-महेश सिंह
मानव स्वभाव को समझने के लिए दुनियां भर में सदियों से चिंतन-मनन होता आया है। इसके लिए न जाने कितनों ने अपना पूरा जीवन बिता दिया लेकिन यह एक ऐसी पहेली है जो आजतक अनसुलझी है। आप अपने खुद के अनुभव से ही समझें तो अक्सर हम अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से हैरान हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई करीबी दोस्त अचानक बदल गया है, तो कभी हमें किसी की मुस्कुराहट के पीछे छिपे असली इरादे समझ नहीं आते। हम खुद से यह सवाल पूछते हैं कि आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ? इस तरह यह सवाल हमें काफी समय के लिए परेशान कर देता है। कई बार तो ऐसा होता है कि हमे समझना कुछ और चाहिए, समझ कुछ और लेते हैं। नतीजतन हमारा अपना खुद का व्यवहार ही बदलने लगता है। आइए, इस लेख के माध्यम से हम उन सभी पहलुओं को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं जो हमें न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी बेहतर इंसान बनाने में मदद करते हैं।
इस संदर्भ में सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है- 'अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना'। हम मनुष्यों का सामान्य स्वभाव है कि हम खुद को बहुत तार्किक या समझदार मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम अपनी भावनाओं के गुलाम होते हैं। जब भी कोई घटना घटती है तो हमारी पहली प्रतिक्रिया भावनात्मक होती है न कि तार्किक। उदाहरण के लिए जब कोई हमें नजरअंदाज करता है तो हमें गुस्सा आता है। हमारा यह गुस्सा सिर्फ उस व्यक्ति के व्यवहार के कारण नहीं होता बल्कि हमारी अपनी असुरक्षा और उस चाहत के कारण होता है कि लोग हमें महत्व दें। रॉबर्ट ग्रीन अपनी किताब 'द लॉ ऑफ ह्यूमन नेचर' में समझाते हैं कि 'जब तक हम अपनी भावनाओं के मालिक नहीं बनते, तब तक कोई और हमारे फैसलों का मालिक बना रहेगा'। जो व्यक्ति अपनी भावनाओं यथा; क्रोध, ईर्ष्या या डर आदि को देख और समझ सकेगा वही अपने मन का असली राजा होगा। इसका माने यह नही है कि हमे अपनी भावनाओं को दबाना है। उन्हें एक तीसरे व्यक्ति की तरह दूर से देखना और समझना है। जब हम खुद को समझने लगते हैं तभी दूसरों के दिलों को पढ़ने की क्षमता विकसित कर पाते हैं।
इसके बाद, इंसानी फितरत का एक और दिलचस्प पहलू आता है, जिसे हम 'मुखौटा' या 'मास्क' कह सकते हैं। समाज में रहने के लिए हर इंसान एक तरह का नकाब पहनता है। यहां मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली का एक शेर याद आ रहा है- "हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिस को भी देखना हो कई बार देखना।" किसी पार्टी या सामाजिक समारोह में आप देखते होंगे कि हर कोई मुस्कुरा रहा है। हर कोई एक दूसरे से बातें कर रहा है और एक-दूसरे के प्रति अपनापन दिखा रहा है। लेकिन आप समझिए कि इस दिखावे के पीछे कई बार छिपे हुए एजेंडे होते हैं। कोई आपकी तारीफ इसलिए कर रहा हो सकता है क्योंकि उसे आपसे कुछ चाहिए, या कोई अपनी अकेलेपन को छिपाने के लिए आपके साथ हो सकता है। यहां हमें लोगों के शब्दों पर नहीं उनके व्यवहार के पैटर्न पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि शब्द झूठ बोल सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की ऊर्जा और उसके लगातार किए गए कार्य कभी झूठ नहीं बोलते। अगर कोई व्यक्ति बार-बार दूसरों की बुराई आपके सामने करता है तो यह निश्चित है कि वह आपकी बुराई भी दूसरों के सामने करेगा। इसलिए, लोगों को समझने के लिए उनकी मुस्कुराहट के पीछे छिपे असली इरादों को पढ़ना सीखना बहुत जरूरी है।
इसी संदर्भ में ईर्ष्या एक ऐसी भावना है जो रिश्तों को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर देती है। यह एक जहर की तरह है। इसे कोई भी स्वीकारना नहीं चाहता लेकिन इसे महसूस सब करते हैं। किसी भी व्यक्ति के अंदर ईर्ष्या की शुरुआत तुलना से होती है। जब हम खुद को किसी और से कमतर आंकते हैं तो हमारे मन में एक जलन पैदा होती है जो धीरे-धीरे नफरत में बदल सकती है। कई बार हमारे दोस्त या सहकर्मी हमारी सफलता पर मुस्कुराते तो हैं, लेकिन उनकी आंखों में वह खुशी नहीं दिखती। यह ईर्ष्या का संकेत है। रॉबर्ट ग्रीन सलाह देते हैं कि 'अगर कोई आपसे ईर्ष्या करता है तो उसे जवाब देने या उससे लड़ने में अपनी ऊर्जा बर्बाद न करें। इसके बजाय, उसे अनदेखा करें और अपनी सफलता और विकास पर ध्यान केंद्रित करें।' आत्मविश्वास ईर्ष्या के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।
आत्म-मुग्धता भी मानव स्वभाव का एक अभिन्न अंग है। हर इंसान में थोड़ा बहुत आत्म-प्रेम होता ही है लेकिन जब यह हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो समस्या बन जाता है। एक आत्ममुग्ध व्यक्ति दुनिया को सिर्फ अपनी नजरों से देखता है। वह चाहता है कि हर कोई उसकी तारीफ करे। उसे लगता है कि दुनिया उसके इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे लोग दूसरों की भावनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं। लेकिन इसका इलाज 'सहानुभूति' में छिपा है। जब हम अपनी खुद की दुनिया से बाहर निकलकर दूसरों के दर्द और खुशियों को महसूस करने की कोशिश करते हैं तो हमारा अहंकार पिघलने लगता है और हम एक बेहतर इंसान बनने की तरफ अग्रसर होने लगते हैं। सच्चा आत्म-प्रेम वही है जो हमें दूसरों से जुड़ने में मदद करे।
इंसानी सोच की अतार्किकता एक और गहरा विषय है। इसपर हमें जरूर विचार करना चाहिए। हम सोचते हैं कि हमने बहुत सोच-समझकर निर्णय लिया है। ऐसा नहीं है ! असल में हमारे वे फैसले डर, अहंकार या लालच से प्रेरित होते हैं। हम पहले फैसला लेते हैं और बाद में उसे सही ठहराने के लिए तर्क ढूंढते हैं। जैसे, हम कोई महंगी चीज यह सोचकर खरीद लेते हैं कि इसकी हमें जरूरत है जबकि असल में वह खरीदारी हमारी किसी भावनात्मक कमी को पूरा करने के लिए की गई होती है। इस अतार्किकता से बचने का तरीका यही है कि जब भी हम भावुक हों तो कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले थोड़ा रुकें। अपनी भावनाओं को पहचानें और सोचें कि क्या यह फैसला डर की वजह से लिया जा रहा है या वाकई यह सही कदम है। यह ठहराव हमें प्रतिक्रिया देने के बजाय सही जवाब देने में मदद करता है।
जीवन में एक स्पष्ट उद्देश्य का होना भी बेहद जरूरी है। बिना उद्देश्य का जीवन एक ऐसी नाव की तरह है जिसका कोई माझी नहीं है। इसे अंग्रेजी में 'एमलेसनेस' कहते हैं। जब हमारे पास अपनी कोई दिशा नहीं होती तो हम दूसरों के सपनों और योजनाओं का हिस्सा बन जाते हैं। हम बस व्यस्त रहते हैं हासिल कुछ नहीं करते। व्यस्त होना और प्रगति करना दो अलग बातें हैं। अपना उद्देश्य खोजने का मतलब है अपने अंदर की आवाज को सुनना। वही हमसे कहती है कि हमें क्या करना पसंद है। इस तरह जब हम अपने जीवन का एक उद्देश्य तय कर लेते हैं, तो हमारे फैसले स्पष्ट हो जाते हैं और हम दूसरों के प्रभाव में आसानी से नहीं आते।
समाज का दबाव भी हमारे व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित करता है। हम एक सामाजिक प्राणी हैं और हमारे अंदर यह डर हमेशा बना रहता है कि अगर हम समूह से अलग चलेंगे, तो अकेले पड़ जाएंगे। इसलिए हम वही करते हैं जो बाकी सब कर रहे होते हैं। फलतः हम अपनी अलग सोच और रचनात्मकता को दबा देते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि महानता उन्हीं को मिली है जिन्होंने भीड़ से अलग चलने की हिम्मत दिखाई है। हमें यह समझना होगा कि भीड़ का हिस्सा बनकर रहना आरामदायक तो हो सकता है लेकिन हमारी असली पहचान खतरे में पड़ जाती है। असली आजादी वही है जब हम दूसरों की राय के गुलाम नहीं रहते और अपने फैसले खुद लेने की हिम्मत जुटाते हैं।
धैर्य एक ऐसी शक्ति है जिसे आज की भागदौड़ भरी दुनिया में हम भूलते जा रहे हैं। हमें हर चीज तुरंत चाहिए- सफलता, पैसा और पहचान। लेकिन यह तो प्रकृति का नियम है कि हर चीज का अपना एक समय होता है। किसान बीज बोने के अगले ही दिन फसल की उम्मीद नहीं करता। वह जानता है कि उसे धूप, पानी और समय देना होगा। इसी तरह जीवन में भी धैर्य रखना कोई कमजोरी नहीं कहा जा सकता। यह तो एक रणनीति है। जो व्यक्ति सही समय का इंतजार करना जानता है वही लंबी रेस का घोड़ा साबित होता है। अधीरता हमें गलत फैसले लेने पर मजबूर करती है।
मानव स्वभाव में आक्रामकता को अक्सर बुरा माना जाता है लेकिन यह एक ऊर्जा है। अगर इसे दबाया जाए तो यह अंदर ही अंदर कुंठा और अवसाद का रूप ले लेती है। लेकिन यहाँ भी सावधानी की जरूरत है। अगर आक्रामकता को सही दिशा मिले तो यही ऊर्जा हमें हमारे लक्ष्यों तक पहुंचा सकती है। इसे महत्वाकांक्षा और दृढ़ता में बदला जा सकता है। हमें अपने गुस्से या आक्रामकता से डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे एक ईंधन की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। यह हमें मुश्किलों से लड़ने और आगे बढ़ने की ताकत देती है।
हम सभी जानते हैं कि जीवन नश्वर है। फिर भी हम ऐसे जीते हैं जैसे हमें हमेशा यहां रहना है। हम मौत के बारे में बात करने से कतराते हैं। सचाई तो यह है कि कोई भी इंसान मृत्यु को स्वीकार करना ही नहीं चाहता। इस संदर्भ में मेरा मानना है कि मृत्यु को हमेशा याद रखना चाहिए। क्योंकि यह हमें जीवन का असली मूल्य समझाता है। जब हमें यह अहसास होता है कि हमारा समय सीमित है तो हम फालतू की चीजों जैसे अहंकार, ईर्ष्या और छोटी-मोटी चिंताओं में अपना समय बर्बाद करना बंद कर देते हैं। हम उन चीजों पर ध्यान देना शुरू करते हैं जो वाकई मायने रखती हैं। इस तरह मौत की याद हमें हर पल को पूरी शिद्दत से जीने की प्रेरणा देती है।
निष्कर्ष रूप में यही कहना है कि दूसरों को समझना बाद की बात है सबसे पहले तो हमें खुद को समझना होगा। आत्म-जागरूकता या सेल्फ-अवेयरनेस ही मानव जीवन को सुंदर बनाने का सबसे जरूरी तत्व है। जब हम अपनी कमियों, अपने डर और अपनी भावनाओं को बिना किसी निर्णय के देखने लगते हैं तो हम न केवल खुद को बेहतर बना पाते हैं बल्कि दूसरों के प्रति भी अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। किसी ने सच ही कहा है जिसने अपने मन को जीत लिया उसे दुनिया की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती।
संपर्क : mahesh.pu14@gmail.com


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