Skip to main content

Posts

Showing posts from December, 2025

जनपक्षधर लेखन के उत्तरदायित्व का बोध कराता रहेगा रामदेव सिंह 'कलाधर' सम्मान : डॉ. रमाशंकर सिंह

रिपोर्ट : डॉ. रवीन्द्र पीएस     भलुआ | देवरिया दिनांक 28 दिसंबर 2025 को ग्राम भलुआ, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश में 'स्व. विंध्याचल सिंह स्मारक न्यास द्वारा संचालित 'ग्रामीण पुस्तकालय' के स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह, परिचर्चा और कविता पाठ का आयोजन किया गया।  कार्यक्रम के शुभारंभ में अतिथियों को असमिया गमछा और भारतीय संविधान की प्रस्तावना भेंट कर स्वागत किया गया। ग्रामीण पुस्तकालय के उदेश्य और इसकी संकल्पना को साकार करने की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए न्यास के अध्यक्ष, परिवर्तन पत्रिका के सम्पादक एवं शिक्षक डॉ. महेश सिंह ने बताया कि मेरे जीवन में पुस्तकालयों ने क्रान्तिकारी भूमिका निभाई है। मैं इंटरमीडियट की पढ़ाई करने के बाद रोजी-रोटी की तलाश में गोवा गया था। वहीं गोवा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एसी का काम करने के दौरान पढ़ने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ी, फलस्वरुप मैंने आगे के वर्षों में परास्नातक और पीएचडी की उपाधि हासिल की। आज झारखण्ड राज्य में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। अपने अनुभवों, कठिनाइयों और संघर्षों को ध्यान में रखते हुए यह विचार आया कि पुस्तक...

भौगोलिक तथ्यों को कविता में समझाने की अद्भुत क़वायद

रामदेव सिंह 'कलाधर' (जन्मतिथि 23 फरवरी 1908, देहावसान 04 अप्रैल 1984) राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त समकालीन महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी रचनाओं में राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है।  रामदेव सिंह 'कलाधर' ने हिंदी भाषा, भोजपुरी लोक भाषा और बाल साहित्य सम्बन्धी विपुल मात्रा में विविधतापूर्ण कविताएं लिखी हैं। 23 से अधिक कविता संग्रह हिंदी भाषा में, भोजपुरी लोक साहित्य में छः से अधिक और बाल साहित्य में 12 से अधिक उनके संग्रह हैं! पांच भागों में उन्होंने भूगोल जैसे जटिल और तथ्यपरक विषय को कविता शैली में लिखी है जो भूगोल जैसे विषय में बच्चों की समझ विकसित करने और उनके लर्निंग आउटकम में सहायक है। भूगोल कलाधर (भाग एक से पांच तक) एक अत्यंत मौलिक और शिक्षाप्रद कृति है, जो भूगोल जैसे तथ्यपरक विषय को कविता के रसपूर्ण माध्यम से प्रस्तुत करती है। स्व. रामदेव सिंह 'कलाधर' एक कुशल शिक्षक थे। साथ ही साथ वे उच्च कोटि के कवि और समालोचक भी थे। इस पुस्तक की समीक्षा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह उभर कर आता है कि लेखक ने कठिन भौगोलिक आँकड़ों और विवरणों को प...

इश्क, इंक़लाब और इंसानियत के शैलेन्द्र

सिनेमा, साहित्य कला के वह माध्यम हैं जिसके ज़रिये समाज के यथार्थ को सामने लाया जाता है। हालांकि सिनेमा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मनोरंजन भी होता है लेकिन उसके साथ देखने वाले दर्शकों को अगर मानव जीवन के विभिन्न रूपों का साक्षात्कार कराया जाए और समाज से परिचित कराया जाता है तो यह सिनेमा की अप्रतिम सफलता भी होगी। साथ ही सिनेमा में हम कई बार देखते हैं कि उसके गीत के बोल समय के दायरे को लांघ कर युग सत्य के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। साहिर लुधियानवी हिन्दी या ये कहें कि भारतीय सिनेमा के उन चंद गीतकारों में से हैं जिन्होंने अपने गीतों के बोल के माध्यम से समाज, मानव जीवन-चेतना के कई रूपों को अभिव्यक्त किया है, स्वर दिया है। इश्क, इंक़लाब और इंसानियत के शब्दशिल्पी  के रूप में शैलेन्द्र को याद किया जाए तो कोई गुरेज नहीं हैं. शैलेन्द्र जिसकी गीत-धारा ने हिंदी सिनेमा को मानवीय संवेदना, सामाजिक न्यायबोध और दार्शनिक गहराई से जोड़ने में एक सफल भूमिका निभाई है। वे अपने गीतों में केवल गीतकार के रूप में  नहीं, बल्कि आम आदमी की तरफ़ से बोलने वाले ‘लोक–दर्शनिक’ के रूप में उभरकर सामने आते हैं,...

मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया

हिंदी फ़िल्म संगीत का इतिहास केवल मनोरंजन की कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के अंतःसंसार का जीवंत दस्तावेज़ भी है। इस इतिहास में कुछ गीतकार ऐसे हुए जिन्होंने प्रेम, विरह और सौंदर्य के पार जाकर मनुष्य, व्यवस्था और सत्ता से प्रश्न किए। इन्हीं में सबसे तेजस्वी नाम है साहिर लुधियानवी। उनके फ़िल्मी गीत केवल धुनों के साथ बँधी भावनाएँ नहीं, बल्कि प्रगतिशील चेतना के घोष-पत्र हैं। उन्होंने सिनेमा के लोकप्रिय माध्यम को सामाजिक आलोचना की धार प्रदान की और शोषण, युद्ध, वर्गभेद, स्त्री-पीड़ा और मानवीय गरिमा जैसे विषयों को गीतों के केंद्र में रखा। चित्र : गूगल से साभार         साहिर लुधियानवी का साहित्यिक संस्कार प्रगतिशील लेखक संघ की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हुआ था। उर्दू शायरी की परंपरा में पले-बढ़े साहिर ने रोमैंटिक भाषा को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। उनके लिए कविता सत्ता-प्रतिष्ठानों की शोभा बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का शस्त्र थी।लाहौर में साहिर ने ‘अदब-ए-लतीफ’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया, लेकिन प्रगतिशील विचारों के कारण पाकिस्ता...