साहित्य, संस्कृति एवं सिनेमा की वैचारिकी का वेब-पोर्टल

Thursday, January 29, 2026

एक संविधान फिर भी इतने हिंदुस्तान ?

  एक संविधान फिर भी इतने हिंदुस्तान ?

हिंदुस्तान का नक्शा उठाइये, उसे गौर से देखिये, देश के बीचों-बीच एक लकीर दिखेगी, पहाड़ों की लकीर। इस लकीर का नाम है विंध्याचल। भूगोल की किताब में यह सिर्फ एक पहाड़ है। मतलब, पत्थर और जंगल। लेकिन रुकिए! अगर आप एक लड़की हैं, तो इसे पहाड़ की तरह नहीं देख सकते। यह एक दीवार है, चीन की महान दीवार जैसी। यह बॉर्डर है आपकी किस्मत का। सच कहूँ? विंध्याचल के उस पार एक दुनिया है, जिसे साउथ इंडिया कहते हैं। विंध्याचल के इस पार भी एक दूसरी दुनिया है, जिसे नॉर्थ इंडिया कहते हैं। दोनों तरफ लड़कियों की कहानी जुदा है। स्क्रिप्ट बिलकुल अलग है। इतना ही नहीं, पूरब में जाइए, पहाड़ों में बसे नॉर्थ-ईस्ट को देखिये। पश्चिम में जाइए, समंदर किनारे बसे गुजरात और महाराष्ट्र को देखिये। या फिर उतर जाइये देश के दिल में। आदिवासियों के जंगलों में। हर जगह कहानी बदल जाती है। ऐसा लगता ही नहीं कि यह एक देश है और एक संविधान है। सवाल बहुत सीधा है दोस्त। आखिर एक लड़की के लिए लाइफ कहाँ आसान है? कहाँ उसे ज्यादा आज़ादी है? और कहाँ उसे साँस लेने के लिए भी लड़ना पड़ता है? दुनियाँ घूमने और देखने का असल नफा यही है कि आप कुछ सवालों के जवाब जानते हैं। तो, आइए, कुछ विचार किया जाय।


शुरुआत आज से नहीं होगी। हमें पीछे जाना होगा, सैकड़ों साल पीछे। हमारे आज के जो हालात हैं उनकी जड़ें वहां तक जाती हैं। आखिर इतना फर्क आया कहाँ से? इसका जवाब हमारे इतिहास में है। हमारी धार्मिक मान्यताओं में है। समाज की रीतियों में है। पहले नॉर्थ इंडिया को देखते हैं। मतलब पुराने ज़माने का आर्यावर्त, जहाँ वैदिक काल के बाद भारी बदलाव आया। स्मृतियों जैसी किताबों का असर बढ़ा। धर्म को 'बेटे' से जोड़ दिया गया। एक बहुत गहरी बात मन में बैठा दी गई। कहा गया कि पिता को मोक्ष चाहिए? तो बेटा ज़रूरी है। मुखाग्नि वही देगा, पिंडदान वही करेगा, तभी आत्मा को शांति मिलेगी। बस! यहीं से खेल बिगड़ गया। बेटे की चाहत जन-जन में जूनून बन गई और बेटी अचानक 'पराया धन' हो गई। लोगों को लगा यह तो दूसरे के घर जाएगी। वहां का दीया जलाएगी। इसे पालना मतलब पड़ोसी के बगीचे में पानी देना। यह सोच धर्म के नाम पर पक्की हुई।



फिर इतिहास ने करवट ली। विदेशी हमले हुए। दर्रे से दुश्मन आए। उन्होंने सबसे पहले उत्तर भारत को रौंदा। लूटपाट हुई। समाज डर गया। अपनी बहु-बेटियों को बचाना था। उपाय क्या था? उन्हें घर में बंद कर दो, पर्दा डाल दो और इसतरह घर की चारदीवारी ही उनकी सेफ्टी बन गई। बाल विवाह शुरू हो गए। सती प्रथा आई। यह सब कोई शौक नहीं था, यह डर था दोस्त डर। लेकिन अफ़सोस! वक्त बीत गया, डर भी चला गया, लेकिन 'पर्दा' रह गया। अब वह हमारी 'परंपरा' में है, रूढ़ होकर बेड़ियों की तरह। यह बेड़ियाँ लोहे की नहीं थीं, रिवाज़ों की थीं।


अब चलते हैं विंध्याचल के उस पार यानी साउथ इंडिया। वहां का मामला अलग था। वहां द्रविड़ संस्कृति थी। वहां मंदिरों का बोलबाला था। औरतों को ईश्वर की सेविका माना गया। (हालाँकि इसका अपना एक काला सच है, उधर जाना विषयांतर हो जाएगा) उन्हें कला और संगीत में जगह मिली। और सबसे बड़ी बात। केरल को देखिये, कर्नाटक के तटीय इलाकों को देखिये। वहां 'मरुमकतायम' जैसी परंपरा थी। नाम मुश्किल है, पर मतलब आसान है। इस मतलब है मातृसत्ता। यानी घर की मुखिया माँ होगी, यानी वंश माँ के नाम से चलेगा, यानी जायदाद बेटी को मिलेगी। ज़रा सोचिये, जिस वक्त नॉर्थ में औरतें घूंघट में थीं, उसी वक्त साउथ की औरतें ज़मीन की मालकिन थीं। वे फैसले ले रही थीं। एक और कारण था। साउथ तीन तरफ से समंदर से घिरा है। इसलिए वहां लड़ाइयाँ कम हुईं और व्यापार ज्यादा हुआ। समंदर किनारे के लोगों का दिमाग खोल देता है। ऐसा कहा जा सकता है। क्योंकि दुनियां खोजने वाले पहले-पहल समुद्री मार्ग से ही आये। तो, वे दुनिया से मिलते हैं। नई बातें सीखते हैं। इसलिए वहां कट्टरपन कम पनपा।


अब पूर्वोत्तर चलिए मतलब नॉर्थ-ईस्ट। या फिर आदिवासी इलाके। दोनों जगह कबीलाई जीवन था। लोग पेड़ों को पूजते थे। नदियों को पूजते थे। पहाड़ों को मानते थे। प्रकृति में नर और मादा बराबर होते हैं। इसलिए वहां धर्म के नाम पर औरतों को दबाया नहीं गया। उन्हें कभी 'अशुद्ध' नहीं कहा गया। तो, यह था हमारा इतिहास, जिसने हमारी आज की नींव रखी।


अब थ्योरी और इतिहास को यहीं छोड़ते हैं। आज की बात करते हैं। रियल लाइफ की। इन अलग-अलग जगहों पर एक लड़की का दिन कैसा गुजरता है? चलिए, चेन्नई चलते हैं। मान लीजिए वहां लक्ष्मी रहती है। उसकी सुबह सुकून भरी होती है। वह सात बजे उठती है। बालों में गजरा लगाती है। गजरा वहां यह शुभ माना जाता है। वह स्कूटी उठाती है। या बस स्टॉप जाती है। बस में भीड़ होती है। धक्के भी लगते हैं। मगर उसे डर नहीं लगता। कोई उसे गलत तरीके से नहीं छुएगा। कोई उसे जज नहीं करेगा। वह अपने ऑफिस पहुँचती है। फैक्ट्री में काम करती है। शाम को दोस्तों के साथ कॉफ़ी पीती है। रात नौ बजे घर लौटती है। घर वाले टीवी देख रहे होते हैं। कोई टेंशन नहीं। कोई सवाल नहीं। उन्हें वहां के सिस्टम पर भरोसा है। माहौल पर भी।


अब सीन बदलिये। मेरठ चलिए या दिल्ली के पास किसी शहर में। मान लीजिए यहाँ सुमन रहती है। सुमन घर से निकलती है। सबसे पहले अपना दुपट्टा कसती है। उसे पता है, नुक्कड़ पर लड़के खड़े होंगे। वे उसे घूरेंगे। वह हर पल डरती है। अलर्ट रहती है। बस में चढ़ती है तो नज़रें नीची रखती है। फ्री माइंड होकर कानों में ईयरफोन नहीं लगाती। उसे आहटें सुननी होती हैं। शाम के पांच बजते हैं। फ़ोन बजने लगता है। घर का कॉल है। "कहाँ हो? अँधेरा होने वाला है। जल्दी घर आओ।" सुमन को चिंता कैरियर नहीं है लेकिन सेफ्टी की है, इज्जत की है। यह एक बोझ की तरह है, दिमागी बोझ जो तमाम सुमनों को थका देता है। अंदर से तोड़ देता है।


लेकिन भारत सिर्फ उत्तर और दक्षिण नहीं है। एक तीसरी दुनिया भी है यानी मुंबई, यानी पश्चिम का भारत। मान लीजिए यहाँ राधिका रहती है। उसकी लाइफ रफ़्तार वाली है। वह लोकल ट्रेन पकड़ती है। लेडीज़ डिब्बे में धक्के खाती है। लेकिन वहां औरतों का एक ग्रुप है। वे एक-दूसरे का सहारा हैं। उसे रात के ग्यारह बजे भी डर नहीं लगता। वह कैब लेकर घर जाती है। मुंबई की हवा में एक अलग बात है जिसे कहते हैं प्रोफेशनलिज्म। वहां कोई नहीं पूछता कि तुम बाहर क्या कर रही हो। सब अपने-अपने काम से मतलब रखते हैं।


अब पहाड़ों पर चलिए यानी नार्थ-ईस्ट, यानी शिलांग और मेघालय। मान लीजिए यहाँ मर्लिन रहती है। उसकी दुनिया तो बिलकुल अलग है। एक जादुई दुनिया। वह अपनी मर्जी के कपड़े पहनती है। शॉर्ट्स हों या साड़ी। कोई उसे नहीं घूरता। कोई जज नहीं करता। वह शाम को माँ की दुकान पर बैठती है। गिटार बजाती है। उसके समाज में रीत उल्टी है। वहां कई जगह शादी के बाद लड़का अपना घर छोड़ेगा। वह मर्लिन के घर आएगा। मर्लिन के लिए आज़ादी कोई मांग नहीं है। यह उसकी आदत है, उसकी साँस है। और फिर आती हैं जंगल की बेटियाँ यानी झारखंड और छत्तीसगढ़। मान लीजिए यहाँ सुमी रहती है। वह आदिवासी है। सुमी के गाँव में भेद नहीं है। लड़का-लड़की साथ नाचते हैं। साथ काम करते हैं। वहां दहेज़ का लालच नहीं है। बहुओं को जलाया नहीं जाता। लेकिन सुमी की लड़ाई बड़ी है। उसकी लड़ाई समाज से नहीं है। हालात से है। उसके जंगल कट रहे हैं। खदानें बन रही हैं। उसे घर छोड़ना पड़ता है। उसकी आधी मौत तो तभी हो जाती है जब उसे शहर जाना पड़ता है। वहां उसे डर लगता है। मानव तस्करी का डर। डायन बता दिए जाने का डर। उसकी लड़ाई अस्तित्व की है। 


चलिए आज बढ़ते हैं और एक लड़की की जन्म से लेकर विवाह होने तक की बात करते हैं। सबसे पहले बात जन्म की। तो, यहाँ भी ज़मीन-आसमान का फर्क है। साउथ इंडिया में देखिये। केरल में बेटी पैदा होती है। खुशियाँ मनती हैं। कोई मातम नहीं होता। आंकड़े झूठ नहीं बोलते। केरल में एक हज़ार लड़कों पर ग्यारह सौ लड़कियाँ हैं। अब नॉर्थ की ट्रेन पकड़िये। यूपी-हरियाणा आइये। यहाँ की हवा में जन्म से टेंशन है। हाँ, अब नारे जरूर लग रहे हैं। 'बेटी बचाओ' का डीजे ऑन है। कुछ-कुछ सुधार भी हो रहा है। लेकिन दिमाग बदलना आसान नहीं। याद करिए वह धार्मिक बात, कि "बेटा ही कुल तारेगा"। इधर यह सोच अभी गई नहीं है। नॉर्थ में लड़की को पैदा होने के लिए लड़ना पड़ता है। यह उसकी पहली जंग है।

फिर स्कूल का टाइम आता है। फर्क और गहरा हो जाता है। साउथ में पढ़ाई 'ऑप्शन' नहीं है। 'कम्पलसरी' है। केरल में सब पढ़े-लिखे हैं। तमिलनाडु सरकार लड़कियों को पैसे देती है, ताकि वो कॉलेज जाएं। लेकिन नॉर्थ इंडिया? यहाँ का सीन 'हार्डकोर' वाला है। इधर के गाँव में लड़की का स्कूल जाना ही एक बड़ी क्रांति है। उसे बैग टांगकर निकलना पड़ता है। उसे लड़ना पड़ता है घर वालों की ना-नुकुर से। पड़ोसियों के तानों से। रास्ते की छेड़खानी से। लाखों लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। क्यों? क्योंकि स्कूल दूर है। रास्ता सेफ नहीं है। भेड़िये बैठे हैं घात लगाए। व्यक्तिगत तौर पर सैकडों लड़कियों से मैने दो सवाल पूछे - 'क्या घर से स्कूल/कॉलेज जाने और आने में जो पुरुष मिलते हैं वे तुम्हें देखते हैं ? उनका जवाब है - 'हाँ, सब के सब।' दूसरा सवाल यह कि- 'क्या वे तुम्हे एक बेटी, एक बहन, एक भतीजी की तरह देखते हैं? उनका जवाब था - 'नहीं' (90%)। आप भी चाहें तो यह सवाल पूछ सकते हैं। बहरहाल, कुल मिलाकर साउथ में शिक्षा एक सिस्टम है तो नॉर्थ में यह एक जंग है। 


लड़कियों के जीवन मे असली फर्क पैसे कमाने में दिखता है। करियर में दिखता है। फैक्ट्रियों में जाइये। तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में देखिये। वहां औरतों की फौज है। तैंतालीस प्रतिशत वर्कर महिलाएं हैं। वहां कमाना 'नॉर्मल' है। महाराष्ट्र-गुजरात में भी यही हाल है। वहां लक्ष्मी का मतलब 'कमाऊ बेटी' है। लेकिन नॉर्थ इंडिया? यहाँ ईगो है। झूठी शान है। लोग कहते हैं, "हमारे घर की औरतें काम नहीं करतीं।" पैसा आते ही औरतों को घर में बैठा देते हैं। यह शान लड़कियों के सपनों को खा जाती है। अगर कोई करना भी चाहे? तो सेफ्टी का भूत खड़ा हो जाता है। नोएडा और गुरुग्राम जैसी जगहों में शाम को आठ बजे कोहराम मच जाता है। अगर बेटी घर न आए। साउथ और मुंबई में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेफ है। लड़कियाँ बेधड़क घूमती हैं। नॉर्थ में करियर के लिए जिगर चाहिए। बहुत बड़ा जिगर।

अब शादी की बात करते हैं। साउथ कोई स्वर्ग नहीं है। वहां भी मुसीबत है। सबसे बड़ी मुसीबत है 'सोना' यानी कि गोल्ड। वहां सोने को लक्ष्मी मानते हैं। यह आस्था मुसीबत बन गई है। शादियों में पागलपन है। लड़की को सोने से लाद देते हैं। लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो। उसकी वैल्यू उसके दिमाग से नहीं होती। उसके गले के हार से होती है। यह एक प्रकार का टॉर्चर है। नॉर्थ में दहेज़ अलग है। वहां कैश चाहिए। गाड़ी चाहिए। लेकिन नॉर्थ में एक चीज़ और डराती है- जाति और गोत्र। अपनी मर्जी से शादी करना पाप है। दूसरी जाति में शादी? मतलब मौत यानी ऑनर किलिंग। खाप पंचायतों का डर है। धर्म और जाति की शुद्धता के नाम पर जान ले ली जाती है। यानी नॉर्थ की लड़की 'च्वाइस' के लिए जान लगाती है। साउथ की लड़की 'सोने' के बोझ तले दबी है।


लेकिन नॉर्थ-ईस्ट को मत भूलिए। वह कहानी अधूरी रह जाएगी। मेघालय की खासी जनजाति को देखिये। वहां आज भी मातृसत्ता है। जायदाद सबसे छोटी बेटी को मिलती है। बच्चे माँ का सरनेम लगाते हैं। मणिपुर में 'इमा कैथेल' एक बाज़ार है। इसे सिर्फ औरतें चलाती हैं। यह नॉर्थ इंडिया के पितृसत्तात्मक मुंह पर तमाचा है। लेकिन एक दुःख भी है। जब ये लड़कियाँ दिल्ली या बैंगलोर आती हैं। तो भेदभाव होता है। नस्लीय टिप्पणी होती है। जो अपने घर में रानी हैं। उन्हें हमारे शहरों में घर नहीं मिलता। यह शर्म की बात है।


अब आप सोचेंगे। क्या नॉर्थ इंडिया इतना बेकार है? क्या यहां पूरा का पूरा अँधेरा ही है? नहीं, यहीं तो ट्विस्ट है। असली कहानी यहीं है। कहते हैं न, हीरा कोयले की खान में मिलता है। नॉर्थ इंडिया की लड़कियों को देखिये। पिछले कुछ सालों में उन्होंने गदर काट दिया है। खेल का मैदान देखिये। कुश्ती हो, बॉक्सिंग हो, क्रिकेट हो, मेडल कौन ला रहा है? वही लड़कियाँ। उन्हीं इलाकों से, जहाँ सबसे ज्यादा बंदिशें थीं। हरियाणा की फोगाट बहनें, साक्षी मलिक, मणिपुर की मैरी कॉम भी। ये सब उसी माहौल से निकलीं। जहाँ घर से निकलना मना था। नॉर्थ की लड़कियों में एक एटीट्यूड आ गया है। गज़ब का एटीट्यूड। उन्हें हर छोटी चीज़ के लिए लड़ना पड़ा। जींस पहनने के लिए, फ़ोन रखने के लिए, दोस्तों से मिलने के लिए। इसलिए वो अंदर से लोहे जैसी हो गई हैं। उनमें आग है। साउथ की लड़कियाँ स्टेबल हैं, उन्हें सिस्टम मिला। नॉर्थ की लड़कियाँ फाइटर हैं क्योंकि उन्हें हालात मिले।


आज का दौर डिजिटल है। हाथ में स्मार्टफ़ोन है। गेम बदल गया है। बिहार के गाँव की लड़की रील्स देख रही है। वह शिलांग की लड़की को देखती है। मुंबई की लड़की को देखती है। वह सीख रही है। मतलब, दीवारें गिर रही हैं। वह सोचती है, "अगर वो आज़ाद है, तो मैं क्यों नहीं?" लेकिन एक काला सच भी है। साइबर बुलिंग। अब खतरा सड़क से उठकर स्क्रीन पर आ गया है। गंदी बातें, न्यूड पिक्चर और ब्लैकमेलिंग। इससे हर भारतीय लड़की लड़ रही है। चाहे वो साउथ की हो, नॉर्थ की हो या नॉर्थ-ईस्ट की।


तो निचोड़ क्या है? हमें क्या चाहिए? बात बहुत साफ़ है। हमें एक नया इंडिया चाहिए। एक मिक्स इंडिया। हमें साउथ जैसा सिस्टम चाहिए। अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, सेफ सड़कें। हमें नॉर्थ जैसा भी जज़्बा चाहिए, हार न मानने की ज़िद। हमें मुंबई जैसा काम का माहौल चाहिए, जहाँ लोग काम से काम रखें। हमें नॉर्थ-ईस्ट जैसा कल्चर चाहिए, जहाँ बेटी बोझ न हो, घर की मालिक हो और हमें आदिवासी समाज जैसी बराबरी चाहिए।


सोचिए, जिस दिन यह सब मिल जाएगा, उस दिन क्या होगा? हमारी बेटियाँ उड़ेंगी फाईटर प्लेन की तरह। बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से तेज होगी उनकी रफ़्तार। इस बालिका दिवस उन्हें शुभकामनाओं के साथ बस इतना ही। 


(नोट : इन बातों को मुकम्मल न माना जाय, यह महज, एक पॉइंट ऑफ व्यू है)


संपर्क : महेश सिंह


No comments:

Post a Comment

Post Top Ad

Your Ad Spot

Pages

SoraTemplates

Best Free and Premium Blogger Templates Provider.

Buy This Template