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Showing posts from January, 2026

युवा दिवस पर आज के युवाओं की हालत

लेखक : महेश सिंह आज 12 जनवरी है, यानी राष्ट्रीय युवा दिवस। स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन। पूरा देश आज युवाओं की बात कर रहा है। वादों और दावों का दौर चल रहा है। कई मंचों से बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे होंगे कि भारत एक युवा देश है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और यही आबादी हमें एकदिन 'विश्वगुरु' बनाएगी। यह सब सुनना बहुत अच्छा लगता है, कानों को सुकून देता है। लेकिन जब हम हकीकत से रूबरू होते हैं तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। युवा दिवस का उत्सव मनाना है, मनाइए, लेकिन क्या केवल उत्सव मना लेने भर से आज के युवाओं दशा सुधर जाएगी? क्या हमारे पास ऐसी आँखें हैं जो उनकी मनोदशा को, आदतों को, मजबूरियों और निराशा को साफ-साफ देख सकें? स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए," लेकिन आज का युवा न तो ठीक से जाग पा रहा है और न ही उसे अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा है। वह तो एक अजीब से धुंधलके में जी रहा है। सबसे पहले अगर हम आज के युवा की दिनचर्या और आदतों पर गौर करें, तो एक बहुत बड़ा बदलाव नजर आता है। उसके हाथ में किताबों की जगह स्मार...

समकालीन विद्रूपताओं के विरुद्ध एक निर्विवाद हस्तक्षेप

समीक्षक : डॉ. सुमित पी.वी.  समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों का बोलबाला है, वहीं पवन कुमार सिंह का नया कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' एक सचेत सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है । यह संग्रह केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समय की शिला पर अंकित वे यथार्थवादी प्रश्न हैं, जिन्हें अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। संग्रह की कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति गहरी चिंता और तीखा असंतोष व्याप्त है। 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' जैसी रचनाओं के माध्यम से कवि सत्ता के अहंकार, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर सीधा और निर्भीक प्रहार करते हैं । कवि यहाँ केवल एक दृष्टा नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था की विसंगतियों को बेनकाब करने वाला एक सजग नागरिक भी है । 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त भेदभाव और भाई-भतीजावाद की जड़ों को कुरेदती हैं। पवन कुमार सिंह की दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती; वे प्रकृति को ए...

मानव स्वभाव की कुछ बातें

-महेश सिंह मानव स्वभाव को समझने के लिए दुनियां भर में सदियों से चिंतन-मनन होता आया है। इसके लिए न जाने कितनों ने अपना पूरा जीवन बिता दिया लेकिन यह एक ऐसी पहेली है जो आजतक अनसुलझी है। आप अपने खुद के अनुभव से ही समझें तो अक्सर हम अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से हैरान हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई करीबी दोस्त अचानक बदल गया है, तो कभी हमें किसी की मुस्कुराहट के पीछे छिपे असली इरादे समझ नहीं आते। हम खुद से यह सवाल पूछते हैं कि आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ? इस तरह यह सवाल हमें काफी समय के लिए परेशान कर देता है। कई बार तो ऐसा होता है कि हमे समझना कुछ और चाहिए, समझ कुछ और लेते हैं। नतीजतन हमारा अपना खुद का व्यवहार ही बदलने लगता है। आइए, इस लेख के माध्यम से हम उन सभी पहलुओं को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं जो हमें न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी बेहतर इंसान बनाने में मदद करते हैं। इस संदर्भ में सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है- 'अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना'। हम मनुष्यों का सामान्य स्वभाव है कि हम खुद को बहुत तार्किक या समझदार मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम...