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Friday, January 23, 2026

निराला का गद्य: महाप्राण से लोकप्राण की यात्रा


डॉ. विजय कुमार 

"साकी कुछ आज तुझे खबर है बसंत की
  हर सुबह पेश-ए-नज़र है बसंत की”      
                                                -  उफ़्फ़ुक़ु लखनवी
चित्र : गूगल से साभार
वसंत के आगमन के साथ जब प्रकृति अपना रूप धारण करती है, तब निराला का स्मरण अनायास ही हो जाता है। वर्णित पंक्तियाँ जिस उल्लास का संकेत करती हैं, निराला का जीवन और साहित्य उस उल्लास को पाने के लिए 'जीवन-संग्राम' की गाथा है। निराला का गद्य लेखन की कविता से कतिपय कमतर नहीं है. बल्कि यहां वे अधिक यथार्थवादी, अधिक आक्रामक और समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिक निकट दिखाई देते हैं। निराला का समय भारतीय इतिहास में उगला-स्ट्रेट का समय था। एक ओर औपनिवेशिक दासता की बेदियाँ थीं, तो दूसरी ओर आंतरिक कुरीतियाँ, रूढ़ियाँ और सामंती ढाँचा भारतीय समाज को स्थापित किये गये थे। निराला का गद्य इसी तरह मराठा मोर्चा पर संघर्ष करने वाली भाषा है। जब हम उनके उपन्यासों- अप्सरा (1931), अलका (1933), प्रभावती (1936), और निरुपमा (1936) की बात करते हैं, तो हम उसमें वह केवल काल्पनिक रूमानी दुनिया नहीं रच रहे थे, बल्कि वे एक नए समाज का सपना देख रहे थे।
       अप्सरा और निरूपमा उपन्यासों में निराला ने नारी अस्मिता और अपनी स्वतंत्रता के प्रश्न को प्रमुखता से उठाया। उस दौर में, जब स्त्री का व्यक्तित्व घर की चारदीवारी तक सीमित था, निराला की कथा नायिकाएं में अपनी प्रतिभा और अधिकार का डंका बजता था। यहाँ स्वतंत्रता ,केवल राजनितिक स्वतंत्रता तक सीमित नही हैं बल्कि वह व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की छटपटाहट भी है। निराला के गद्य पाठक को केवल सूचना नहीं है, बल्कि उन्हें उस संघर्ष का हिस्सा बताया गया है जो निराला ने अपने निजी जीवन में भी झेला था। निराला के गद्य का सबसे जीवंत और अनोखा पक्ष उनके रेखाचित्र और यादगार उपन्यासों में निखरता है। निराला के उपन्यासों, 'अप्सरा' और 'अलका' में स्वाधीनता का एक और आयाम उभरता है वह है 'सांस्कृतिक स्वाधीनता' जो आगे चलकर हमें स्पस्ट रूप में दिखलाई पड़ता हैं। निराला ये देख रहे थे कि भारतीय समाज पश्चिम की अंधी नकल और अपनी ही रूढ़ियों के बीच में फंसा हुआ है। उनके गद्य में जहां एक ओर सामंती सोच पर तीखा प्रभाव है, वहीं दूसरी ओर भारतीय मंदी के उस उदात्त रूप की खोज भी है, जो मनुष्य वास्तव में स्वतंत्र रचनाएं है। निराला की 'स्वाधीनता स्वयं' का एक राजनितिक और सामाजिक अर्थ है। 
      कुल्लीभाट और बिल्लेसुर बकरिहा हिंदी साहित्य की वे कृतियाँ हैं, प्रश्न यथार्थवाद को एक नई शुरुआत दी। कुल्लीभाट (1938-39) और बिल्लेसुर जैसे पात्र अपने स्मारकीय साहस के साथ जीवन जीते हैं, वह निराला की "जीवन-संग्राम भाषा की" का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। कुल्लीभाट में निराला ने जिस बेबाकी से ब्राह्मणवादी कट्टरता और सामाजिक पाखंड पर प्रहार किया, उसमें उनके विद्रोही अनूठेपन का ही विस्तार था। निराला जब 'कुल्लीभाट' रचते हैं, तो वे केवल एक व्यक्ति का चरित्र चित्रण नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे उस सामाजिक संरचना को चुनौती दे रहे हैं जो प्रतिभा को जाति और कुल के विशिष्ट गुणों में वर्गीकृत कर देता है। कुल्लीभाट का चरित्र अपने स्थान पर बने रहने के बावजूद जिस तरह से शिक्षित होना और समाज में अपना स्थान बनाना की जिद करता है, वह निराला की अपनी जिद का ही एक अक्स है।
        बिल्लेसुर बकरिहा (1942) को देखें तो इसमें एक निम्नतम मध्यवर्गीय किसान और पशुपालक के संघर्ष की कथा है। बिल्लेसुर का अपना ज़मीन के लिए टुकड़ा, अपना शिकार बनाना और हार न मानना, स्वाधीनता के उस सूक्ष्म रूप का विवरण है जिसे आर्थिक स्वावलंबन कहते हैं। निराला यह भली-भांति जानते थे कि जब तक व्यक्तिगत और मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होंगे, देश की राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। इसलिए उनके गद्य में "स्वाधीनता स्वयं" का एक व्यापक अर्थ ग्रहण किया गया है, जिसमें जाति, धर्म और वर्ग की शिक्षाएँ दिखाई देती हैं। निराला की गद्य शैली की एक और विशेषता उनकी सादगी और देशीपन है। जहाँ उस समय के कई रचनाकार संस्कृतनिष्ठ या अति क्लिष्ट भाषा का प्रयोग कर रहे थे, वहीं निराला नेचाल की ज़बान को साहित्य का गौरव प्रदान किया। उनकी भाषा में वह कुर्दरापन है जो वास्तविक जीवन में घटित होता है। यह उनका "जीवन-संग्राम की भाषा" रचना है। वे सजे-धजे महलों की कहानी नहीं सुनाते, बल्कि उन किताबों और किताबों की बातें करते हैं जहां जीवन हर दिन एक नई लड़ाई लड़ता है।
           निराला की कविता उनकी कविता का सार नहीं है, बल्कि उनकी क्रांतिकारी क्रांति का मुख्य हथियार है। निराला के गद्य में स्वाधीनता निहित है। अगर वह अप्सरा की नारी हो या बिल्लेसुर , संघर्षशील ग्रामीण के रूप में, निराला के गीतों के माध्यम से जो स्वर गूंजता है, वह 'मुक्ति' का स्वर है। बसंत की वह बहार, निराला के लिए केवलमौसम परिवर्तन नहीं था, बल्कि वह समाज में आने वाले उस बदलाव का प्रतीक था, नयेपन का प्रतीक था जिसको निराला अपनी साहित्यिक दृष्टि से देख रहें थे, जिसके लिए उन्होंने कलम को तलवार की तरह की शैली दी। निराला का गद्य आज भी मौलिक पतन है, क्योंकि "जीवन-संग्राम" आज भी जारी है और स्वाधीनता की रक्षा हर युग की अनिवार्य आवश्यकता है। 'बिल्लेसुर बकरिहा' की कथावस्तु में जिस तरह का यथार्थवाद निराला ने पिरोया है, वह प्रेमचंद के यथार्थवाद से थोड़ा अलग और अधिक आक्रामक है। बिल्लेसुर का संघर्ष केवल पेट भरने का संघर्ष नहीं है, बल्कि वह अपनी अस्मिता को बचाये रखने का संघर्ष है। 
          निराला ने गद्य को जो "जीवन-संग्राम की भाषा" कहा, उसका एक बड़ा आधार यह भी है कि निराला ने गद्य में उस भाषा को प्रतिष्ठित किया जो 'पसीने की गंध' से सराबोर है। इसमें मजबूती नहीं है; वह सच है कि इसमें जो पाठक शामिल होते हैं और विचारों पर जबरदस्ती करते हैं। साथ ही, निराला के यादगार गद्य में जिस तरह का आत्म-दर्शन होता है, वह वायरल है। वे अपने दोषों को भी उसी निर्भीकता से स्वीकार करते हैं, जिस निर्भीकता से वे दस्तावेजों की आलोचना करते हैं। यह 'सत्य' के प्रति उनकी निष्ठा ही है जो उनके गद्य को एक नैतिक शक्ति प्रदान करता है। स्वाधीनता चेतना का यह सर्वोच्च रूप है, जहाँ रचनाकार किसी भी प्रकार के भय या लोभ से मुक्त होकर बात अपनी कहता है। निराला का गद्य इसी अर्थ में स्वाधीनता है, वह न तो किसी वैजचारिक गुटबाज़ी का हिस्सा है और न ही किसी सिद्धांत चर्चा के दबाव में लिखा गया है। अंततः, निराला का गद्य साहित्य उनकी विरासत है जो हमें सिखाया जाता है कि उनकी रचना केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं है, बल्कि वह "स्वतंत्रता का रंगघोष" है। उनकी रचनाएँ आज भी हमें सिखाती हैं कि संकटपूर्ण परिस्थितियाँ इतनी विषम हैं परन्तु मनुष्य की जिजीविषा और उसकी स्वतंत्रता की इच्छा को वसंत में खिलने वाले फूलों की तरह कभी कुचला नहीं जा सकता। निराला का गद्य उनके साहित्य का विस्तार है। जहां कविता में वे 'महाप्राण' हैं, वहीं गद्य में वे 'लोकप्राण' के रूप में उभरते हैं।

संपर्क : हिंदी विभाग शास. तिलक महाविद्यालय

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