Wednesday, March 11, 2026
सूबेदार : घर वापसी के बाद भी खत्म नहीं होता युद्ध
Saturday, February 21, 2026
पहचान और वैचारिक आज़ादी का जरिया हैं मातृभाषाएँ
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Sunday, February 1, 2026
तिमिर में सूर्य-नाद : संत रविदास
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Thursday, January 29, 2026
एक संविधान फिर भी इतने हिंदुस्तान ?
हिंदुस्तान का नक्शा उठाइये, उसे गौर से देखिये, देश के बीचों-बीच एक लकीर दिखेगी, पहाड़ों की लकीर। इस लकीर का नाम है विंध्याचल। भूगोल की किताब में यह सिर्फ एक पहाड़ है। मतलब, पत्थर और जंगल। लेकिन रुकिए! अगर आप एक लड़की हैं, तो इसे पहाड़ की तरह नहीं देख सकते। यह एक दीवार है, चीन की महान दीवार जैसी। यह बॉर्डर है आपकी किस्मत का। सच कहूँ? विंध्याचल के उस पार एक दुनिया है, जिसे साउथ इंडिया कहते हैं। विंध्याचल के इस पार भी एक दूसरी दुनिया है, जिसे नॉर्थ इंडिया कहते हैं। दोनों तरफ लड़कियों की कहानी जुदा है। स्क्रिप्ट बिलकुल अलग है। इतना ही नहीं, पूरब में जाइए, पहाड़ों में बसे नॉर्थ-ईस्ट को देखिये। पश्चिम में जाइए, समंदर किनारे बसे गुजरात और महाराष्ट्र को देखिये। या फिर उतर जाइये देश के दिल में। आदिवासियों के जंगलों में। हर जगह कहानी बदल जाती है। ऐसा लगता ही नहीं कि यह एक देश है और एक संविधान है। सवाल बहुत सीधा है दोस्त। आखिर एक लड़की के लिए लाइफ कहाँ आसान है? कहाँ उसे ज्यादा आज़ादी है? और कहाँ उसे साँस लेने के लिए भी लड़ना पड़ता है? दुनियाँ घूमने और देखने का असल नफा यही है कि आप कुछ सवालों के जवाब जानते हैं। तो, आइए, कुछ विचार किया जाय।
शुरुआत आज से नहीं होगी। हमें पीछे जाना होगा, सैकड़ों साल पीछे। हमारे आज के जो हालात हैं उनकी जड़ें वहां तक जाती हैं। आखिर इतना फर्क आया कहाँ से? इसका जवाब हमारे इतिहास में है। हमारी धार्मिक मान्यताओं में है। समाज की रीतियों में है। पहले नॉर्थ इंडिया को देखते हैं। मतलब पुराने ज़माने का आर्यावर्त, जहाँ वैदिक काल के बाद भारी बदलाव आया। स्मृतियों जैसी किताबों का असर बढ़ा। धर्म को 'बेटे' से जोड़ दिया गया। एक बहुत गहरी बात मन में बैठा दी गई। कहा गया कि पिता को मोक्ष चाहिए? तो बेटा ज़रूरी है। मुखाग्नि वही देगा, पिंडदान वही करेगा, तभी आत्मा को शांति मिलेगी। बस! यहीं से खेल बिगड़ गया। बेटे की चाहत जन-जन में जूनून बन गई और बेटी अचानक 'पराया धन' हो गई। लोगों को लगा यह तो दूसरे के घर जाएगी। वहां का दीया जलाएगी। इसे पालना मतलब पड़ोसी के बगीचे में पानी देना। यह सोच धर्म के नाम पर पक्की हुई।
फिर इतिहास ने करवट ली। विदेशी हमले हुए। दर्रे से दुश्मन आए। उन्होंने सबसे पहले उत्तर भारत को रौंदा। लूटपाट हुई। समाज डर गया। अपनी बहु-बेटियों को बचाना था। उपाय क्या था? उन्हें घर में बंद कर दो, पर्दा डाल दो और इसतरह घर की चारदीवारी ही उनकी सेफ्टी बन गई। बाल विवाह शुरू हो गए। सती प्रथा आई। यह सब कोई शौक नहीं था, यह डर था दोस्त डर। लेकिन अफ़सोस! वक्त बीत गया, डर भी चला गया, लेकिन 'पर्दा' रह गया। अब वह हमारी 'परंपरा' में है, रूढ़ होकर बेड़ियों की तरह। यह बेड़ियाँ लोहे की नहीं थीं, रिवाज़ों की थीं।
अब चलते हैं विंध्याचल के उस पार यानी साउथ इंडिया। वहां का मामला अलग था। वहां द्रविड़ संस्कृति थी। वहां मंदिरों का बोलबाला था। औरतों को ईश्वर की सेविका माना गया। (हालाँकि इसका अपना एक काला सच है, उधर जाना विषयांतर हो जाएगा) उन्हें कला और संगीत में जगह मिली। और सबसे बड़ी बात। केरल को देखिये, कर्नाटक के तटीय इलाकों को देखिये। वहां 'मरुमकतायम' जैसी परंपरा थी। नाम मुश्किल है, पर मतलब आसान है। इस मतलब है मातृसत्ता। यानी घर की मुखिया माँ होगी, यानी वंश माँ के नाम से चलेगा, यानी जायदाद बेटी को मिलेगी। ज़रा सोचिये, जिस वक्त नॉर्थ में औरतें घूंघट में थीं, उसी वक्त साउथ की औरतें ज़मीन की मालकिन थीं। वे फैसले ले रही थीं। एक और कारण था। साउथ तीन तरफ से समंदर से घिरा है। इसलिए वहां लड़ाइयाँ कम हुईं और व्यापार ज्यादा हुआ। समंदर किनारे के लोगों का दिमाग खोल देता है। ऐसा कहा जा सकता है। क्योंकि दुनियां खोजने वाले पहले-पहल समुद्री मार्ग से ही आये। तो, वे दुनिया से मिलते हैं। नई बातें सीखते हैं। इसलिए वहां कट्टरपन कम पनपा।
अब पूर्वोत्तर चलिए मतलब नॉर्थ-ईस्ट। या फिर आदिवासी इलाके। दोनों जगह कबीलाई जीवन था। लोग पेड़ों को पूजते थे। नदियों को पूजते थे। पहाड़ों को मानते थे। प्रकृति में नर और मादा बराबर होते हैं। इसलिए वहां धर्म के नाम पर औरतों को दबाया नहीं गया। उन्हें कभी 'अशुद्ध' नहीं कहा गया। तो, यह था हमारा इतिहास, जिसने हमारी आज की नींव रखी।
अब थ्योरी और इतिहास को यहीं छोड़ते हैं। आज की बात करते हैं। रियल लाइफ की। इन अलग-अलग जगहों पर एक लड़की का दिन कैसा गुजरता है? चलिए, चेन्नई चलते हैं। मान लीजिए वहां लक्ष्मी रहती है। उसकी सुबह सुकून भरी होती है। वह सात बजे उठती है। बालों में गजरा लगाती है। गजरा वहां यह शुभ माना जाता है। वह स्कूटी उठाती है। या बस स्टॉप जाती है। बस में भीड़ होती है। धक्के भी लगते हैं। मगर उसे डर नहीं लगता। कोई उसे गलत तरीके से नहीं छुएगा। कोई उसे जज नहीं करेगा। वह अपने ऑफिस पहुँचती है। फैक्ट्री में काम करती है। शाम को दोस्तों के साथ कॉफ़ी पीती है। रात नौ बजे घर लौटती है। घर वाले टीवी देख रहे होते हैं। कोई टेंशन नहीं। कोई सवाल नहीं। उन्हें वहां के सिस्टम पर भरोसा है। माहौल पर भी।
अब सीन बदलिये। मेरठ चलिए या दिल्ली के पास किसी शहर में। मान लीजिए यहाँ सुमन रहती है। सुमन घर से निकलती है। सबसे पहले अपना दुपट्टा कसती है। उसे पता है, नुक्कड़ पर लड़के खड़े होंगे। वे उसे घूरेंगे। वह हर पल डरती है। अलर्ट रहती है। बस में चढ़ती है तो नज़रें नीची रखती है। फ्री माइंड होकर कानों में ईयरफोन नहीं लगाती। उसे आहटें सुननी होती हैं। शाम के पांच बजते हैं। फ़ोन बजने लगता है। घर का कॉल है। "कहाँ हो? अँधेरा होने वाला है। जल्दी घर आओ।" सुमन को चिंता कैरियर नहीं है लेकिन सेफ्टी की है, इज्जत की है। यह एक बोझ की तरह है, दिमागी बोझ जो तमाम सुमनों को थका देता है। अंदर से तोड़ देता है।
लेकिन भारत सिर्फ उत्तर और दक्षिण नहीं है। एक तीसरी दुनिया भी है यानी मुंबई, यानी पश्चिम का भारत। मान लीजिए यहाँ राधिका रहती है। उसकी लाइफ रफ़्तार वाली है। वह लोकल ट्रेन पकड़ती है। लेडीज़ डिब्बे में धक्के खाती है। लेकिन वहां औरतों का एक ग्रुप है। वे एक-दूसरे का सहारा हैं। उसे रात के ग्यारह बजे भी डर नहीं लगता। वह कैब लेकर घर जाती है। मुंबई की हवा में एक अलग बात है जिसे कहते हैं प्रोफेशनलिज्म। वहां कोई नहीं पूछता कि तुम बाहर क्या कर रही हो। सब अपने-अपने काम से मतलब रखते हैं।
अब पहाड़ों पर चलिए यानी नार्थ-ईस्ट, यानी शिलांग और मेघालय। मान लीजिए यहाँ मर्लिन रहती है। उसकी दुनिया तो बिलकुल अलग है। एक जादुई दुनिया। वह अपनी मर्जी के कपड़े पहनती है। शॉर्ट्स हों या साड़ी। कोई उसे नहीं घूरता। कोई जज नहीं करता। वह शाम को माँ की दुकान पर बैठती है। गिटार बजाती है। उसके समाज में रीत उल्टी है। वहां कई जगह शादी के बाद लड़का अपना घर छोड़ेगा। वह मर्लिन के घर आएगा। मर्लिन के लिए आज़ादी कोई मांग नहीं है। यह उसकी आदत है, उसकी साँस है। और फिर आती हैं जंगल की बेटियाँ यानी झारखंड और छत्तीसगढ़। मान लीजिए यहाँ सुमी रहती है। वह आदिवासी है। सुमी के गाँव में भेद नहीं है। लड़का-लड़की साथ नाचते हैं। साथ काम करते हैं। वहां दहेज़ का लालच नहीं है। बहुओं को जलाया नहीं जाता। लेकिन सुमी की लड़ाई बड़ी है। उसकी लड़ाई समाज से नहीं है। हालात से है। उसके जंगल कट रहे हैं। खदानें बन रही हैं। उसे घर छोड़ना पड़ता है। उसकी आधी मौत तो तभी हो जाती है जब उसे शहर जाना पड़ता है। वहां उसे डर लगता है। मानव तस्करी का डर। डायन बता दिए जाने का डर। उसकी लड़ाई अस्तित्व की है।
चलिए आज बढ़ते हैं और एक लड़की की जन्म से लेकर विवाह होने तक की बात करते हैं। सबसे पहले बात जन्म की। तो, यहाँ भी ज़मीन-आसमान का फर्क है। साउथ इंडिया में देखिये। केरल में बेटी पैदा होती है। खुशियाँ मनती हैं। कोई मातम नहीं होता। आंकड़े झूठ नहीं बोलते। केरल में एक हज़ार लड़कों पर ग्यारह सौ लड़कियाँ हैं। अब नॉर्थ की ट्रेन पकड़िये। यूपी-हरियाणा आइये। यहाँ की हवा में जन्म से टेंशन है। हाँ, अब नारे जरूर लग रहे हैं। 'बेटी बचाओ' का डीजे ऑन है। कुछ-कुछ सुधार भी हो रहा है। लेकिन दिमाग बदलना आसान नहीं। याद करिए वह धार्मिक बात, कि "बेटा ही कुल तारेगा"। इधर यह सोच अभी गई नहीं है। नॉर्थ में लड़की को पैदा होने के लिए लड़ना पड़ता है। यह उसकी पहली जंग है।
फिर स्कूल का टाइम आता है। फर्क और गहरा हो जाता है। साउथ में पढ़ाई 'ऑप्शन' नहीं है। 'कम्पलसरी' है। केरल में सब पढ़े-लिखे हैं। तमिलनाडु सरकार लड़कियों को पैसे देती है, ताकि वो कॉलेज जाएं। लेकिन नॉर्थ इंडिया? यहाँ का सीन 'हार्डकोर' वाला है। इधर के गाँव में लड़की का स्कूल जाना ही एक बड़ी क्रांति है। उसे बैग टांगकर निकलना पड़ता है। उसे लड़ना पड़ता है घर वालों की ना-नुकुर से। पड़ोसियों के तानों से। रास्ते की छेड़खानी से। लाखों लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। क्यों? क्योंकि स्कूल दूर है। रास्ता सेफ नहीं है। भेड़िये बैठे हैं घात लगाए। व्यक्तिगत तौर पर सैकडों लड़कियों से मैने दो सवाल पूछे - 'क्या घर से स्कूल/कॉलेज जाने और आने में जो पुरुष मिलते हैं वे तुम्हें देखते हैं ? उनका जवाब है - 'हाँ, सब के सब।' दूसरा सवाल यह कि- 'क्या वे तुम्हे एक बेटी, एक बहन, एक भतीजी की तरह देखते हैं? उनका जवाब था - 'नहीं' (90%)। आप भी चाहें तो यह सवाल पूछ सकते हैं। बहरहाल, कुल मिलाकर साउथ में शिक्षा एक सिस्टम है तो नॉर्थ में यह एक जंग है।
लड़कियों के जीवन मे असली फर्क पैसे कमाने में दिखता है। करियर में दिखता है। फैक्ट्रियों में जाइये। तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में देखिये। वहां औरतों की फौज है। तैंतालीस प्रतिशत वर्कर महिलाएं हैं। वहां कमाना 'नॉर्मल' है। महाराष्ट्र-गुजरात में भी यही हाल है। वहां लक्ष्मी का मतलब 'कमाऊ बेटी' है। लेकिन नॉर्थ इंडिया? यहाँ ईगो है। झूठी शान है। लोग कहते हैं, "हमारे घर की औरतें काम नहीं करतीं।" पैसा आते ही औरतों को घर में बैठा देते हैं। यह शान लड़कियों के सपनों को खा जाती है। अगर कोई करना भी चाहे? तो सेफ्टी का भूत खड़ा हो जाता है। नोएडा और गुरुग्राम जैसी जगहों में शाम को आठ बजे कोहराम मच जाता है। अगर बेटी घर न आए। साउथ और मुंबई में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सेफ है। लड़कियाँ बेधड़क घूमती हैं। नॉर्थ में करियर के लिए जिगर चाहिए। बहुत बड़ा जिगर।
अब शादी की बात करते हैं। साउथ कोई स्वर्ग नहीं है। वहां भी मुसीबत है। सबसे बड़ी मुसीबत है 'सोना' यानी कि गोल्ड। वहां सोने को लक्ष्मी मानते हैं। यह आस्था मुसीबत बन गई है। शादियों में पागलपन है। लड़की को सोने से लाद देते हैं। लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो। उसकी वैल्यू उसके दिमाग से नहीं होती। उसके गले के हार से होती है। यह एक प्रकार का टॉर्चर है। नॉर्थ में दहेज़ अलग है। वहां कैश चाहिए। गाड़ी चाहिए। लेकिन नॉर्थ में एक चीज़ और डराती है- जाति और गोत्र। अपनी मर्जी से शादी करना पाप है। दूसरी जाति में शादी? मतलब मौत यानी ऑनर किलिंग। खाप पंचायतों का डर है। धर्म और जाति की शुद्धता के नाम पर जान ले ली जाती है। यानी नॉर्थ की लड़की 'च्वाइस' के लिए जान लगाती है। साउथ की लड़की 'सोने' के बोझ तले दबी है।
लेकिन नॉर्थ-ईस्ट को मत भूलिए। वह कहानी अधूरी रह जाएगी। मेघालय की खासी जनजाति को देखिये। वहां आज भी मातृसत्ता है। जायदाद सबसे छोटी बेटी को मिलती है। बच्चे माँ का सरनेम लगाते हैं। मणिपुर में 'इमा कैथेल' एक बाज़ार है। इसे सिर्फ औरतें चलाती हैं। यह नॉर्थ इंडिया के पितृसत्तात्मक मुंह पर तमाचा है। लेकिन एक दुःख भी है। जब ये लड़कियाँ दिल्ली या बैंगलोर आती हैं। तो भेदभाव होता है। नस्लीय टिप्पणी होती है। जो अपने घर में रानी हैं। उन्हें हमारे शहरों में घर नहीं मिलता। यह शर्म की बात है।
अब आप सोचेंगे। क्या नॉर्थ इंडिया इतना बेकार है? क्या यहां पूरा का पूरा अँधेरा ही है? नहीं, यहीं तो ट्विस्ट है। असली कहानी यहीं है। कहते हैं न, हीरा कोयले की खान में मिलता है। नॉर्थ इंडिया की लड़कियों को देखिये। पिछले कुछ सालों में उन्होंने गदर काट दिया है। खेल का मैदान देखिये। कुश्ती हो, बॉक्सिंग हो, क्रिकेट हो, मेडल कौन ला रहा है? वही लड़कियाँ। उन्हीं इलाकों से, जहाँ सबसे ज्यादा बंदिशें थीं। हरियाणा की फोगाट बहनें, साक्षी मलिक, मणिपुर की मैरी कॉम भी। ये सब उसी माहौल से निकलीं। जहाँ घर से निकलना मना था। नॉर्थ की लड़कियों में एक एटीट्यूड आ गया है। गज़ब का एटीट्यूड। उन्हें हर छोटी चीज़ के लिए लड़ना पड़ा। जींस पहनने के लिए, फ़ोन रखने के लिए, दोस्तों से मिलने के लिए। इसलिए वो अंदर से लोहे जैसी हो गई हैं। उनमें आग है। साउथ की लड़कियाँ स्टेबल हैं, उन्हें सिस्टम मिला। नॉर्थ की लड़कियाँ फाइटर हैं क्योंकि उन्हें हालात मिले।
आज का दौर डिजिटल है। हाथ में स्मार्टफ़ोन है। गेम बदल गया है। बिहार के गाँव की लड़की रील्स देख रही है। वह शिलांग की लड़की को देखती है। मुंबई की लड़की को देखती है। वह सीख रही है। मतलब, दीवारें गिर रही हैं। वह सोचती है, "अगर वो आज़ाद है, तो मैं क्यों नहीं?" लेकिन एक काला सच भी है। साइबर बुलिंग। अब खतरा सड़क से उठकर स्क्रीन पर आ गया है। गंदी बातें, न्यूड पिक्चर और ब्लैकमेलिंग। इससे हर भारतीय लड़की लड़ रही है। चाहे वो साउथ की हो, नॉर्थ की हो या नॉर्थ-ईस्ट की।
तो निचोड़ क्या है? हमें क्या चाहिए? बात बहुत साफ़ है। हमें एक नया इंडिया चाहिए। एक मिक्स इंडिया। हमें साउथ जैसा सिस्टम चाहिए। अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, सेफ सड़कें। हमें नॉर्थ जैसा भी जज़्बा चाहिए, हार न मानने की ज़िद। हमें मुंबई जैसा काम का माहौल चाहिए, जहाँ लोग काम से काम रखें। हमें नॉर्थ-ईस्ट जैसा कल्चर चाहिए, जहाँ बेटी बोझ न हो, घर की मालिक हो और हमें आदिवासी समाज जैसी बराबरी चाहिए।
सोचिए, जिस दिन यह सब मिल जाएगा, उस दिन क्या होगा? हमारी बेटियाँ उड़ेंगी फाईटर प्लेन की तरह। बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से तेज होगी उनकी रफ़्तार। इस बालिका दिवस उन्हें शुभकामनाओं के साथ बस इतना ही।
(नोट : इन बातों को मुकम्मल न माना जाय, यह महज, एक पॉइंट ऑफ व्यू है)
संपर्क : महेश सिंह
गिरिडीह, झारखंड
Friday, January 23, 2026
निराला का गद्य: महाप्राण से लोकप्राण की यात्रा
डॉ. विजय कुमार
"साकी कुछ आज तुझे खबर है बसंत की
हर सुबह पेश-ए-नज़र है बसंत की”
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अप्सरा और निरूपमा उपन्यासों में निराला ने नारी अस्मिता और अपनी स्वतंत्रता के प्रश्न को प्रमुखता से उठाया। उस दौर में, जब स्त्री का व्यक्तित्व घर की चारदीवारी तक सीमित था, निराला की कथा नायिकाएं में अपनी प्रतिभा और अधिकार का डंका बजता था। यहाँ स्वतंत्रता ,केवल राजनितिक स्वतंत्रता तक सीमित नही हैं बल्कि वह व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की छटपटाहट भी है। निराला के गद्य पाठक को केवल सूचना नहीं है, बल्कि उन्हें उस संघर्ष का हिस्सा बताया गया है जो निराला ने अपने निजी जीवन में भी झेला था। निराला के गद्य का सबसे जीवंत और अनोखा पक्ष उनके रेखाचित्र और यादगार उपन्यासों में निखरता है। निराला के उपन्यासों, 'अप्सरा' और 'अलका' में स्वाधीनता का एक और आयाम उभरता है वह है 'सांस्कृतिक स्वाधीनता' जो आगे चलकर हमें स्पस्ट रूप में दिखलाई पड़ता हैं। निराला ये देख रहे थे कि भारतीय समाज पश्चिम की अंधी नकल और अपनी ही रूढ़ियों के बीच में फंसा हुआ है। उनके गद्य में जहां एक ओर सामंती सोच पर तीखा प्रभाव है, वहीं दूसरी ओर भारतीय मंदी के उस उदात्त रूप की खोज भी है, जो मनुष्य वास्तव में स्वतंत्र रचनाएं है। निराला की 'स्वाधीनता स्वयं' का एक राजनितिक और सामाजिक अर्थ है।
कुल्लीभाट और बिल्लेसुर बकरिहा हिंदी साहित्य की वे कृतियाँ हैं, प्रश्न यथार्थवाद को एक नई शुरुआत दी। कुल्लीभाट (1938-39) और बिल्लेसुर जैसे पात्र अपने स्मारकीय साहस के साथ जीवन जीते हैं, वह निराला की "जीवन-संग्राम भाषा की" का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। कुल्लीभाट में निराला ने जिस बेबाकी से ब्राह्मणवादी कट्टरता और सामाजिक पाखंड पर प्रहार किया, उसमें उनके विद्रोही अनूठेपन का ही विस्तार था। निराला जब 'कुल्लीभाट' रचते हैं, तो वे केवल एक व्यक्ति का चरित्र चित्रण नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे उस सामाजिक संरचना को चुनौती दे रहे हैं जो प्रतिभा को जाति और कुल के विशिष्ट गुणों में वर्गीकृत कर देता है। कुल्लीभाट का चरित्र अपने स्थान पर बने रहने के बावजूद जिस तरह से शिक्षित होना और समाज में अपना स्थान बनाना की जिद करता है, वह निराला की अपनी जिद का ही एक अक्स है।
बिल्लेसुर बकरिहा (1942) को देखें तो इसमें एक निम्नतम मध्यवर्गीय किसान और पशुपालक के संघर्ष की कथा है। बिल्लेसुर का अपना ज़मीन के लिए टुकड़ा, अपना शिकार बनाना और हार न मानना, स्वाधीनता के उस सूक्ष्म रूप का विवरण है जिसे आर्थिक स्वावलंबन कहते हैं। निराला यह भली-भांति जानते थे कि जब तक व्यक्तिगत और मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होंगे, देश की राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। इसलिए उनके गद्य में "स्वाधीनता स्वयं" का एक व्यापक अर्थ ग्रहण किया गया है, जिसमें जाति, धर्म और वर्ग की शिक्षाएँ दिखाई देती हैं। निराला की गद्य शैली की एक और विशेषता उनकी सादगी और देशीपन है। जहाँ उस समय के कई रचनाकार संस्कृतनिष्ठ या अति क्लिष्ट भाषा का प्रयोग कर रहे थे, वहीं निराला नेचाल की ज़बान को साहित्य का गौरव प्रदान किया। उनकी भाषा में वह कुर्दरापन है जो वास्तविक जीवन में घटित होता है। यह उनका "जीवन-संग्राम की भाषा" रचना है। वे सजे-धजे महलों की कहानी नहीं सुनाते, बल्कि उन किताबों और किताबों की बातें करते हैं जहां जीवन हर दिन एक नई लड़ाई लड़ता है।
निराला की कविता उनकी कविता का सार नहीं है, बल्कि उनकी क्रांतिकारी क्रांति का मुख्य हथियार है। निराला के गद्य में स्वाधीनता निहित है। अगर वह अप्सरा की नारी हो या बिल्लेसुर , संघर्षशील ग्रामीण के रूप में, निराला के गीतों के माध्यम से जो स्वर गूंजता है, वह 'मुक्ति' का स्वर है। बसंत की वह बहार, निराला के लिए केवलमौसम परिवर्तन नहीं था, बल्कि वह समाज में आने वाले उस बदलाव का प्रतीक था, नयेपन का प्रतीक था जिसको निराला अपनी साहित्यिक दृष्टि से देख रहें थे, जिसके लिए उन्होंने कलम को तलवार की तरह की शैली दी। निराला का गद्य आज भी मौलिक पतन है, क्योंकि "जीवन-संग्राम" आज भी जारी है और स्वाधीनता की रक्षा हर युग की अनिवार्य आवश्यकता है। 'बिल्लेसुर बकरिहा' की कथावस्तु में जिस तरह का यथार्थवाद निराला ने पिरोया है, वह प्रेमचंद के यथार्थवाद से थोड़ा अलग और अधिक आक्रामक है। बिल्लेसुर का संघर्ष केवल पेट भरने का संघर्ष नहीं है, बल्कि वह अपनी अस्मिता को बचाये रखने का संघर्ष है।
निराला ने गद्य को जो "जीवन-संग्राम की भाषा" कहा, उसका एक बड़ा आधार यह भी है कि निराला ने गद्य में उस भाषा को प्रतिष्ठित किया जो 'पसीने की गंध' से सराबोर है। इसमें मजबूती नहीं है; वह सच है कि इसमें जो पाठक शामिल होते हैं और विचारों पर जबरदस्ती करते हैं। साथ ही, निराला के यादगार गद्य में जिस तरह का आत्म-दर्शन होता है, वह वायरल है। वे अपने दोषों को भी उसी निर्भीकता से स्वीकार करते हैं, जिस निर्भीकता से वे दस्तावेजों की आलोचना करते हैं। यह 'सत्य' के प्रति उनकी निष्ठा ही है जो उनके गद्य को एक नैतिक शक्ति प्रदान करता है। स्वाधीनता चेतना का यह सर्वोच्च रूप है, जहाँ रचनाकार किसी भी प्रकार के भय या लोभ से मुक्त होकर बात अपनी कहता है। निराला का गद्य इसी अर्थ में स्वाधीनता है, वह न तो किसी वैजचारिक गुटबाज़ी का हिस्सा है और न ही किसी सिद्धांत चर्चा के दबाव में लिखा गया है। अंततः, निराला का गद्य साहित्य उनकी विरासत है जो हमें सिखाया जाता है कि उनकी रचना केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं है, बल्कि वह "स्वतंत्रता का रंगघोष" है। उनकी रचनाएँ आज भी हमें सिखाती हैं कि संकटपूर्ण परिस्थितियाँ इतनी विषम हैं परन्तु मनुष्य की जिजीविषा और उसकी स्वतंत्रता की इच्छा को वसंत में खिलने वाले फूलों की तरह कभी कुचला नहीं जा सकता। निराला का गद्य उनके साहित्य का विस्तार है। जहां कविता में वे 'महाप्राण' हैं, वहीं गद्य में वे 'लोकप्राण' के रूप में उभरते हैं।
संपर्क : हिंदी विभाग शास. तिलक महाविद्यालय
Monday, January 12, 2026
युवा दिवस पर आज के युवाओं की हालत
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Wednesday, January 7, 2026
समकालीन विद्रूपताओं के विरुद्ध एक निर्विवाद हस्तक्षेप
समीक्षक : डॉ. सुमित पी.वी.
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों का बोलबाला है, वहीं पवन कुमार सिंह का नया कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' एक सचेत सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है । यह संग्रह केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समय की शिला पर अंकित वे यथार्थवादी प्रश्न हैं, जिन्हें अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
संग्रह की कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति गहरी चिंता और तीखा असंतोष व्याप्त है। 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' जैसी रचनाओं के माध्यम से कवि सत्ता के अहंकार, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर सीधा और निर्भीक प्रहार करते हैं । कवि यहाँ केवल एक दृष्टा नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था की विसंगतियों को बेनकाब करने वाला एक सजग नागरिक भी है । 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त भेदभाव और भाई-भतीजावाद की जड़ों को कुरेदती हैं।
पवन कुमार सिंह की दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती; वे प्रकृति को एक 'जीवंत सत्ता' के रूप में देखते हैं । 'ग्लेशियर' और 'डाल पर बैठा पंछी' जैसी कविताएं विकास की अंधी दौड़ में नष्ट होती पारिस्थितिकी और मानवीय लालच के प्रति आगाह करती हैं । वहीं, 'सीढ़ियाँ' और 'निर्विवाद' जैसी कविताओं में जीवन का दार्शनिक पक्ष उभरता है, जहाँ समय की गतिशीलता और मानवीय अस्तित्व के संघर्षों को बहुत गहराई से महसूस किया गया है।
कवि का शिल्प सहजता और सादगी पर टिका है। पवन कुमार सिंह की सबसे बड़ी शक्ति उनकी 'साफ़गोई' और सरल भाषा है, जो जटिल दार्शनिक भावों को भी आम आदमी की समझ के करीब ले आती है। 'समय की शिला' और 'लोकतंत्र की आत्मा' जैसे बिंबों का प्रयोग उनकी कविताओं को एक विशिष्ट प्रभाव प्रदान करता है । कवि के व्यक्तित्व में रची-बसी 'गाँव की सादगी' और 'शहर का संघर्ष' उनकी रचनाओं को एक व्यापक विस्तार देते हैं ।
पवन कुमार सिंह के कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' के शिल्प, तेवर और सरोकारों को समझने के लिए आधुनिक हिंदी कविता के कुछ महान हस्ताक्षर और उनकी रचनाओं से तुलना करना समीचीन होगा। पवन कुमार सिंह के कवि व्यक्तित्व में दुष्यंत कुमार जैसी बेबाकी और रघुवीर सहाय जैसी सूक्ष्म सामाजिक मारकता का मिश्रण दिखाई देता है। जिस तरह दुष्यंत की गजलें व्यवस्था की सड़ांध पर सीधे चोट करती थीं (जैसे: "हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए"), पवन कुमार सिंह भी अपनी कविता 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' के जरिए उसी तल्ख तेवर को अपनाते हैं। दुष्यंत के यहाँ जो 'विद्रोह' है, पवन के यहाँ वही 'साफ़गोई' के रूप में प्रकट हुआ है। रघुवीर सहाय ने आम आदमी की बेबसी और सत्ता के क्रूर मजाक को बहुत साधारण शब्दों में पिरोया था। पवन कुमार सिंह की 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं उसी परंपरा की अगली कड़ी मालूम होती हैं, जहाँ वे सामाजिक विसंगतियों को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखते हैं। पवन कुमार सिंह की 'लोकतंत्र' पर केंद्रित कविताएं धूमिल की याद दिलाती हैं। धूमिल ने जिस तरह लोकतंत्र को एक 'तमाशा' बताया था, पवन भी अपनी कविताओं में इसे 'मक्कार की गोद में बैठा' हुआ दिखाकर वर्तमान समय की राजनीतिक विद्रूपताओं को उजागर करते हैं। हालाँकि, जहाँ धूमिल की भाषा अधिक आक्रामक और हिंसक है, पवन की भाषा में एक शिक्षक की संयत पीड़ा और सुधार की चाह अधिक है। मुक्तिबोध की कविताओं में जिस तरह का 'आत्म-संघर्ष' और 'समय का अंधेरा' दिखता है, पवन की 'सीढ़ियाँ' और 'मुक्ति का पथ' जैसी रचनाएं उसी अस्तित्वगत व्याकुलता का आधुनिक संस्करण हैं। मुक्तिबोध जहाँ जटिल बिंबों का सहारा लेते हैं, पवन इसे 'सीढ़ियों' जैसे सरल प्रतीकों से स्पष्ट करते हैं। हिंदी कविता में प्रकृति चित्रण के लिए पंत जी जाने जाते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति 'सुकोमल' है। इसके विपरीत, पवन कुमार सिंह की 'ग्लेशियर' और 'डाल पर बैठा पंछी' जैसी कविताएं गुलज़ार के नवीनतम संग्रह 'ग्रीन पोयम्स' के करीब खड़ी होती हैं। यहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि संकटग्रस्त अस्तित्व की गवाह है। पवन कुमार सिंह की प्रकृति 'दुखती' हुई प्रकृति है, जो आधुनिक विकास के प्रहारों से घायल है। पवन की 'मैं एक गिलहरी हूँ' जैसी कविताओं की तुलना कुंवर नारायण की कविताओं से की जा सकती है। कुंवर नारायण की तरह पवन भी छोटे जीव-जंतुओं और वस्तुओं के माध्यम से बड़ी मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हैं। यह 'मौन' के जरिए 'मुखर' होने की कला है जो दोनों कवियों में साझा दिखती है। यदि पवन कुमार सिंह को एक काव्य-परंपरा में रखना हो, तो वे 'जनचेतना के कवि' हैं। उनकी तुलना उन कवियों से की जा सकती है जो कविता को ड्राइंग रूम की वस्तु न मानकर समाज का 'आईना' और 'हथियार' दोनों मानते हैं। जहाँ वे शिल्प में दुष्यंत के करीब हैं, वहीं संवेदना में वे रघुवीर सहाय और कुंवर नारायण के वैचारिक पदचिह्नों पर चलते दिखाई देते हैं।
जहाँ विषय-वस्तु की ईमानदारी इस संग्रह की ताकत है, वहीं शिल्प के स्तर पर कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान जाता है। अधिकांश कविताएं 'छंदमुक्त' और सरल शैली में हैं, जिससे कहीं-कहीं 'सपाटबयानी' का आभास होता है । आधुनिक कविता के पाठकों को यहाँ शिल्पगत प्रयोगों और भाषाई जटिलताओं की कमी खल सकती है । इसके अतिरिक्त, कुछ कविताओं में निराशा और अवसाद का स्वर इतना तीव्र है कि वे किसी ठोस वैचारिक समाधान के बजाय केवल यक्ष प्रश्नों तक ही सीमित रह जाती हैं । एक ही विषय (जैसे समय और लोकतंत्र) पर कई कविताओं के होने से कहीं-कहीं दोहराव भी महसूस होता है ।
इन छोटी सीमाओं के बावजूद, 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' अपनी संवेदनात्मक गहराई और सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण एक संग्रहणीय कृति है । यह संग्रह उन पाठकों के लिए एक अनिवार्य दस्तावेज है जो समकालीन समाज के कड़वे सच और व्यवस्था के विद्रूप चेहरे को देखने का साहस रखते हैं । पवन कुमार सिंह की यह कृति हिंदी कविता की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जहाँ कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि परिवर्तन की एक वैचारिक इकाई है।
संपर्क : सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,
पीआरएनएसएस कॉलेज, मट्टनूर,
कण्णूर, केरल-670702,
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