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Sunday, February 1, 2026

तिमिर में सूर्य-नाद : संत रविदास

तिमिर में सूर्य-नाद : संत रविदास
-महेश सिंह

मध्यकालीन इतिहास में जब रूढ़ियों की काई जमने लगी थी और धर्म के नाम पर मनुष्यता शर्मसार हो रही थी तब काशी के घाटों से एक आवाज पाखंड के महलों की नींव हिलाने का काम कर रही थी। वह आवाज संत शिरोमणि रविदास की थी। उस समय छुआछूत और भेदभाव की वजह से आदमी को आदमी की परछाई से भी भय लगता था। सन्त रविदास ने निर्भीक होकर उस 'एक बूंद' की बात की, जिससे हम सब बने हैं। उन्होंने अपमान के विष को पीकर उसे समता के अमृत में बदलने का काम किया। उनका प्रयास बिना शस्त्र उठाए, केवल 'सूत और धागे' से समाज के फटे हुए आंचल को रफू करने का था।
चित्र : गूगल से साभार

संत रविदास का जन्म विरोधाभासों के युग में हुआ। एक ओर क्रूर सामंती व्यवस्था थी, तो दूसरी ओर भक्ति आंदोलन की शीतल बयार बह रही थी। ऐसे में, चर्मकार कुल में जन्में रविदास ने सिद्ध किया कि कमल कीचड़ में ही खिलता है। उन्होंने अपने पुश्तैनी काम अर्थात जूते बनाने को कभी छोटा नहीं माना। वे इसे एक 'साधना' मानते थे। उनकी दृष्टि में श्रम करने वाला हाथ पूजा करने वाले हाथ से कहीं अधिक पवित्र है। 'श्रम की गरिमा' का ऐसा उदात्त दर्शन विश्व के किसी अन्य चिंतक में इतनी सहजता से नहीं मिलता।

उनका वैराग्य उनके आचरण का सत्य था। 'पारस पत्थर' की लोकप्रसिद्ध कथा उनके इसी निस्पृह व्यक्तित्व का प्रमाण है। किंवदंती है कि एक सिद्ध योगी ने उनकी गरीबी देखकर उन्हें पारस मणि दी, जिससे लोहा सोना बन सकता था। योगी को लगा कि वे उपकार कर रहे हैं, किंतु रविदास के लिए वह पत्थर रास्ते के कंकड़ समान था। उन्होंने योगी से कहा, "इसे छप्पर में खोंस दीजिए।" वर्षों बाद जब योगी लौटे तो पत्थर वहीं जालों में लिपटा पड़ा था। रविदास ने उसे स्पर्श तक नहीं किया था। वे क्यों छूते भला! जिसका मन 'हरि-रस' से भरा हो, उसके लिए दुनिया का सारा सोना मिट्टी है। "साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि" यही तो उनके जीवन का सार था।

संत रविदास की अध्यात्म-यात्रा 'बाहरी दिखावे' से 'आंतरिक शुद्धि' की ओर जाने वाली थी। उनकी यह प्रसिद्ध उक्ति है- "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। इसके पीछे का मनोविज्ञान गहरा है। वे काशी में रहते थे। वही काशी, जहाँ गंगा स्नान को मोक्ष का द्वार माना जाता था। लेकिन रविदास ने 'जल' को चुनौती दी और 'भाव' को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने कहा- तीर्थों का जल शरीर को तो धो सकता है लेकिन आत्मा को नहीं। यदि मन पवित्र है तो चमड़ा भिगोने वाली कठौती का जल भी पतितपावनी गंगा है। और यदि चित्त में मैल है तो उसे किसी भी तीर्थ का पानी नहीं धो सकता। उनका यह 'चित्त-शुद्धि' का सिद्धांत, धर्म को पुजारियों की मुट्ठी से निकालकर आम आदमी के हृदय में स्थापित किया। उनके राम, दशरथ के पुत्र नहीं बल्कि 'निर्गुण राम' थे, जो हर घट में रमते हैं।

सन्त रविदास की चेतना धरती के यथार्थ को बदलने के लिए व्याकुल थी। उनकी 'बेगमपुरा' की संकल्पना राजनीति-शास्त्र का दुर्लभ दस्तावेज है। यहाँ 'राज्य' का अर्थ 'शासन' की बजाय 'समता' है। जब दुनिया के दार्शनिक 'आदर्श राज्य' की जटिल परिभाषाएं गढ़ रहे थे, तब उन्होंने 'दुःख-विहीन समाज' का नक्शा खींचा। बेगमपुरा की संकल्पना में 'मानवाधिकार' है। यह एक ऐसा लोक है जहाँ प्रेम का बंधन है। सह-अस्तित्व का उत्सव है। उन्होंने सदियों पहले उद्घोष किया था कि सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ "छोट-बड़ो सब सम बसै।" यानी अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी प्रथम पंक्ति के बराबर सम्मान का अधिकारी हो।

जाति-व्यवस्था पर रविदास ने जो प्रहार किए वे तर्क और विज्ञान की कसौटी पर आज भी खरे उतरते हैं। वे किसी से उलझते नहीं थे लेकिन तर्क के साथ उदाहरण देकर तथाकथित उच्च समाज को लज्जित कर देते थे। "जाति-जाति में जाति है, ज्यों केलन में पात।" केले के तने का यह रूपक अत्यंत सटीक है। जैसे तने को छीलते जाओ तो परतों के सिवा कुछ नहीं मिलता, वैसे ही जाति भी एक खोखली व्यवस्था है। उन्होंने पूछा कि यदि सृजनकर्ता ने भेद नहीं किया तो हम कौन होते हैं लकीरें खींचने वाले? सुल्तान सिकंदर लोदी के साथ उनका संवाद इतिहास का एक ऐतिहासिक तथ्य है। जब सत्ता के मद में चूर सुल्तान ने उन्हें धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया, तो रविदास जी ने निर्भीकता से उत्तर दिया- "वेद-कतेब से परे है वह, जो सबका सिरजनहार।" उन्होंने बता दिया कि एक फकीर की कुटिया, बादशाह के महल से ऊंची होती है क्योंकि वहाँ भय का कोई स्थान नहीं होता।

संत रविदास की वाणी में वह चुंबकत्व था जिसने चित्तौड़ की महारानी मीराबाई को भी महलों का सुख त्यागकर एक चर्मकार के चरणों में बैठने पर विवश कर दिया। मीराबाई और रविदास का गुरु-शिष्य संबंध भारतीय संस्कृति की सबसे क्रांतिकारी घटनाओं में से एक है। इसे कुलीनता पर ज्ञान का विजय कह सकते हैं। "गुरु मिलिया रैदास, दीन्हीं ज्ञान की गुटकी।" यह स्वीकारोक्ति प्रमाण है कि मीरा को जो तृप्ति कृष्ण की मूर्ति में नहीं मिली, वह रविदास के शब्दों में मिली। चित्तौड़ के भोज में जब ब्राह्मणों ने रविदास के साथ बैठने से इनकार किया, तब हर ब्राह्मण ने अपनी बगल में एक रविदास को पाया। यह एक प्रतीकात्मक प्रसंग है जो दर्शाता है कि ईश्वर 'जनेऊ' में नहीं, 'जन' में बसता है।  

उनकी साहित्यिक साधना का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वे 'शब्द-ब्रह्म' के उपासक थे। कबीर यदि 'खंडन' के कवि हैं, तो रविदास 'मंडन' के कवि हैं। कबीर की भाषा में आग है, तो रविदास की भाषा में मरहम। उन्होंने संस्कृत के वर्चस्व को चुनौती देते हुए 'लोकवाणी' को अध्यात्म की भाषा बनाया। उनकी कविताएं 'सधुक्कड़ी' होते हुए भी अत्यंत लयात्मक हैं। उनमें संगीत और साहित्य का मणिकांचन संयोग है। वे जटिल वेदांत को भी "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी" जैसे सरल रूपकों में ढाल देते थे। यहाँ चंदन और पानी का मिलन 'अद्वैत' का सबसे सुंदर उदाहरण है। पानी की अपनी कोई गंध नहीं होती, लेकिन चंदन के संपर्क में आते ही वह सुगंधित हो उठता है। यही जीवात्मा की स्थिति है। उन्होंने शरीर को नश्वर मानकर उपेक्षा नहीं की बल्कि उसे 'हरि का मंदिर' माना।

संत रविदास के कृतित्व का मूल्यांकन करते समय, साहित्य के मर्मज्ञ विद्वानों ने भी उनकी 'सहजता' को स्वीकार किया है। गोस्वामी नाभादास ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'भक्तमाल' में रविदास जी की वाणी की शक्ति को रेखांकित करते हुए लिखा है— "संदेह ग्रंथि खंडन-निपुन बानि विमल रैदास की।" अर्थात, रैदास की वाणी इतनी निर्मल और प्रभावशाली है कि वह मनुष्य के मन में बैठे संदेह की जटिल गांठों को क्षण भर में काट देती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जो अपनी कठोर आलोचनात्मक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने भी संत रविदास के प्रभाव को स्वीकार किया है। शुक्ल जी लिखते हैं— "संत मत के अनुयायियों में कबीर के बाद रैदास का ही स्थान है... इनकी साखी में प्रेम की निरीहता और आत्म-समर्पण का भाव अधिक है।"

इसी क्रम में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संत रविदास को 'सहजता का संत' कहा है। द्विवेदी जी का मानना था कि रविदास जी का क्रोध भी करुणा में लिपटा हुआ था। वे कहते हैं— "रविदास की भक्ति में एक प्रकार की ऐसी आकुलता है जो सीधे हृदय में प्रवेश कर जाती है। उनमें कबीर जैसा अक्खड़पन नहीं, बल्कि एक विनम्र दृढ़ता है।" वहीं, आधुनिक विमर्श और दलित साहित्य चिंतन में डॉ. धर्मवीर ने उन्हें एक 'समाज-वैज्ञानिक' माना है। डॉ. धर्मवीर के अनुसार, रविदास जी का 'बेगमपुरा' मार्क्स के साम्यवाद से सदियों पहले की गई एक ऐसी परिकल्पना है, जिसने शोषित समाज को 'राजसत्ता' में हिस्सेदारी का सपना दिखाया।

संत रविदास ने गृहस्थ और संन्यास के बीच की कृत्रिम दीवार को ढहा दिया। उन्होंने पलायनवाद को कभी प्रश्रय नहीं दिया। वे मानते थे कि संसार से भागना कायरता है, संसार में रहकर उसे बदलना ही असली वीरता है। "नेक कमाई जौ करै, कबहूँ न निहफल जाय।" यह आर्थिक स्वावलंबन का मंत्र है। वे जानते थे कि आर्थिक दासता ही मानसिक दासता की जननी है, इसलिए उन्होंने अपने अनुयायियों को 'किरत' (श्रम) करने की प्रेरणा दी। उनका जीवन संदेश देता है कि मोक्ष के लिए जंगल जाने की आवश्यकता नहीं, बस अपनी नीयत और नीति साफ रखो।

आज, जब हम इक्कीसवीं सदी में स्वयं को सभ्य कहते हैं, तब भी हमारे भीतर का आदिम अहंकार जाति और धर्म के नाम पर तांडव करता है। ऐसे समय में संत रविदास की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। वे आज भी हमारे लिए एक 'प्रकाश-स्तंभ' हैं। उनका 'बेगमपुरा' आज भी हमारा अधूरा सपना है। आज की राजनीति जो बांटने का काम करती है, उसके सामने रविदास का दर्शन जोड़ने का काम करता है। वे भारत की साझी संस्कृति के सच्चे संवाहक हैं। उनकी दृष्टि में शांत रहकर, स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, सत्य पर अडिग रहना सबसे बड़ा प्रतिरोध है।
  
निष्कर्षतः, संत रविदास काल की सीमाओं से परे एक शाश्वत विचार हैं। वे उस भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो विविधता में एकता और विषमता में समता की बात करता है। वे एक समतामूलक, भयमुक्त और प्रेमपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते थे, जहाँ मनुष्य की पहचान उसकी 'मनुष्यता' हो। अंत में यही कहना है कि सन्त रविदास की वाणी का सूर्य-नाद अनंत काल तक मानवता के पथ को आलोकित करता रहेगा।

संपर्क : महेश सिंह, mahesh.pu14@gmail.com
 

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