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समकालीन विद्रूपताओं के विरुद्ध एक निर्विवाद हस्तक्षेप


समीक्षक : डॉ. सुमित पी.वी. 

समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों का बोलबाला है, वहीं पवन कुमार सिंह का नया कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' एक सचेत सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है । यह संग्रह केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समय की शिला पर अंकित वे यथार्थवादी प्रश्न हैं, जिन्हें अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।


संग्रह की कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति गहरी चिंता और तीखा असंतोष व्याप्त है। 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' जैसी रचनाओं के माध्यम से कवि सत्ता के अहंकार, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर सीधा और निर्भीक प्रहार करते हैं । कवि यहाँ केवल एक दृष्टा नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था की विसंगतियों को बेनकाब करने वाला एक सजग नागरिक भी है । 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त भेदभाव और भाई-भतीजावाद की जड़ों को कुरेदती हैं।

पवन कुमार सिंह की दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती; वे प्रकृति को एक 'जीवंत सत्ता' के रूप में देखते हैं । 'ग्लेशियर' और 'डाल पर बैठा पंछी' जैसी कविताएं विकास की अंधी दौड़ में नष्ट होती पारिस्थितिकी और मानवीय लालच के प्रति आगाह करती हैं । वहीं, 'सीढ़ियाँ' और 'निर्विवाद' जैसी कविताओं में जीवन का दार्शनिक पक्ष उभरता है, जहाँ समय की गतिशीलता और मानवीय अस्तित्व के संघर्षों को बहुत गहराई से महसूस किया गया है।

कवि का शिल्प सहजता और सादगी पर टिका है। पवन कुमार सिंह की सबसे बड़ी शक्ति उनकी 'साफ़गोई' और सरल भाषा है, जो जटिल दार्शनिक भावों को भी आम आदमी की समझ के करीब ले आती है। 'समय की शिला' और 'लोकतंत्र की आत्मा' जैसे बिंबों का प्रयोग उनकी कविताओं को एक विशिष्ट प्रभाव प्रदान करता है । कवि के व्यक्तित्व में रची-बसी 'गाँव की सादगी' और 'शहर का संघर्ष' उनकी रचनाओं को एक व्यापक विस्तार देते हैं ।

पवन कुमार सिंह के कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' के शिल्प, तेवर और सरोकारों को समझने के लिए आधुनिक हिंदी कविता के कुछ महान हस्ताक्षर और उनकी रचनाओं से तुलना करना समीचीन होगा। पवन कुमार सिंह के कवि व्यक्तित्व में दुष्यंत कुमार जैसी बेबाकी और रघुवीर सहाय जैसी सूक्ष्म सामाजिक मारकता का मिश्रण दिखाई देता है। जिस तरह दुष्यंत की गजलें व्यवस्था की सड़ांध पर सीधे चोट करती थीं (जैसे: "हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए"), पवन कुमार सिंह भी अपनी कविता 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' के जरिए उसी तल्ख तेवर को अपनाते हैं। दुष्यंत के यहाँ जो 'विद्रोह' है, पवन के यहाँ वही 'साफ़गोई' के रूप में प्रकट हुआ है। रघुवीर सहाय ने आम आदमी की बेबसी और सत्ता के क्रूर मजाक को बहुत साधारण शब्दों में पिरोया था। पवन कुमार सिंह की 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं उसी परंपरा की अगली कड़ी मालूम होती हैं, जहाँ वे सामाजिक विसंगतियों को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखते हैं। पवन कुमार सिंह की 'लोकतंत्र' पर केंद्रित कविताएं धूमिल की याद दिलाती हैं। धूमिल ने जिस तरह लोकतंत्र को एक 'तमाशा' बताया था, पवन भी अपनी कविताओं में इसे 'मक्कार की गोद में बैठा' हुआ दिखाकर वर्तमान समय की राजनीतिक विद्रूपताओं को उजागर करते हैं। हालाँकि, जहाँ धूमिल की भाषा अधिक आक्रामक और हिंसक है, पवन की भाषा में एक शिक्षक की संयत पीड़ा और सुधार की चाह अधिक है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस तरह का 'आत्म-संघर्ष' और 'समय का अंधेरा' दिखता है, पवन की 'सीढ़ियाँ' और 'मुक्ति का पथ' जैसी रचनाएं उसी अस्तित्वगत व्याकुलता का आधुनिक संस्करण हैं। मुक्तिबोध जहाँ जटिल बिंबों का सहारा लेते हैं, पवन इसे 'सीढ़ियों' जैसे सरल प्रतीकों से स्पष्ट करते हैं। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के लिए पंत जी जाने जाते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति 'सुकोमल' है। इसके विपरीत, पवन कुमार सिंह की 'ग्लेशियर' और 'डाल पर बैठा पंछी' जैसी कविताएं गुलज़ार के नवीनतम संग्रह 'ग्रीन पोयम्स' के करीब खड़ी होती हैं। यहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि संकटग्रस्त अस्तित्व की गवाह है। पवन कुमार सिंह की प्रकृति 'दुखती' हुई प्रकृति है, जो आधुनिक विकास के प्रहारों से घायल है। पवन की 'मैं एक गिलहरी हूँ' जैसी कविताओं की तुलना कुंवर नारायण की कविताओं से की जा सकती है। कुंवर नारायण की तरह पवन भी छोटे जीव-जंतुओं और वस्तुओं के माध्यम से बड़ी मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हैं। यह 'मौन' के जरिए 'मुखर' होने की कला है जो दोनों कवियों में साझा दिखती है। यदि पवन कुमार सिंह को एक काव्य-परंपरा में रखना हो, तो वे 'जनचेतना के कवि' हैं। उनकी तुलना उन कवियों से की जा सकती है जो कविता को ड्राइंग रूम की वस्तु न मानकर समाज का 'आईना' और 'हथियार' दोनों मानते हैं। जहाँ वे शिल्प में दुष्यंत के करीब हैं, वहीं संवेदना में वे रघुवीर सहाय और कुंवर नारायण के वैचारिक पदचिह्नों पर चलते दिखाई देते हैं।

जहाँ विषय-वस्तु की ईमानदारी इस संग्रह की ताकत है, वहीं शिल्प के स्तर पर कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान जाता है। अधिकांश कविताएं 'छंदमुक्त' और सरल शैली में हैं, जिससे कहीं-कहीं 'सपाटबयानी' का आभास होता है । आधुनिक कविता के पाठकों को यहाँ शिल्पगत प्रयोगों और भाषाई जटिलताओं की कमी खल सकती है । इसके अतिरिक्त, कुछ कविताओं में निराशा और अवसाद का स्वर इतना तीव्र है कि वे किसी ठोस वैचारिक समाधान के बजाय केवल यक्ष प्रश्नों तक ही सीमित रह जाती हैं । एक ही विषय (जैसे समय और लोकतंत्र) पर कई कविताओं के होने से कहीं-कहीं दोहराव भी महसूस होता है ।

इन छोटी सीमाओं के बावजूद, 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' अपनी संवेदनात्मक गहराई और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण एक संग्रहणीय कृति है । यह संग्रह उन पाठकों के लिए एक अनिवार्य दस्तावेज है जो समकालीन समाज के कड़वे सच और व्यवस्था के विद्रूप चेहरे को देखने का साहस रखते हैं । पवन कुमार सिंह की यह कृति हिंदी कविता की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जहाँ कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि परिवर्तन की एक वैचारिक इकाई है।



पुस्तक: निर्विवाद और अन्य कविताएं
कवि: पवन कुमार सिंह
प्रकाशक: रश्मि प्रकाशन (2025)
मूल्य: ₹199


संपर्क : सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,

पीआरएनएसएस कॉलेज, मट्टनूर,

कण्णूर, केरल-670702,

sumithpoduval@gmail.com, 9497388529 




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