पहचान और वैचारिक आज़ादी का जरिया हैं मातृभाषाएँ
-महेश सिंह
मातृभाषा हमारे भीतर की वह पहली आवाज़ है जिससे हम दुनिया को समझना शुरू करते हैं। हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और हमारी पहचान क्या है, यह सब हमें हमारी भाषा ही बताती है। जब एक छोटा बच्चा अपनी माँ की गोद में होता है, तो वह सबसे पहले अपनी भाषा के शब्द ही सुनता है। वह इसी भाषा में पहली बार अपनी ज़रूरतें बताता है, सपने देखता है। सच तो यह है कि हर कोई अपनी भाषा में ही खुद को सबसे ज्यादा सहज महसूस करता है। इसीलिए दुनिया भर के जानकारों का कहना है कि किसी भी बच्चे के दिमाग का सही विकास उसकी अपनी भाषा में ही हो सकता है। वस्तुतः मातृभाषा हमारे होने का सबसे गहरा अहसास है।
नेल्सन मंडेला ने एक बार बहुत पते की बात कही थी, "अगर आप किसी आदमी से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह सिर्फ समझता है, तो आपकी बात उसके दिमाग तक पहुँचती है। लेकिन अगर आप उससे उसकी अपनी भाषा में बात करते हैं, तो वह बात सीधे उसके दिल में उतरती है।" इस तरह किसी भी भाषा का असली काम जानकारी देना तो है ही, लोगों को एक-दूसरे से जोड़ना भी है। जब हम अपनी भाषा में बात कर रहे होते हैं तो हम अपना पूरा इतिहास और अपनी भावनाएं साझा करने में सहज महसूस करते हैं। यही कारण है कि दुनिया के किसी भी कोने में जब दो अनजान लोग अपनी मातृभाषा में बात करते मिलते हैं, तो उनके बीच की दूरी तुरंत खत्म हो जाती है।
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इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज को कमजोर करना चाहा गया, सबसे पहले उसकी भाषा छीनी गई। असली गुलामी तब शुरू होती है जब हम अपनी भाषा छोड़कर दूसरों की सांस्कृतिक पहचान अपनाने को मजबूर हो जाते हैं। फ्रांसीसी लेखक अल्फांसो डौडेट ने अपनी मशहूर कहानी 'द लास्ट लेसन' में प्रतिरोध की महत्ता बताते हुए लिखा है, "जब किसी कौम को गुलाम बनाया जाता है, तो जब तक वहां के लोग अपनी भाषा को मजबूती से पकड़े रहते हैं, तब तक उनके पास अपनी जेल की चाबी रहती है।" यह चाबी वह भरोसा है जो हमें अपनी जड़ों से मिलता है। अगर भाषा बच गई, तो समाज अपनी आज़ादी और सम्मान वापस पा सकता है। भाषा की इसी ताकत को दुनिया ने 1952 के भाषा आंदोलन में देखा था, जब पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने 'बांग्ला' के लिए शहादत दी थी। इसी बलिदान के सम्मान में यूनेस्को ने 1999 में घोषणा की और तब से पूरी दुनिया 21 फरवरी को 'अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाती है।
भारत में महात्मा गांधी ने भी इसी बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया था। उन्होंने 1921 में लिखा था, "जैसे बच्चे के शरीर के लिए माँ का दूध जरूरी है, वैसे ही उसके दिमाग के विकास के लिए मातृभाषा जरूरी है।" गांधी जी का मानना था कि विदेशी भाषा में शिक्षा पाकर हम शायद कुछ जानकारी जुटा लें, पर हम अपने ही लोगों के बीच अजनबी बन जाते हैं। जब हम अपनी भाषा में पढ़ते-लिखते हैं, तो हमारा दिमाग ज्यादा खुलकर सोचता है और हम कुछ नया करने का साहस जुटा पाते हैं। गांधी जी ने हमें चेताया था कि अपनी भाषा को कमतर आंकना आत्मसम्मान खोने जैसा है। उन्होंने एक बार बहुत सुंदर बात कही थी, "मैं चाहता हूँ कि दुनिया भर की संस्कृतियों की हवा मेरे घर में आए, पर मैं यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करूँगा कि वह हवा मुझे मेरे पैरों से ही उखाड़ दे।" यह सांस्कृतिक मजबूती हमें हमारी अपनी भाषा ही दे सकती है।
आज का आधुनिक विज्ञान और न्यूरोसाइंस भी यही कहता है कि बच्चा अपनी मातृभाषा में सबसे जल्दी और बेहतर संज्ञानात्मक विकास करता है। तमाम शिक्षा वैज्ञानिकों ने बार-बार इस बात पर मुहर लगाई है कि बच्चों को उनकी अपनी भाषा में पढ़ाना ही सबसे वैज्ञानिक तरीका है। रवींद्रनाथ टैगोर ने मातृभाषा के संबंध में कहा था, "मातृभाषा एक दृष्टि की तरह है, जिसके माध्यम से हम दुनिया को देख सकते हैं और समझ सकते हैं। अपनी भाषा का त्याग करना अपनी आँखों को खोने जैसा है।" बिना अपनी भाषा के, हम दुनिया को वैसा नहीं देख पाते जैसी वह असल में है, हम दूसरों के चश्मे से चीजें देखने लगते हैं। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक ओलिवर वेंडेल होम्स ने कहा था, "हर भाषा एक मंदिर की तरह है जिसमें उस समाज की आत्मा रहती है।" जब हम अपनी भाषा से दूर होते हैं, तो हम उस मंदिर को ही उजाड़ देते हैं।
जापान का उदाहरण इस संदर्भ में बहुत प्रेरक है। द्वितीय विश्व युद्ध के कई सालों बाद उन्होंने पश्चिमी तकनीक को अपनाना शुरू किया लेकिन अपनी भाषा का त्याग नहीं किया। उन्होंने 'वाकोन-योसाई' यानी जापानी भावना और पश्चिमी तकनीक के मंत्र पर चलते हुए विज्ञान की हर बड़ी किताब का अनुवाद किया। आज जापान तकनीक में दुनिया का सिरमौर है, और वह भी अपनी मातृभाषा की बदौलत। उन्होंने साबित कर दिया कि आधुनिक होने के लिए अपनी जड़ें काटना जरूरी नहीं है। इसी तरह इजराइल ने भी हिब्रू भाषा को फिर से जिंदा करके दिखाया। सदियों तक जो भाषा केवल किताबों में सीमित थी, उसे लोगों के प्यार और जिद ने रोजमर्रा की बातचीत की भाषा बना दिया।
हमारी संस्कृति का असली खजाना हमारी भाषा के मुहावरों, कहावतों और गानों में छिपा होता है। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ हज़ारों साल का तजुर्बा भी खत्म हो जाता है। दार्शनिक जोहान गॉटफ्राइड वॉन हर्डर का मानना था कि किसी राष्ट्र की असलियत उसकी भाषा में ही बसती है। प्रसिद्ध कवि गोपालदास 'नीरज' से जब एक बार पूछा गया कि वे हिंदी में ही क्यों लिखते हैं, तो उन्होंने सादगी से जवाब दिया, "अंग्रेजी मेरी 'ब्रेड' हो सकती है, लेकिन हिंदी मेरा 'ब्लड' है।" यह बात हर उस इंसान पर लागू होती है जो रोजी-रोटी के लिए दूसरी भाषाएं तो सीखता है, लेकिन जीता अपनी मातृभाषा में है। बिना अपनी भाषा के, इंसान के भीतर का कलाकार कभी जिंदा नहीं रह सकता।
रूस के महान कथाकार इवान तुर्गनेव ने भी मुश्किल वक्त में अपनी मातृभाषा को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत माना था। उन्होंने कहा था, "संदेह और कष्ट के दिनों में, ओ महान और मुक्त रूसी भाषा, तुम ही मेरा एकमात्र सहारा हो!" दक्षिण भारत के महान कवि सुब्रमण्यम भारती ने भी अपनी रचनाओं के जरिए यही संदेश दिया। वे कई भाषाओं के जानकार थे, पर उन्होंने तमिल को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम चुना क्योंकि उनका मानना था कि अपनी भाषा में कही गई बात ही समाज में क्रांति ला सकती है। मातृभाषा वह बिजली है जो सोए हुए समाज को एक झटके में जगा सकती है।
शिक्षा के क्षेत्र में 'मूंछों वाली माँ' कहे जाने वाले गीजूभाई बधेका ने अद्भुत प्रयोग किए। उन्होंने देखा कि जब बच्चों को पराई भाषा में सिखाया जाता है, तो वे डरे-सहमे रहते हैं। लेकिन जैसे ही शिक्षक उनकी अपनी बोली में बात करना शुरू करता है, बच्चों की आँखों में चमक आ जाती है। मातृभाषा बच्चों के डर को खत्म कर देती है और उनमें सवाल पूछने की हिम्मत पैदा करती है। अपनी भाषा में सोचना हमें एक 'सर्जक' यानी कुछ नया रचने वाला बनाता है, जबकि उधार की भाषा में हम केवल नकलची बनकर रह जाते हैं। टैगोर ने शांतिनिकेतन में इसीलिए मातृभाषा पर जोर दिया था क्योंकि वे चाहते थे कि भारतीय बच्चे अपनी मिट्टी से जुड़कर विश्व के साथ संवाद करें। इसी संदर्भ में एक अपना भी अनुभव याद आ रहा है। मेरी क्लास में आधे से ज्यादा विद्यार्थी संथाली हैं। एक दिन मैंने सबसे कहा कि स्वेच्छा से हिंदी में किसी भी विषय पर सामने आकर दो मिनट बोलना है। बहुत बच्चे सामने आए और बोले भी। मैंने नोटिस किया कि इनमें एक भी संथाली छात्र नहीं आया है। अंत मे मैंने यह छूट दी कि वह अपनी भाषा में भी बोल सकते हैं। यकीन मानिए, अब मेरे पास समय की कमी थी।
आज के समय में दूसरी भाषाओं को सीखना एक जरूरत हो सकती है, पर अपनी भाषा को भूलकर नहीं। भारत की नई शिक्षा नीति में भी इसीलिए मातृभाषा को अहमियत दी गई है क्योंकि यह हमारे सोचने के तरीके को मजबूत बनाती है। अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन कहते थे कि भाषा की ताकत उसकी सादगी में होती है। उन्होंने हमेशा बड़े और बनावटी शब्दों के बजाय उन शब्दों को चुना जो आम आदमी अपने खेतों या घर में बोलता है। उनका मानना था कि जो बात अपनी सहज बोली में कही जा सकती है, वह किसी भी विदेशी शब्द से नहीं कही जा सकती।
दार्शनिक विट्गेन्स्टाइन ने कहा था, "मेरी भाषा की सीमाएं ही मेरे संसार की सीमाएं हैं।" इसका मतलब है कि अगर हम अपनी भाषा खो देते हैं, तो हम उस विशाल संसार को भी खो देते हैं जिसे सिर्फ उस भाषा के जरिए समझा जा सकता था। हमारी मातृभाषा ही वह खिड़की है जिससे हम इस कायनात को सबसे साफ देख सकते हैं। अपनी भाषा में बात करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात होनी चाहिए। अक्सर देखा गया है कि आधुनिकता के नाम पर हम अपनी बोलियों को बोलने में हिचकते हैं। यह एक किस्म की हीनभावना है जो हमें मानसिक रूप से कमजोर बनाती है। दुनिया का कोई भी महान साहित्य, चाहे वह होमर की 'इलियड' हो, दांते की 'डिवाइन कॉमेडी' हो या तुलसीदास की 'रामचरितमानस', सब अपनी मातृभाषा की कोख से ही निकले हैं।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने बहुत पहले कहा था, "निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल॥" इसका सीधा मतलब है कि अपनी भाषा की तरक्की ही हर तरह की तरक्की का आधार है। अपनी भाषा के बिना हम खुद को कभी पूरा महसूस नहीं कर सकते। मातृभाषा का सम्मान करना खुद का सम्मान करना है। यह वह विरासत है जो हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपी है और जिसे हमें अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है। इसमें हमारे पुरखों की मेहनत, उनकी हँसी, उनके आँसू और उनकी बुद्धिमानी छिपी है।
अपनी मातृभाषा को बचाए रखना अपनी पहचान को बचाए रखना है। जब हम अपनी भाषा बोलते हैं, तो हम अपने पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। आइए, हम अपनी भाषा को केवल बोलने तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने जीवन, अपनी शिक्षा और अपने भविष्य का आधार बनाएं। अपनी भाषा में बात करना, सोचना और रचना ही असल में आज़ाद होने का प्रमाण है। मातृभाषा वह संगीत है जो हमारे भीतर हमेशा गूंजता रहता है। यह वह प्रकाश है जो हमें भीड़ में खोने नहीं देता। अपनी भाषा का गौरव गान करना दरअसल अपनी मानवता के स्वाभिमान को आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मशाल की तरह प्रज्ज्वलित रखना है, ताकि वे अपनी पहचान के साथ गर्व से जी सकें और दुनिया को अपनी बात अपनी भाषा में सुना सकें।
संपर्क : mahesh.pu14@gmail.com

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