोन है। सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले उसका हाथ मोबाइल पर जाता है और रात को सोने से पहले आखिरी नजर स्क्रीन पर होती है। घंटों 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' को स्क्रॉल करते हुए कब वक्त निकल जाता है, इसका उसे आभास ही नहीं होता। यह आदत एक मानसिक बीमारी का रूप ले चुकी है। आभासी दुनिया के चक्कर मे वह असलियत से बहुत दूर खड़ा है। सोशल मीडिया पर दूसरों की 'परफेक्ट' दिखती जिंदगी को देखकर वह अपने भीतर ही भीतर हीनता का शिकार हो रहा है। उसे लगता है कि बाकी सब खुश हैं, बस वही एक है जो पीछे छूट गया है। यह तुलना उसे डिप्रेशन यानी अवसाद की तरफ धकेल रही है। खेल के मैदानों में या रचनात्मक कार्यों में लगने वाली उसकी सारी ऊर्जा 6 इंच की स्क्रीन पर अंगुलियां फिराने में जाया हो रही है। एकाग्रता की कमी तो इतनी ज्यादा हो गई है कि अब 15 सेकंड से ज्यादा किसी गंभीर बात को सुनना या समझना उसके लिए मुश्किल हो गया है।
इस डिजिटल नशे के साथ-साथ अगर हम शिक्षा और रोजगार की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। हमारे देश में डिग्रियां तो बहुत बंट रही हैं, लेकिन उन डिग्रियों से रोजगार नहीं मिल पा रहा है। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की भरमार है। हर साल लाखों युवा ग्रेजुएट होकर निकल रहे हैं, लेकिन उनमें से कितनों के पास कोई ऐसी स्किल या हुनर है जिससे वे अपनी रोजी-रोटी कमा सकें? यह एक कड़वा सच है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने हमें डिग्री लेना तो सिखा दिया, लेकिन काम करना नहीं सिखाया। सरकारों का रवैया भी कुछ ठीक नहीं है। आज पीएच.डी. किया हुआ बंदा भी चपरासी की नौकरी के लिए लाइन में लगने को मजबूर है। ऐसी व्यवस्था केवल एक समस्या नहीं कही जा सकती, यह तो युवाओं के आत्मसम्मान की हत्या है। जब एक पढ़ा-लिखा नौजवान सालों तक नौकरी के लिए धक्के खाता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने जवानी के सुनहरे 5-7 साल एक छोटे से कमरे में गुजार देता है और फिर अचानक से खबर आती है कि पेपर लीक हो गया या भर्ती रद्द हो गई, तो सोचिए उस पर क्या बीतती होगी? यह हताशा उसे अंदर से तोड़ देती है। वह अपने मां-बाप की उम्मीदों का बोझ और अपनी असफलता का दर्द लेकर जीता है। यही हताशा और बेरोजगारी उसे उस रास्ते पर ले जाती है, जहां उसे नहीं जाना चाहिए।

जब भविष्य धुंधला दिखता है और सपने टूटते हैं, तो इंसान सहारा ढूंढता है। दुर्भाग्य से, आज के दौर में बहुत से युवाओं को यह सहारा नशे में मिल रहा है। नशा आज के युवाओं के लिए एक 'एस्केप रूट' यानी हकीकत से भागने का रास्ता बन गया है। चाहे वह शराब हो, सिगरेट हो या फिर सिंथेटिक ड्रग्स, युवाओं की एक बड़ी तादाद इसकी चपेट में है। उन्हें लगता है कि नशा करके वे कुछ पल के लिए अपने तनाव, अपनी बेरोजगारी और गरीबी को भूल जाएंगे। लेकिन यह भूल उन्हें मौत के मुंह में ले जा रही है। कफन कहानी में घीसू और माधव भी कुछ इसी तरह अपने दुख को भुलाने की कोशिश करते हैं। बहरहाल, पहाड़ों से समंदर तक, महानगरों से लेकर छोटे कस्बों, यहाँ तक कि गॉंवों में भी नशे का कारोबार फल-फूल रहा है। क्योंकि उसका ग्राहक वह निराश युवा है जिसके पास करने को कोई काम नहीं है। यह करोबार सिर्फ युवाओं के शरीर को खोखला नहीं कर रहा है, बल्कि उसके परिवार को भी बर्बाद कर रहा है। नशा करने के लिए तो पैसे चाहिए और पैसे तो हैं नहीं, पूरी जेब खाली है। अब वह करे तो क्या करे? बस यहीं से उसे एक रास्ता नजर आता है जो अपराध की तरफ जाता है।

बेरोजगारी और नशे का अपराध से सीधा रिश्ता होता है। जब सीधे रास्ते से पैसा नहीं आता और समाज में इज्जत नहीं मिलती तो वही युवा शॉर्टकट तलाशता है। आज साइबर क्राइम में पकड़े जाने वाले अधिकतर अपराधी 20 से 30 साल के हैं। जामताड़ा जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं। उन्हें लगता है कि जब सिस्टम उन्हें कुछ नहीं दे रहा, तो वे सिस्टम को ठगकर अपना हक ले लेंगे। लूटपाट, छिनैती और ऑनलाइन ठगी जैसी घटनाओं में युवाओं की संलिप्तता खूब है। हमारी सामाजिक और नैतिक व्यवस्था इतनी चरमरा गयी है कि उन्हें यह समझाने वाला कोई नहीं है कि अपराध का रास्ता अंततः बर्बादी की ओर ही जाता है। इसके अलावा, गरीबी भी एक बहुत बड़ा कारण है। एक तरफ चकाचौंध है, मॉल कल्चर है, बड़ी गाड़ियां हैं और दूसरी तरफ दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष है। यह असमानता युवाओं के मन में आक्रोश पैदा करती है। वह समाज से, सरकार से और अपने आप से नफरत करने लगता है।
इन सब परिस्थितियों का सबसे दुखद पहलू है आत्महत्या। पिछले कुछ वर्षों में छात्रों और बेरोजगार युवाओं में आत्महत्या की दर तेजी से बढ़ी है। कोटा जैसे शहरों से आने वाली खबरें दिल दहला देती हैं। उज्ज्वल भविष्य के सपनो की उम्मीदों का इतना बोझ डाल दिया जाता है कि उसे अपनी जान लेने में ही मुक्ति नजर आती है। सही मायने में तो यह हम सब के लिए शर्म की बात है। 'सक्सेस' और 'फेलियर' का ऐसा पैमाना हमने बना दिया है कि अगर सरकारी नौकरी नहीं मिली या परीक्षा में अच्छे नंबर नहीं आए, तो जीवन ही बेकार है। यह सोच युवाओं को मार रही है। वे मानसिक रूप से इतने अकेले हो गए हैं कि भीड़ में रहते हुए भी अपनी बात किसी से कह नहीं पाते। परिवारों में संवाद की कमी है। माता-पिता भी अपनी इच्छाएं बच्चों पर थोप देते हैं। वे बच्चे की क्षमता और उसकी रुचि को समझने का प्रयास तक नहीं करते। नतीजतन, युवाओं में हताशा इस कदर घर कर गई है कि छोटी-छोटी असफलताओं पर भी वे जिंदगी खत्म करने जैसा कदम उठा लेते हैं।  
अशिक्षा भी एक अलग रूप में मौजूद है। साक्षर होना और शिक्षित होना दो अलग बातें हैं। आज का युवा साक्षर तो है, वह व्हाट्सएप पढ़ सकता है, फेसबुक चला सकता है, लेकिन उसमें सही और गलत का फर्क करने वाली शिक्षा यानी विवेक की कमी है। उसे जिस दिशा में मोड़ दिया जाए, वह मुड़ जाता है। इसी का फायदा उठाकर राजनीतिक दल और कट्टरपंथी संगठन उसे दंगों में, उन्माद में और हिंसा में इस्तेमाल करते हैं। वह भीड़ का हिस्सा बन जाता है, बिना यह सोचे कि वह किसका नुकसान कर रहा है। उसके पास अपनी कोई मौलिक सोच नहीं है, वह वही सोचता है जो उसे सोशल मीडिया पर परोसा जाता है। युवाओं की यह बौद्धिक गरीबी' आर्थिक गरीबी से कहीं ज्यादा खतरनाक है। एक तरह से यह स्थिति मानसिक गुलामी की कही जा सकती है।
मसलन, हालात वाकई चिंताजनक हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया है। आज युवा दिवस पर हमें इन समस्याओं को स्वीकार करना होगा। आज के समय में हमें मतलब हम सभी को उसके मनोवैज्ञानिक भाव को समझने की चेष्टा करनी होगी। अगर किसी देश का युवा बीमार है तो देश स्वस्थ नहीं हो सकता। सरकार को रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे। सिर्फ वादों से पेट नहीं भरने वाला। शिक्षा व्यवस्था को बदलने के नाम पर केवल अपना राजनैतिक हित साधने से कुछ नहीं होने वाला। इसके साथ ही खुद युवाओं को भी यह जिम्मेदारी लेनी होगी। उन्हें स्वामी विवेकानंद के उसी संदेश को आज के संदर्भ में समझना होगा। उन्हें रील की दुनिया से निकलकर रियल दुनिया में पसीना बहाना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि कोई भी सफलता शॉर्टकट से नहीं मिलती। उन्हें अपनी मानसिक स्थिति को मजबूत करना होगा और नशे या अपराध जैसे रास्तों को नकारना होगा। निराशा के बादल कितने भी घने हों, सूरज तो उगेगा ही। समस्या है तो समाधान भी है। लेकिन उसके लिए जागना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है। सोहन लाल द्विवेदी की एक कविता है- 'लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।'

© महेश सिंह
 
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Wednesday, January 7, 2026

समकालीन विद्रूपताओं के विरुद्ध एक निर्विवाद हस्तक्षेप


समीक्षक : डॉ. सुमित पी.वी. 

समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों का बोलबाला है, वहीं पवन कुमार सिंह का नया कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' एक सचेत सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है । यह संग्रह केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समय की शिला पर अंकित वे यथार्थवादी प्रश्न हैं, जिन्हें अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।


संग्रह की कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति गहरी चिंता और तीखा असंतोष व्याप्त है। 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' जैसी रचनाओं के माध्यम से कवि सत्ता के अहंकार, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर सीधा और निर्भीक प्रहार करते हैं । कवि यहाँ केवल एक दृष्टा नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था की विसंगतियों को बेनकाब करने वाला एक सजग नागरिक भी है । 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त भेदभाव और भाई-भतीजावाद की जड़ों को कुरेदती हैं।

पवन कुमार सिंह की दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती; वे प्रकृति को एक 'जीवंत सत्ता' के रूप में देखते हैं । 'ग्लेशियर' और 'डाल पर बैठा पंछी' जैसी कविताएं विकास की अंधी दौड़ में नष्ट होती पारिस्थितिकी और मानवीय लालच के प्रति आगाह करती हैं । वहीं, 'सीढ़ियाँ' और 'निर्विवाद' जैसी कविताओं में जीवन का दार्शनिक पक्ष उभरता है, जहाँ समय की गतिशीलता और मानवीय अस्तित्व के संघर्षों को बहुत गहराई से महसूस किया गया है।

कवि का शिल्प सहजता और सादगी पर टिका है। पवन कुमार सिंह की सबसे बड़ी शक्ति उनकी 'साफ़गोई' और सरल भाषा है, जो जटिल दार्शनिक भावों को भी आम आदमी की समझ के करीब ले आती है। 'समय की शिला' और 'लोकतंत्र की आत्मा' जैसे बिंबों का प्रयोग उनकी कविताओं को एक विशिष्ट प्रभाव प्रदान करता है । कवि के व्यक्तित्व में रची-बसी 'गाँव की सादगी' और 'शहर का संघर्ष' उनकी रचनाओं को एक व्यापक विस्तार देते हैं ।

पवन कुमार सिंह के कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' के शिल्प, तेवर और सरोकारों को समझने के लिए आधुनिक हिंदी कविता के कुछ महान हस्ताक्षर और उनकी रचनाओं से तुलना करना समीचीन होगा। पवन कुमार सिंह के कवि व्यक्तित्व में दुष्यंत कुमार जैसी बेबाकी और रघुवीर सहाय जैसी सूक्ष्म सामाजिक मारकता का मिश्रण दिखाई देता है। जिस तरह दुष्यंत की गजलें व्यवस्था की सड़ांध पर सीधे चोट करती थीं (जैसे: "हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए"), पवन कुमार सिंह भी अपनी कविता 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' के जरिए उसी तल्ख तेवर को अपनाते हैं। दुष्यंत के यहाँ जो 'विद्रोह' है, पवन के यहाँ वही 'साफ़गोई' के रूप में प्रकट हुआ है। रघुवीर सहाय ने आम आदमी की बेबसी और सत्ता के क्रूर मजाक को बहुत साधारण शब्दों में पिरोया था। पवन कुमार सिंह की 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं उसी परंपरा की अगली कड़ी मालूम होती हैं, जहाँ वे सामाजिक विसंगतियों को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखते हैं। पवन कुमार सिंह की 'लोकतंत्र' पर केंद्रित कविताएं धूमिल की याद दिलाती हैं। धूमिल ने जिस तरह लोकतंत्र को एक 'तमाशा' बताया था, पवन भी अपनी कविताओं में इसे 'मक्कार की गोद में बैठा' हुआ दिखाकर वर्तमान समय की राजनीतिक विद्रूपताओं को उजागर करते हैं। हालाँकि, जहाँ धूमिल की भाषा अधिक आक्रामक और हिंसक है, पवन की भाषा में एक शिक्षक की संयत पीड़ा और सुधार की चाह अधिक है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस तरह का 'आत्म-संघर्ष' और 'समय का अंधेरा' दिखता है, पवन की 'सीढ़ियाँ' और 'मुक्ति का पथ' जैसी रचनाएं उसी अस्तित्वगत व्याकुलता का आधुनिक संस्करण हैं। मुक्तिबोध जहाँ जटिल बिंबों का सहारा लेते हैं, पवन इसे 'सीढ़ियों' जैसे सरल प्रतीकों से स्पष्ट करते हैं। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के लिए पंत जी जाने जाते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति 'सुकोमल' है। इसके विपरीत, पवन कुमार सिंह की 'ग्लेशियर' और 'डाल पर बैठा पंछी' जैसी कविताएं गुलज़ार के नवीनतम संग्रह 'ग्रीन पोयम्स' के करीब खड़ी होती हैं। यहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि संकटग्रस्त अस्तित्व की गवाह है। पवन कुमार सिंह की प्रकृति 'दुखती' हुई प्रकृति है, जो आधुनिक विकास के प्रहारों से घायल है। पवन की 'मैं एक गिलहरी हूँ' जैसी कविताओं की तुलना कुंवर नारायण की कविताओं से की जा सकती है। कुंवर नारायण की तरह पवन भी छोटे जीव-जंतुओं और वस्तुओं के माध्यम से बड़ी मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हैं। यह 'मौन' के जरिए 'मुखर' होने की कला है जो दोनों कवियों में साझा दिखती है। यदि पवन कुमार सिंह को एक काव्य-परंपरा में रखना हो, तो वे 'जनचेतना के कवि' हैं। उनकी तुलना उन कवियों से की जा सकती है जो कविता को ड्राइंग रूम की वस्तु न मानकर समाज का 'आईना' और 'हथियार' दोनों मानते हैं। जहाँ वे शिल्प में दुष्यंत के करीब हैं, वहीं संवेदना में वे रघुवीर सहाय और कुंवर नारायण के वैचारिक पदचिह्नों पर चलते दिखाई देते हैं।

जहाँ विषय-वस्तु की ईमानदारी इस संग्रह की ताकत है, वहीं शिल्प के स्तर पर कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान जाता है। अधिकांश कविताएं 'छंदमुक्त' और सरल शैली में हैं, जिससे कहीं-कहीं 'सपाटबयानी' का आभास होता है । आधुनिक कविता के पाठकों को यहाँ शिल्पगत प्रयोगों और भाषाई जटिलताओं की कमी खल सकती है । इसके अतिरिक्त, कुछ कविताओं में निराशा और अवसाद का स्वर इतना तीव्र है कि वे किसी ठोस वैचारिक समाधान के बजाय केवल यक्ष प्रश्नों तक ही सीमित रह जाती हैं । एक ही विषय (जैसे समय और लोकतंत्र) पर कई कविताओं के होने से कहीं-कहीं दोहराव भी महसूस होता है ।

इन छोटी सीमाओं के बावजूद, 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' अपनी संवेदनात्मक गहराई और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण एक संग्रहणीय कृति है । यह संग्रह उन पाठकों के लिए एक अनिवार्य दस्तावेज है जो समकालीन समाज के कड़वे सच और व्यवस्था के विद्रूप चेहरे को देखने का साहस रखते हैं । पवन कुमार सिंह की यह कृति हिंदी कविता की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जहाँ कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि परिवर्तन की एक वैचारिक इकाई है।



पुस्तक: निर्विवाद और अन्य कविताएं
कवि: पवन कुमार सिंह
प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन (2025)
मूल्य: ₹199


संपर्क : सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,

पीआरएनएसएस कॉलेज, मट्टनूर,

कण्णूर, केरल-670702,

sumithpoduval@gmail.com, 9497388529 




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Sunday, January 4, 2026

मानव स्वभाव की कुछ बातें


-महेश सिंह

मानव स्वभाव को समझने के लिए दुनियां भर में सदियों से चिंतन-मनन होता आया है। इसके लिए न जाने कितनों ने अपना पूरा जीवन बिता दिया लेकिन यह एक ऐसी पहेली है जो आजतक अनसुलझी है। आप अपने खुद के अनुभव से ही समझें तो अक्सर हम अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से हैरान हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई करीबी दोस्त अचानक बदल गया है, तो कभी हमें किसी की मुस्कुराहट के पीछे छिपे असली इरादे समझ नहीं आते। हम खुद से यह सवाल पूछते हैं कि आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ? इस तरह यह सवाल हमें काफी समय के लिए परेशान कर देता है। कई बार तो ऐसा होता है कि हमे समझना कुछ और चाहिए, समझ कुछ और लेते हैं। नतीजतन हमारा अपना खुद का व्यवहार ही बदलने लगता है। आइए, इस लेख के माध्यम से हम उन सभी पहलुओं को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं जो हमें न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी बेहतर इंसान बनाने में मदद करते हैं।


इस संदर्भ में सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है- 'अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना'। हम मनुष्यों का सामान्य स्वभाव है कि हम खुद को बहुत तार्किक या समझदार मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम अपनी भावनाओं के गुलाम होते हैं। जब भी कोई घटना घटती है तो हमारी पहली प्रतिक्रिया भावनात्मक होती है न कि तार्किक। उदाहरण के लिए जब कोई हमें नजरअंदाज करता है तो हमें गुस्सा आता है। हमारा यह गुस्सा सिर्फ उस व्यक्ति के व्यवहार के कारण नहीं होता बल्कि हमारी अपनी असुरक्षा और उस चाहत के कारण होता है कि लोग हमें महत्व दें। रॉबर्ट ग्रीन अपनी किताब 'द लॉ ऑफ ह्यूमन नेचर' में समझाते हैं कि 'जब तक हम अपनी भावनाओं के मालिक नहीं बनते, तब तक कोई और हमारे फैसलों का मालिक बना रहेगा'। जो व्यक्ति अपनी भावनाओं यथा; क्रोध, ईर्ष्या या डर आदि को देख और समझ सकेगा वही अपने मन का असली राजा होगा।  इसका माने यह नही है कि हमे अपनी भावनाओं को दबाना है। उन्हें एक तीसरे व्यक्ति की तरह दूर से देखना और समझना है। जब हम खुद को समझने लगते हैं तभी दूसरों के दिलों को पढ़ने की क्षमता विकसित कर पाते हैं।


इसके बाद, इंसानी फितरत का एक और दिलचस्प पहलू आता है, जिसे हम 'मुखौटा' या 'मास्क' कह सकते हैं। समाज में रहने के लिए हर इंसान एक तरह का नकाब पहनता है। यहां मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का एक शेर याद आ रहा है- "हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिस को भी देखना हो कई बार देखना।" किसी पार्टी या सामाजिक समारोह में आप देखते होंगे कि हर कोई मुस्कुरा रहा है। हर कोई एक दूसरे से बातें कर रहा है और एक-दूसरे के प्रति अपनापन दिखा रहा है। लेकिन आप समझिए कि इस दिखावे के पीछे कई बार छिपे हुए एजेंडे होते हैं। कोई आपकी तारीफ इसलिए कर रहा हो सकता है क्योंकि उसे आपसे कुछ चाहिए, या कोई अपनी अकेलेपन को छिपाने के लिए आपके साथ हो सकता है। यहां हमें लोगों के शब्दों पर नहीं उनके व्यवहार के पैटर्न पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि शब्द झूठ बोल सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की ऊर्जा और उसके लगातार किए गए कार्य कभी झूठ नहीं बोलते। अगर कोई व्यक्ति बार-बार दूसरों की बुराई आपके सामने करता है तो यह निश्चित है कि वह आपकी बुराई भी दूसरों के सामने करेगा। इसलिए, लोगों को समझने के लिए उनकी मुस्कुराहट के पीछे छिपे असली इरादों को पढ़ना सीखना बहुत जरूरी है।


इसी संदर्भ में ईर्ष्या एक ऐसी भावना है जो रिश्तों को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर देती है। यह एक जहर की तरह है। इसे कोई भी स्वीकारना नहीं चाहता लेकिन इसे महसूस सब करते हैं। किसी भी व्यक्ति के अंदर ईर्ष्या की शुरुआत तुलना से होती है। जब हम खुद को किसी और से कमतर आंकते हैं तो हमारे मन में एक जलन पैदा होती है जो धीरे-धीरे नफरत में बदल सकती है। कई बार हमारे दोस्त या सहकर्मी हमारी सफलता पर मुस्कुराते तो हैं, लेकिन उनकी आंखों में वह खुशी नहीं दिखती। यह ईर्ष्या का संकेत है। रॉबर्ट ग्रीन सलाह देते हैं कि 'अगर कोई आपसे ईर्ष्या करता है तो उसे जवाब देने या उससे लड़ने में अपनी ऊर्जा बर्बाद न करें। इसके बजाय, उसे अनदेखा करें और अपनी सफलता और विकास पर ध्यान केंद्रित करें।' आत्मविश्वास ईर्ष्या के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।


आत्म-मुग्धता भी मानव स्वभाव का एक अभिन्न अंग है। हर इंसान में थोड़ा बहुत आत्म-प्रेम होता ही है लेकिन जब यह हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो समस्या बन जाता है। एक आत्ममुग्ध व्यक्ति दुनिया को सिर्फ अपनी नजरों से देखता है। वह चाहता है कि हर कोई उसकी तारीफ करे। उसे लगता है कि दुनिया उसके इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे लोग दूसरों की भावनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं। लेकिन इसका इलाज 'सहानुभूति' में छिपा है। जब हम अपनी खुद की दुनिया से बाहर निकलकर दूसरों के दर्द और खुशियों को महसूस करने की कोशिश करते हैं तो हमारा अहंकार पिघलने लगता है और हम एक बेहतर इंसान बनने की तरफ अग्रसर होने लगते हैं। सच्चा आत्म-प्रेम वही है जो हमें दूसरों से जुड़ने में मदद करे।


इंसानी सोच की अतार्किकता एक और गहरा विषय है। इसपर हमें जरूर विचार करना चाहिए। हम सोचते हैं कि हमने बहुत सोच-समझकर निर्णय लिया है। ऐसा नहीं है ! असल में हमारे वे फैसले डर, अहंकार या लालच से प्रेरित होते हैं। हम पहले फैसला लेते हैं और बाद में उसे सही ठहराने के लिए तर्क ढूंढते हैं। जैसे, हम कोई महंगी चीज यह सोचकर खरीद लेते हैं कि इसकी हमें जरूरत है जबकि असल में वह खरीदारी हमारी किसी भावनात्मक कमी को पूरा करने के लिए की गई होती है। इस अतार्किकता से बचने का तरीका यही है कि जब भी हम भावुक हों तो कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले थोड़ा रुकें। अपनी भावनाओं को पहचानें और सोचें कि क्या यह फैसला डर की वजह से लिया जा रहा है या वाकई यह सही कदम है। यह ठहराव हमें प्रतिक्रिया देने के बजाय सही जवाब देने में मदद करता है।


जीवन में एक स्पष्ट उद्देश्य का होना भी बेहद जरूरी है। बिना उद्देश्य का जीवन एक ऐसी नाव की तरह है जिसका कोई माझी नहीं है। इसे अंग्रेजी में 'एमलेसनेस' कहते हैं। जब हमारे पास अपनी कोई दिशा नहीं होती तो हम दूसरों के सपनों और योजनाओं का हिस्सा बन जाते हैं। हम बस व्यस्त रहते हैं हासिल कुछ नहीं करते। व्यस्त होना और प्रगति करना दो अलग बातें हैं। अपना उद्देश्य खोजने का मतलब है अपने अंदर की आवाज को सुनना। वही हमसे कहती है कि हमें क्या करना पसंद है। इस तरह जब हम अपने जीवन का एक उद्देश्य तय कर लेते हैं, तो हमारे फैसले स्पष्ट हो जाते हैं और हम दूसरों के प्रभाव में आसानी से नहीं आते।


समाज का दबाव भी हमारे व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित करता है। हम एक सामाजिक प्राणी हैं और हमारे अंदर यह डर हमेशा बना रहता है कि अगर हम समूह से अलग चलेंगे, तो अकेले पड़ जाएंगे। इसलिए हम वही करते हैं जो बाकी सब कर रहे होते हैं। फलतः हम अपनी अलग सोच और रचनात्मकता को दबा देते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि महानता उन्हीं को मिली है जिन्होंने भीड़ से अलग चलने की हिम्मत दिखाई है। हमें यह समझना होगा कि भीड़ का हिस्सा बनकर रहना आरामदायक तो हो सकता है लेकिन हमारी असली पहचान खतरे में पड़ जाती है। असली आजादी वही है जब हम दूसरों की राय के गुलाम नहीं रहते और अपने फैसले खुद लेने की हिम्मत जुटाते हैं।


धैर्य एक ऐसी शक्ति है जिसे आज की भागदौड़ भरी दुनिया में हम भूलते जा रहे हैं। हमें हर चीज तुरंत चाहिए- सफलता, पैसा और पहचान। लेकिन यह तो प्रकृति का नियम है कि हर चीज का अपना एक समय होता है। किसान बीज बोने के अगले ही दिन फसल की उम्मीद नहीं करता। वह जानता है कि उसे धूप, पानी और समय देना होगा। इसी तरह जीवन में भी धैर्य रखना कोई कमजोरी नहीं कहा जा सकता। यह तो एक रणनीति है। जो व्यक्ति सही समय का इंतजार करना जानता है वही लंबी रेस का घोड़ा साबित होता है। अधीरता हमें गलत फैसले लेने पर मजबूर करती है।  


मानव स्वभाव में आक्रामकता को अक्सर बुरा माना जाता है लेकिन यह एक ऊर्जा है। अगर इसे दबाया जाए तो यह अंदर ही अंदर कुंठा और अवसाद का रूप ले लेती है।  लेकिन यहाँ भी सावधानी की जरूरत है। अगर आक्रामकता को सही दिशा मिले तो यही ऊर्जा हमें हमारे लक्ष्यों तक पहुंचा सकती है। इसे महत्वाकांक्षा और दृढ़ता में बदला जा सकता है। हमें अपने गुस्से या आक्रामकता से डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे एक ईंधन की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। यह हमें मुश्किलों से लड़ने और आगे बढ़ने की ताकत देती है।


हम सभी जानते हैं कि जीवन नश्वर है। फिर भी हम ऐसे जीते हैं जैसे हमें हमेशा यहां रहना है। हम मौत के बारे में बात करने से कतराते हैं। सचाई तो यह है कि कोई भी इंसान मृत्यु को स्वीकार करना ही नहीं चाहता। इस संदर्भ में मेरा मानना है कि मृत्यु को हमेशा याद रखना चाहिए। क्योंकि यह हमें जीवन का असली मूल्य समझाता है। जब हमें यह अहसास होता है कि हमारा समय सीमित है तो हम फालतू की चीजों जैसे अहंकार, ईर्ष्या और छोटी-मोटी चिंताओं में अपना समय बर्बाद करना बंद कर देते हैं। हम उन चीजों पर ध्यान देना शुरू करते हैं जो वाकई मायने रखती हैं। इस तरह मौत की याद हमें हर पल को पूरी शिद्दत से जीने की प्रेरणा देती है।


निष्कर्ष रूप में यही कहना है कि दूसरों को समझना बाद की बात है सबसे पहले तो हमें खुद को समझना होगा। आत्म-जागरूकता या सेल्फ-अवेयरनेस ही मानव जीवन को सुंदर बनाने का सबसे जरूरी तत्व है। जब हम अपनी कमियों, अपने डर और अपनी भावनाओं को बिना किसी निर्णय के देखने लगते हैं तो हम न केवल खुद को बेहतर बना पाते हैं बल्कि दूसरों के प्रति भी अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। किसी ने सच ही कहा है जिसने अपने मन को जीत लिया उसे दुनिया की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती।


संपर्क : mahesh.pu14@gmail.com

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