हाल ही में अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई फिल्म सूबेदार एक ऐसी फिल्म है जो एक साथ कई कहानियों, सामाजिक मुद्दों और मानवीय भावनाओं को समेटने का प्रयास करती है। सुरेश त्रिवेणी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में वरिष्ठ अभिनेता अनिल कपूर मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म की कहानी मुख्य रूप से एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी, सूबेदार अर्जुन मौर्य के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है।
अर्जुन अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा देश की सीमा पर और सेना के कठोर अनुशासन के बीच बिताने के बाद अपने घर वापस लौटता है। उसका यह घर मध्य प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में स्थित है। वह अपने पीछे एक शानदार सैन्य जीवन छोड़कर आया है, लेकिन उसके भीतर एक गहरा अपराधबोध और दुख भी है। जब वह अपनी ड्यूटी पर तैनात था, तब एक हादसे में उसकी पत्नी की मौत हो गई थी। इस कारण से वह अपनी बेटी श्यामा से भावनात्मक रूप से बहुत दूर हो चुका है।
फिल्म की शुरुआत इसी पारिवारिक अलगाव और एक पिता के अपनी युवा बेटी से जुड़ने के संघर्ष से होती है। फिल्म में अर्जुन मौर्य की पत्नी के किरदार में खुशबू सुंदर भी दिखाई देती हैं, जिनकी स्मृति और अनुपस्थिति कहानी के भावनात्मक आधार को और गहरा बनाती है।
दूसरी तरफ, उसी कस्बे में एक स्थानीय रेत माफिया का जबरदस्त आतंक है, जिसे प्रिंस और उसकी जेल में बंद बहन बबली दीदी चलाते हैं। जब एक छोटी-सी बात पर इस भ्रष्ट और बेलगाम माफिया का सामना उस अनुशासित और दुखी सूबेदार से होता है, तो कहानी में असल तनाव पैदा होता है।
फिल्म की पटकथा को बहुत ही यथार्थवादी और सीधे ढंग से लिखा गया है। शुरुआत में फिल्म एक बेहतरीन माहौल बनाती है, जहाँ आपको महसूस होता है कि कहानी धीरे-धीरे एक बड़े टकराव की तरफ बढ़ रही है। लेखक और निर्देशक ने एक पूर्व सैनिक की मानसिक स्थिति को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ परदे पर उतारने की कोशिश की है। अर्जुन मौर्य सिर्फ एक मारधाड़ वाला नायक नहीं है, वह एक ऐसा इंसान है जो अंदर से टूट चुका है और अपने परिवार को फिर से जोड़ना चाहता है।
वह समाज की गुंडागर्दी से दूर एक शांत जीवन जीना चाहता है, लेकिन जिस समाज में वह वापस आया है, वह भ्रष्टाचार, अराजकता और ताकत के नशे से भरा हुआ है। कहानी का मुख्य विषय यही है कि कैसे सेना का अनुशासित नियम आम नागरिक जीवन की बेतरतीब और भ्रष्ट व्यवस्था से टकराता है। जब सूबेदार की पत्नी की आखिरी निशानी, उसकी लाल रंग की जिप्सी कार—को प्रिंस के गुंडे नुकसान पहुँचाते हैं, तो सूबेदार का संयम टूट जाता है।
पटकथा में कुछ कमजोरियाँ भी हैं, जिन पर बात करना जरूरी है। कहानी में एक साथ बहुत सारे मुद्दे उठाने की कोशिश की गई है। एक तरफ सूबेदार और उसकी बेटी का तनावपूर्ण रिश्ता है, दूसरी तरफ बेटी श्यामा का अपने महाविद्यालय के लड़कों से संघर्ष है जो उसे परेशान करते हैं। फिल्म यह भी दिखाने की कोशिश करती है कि कैसे महिलाओं को पुरुषों के वर्चस्व वाले इस समाज में अपने सम्मान के लिए लगातार लड़ना पड़ता है।
इसके अलावा रेत माफिया का पूरा साम्राज्य और सत्ता का दुरुपयोग भी कहानी का बड़ा हिस्सा है। ये सारी बातें अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन फिल्म इन सभी को एक साथ अच्छी तरह से जोड़ नहीं पाती है। ऐसा लगता है कि कई अलग-अलग कहानियाँ एक साथ चल रही हैं, जो कभी-कभी मुख्य कहानी की रफ्तार को धीमा कर देती हैं। फिल्म को अलग-अलग अध्यायों में बाँटा गया है, लेकिन यह विभाजन कहानी को जोड़ने के बजाय कई बार उसके प्रवाह को तोड़ देता है। फ़िल्म के अंत को और बेहतर बनाया जा सकता था। लगता है जैसे निर्देशक ने किसी वजह से सैनिक एकता वाला पुट देने का काम किया है।
अभिनय के मामले में यह फिल्म पूरी तरह से अनिल कपूर के कंधों पर टिकी हुई है। उन्होंने जिस ऊर्जा और संयम के साथ सूबेदार अर्जुन मौर्य का किरदार निभाया है, वह बहुत ही प्रभावशाली है। उन्होंने इस किरदार के गुस्से और हताशा को बहुत ही खामोशी के साथ पेश किया है। उनके चेहरे के भाव, उनकी चाल और उनकी खामोशी उनके संवादों से ज्यादा बहुत कुछ कह जाते हैं।
वह एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बहुत ही स्वाभाविक लगते हैं, जो दुश्मनों से तो लड़ सकता है, लेकिन अपनी बेटी से सामान्य बातचीत करने में उसे बहुत हिचकिचाहट होती है। एक्शन दृश्यों में भी उनका शारीरिक संतुलन और फुर्ती देखने लायक है। उन्होंने एक ऐसे उम्रदराज सैनिक की भूमिका को पूरी ईमानदारी से जिया है, जो अपनी वर्दी का गर्व और अपनी पारिवारिक गलतियों का बोझ एक साथ ढो रहा है।
राधिका मदान ने सूबेदार की बेटी श्यामा का किरदार निभाया है। श्यामा अपनी माँ की मौत के सदमे और अपने पिता की गैरमौजूदगी के कारण बहुत ही गुस्सैल और चिड़चिड़ी हो गई है। राधिका ने इस मानसिक उलझन को बहुत ही सादगी और सच्चाई के साथ परदे पर उतारा है। पिता और बेटी के बीच जो एक अजीब-सी दूरी और खामोशी होती है, उसे दोनों कलाकारों ने बहुत ही बेहतरीन ढंग से निभाया है।
दूसरी ओर, फिल्म के मुख्य खलनायक प्रिंस के रूप में आदित्य रावल ने बहुत अच्छा काम किया है। प्रिंस एक ऐसा युवा है जिसे अपनी ताकत का बहुत घमंड है। वह बहुत तेज बोलता है, बिना सोचे-समझे फैसले लेता है और उसके अंदर एक अजीब-सा अभिमान है। आदित्य रावल ने इस चिड़चिड़े और अभिमानी किरदार को इतनी अच्छी तरह से निभाया है कि दर्शक के रूप में आपको उससे सच में चिढ़ होने लगती है। उनके इस शोरगुल वाले अभिनय से सूबेदार की खामोशी के बीच एक बहुत अच्छा विरोधाभास पैदा होता है।
फिल्म के बाकी सहायक कलाकारों ने भी कहानी को आगे बढ़ाने में अच्छी भूमिका निभाई है। सौरभ शुक्ला ने सूबेदार के दोस्त प्रभाकर का किरदार निभाया है। वह कहानी में एक ठहराव और समझदारी लेकर आते हैं और सूबेदार को आम जिंदगी जीने की सलाह देते हैं। उनका अनुभव और उनकी सहजता हर दृश्य में साफ नजर आती है।
फैसल मलिक ने सॉफ्टी के रूप में हमेशा की तरह अपना बेहतरीन काम किया है, जो प्रिंस के गिरोह का हिस्सा होने के बावजूद अपनी एक अलग पहचान बनाता है और ज्यादा समझदार नजर आता है। लेकिन मोना सिंह के किरदार बबली दीदी के साथ न्याय नहीं हो पाया है। कहानी के अनुसार बबली दीदी एक बहुत ही खतरनाक और चालाक महिला डॉन है, लेकिन पूरी फिल्म में उसे ऐसा कुछ भी करने का मौका नहीं मिलता जिससे उसका खौफ साबित हो सके।
निर्देशन और तकनीकी पहलुओं की बात करें तो सुरेश त्रिवेणी ने एक बहुत ही अलग तरह की दुनिया रचने की कोशिश की है। उन्होंने मध्य प्रदेश के इस छोटे से कस्बे के माहौल को बहुत ही असली और कच्चा रखा है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत ही शानदार है। धूल भरे रास्ते, पुरानी इमारतें और वहाँ का पूरा रहन-सहन कहानी के मूड से बिल्कुल मेल खाता है। फिल्म के एक्शन दृश्यों को भी बहुत ही असली रखा गया है।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि सूबेदार एक ऐसी फिल्म है जिसका इरादा बहुत साफ है। यह सिर्फ एक मारधाड़ वाली फिल्म नहीं है, बल्कि एक इंसान के अपने अतीत, अपने परिवार और एक भ्रष्ट समाज से लड़ने की साधारण कहानी है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका मुख्य विचार और अनिल कपूर का शानदार अभिनय है। अपनी कुछ खामियों के बावजूद यह फिल्म अपनी सादगी और संवेदनशीलता के कारण एक बार देखने लायक अनुभव जरूर प्रदान करती है।
समीक्षक : महेश सिंह
गिरिडीह, झारखंड


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