साहित्य, समाज, संस्कृति और सिनेमा का वैचारिक मंच

Monday, December 30, 2024

'सामाजिक बदलाव के लिए साहित्य को राजनीतिक रास्ते की ओर भी देखना होगा।' - डॉ. अनिल राय

ग्रामीण पुस्तकालय भलुआ, देवरिया की स्थापना दिवस के उपलक्ष में स्व. विंध्याचल सिंह स्मारक न्यास द्वारा आयोजित  29 दिसम्बर 2024 को 'पूँजीवादी विकास के दौर में लोकतांत्रिक मूल्य और साहित्य' विषय पर परिचर्चा, सम्मान समारोह एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। 


कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों को असमिया गमुसा और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत करने से हुआ। इसके बाद पहले से तय विषय पर परिचर्चा की शुरुआत हुई। विषय प्रवेश करते हुए देवरिया के वरिष्ठ साहित्यकार उद्भव मिश्र ने पूँजीवाद के इतिहास से परिचित कराते हुए कहा कि शुरुआत में पूँजीवाद ने सामंतवाद से मुक्ति दिलायी पर आज केंद्रित पूँजीवाद सामंती औजार बन गया है,जो नये तरह के सामंती व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। मनुष्य कब पूँजीवाद के गिरफ्त में आ जाता है; पता नहीं चलता है।' जनवादी लेखक संघ गोरखपुर के अध्यक्ष जयप्रकाश मल्ल ने कहा कि 'पूँजीवाद के दौर में आम इंसान से कार्य करने के अवसर छीने जा रहे हैं, पूँजीवाद में विकास तो दिख रहा है लेकिन इसी अनुपात में लोग भुखमरी से मर भी रहे हैं।' जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि 'सूचना के संसाधन एवं जैव प्रौद्योगिकी पर पूँजीवाद का कब्जा उदारवादी लोकतंत्र के लिए खतरा है। पूँजीवाद एक तरफ हमारी मदद करने आया लेकिन ये हमारे लिए ही खतरा बन गया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), अरबों लोगो के कार्य को खत्म कर देगा। इस दौर में जो इंसान मनुष्य की इन परेशानियों के बारे में लिख रहा है वही सच्चा साहित्यकार है।' 


डॉ. चतुरानन ओझा ने कहा कि 'पूँजीवाद के दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे तथ्यों पर चर्चा अपने आप में बहुत साहसिक कार्य है। पूँजीवाद, सामंतवाद के विरोध के रूप में बराबरी लेकर आया, लेकिन बाद में इसने संसाधनों पर कब्जा करना शुरू किया। यदि उत्पादन और उपभोग सामूहिक है तो उस पर स्वामित्व अकेला किसी व्यक्ति का नहीं होना चाहिए।' ऋषिकेश मिश्र ने कहा कि 'देश समाज में इस तरह की परिचर्चा बहुत ही सराहनीय है, लोकतांत्रिक मूल्यों पर जो खतरा है उनके समाधान भी खोजने जरूरी हैं, हमारी ये जिम्मेदारी है कि समाधान भी खोजें।' डॉ. विजयश्री मल्ल ने कहा कि AI मानव के दिखाई देने वाले कार्यों को ही कॉपी कर सकता है, लेकिन उसके अंदर चेतना नहीं है, वो हमारी भावनाओं को कॉपी नहीं कर सकता है।' मेरठ कॉलेज, मेरठ के सहायक प्रोफेसर डॉ. हितेश कुमार सिंह ने कहा कि 'पूँजीवाद और रूढ़िवाद को मजबूत किया जा रहा है। भारतीय जनमानस अभी लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित नहीं कर पाया है। सूचना के तंत्रों पर समान हित धारकों का कब्जा हो गया है, इस वजह से इस वक्त अभिभावक एवं अध्यापक के ऊपर संकट आ गया है। इसका उपाय ये है कि लोकतांत्रिक मूल्यों वाले लोगों को सम्मान दीजिए।' गिरीश नारायण शाही ने किसानों की दुर्दशा पर चर्चा की। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. अनिल राय ने कहा कि 'पूँजीवादी व्यवस्था केवल अर्थतंत्र की व्यवस्था ही नहीं है बल्कि इसने हमारी मानवीय, सांस्कृतिक व्यवस्था को काफी क्षति पहुंचाई है। स्पष्ट राजनीतिक समझदारी न होने की दशा में साहित्य कोई बदलाव नहीं ला सकता है। सांस्कृतिक बदलाव के लिए साहित्य बहुत कोमल रास्ता है, इसलिए बदलाव के लिए राजनीतिक रास्ते की तरफ देखना जरूरी है। परिवर्तन पत्रिका के संपादक और इस कार्यक्रम के आयोजक डॉ. महेश सिंह ने कहा कि 'लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए इतने सारे विचारों के संचार से इस गाँव में जो क्रांतिकारी बयार बहेगी वो निश्चय ही देश और समाज में बदलाव का वाहक बनेगी ।'


अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं ईस्टर्न साइंटिस्ट शोध पत्रिका के मुख्य सम्पादक डॉ. अचल पुलस्तेय ने सभी वक्ताओं की वक्तव्यों की समीक्षा करते हुआ हुए कहा- दुनिया का कोई भी ईजाद या वाद मनुष्य के लिए होता है,पर कुछ ही पूँजीपतियों के हाथ में आ जाने पर मनुष्य पर वर्चस्व स्थापित करने का माध्यम बन जाता है, कुछ ऐसे ही दौर से दुनिया गुजर रही है। इसलिए आज मनुष्य की नीजता स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाना जरूरी है,इसके लिए साहित्यकारों आगे होना होगा, जिसकी शुरुआत घर से करनी होगी। पारिवारिक संवाद से लेकर गाँवों की कउड़ा बतकही इसका सशक्त माध्यम बन सकती है।  ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कार्यक्रमों हो निश्चित ही इसमें सफलता मिलेगी। 


इसके बाद सम्मान समारोह का कार्यक्रम हुआ जिसमें अभिषेक कुमार को उनके काव्य संग्रह 'बादल की अलगनी पर' के लिए राष्ट्रीय सम्मान 'रामदेव सिंह 'कलाधर' साहित्य सम्मान' देते हुए अंगवस्त्र, प्रशस्ती पत्र, स्मृति चिह्न, और 5100/- रुपये नकद देकर सम्मानित किया गया। 
काव्य संग्रह : 'बादल की अलगनी पर' के रचनाकार अभिषेक कुमार को राष्ट्रीय 'रामदेव सिंह 'कलाधर' सम्मान'

वरिष्ठ लोक-कलाकार बनवारी सिंह 'आजाद' को गोरखपुर मंडल सम्मान; 'बोधिसत्व लोक कला सम्मान' देते हुए अंगवस्त्र, प्रशस्ती पत्र, स्मृति चिह्न, 1100 रुपये नकद देकर सम्मानित किया गया। 
गोरखपुर मंडल सम्मान: 'बोधिसत्व लोक-कला सम्मान' बनवारी सिंह 'आजाद' को मिला।

तीसरा सम्मान जनपद देवरिया सम्मान; 'प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान' कवि योगेंद्र पाण्डेय को अंगवस्त्र, प्रशस्ती पत्र, स्मृति चिह्न, ₹1100 नकद देकर सम्मानित किया गया। 
जनपद देवरिया सम्मान : 'प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान' योगेन्द्र पाण्डेय को दिया गया। 

इस का का संचालन गोरखपुर के युवा कवि और विचारक डॉ. रवीन्द्र प्रताप सिंह ने किया।


कार्यक्रम के दूसरे और अंतिम सत्र में काव्यगोष्ठी हुई। सबसे पहले सम्मानित हुए कवियों ने अपनी रचनाएँ पढ़ीं। इसके बाद    जयप्रकाश मल्ल, सुजान सिंह, डॉ. रवीन्द्र प्रताप सिंह, कौशलेंद्र मिश्र, प्रवीण त्रिपाठी, डॉ. विजयश्री मल्ल, डॉ. महेश सिंह आदि ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। इस सत्र की अध्यक्षता इंद्र कुमार दीक्षित ने की और संचालन सरोज पाण्डेय ने किया। इस कार्यक्रम में ग्राम भलुआ और क्षेत्र के तमाम प्रबुद्ध जन, ग्रामीण, महिलाएं और बच्चे उपस्थित थे।
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Thursday, December 12, 2024

चौथा अनहद कोलकाता सम्मान डॉ. सुनील कुमार शर्मा को

मनीषा त्रिपाठी फाउंडेशन फिल्म तथा अनहद कोलकाता वेब पत्रिका की ओर से दिया जाने वाला चौथा मनीषा त्रिपाठी स्मृति अनहद कोलकाता सम्मान 2024 हिन्दी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-गद्यकार एवं विज्ञान लेखक डॉ. सुनील कुमार शर्मा को प्रदान किया जाएगा। अनहद कोलकाता के प्रबंध निदेशक उमेश त्रिपाठी ने बताया कि यह सम्मान हर वर्ष कला के किसी भी विधा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले एक कला साधक को दिया जाता है। इसके पूर्व यह सम्मान हिन्दी के महत्त कवि एवं एक्टिविस्ट केशव तिवारी और महिलाओं के सवालों को अपनी कविता में पूरजोर तरीके से उठाने वाली हिन्दी की ही कवि रूपम मिश्र तथा महत्त कवि कथाकार, पत्रकार, फिल्मकार एवं चित्रकार डॉ. अभिज्ञात को दिया जा चुका है। सम्मान स्वरूप सम्मानित कलाकार को ग्यारह हजार रूपए की मानदेय राशि सहित प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है। 



               डॉ. सुनील कुमार शर्मा हिन्दी में उस परम्परा के लेखक हैं जिनकी जड़ें विज्ञान और भारतीय परम्परा में धँसी हुई हैं। उन्होंने हिन्दी कविता को न केवल नए शब्द दिए हैं वरन् चैट जीपीटी एवं कृत्रिम मेधा पर भी हिन्दी भाषा में महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। विज्ञान एवं तकनीक से संबंधित उनके अनेक शोध आलेख राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छप चुके हैं जो उनकी शोध क्षमता एवं मेधा को सिद्ध करते हैं। इस बार अनहद कोलकाता के निर्णायक मण्डल के सदस्य  वरिष्ठ कवि केशव तिवारी ने अनहद कोलकाता द्वारा आयोजित कविताई की एक शाम कार्यक्रम में  चौथा मनीषा त्रिपाठी अनहद कोलकाता पुरस्कार देने की घोषणा करते हुए बताया कि यह सम्मान अनहद कोलकाता की तरफ से एक ऐसे साहित्यकार को दिया जा रहा है जो हिन्दी कविता और गद्य को न केवल अपनी नई भाषा और विषयों से समृद्ध कर रहे हैं वरन अपने कवित्व से सराहे भी जा रहे हैं साथ ही अपने वैज्ञानिक लेखन से हिन्दी भाषा को समृद्ध करते हुए ऐसे ही गंभीर लेखन को प्रत्साहित भी कर रहे हैं।  उन्होंने यह यह भी कहा कि डॉ. सुनील कुमार शर्मा की रचनाओं में समय की गूँज है।

        संस्थान के संस्थापक डॉ. विमलेश त्रिपाठी ने बताया कि यह सम्मान डॉ. सुनील कुमार शर्मा को धनबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा जिसमें कोलकाता एवं भारत के अन्य हिस्से से आए वरिष्ठ एवं युवा साहित्यकार शामिल होंगे।

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Tuesday, August 13, 2024

चित्तौड़गढ़ दुर्ग भ्रमण

यूँ तो राजस्थान किलों के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान के हर बड़े शहर में एक किला (दुर्ग) आपको अवश्य दिख जाएगा। परंतु राजस्थान के चित्तौड़गढ़ का किला अपने आप में बेहद खास है। चित्तौड़गढ़ का किला भारत का सबसे विशाल दुर्ग है। चित्तौड़गढ़ मेवाड़ राज्य की राजधानी थी। किले की चारदीवारी भी अपने आप में बेहद खास है। यहां आने वाले पर्यटकों में राजस्थान के निवासियों के अलावा भारत के अलग-अलग राज्यों के निवासी भी आते हैं। इसके अलावा देश-विदेश के तमाम सैलानी रोजाना हजारों की तादाद में यहाँ आते हैं। यह किला मौर्य राजवंश के सम्राट चित्रांगद मौर्य ( चित्रांग ) ने बनवाया था। यह एक विश्व विरासत स्थल है। मेवाड़ के प्राचीन सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट नाम अंकित मिलता है।

इस किले की बहुत प्रशंसा सुनने के बाद मेरा मन भी चित्तौड़गढ़ दुर्ग को देखने के लिए लालायित हो उठा था। बचपन में पुस्तकों में चित्तौड़गढ़ के किले के बारे में एक चित्र देखा था और कुछ कहानियां भी सुनी थी जो राजपूत राजा महाराणा प्रताप के बारे में थी। दरअसल जब मैं सन 2022 में मेवाड़ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्य करने के लिए आया तो यह उत्सुकता और भी ज्यादा बढ़ गई थी। लेकिन शुरुआत में मेरे ज्यादा मित्र भी ना थे और विश्वविद्यालय में भी ढेर सारे कार्य के कारण मुझे जाने का अवसर न मिला। धीरे-धीरे समय व्यतीत होता चला गया लेकिन मन में एक ललक थी चित्तौड़गढ़ दुर्ग देखने की।

हुआ यूं कि मार्च 2023 में मैं बीए की क्लास का कोऑर्डिनेटर बना और तभी मुझे बी ए के समस्त छात्रों के साथ फोर्ट विजिट करने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। मन में बहुत खुशी थी जिसे मैं बयां नहीं कर सकता क्योंकि कभी सोचा ही ना था कि मैं चित्तौड़गढ़ दुर्गा का भ्रमण कर पाऊंगा। सभी छात्र मस्ती के साथ विश्वविद्यालय की बस में बैठ गए। मैंने एक छात्र से सभी बच्चों की लिस्ट बनवा जिसने मोबाइल नंबर भी अंकित थे। लगभग 30 मिनट में बस चित्तौड़गढ़ पहुंच गई और वहां से ऑटो लेकर हम लोग चित्तौड़गढ़ किले की ओर निकल पड़े। छात्राएं और छात्र दोनों ही थे तो थोड़ा सा सफर कठिन सा रहा क्योंकि मैं अध्यापक जो था। मुझे मस्ती करने से परहेज करना पड़ा। अपना कारवां अब चितौड़गढ़ फोर्ट पर पहुंच चुका था बच्चों ने अलग-अलग तरह की नक्काशीदार मंदिरों को भी देखा।  सभी छात्रों ने वहां विजय स्तंभ, पद्मिनी महल, जौहर स्थल, काली माता का मंदिर, कीर्ति स्तंभ, नीलकंठ महादेव का मंदिर, महावीर स्वामी का मंदिर, आदि का आनंद के साथ भ्रमण किया। मैं सभी छात्रों को वहां प्रत्येक स्थान के बारे में अलग-अलग विस्तार से बता रहा था। ज्यादातर जगहों पर तो शिलालेख लगे हुए हैं जो पुरातत्व विभाग में लगवा रखे हैं। 

इसके बाद सभी छात्रों ने चित्तौड़गढ़ में प्रसिद्ध नमकीन और खाने का कुछ सामान खरीदा। बाद में हम विश्वविद्यालय की बस से वापस विश्वविद्यालय आ गए।और सभी छात्रों ने आकर विश्वविद्यालय के नीलकंठ महादेव मंदिर में एक समूह छायाचित्र लिया और अपने-अपने घर चले गए। 

लेकिन यह चित्तौड़गढ़ की यात्रा बहुत ही सुखद महसूस हुई और सभी के मस्तिष्क पर एक यादगार पल छोड़ कर गई।

संपर्क : 
प्रोफेसर जुगेन्द्र सिंह 'विद्यार्थी'
पता- खुशीपुरा, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
9759708798
prof.jugendrasingh@yahoo.com
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हद या अनहद कविता संग्रह को मिला जनकवि रामजी लाल चतुर्वेदी सम्मान

छतरपुर। मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की छतरपुर इकाई द्वारा जनकवि रामजी लाल चतुर्वेदी स्मृति सम्मान 2023, युवा कवि सुनील कुमार शर्मा की कृति हद या अनहद को दिया गया। गांधी आश्रम में आयोजित इस सम्मान समारोह में डॉ सुनील कुमार शर्मा को हिन्दी सम्मेलन की छतरपुर इकाई के सदस्यों द्वारा सम्मान पत्र, शाल श्रीफल और सम्मान राशि के द्वारा अलंकृत किया गया। सम्मान समारोह में जनकवि रामजी लाल चतुर्वेदी पर आधारित पुस्तक "हमारे नन्ना" का लोकार्पण अतिथियों एवम् नन्ना के परिवारजनों के द्वारा किया गया। लोकार्पित ग्रंथ का संपादन डॉ बहादुर सिंह परमार, शिवेंद्र शुक्ला और नीरज खरे द्वारा किया गया है। इस अवसर पर नन्ना का पुण्य स्मरण अतिथियों एवम् उनके संबंधियों द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत, महाकवि तुलसीदास, प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, एवम् रामजीलाल चतुर्वेदी के चित्रों पर अतिथियों द्वारा माल्यार्पण एवम् दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इकाई के अध्यक्ष नीरज खरे ने समस्त अतिथियों का परिचय कराते हुए उनका पारंपरिक स्वागत कराया। इसके उपरांत कबीर भजन हुआ। इकाई के संयोजक प्रो बहादुर सिंह परमार ने पुरस्कार समारोह भूमिका प्रस्तुत करते नन्ना के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने पुरस्कृत कवि का भी परिचय कराते हुए उनके द्वारा विज्ञान के अद्यतन विषयों पर हिन्दी में आयी हुई उनकी पुस्तकों पर भी चर्चा की।
पुरस्कृत कृति पर युवा आलोचक डॉ. आदित्य विक्रम सिंह ने अपने बात रखते हुए कहा कि सुनील जी कवितायें समकालीन समय की मानवीयता का वितान रचती है। ये कविताएँ मशीनी युग में मानव संवेदना का आख्यान है। यह संग्रह की और कवि की लोकप्रियता है कि विगत दो वर्षों में इसके तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके है।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में महान व्यंगकार हरिशंकर परसाई की जनशताब्दी के उपलक्ष्य में प्रेमचंद से परसाई शीर्षक गोष्ठी का आयोजन हुआ। गोष्ठी के क्रेंद्र में समकालीन समय और प्रगतशीलता रही। गोष्ठी में मुख्य वक्ता रूप में अपनी बात रखते हुए राजीव कुमार शुक्ला जी ने परसाई, प्रेमचंद और मुक्तिबोध के विचारों का संयोजन किया। शुक्ल जी का एक लंबा समय इन साहित्यकारों के सानिध्य में बीता है, जिसके स्मरण से कल छतरपुर के साहित्यसुधि सराबोर हुए। परसाई जी के तमाम उद्धरणो को रखते हुए उन्होंने परसाई जी को लोकशिक्षक के रूप में स्थापित किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सुनील कुमार शर्मा ने जनकवि रामजी लाल चतुर्वेदी का पुण्य स्मरण करते हुए साहित्य सम्मेलन की छतरपुर इकाई को धन्यवाद प्रेषित किया कि इन्होंने उनकी विरासत को बहुत संजो कर रखा है। समकालीन समय पर बात रखते हुए मुख्य अतिथि ने कहा कि साहित्य में निहित साँस्कृतिक तत्वों को बारीकी से पहचानने के लिए मन का साँस्कृतिक परिष्कार ज़रूरी है। समकालीन कविता की लंबी पड़ताल करते हुए उन्होंने समकालीन साहित्य और समय का विवेचन किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पदमश्री बाबूलाल दाहिया जी ने प्रेमचंद और परसाई जी के कई संस्मरण सुनाए, साथ ही उन्होंने बघेली लोकगीत में अपनी बात रखी। 

इकाई के अध्यक्ष नीरज खरे ने परसाई जी की तमाम बातों और व्यंगों को अपने संचालन के दौरान बताया। कार्यक्रम में औपचारिक धन्यवाद इकाई की सचिव निदा रहमान द्वारा किया गया। इस अवसर पर नगर के साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति रही।

*रिपोर्ट
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Monday, August 12, 2024

गिरिडीह में याद किए गए अवधी भाषा के प्रगतिशील कवि जुमई खां 'आजाद'

दिनांक 11.08.24 को जन संस्कृति मंच, गिरिडीह और 'परिवर्तन' पत्रिका के साझे प्रयत्न से गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह के न्यू बिल्डिंग में अवधी भाषा के प्रगतिशील कवि जुमई खां 'आजाद' स्मृति संवाद के तहत जुमई खां 'आजाद' की कविताओं का पाठ किया गया तथा उनकी कविताओं पर बतौर मुख्य वक्ता अवधी और हिंदी के युवा कवि-आलोचक डॉ.शैलेंद्र कुमार शुक्ल ने व्याख्यान दिया। 


जुमई खां का जन्म 05 अगस्त 1930 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिला के गोबरी गांव में हुआ था। वे समाजवादी विचारधारा से ताजिंदगी जुड़े रहे और डॉ.राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के करीबी थे। समाजवादी आंदोलनों में उनको जेल भी जाना पड़ा था। शैलेंद्र ने बताया कि हिंदी और अवधी कविताओं की कुल इक्कीस किताबें प्रकाशित हैं। उनका आखिरी अवधी कविता संग्रह का नाम 'कथरी' है। शैलेंद्र ने कहा कि अवधी के कवि 'पढ़ीस ' के बाद जुमई खां की कविताओं में सबसे अधिक वर्ग चेतना की सहज अभिव्यक्ति हुई है। वे ऐसे कवि थे जो जीवन भर खेती और कविकर्म से जुड़े रहे। 


अपने बीज वक्तव्य में डॉ. बलभद्र ने कहा कि जुमई खां मध्यकाल के कवि तुलसीदास की भाषा को आधुनिक और प्रगतिशील धार देने वाले कवि थे। उन्होंने कहा कि भोजपुरी, मगही, खोरठा, संताली आदि अनेक भाषाओं के कवियों को भी पढ़ने समझने की जरूरत है। बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों के अध्येता रामदेव विश्वबंधु ने कहा कि स्थानीय भाषाओं की कविताओं में जीवन, समाज, संस्कृति की विश्वसनीय अभिव्यक्तियां देखने को मिलती हैं। उन्होंने शैलेंद्र शुक्ल को जुमई की कविताओं से परिचित कराने के लिए धन्यवाद दिया। 


जमुआ से आए हुए मु. आलम अंसारी ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से हम भाषाई और सांस्कृतिक विविधताओं से परिचित होते हैं। बतौर मुख्य अतिथि कॉलेज के प्राचार्य डॉ.अनुज कुमार ने कहा कि जुमई खां 'आजाद ' निर्भीक कवि थे। अवध क्षेत्र और अवधी भाषा को जैसे तुलसीदास की कविताओं से समझा गया, वह सामर्थ्य जुमई खां की कविताओं में भी है।कार्यक्रम का आरंभ जुमई खां की कविताओं से हुआ। आठवीं कक्षा का विद्यार्थी अनुपम ने प्रसिद्ध कविता 'कथरी' का पाठ किया तो डॉ.महेश सिंह ने 'बड़ी बड़ी कोठिया सजाए पूंजीपतिया' गाकर सुनाया। 


कार्यक्रम में डॉ. सनोज कुमार केसरी, हीरालाल मंडल, राजेश सिन्हा, धर्मेंद्र कुमार वर्मा, शंभु तुरी, रवि कुमार यादव, नयन कुमार सोरेन, मुकेश कुमार यादव, अजय डोम, राधिका कुमारी, स्वीटी कुमारी, धर्मेंद्र यादव, विनय हांसदा आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन जसम के राज्य कमिटी के सदस्य शंकर पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन डॉ.महेश सिंह ने किया।
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Sunday, August 4, 2024

'प्रेमचंद का भारत' विषय पर टी.डी.बी. कॉलेज, रानीगंज में हुआ एकदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन

प्रेमचंद जी की 144वीं जयंती के अवसर पर दिनांक- 31.07.2024, को त्रिवेणी देवी भालोटिया कॉलेज, रानीगंज हिन्दी विभाग एवं IQAC के संयुक्त तत्वाधान में एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (प्रेमचंद का भारत) का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत सर्वप्रथम मुंशी प्रेमचंद और कवि गुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुआ। संगोष्ठी का आरंभ अतिथियों द्वारा द्वीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत में छठे सेमेस्टर की छात्रा खुशी मिश्रा ने 'वर दे वीणा वादिनी' वन्दना का गायन किया। तत्पश्चात बीए (ऑनर्स) प्रथम सेमेस्टर के छात्रों ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आये प्रोफेसर आशुतोष पार्थेश्वर और विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. साबेरा खातून उपस्थिति रहीं। इस कार्यक्रम में कॉलेज के TIC  प्रोफेसर मोबिनुल इस्लाम, TCS अनूप भट्टाचार्य और IQAC कॉर्डिनेटर डॉ. सर्वानी बनर्जी ने कथाकार प्रेमचंद के संदर्भ में अपने-अपने विचार रखें। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता हिंदी विभाग की डॉ. मंजुला शर्मा ने किया।



प्रथम सत्र का आरम्भ अपराह्ण 12:30 बजे से हुआ। विशिष्ट वक्ता के रूप में त्रिवेणीदेवी भालोटिया कॉलेज, उर्दू विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. साबेरा खातून ने प्रेमचंद के हवाले से अपनी बात रखते हुये कहा कि 'प्रेमचंद हमारी साझी विरासत का हिस्सा हैं। उन्होंने सबसे पहले उर्दू में लिखना शुरू किया बाद में हिंदी और उर्दू दोनों ही में लिखते रहें। उनके अफ़साने और उपन्यासों में वतन की मुहब्बत का जज्बा नज़र आता है।' उन्होंने आगे कहा कि- 'प्रेमचंद के यहाँ गरीब, मजदूर, किसान, दलितों और औरतों को ख़ास जगह दी गई है। उन्होंने कमजोरों को जुबान दी है उन्हें बोलना सिखाया, जुल्म के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के तरकीब बताये। उन्होंने विधवाओं की दूसरी शादी पर जोर दिया और खुद भी ऐसी ही शादी किये। प्रेमचंद एक सच्चे देश भक्त, निडर इंसान और एक महान कहानीकार थे।' दूसरे तकनीकी सत्र का आरम्भ अपराह्ण 1:00 बजे से हुआ। इस दूसरे सत्र में हिंदी विभाग के सहयोगी आचार्य डॉ. गणेश रजक ने हिंदी विभाग और त्रिवेणीदेवी भालोटिया कॉलेज में प्रेमचंद की प्रतिमा के संदर्भ में तथा कॉलेज की गतिविधियों पर अपनी बात रखी।



इसके बाद कॉलेज के विद्यार्थियों ने स्वरचित कविता का पाठ भी किया। जिसमें आरती कुमारी साव, अमन हेला, आशिया परवीन, ज्योति राम, सरोजिनी साव, प्रियंका महतो, निर्मल कुमार ठाकुर एवं अंजली कुमारी दास ने सुंदर प्रस्तुति दी। इस संगोष्ठी में चयनित शोध पत्रों का वाचन भी किया गया। उर्दू विभाग से आयी डॉ. महजबीन ने 'प्रेमचंद के अफ़सानों में हिन्दुस्तानी औरत' विषय पर, डॉ. मो. शमशेर आलम ने 'भारत का सच्चा कहानीकार : प्रेमचंद' विषय पर, हिंदी विभाग की डॉ. मीना कुमारी, 'प्रेमचंद के स्त्री पात्र' विषय पर, खांद्रा कॉलेज से प्रीति सिंह ने 'प्रेमचंद की कहानियों में स्त्री-मनोविज्ञान' विषय पर, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से चांद शेख ने 'प्रेमचंद के किसान' विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए। पी.जी के छात्रों में रोशनी रजक ने 'प्रेमचंद के साहित्य में कृषक जीवन' विषय पर, उर्मिला कुमारी ने 'मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में नारी समस्या का यथार्थ चित्रण' विषय पर और स्वाति मिश्रा ने 'प्रेमचंद की दृष्टि में जाति के प्रश्न : दलित विमर्श के आलोक पर' विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किये।


इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय था ‘प्रेमचंद का भारत’, संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रोफेसर आशुतोष पार्थेश्वर  ने अपने बहुमूल्य वक्तव्य में कहा कि- 'प्रेमचन्द हिन्दी-उर्दू भाषा के शीर्ष-स्थानीय लेखक हैं। उनका लेखन एक बेहतर मनुष्य और बेहतर दुनिया बनाने की रचनात्मक कोशिश है। वे भारतीय नवजागरण और स्वतंत्रता आन्दोलन के सबसे विश्वसनीय लेखक हैं। भारतीय समाज की हजारों वर्षों की गतानुगतिकता, जातिप्रथा की अमानवीयता, धार्मिक वैमनस्य और साम्प्रदायिकता, गरीबी और बेगारी, स्त्रियों की दोयम स्थिति जैसे अनेक मुद्दे, जिनसे उस दौर के संघर्ष का चेहरा बनता है और जो आज भी मौजूद हैं, प्रेमचन्द उनसे टकराते हैं और वैकल्पिक समाज की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। कहना जरूरी है कि जिन सवालों से प्रेमचन्द टकराते हैं, वे केवल भारत के लिए नहीं, दुनिया के किसी भी खित्ते के लिए उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। प्रेमचन्द के लिए भारत का अर्थ भारत की जनता से था। उनके लिए देश, अत्यन्त संवेदनशील, विस्तृत और समावेशी इकाई है। और, केवल देश ही नहीं, वे वृहत्तर मनुष्य समाज के लिए भी ऐसा ही सपना देखते थे।'  


मुख्य वक्ता के वक्तव्य के बाद विद्यार्थियों और शोधार्थियों के द्वारा कई प्रश्न किये गए, जिसका उत्तर मुख्य वक्ता ने दिया। यह सेशन काफी महत्वपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक रहा। इस अवसर पर त्रिवेणी देवी भालोटिया, कॉलेज के प्रेसिडेंट, जी.वी श्री तापस बनर्जी महोदय उपस्थित रहे। उन्होंने इस अवसर पर अपने वक्तव्य में कहा कि- 'प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं', उन्होंने गोदान का जिक्र करते हुए कृषक जीवन के संघर्ष को बताया। इस कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन हिंदी विभाग की डॉ. किरण लता दुबे तथा दूसरे सत्र का संचालन डॉ. जयराम कुमार पासवान (पी.जी. समन्वयक)  ने किया। धन्यवाद ज्ञापन विभाग के सहयोगी डॉ. वसीम आलम (यूजी समन्वयक) ने किया। 


इस अवसर पर हिंदी विभाग से डॉ. आलम शेख, रीना तिवारी, श्री नवीनचंद सिंह, साहित्य आस्था के संचालक श्री मनोहरलाल पटेल, साहित्य आस्था के संरक्षक व समाजसेवी, श्री मनोज यादव, श्री सिन्टू भुईया, बांग्ला विभाग से प्रो. सोम्पा गुप्ता, डॉ. राजश्री बोस, राणा भट्टाचार्य, संस्कृत विभाग से डॉ. दीपोश्री मंडल, अंग्रेजी विभाग से अरुणिमा कर्मकार, शुमबुल नसीम, ऊर्दू विभाग से डॉ. सफक्त कमाल, वाणिज्य विभाग से अभिजित चट्टोपाध्याय, कैमिस्ट्री विभाग से डॉ. संचारी पाल, भूगोल विभाग से दीपांकर उरांव, सहित बड़ी संख्या में छात्र और शोधार्थी उपस्थित रहें। 
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प्रेमचंद की कहानी 'पूस की रात' का पाठ-परिचर्चा एवं परिवर्तन के 34वें अंक का लोकार्पण सम्पन्न

जन संस्कृति मंच के तत्वावधान में कर्बला रोड स्थित सुमित्रा भवन में 'प्रेमचंद स्मृति संवाद' के तहत प्रेमचंद की बहुपठित कहानी 'पूस की रात' का पाठ हुआ और अनेक लेखकों और विचारकों ने इस कहानी पर बातचीत की। साथ ही डॉ.महेश सिंह के संपादन में निकलने वाली ई पत्रिका 'परिवर्तन' के चौतीसवें अंक का लोकार्पण भी हुआ। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि बंगला की कवयित्री, आलोचक और अनुवादक डॉ.मधुश्री सेन सान्याल ने 'परिवर्तन' का लोकार्पण करते हुए कहा कि जिन प्रेमचंद की स्मृति में यह आयोजन है वे महान कथाकार के साथ साथ एक दृष्टिसंपन्न संपादक भी थे। पत्रिका का संपादन बहुत रचनात्मक कार्य है। संपादक महेश सिंह ने पत्रिका के पूर्व प्रकाशित कई सामान्य अंकों के साथ साथ विशेषांकों की जानकारी दी और अगला अंक दलित महिला और आदिवासी पर केंद्रित करने की योजना को साझा किया।
तत्पश्चात बलभद्र ने 'पूस की रात' कहानी का पाठ किया। युवा कवि एवं आलोचक शैलेंद्र कुमार शुक्ल ने कहा कि इस कहानी में एक किसान के मजदूर में तब्दील होने के साथ साथ वर्ग संघर्ष की चेतना की बारीक अभिव्यक्ति है। उन्होंने प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के हवाले से प्रेमचंद और बलभद्र दीक्षित 'पढ़ीस' की कहानियों की विषय वस्तु पर प्रकाश डाला। मधुपुर से आए हुए डॉ. अंजर हुसैन ने प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू का कथाकार बताते हुए कहा कि हाशिए के समाजों को प्रेमचंद ने कथासाहित्य में प्राथमिकता दी है। डॉ.प्रभात कृष्ण ने पूस की रात के पात्रों के मनोविज्ञान को यथार्थ की पृष्ठभूमि में समझने की कोशिश की। मनीष कौशल ने कहा कि प्रेमचंद के समय के किसान और मजदूर आज दूसरे अन्य संकटों से भी घिर गए हैं। आज शोषण के नए नए रूप दिखने लगे हैं।


पत्रकार प्रभाकर ने कहा कि प्रेमचंद की अनेक कहानियों और उपन्यासों में प्रेम उनकी पूरी बुनावट में मिलेगा। शंकर पांडेय ने कहा कि प्रेमचंद तर्क और मनुष्योचित चेतना के कथाकार हैं। उर्दू साहित्य के अध्येता डॉ.गुलाम सामदानी ने पूस की रात को किसान की गरीबी और सहनशीलता के बीच प्रतिरोध को जगह देती कहानी कहा। श्वेता कुमारी ने हस्तक्षेप करते हुए पूस की रात की महिला चरित्र मुन्नी पर बात की। गांडेय के जिला परिषद सदस्य मुफ्ती मोहम्मद सईद आलम ने कहा कि अपने ही समाज में हल्कू हैं और हलाकू भी हैं। प्रेमचंद इसको समझने में सहायक हैं। 


अध्यक्षीय वक्तव्य में उर्दू के शायर मोइनुद्दीन शम्शी ने पूस की रात के परिवेश की चर्चा करते हुए प्रेमचंद की कहानियों में पशु प्राणी की भूमिका को रेखांकित किया। उमेश प्रसाद वर्मा, टुकलाल रविदास, कैसर इमाम कैसर, नवीन कुमार मिश्र ने भी अपनी बातें रखीं। हीरालाल मंडल, मु.रमीज रजा, रणधीर प्रसाद वर्मा, चंद्रभान यादव, पूनम शुक्ल, नीलम सिंह, राधा सिंह,अरविंद कुमार तिवारी, रवि कुमार यादव, नबीन कुमार सिन्हा, पवन कुमार वर्मा, रामकुमार आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन बलभद्र एवं धन्यवाद ज्ञापन महेश सिंह ने किया।
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Friday, May 24, 2024

साधारण से असाधारण की यात्रा : रामनगीना मौर्य की कहानियाँ

लखनऊ निवासी प्रतिष्ठित लेखक रामनगीना मौर्य ने पिछले कुछ वर्षों में ‘आखिरी गेंद’, ‘आप कैमरे की निगाह में हैं’, ‘साॅफ्ट काॅर्नर’ व ‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें’, ‘मन बोहेमियन’, ‘आगे से फटा जूता’ एवं ‘खूबसूरत मोड़’ जैसे बेहतरीन कहानी-संग्रह पाठकों के सुपुर्द किया है। कहानीकार शिवमूर्ति के विचारानुसार-‘‘रामनगीना मौर्य आम जिन्दगी की कहानियां कहते हैं। जहां से ये अपनी कहानियों के पात्र लाते हैं, वहां तक सामान्यतः अन्य कथाकारों की निगाह नहीं पहुॅचती या फिर वे उधर निगाह डालना जरूरी नहीं समझते।...इसीलिए मैं रामनगीना मौर्य को उपेक्षित और अलक्षित जिन्दगी का विशिष्ट कथाकार कहूंगा।’’- (खूबसूरत मोड़, दूसरी आवृत्ति, पृ-7)


रामनगीना जी की कहानियां आम जीवन की छोटी-से-छोटी घटना, भाव, वस्तु तथा स्थिति को पकड़ लेती हैं तथा उनके माध्यम से जीवन के उन अनछुए पहलुओं को प्रकाशित करती हैं जिसे जिन्दगी को सरसरी नजर से जीने वाले साधारण लोग नजरअंदाज कर जाते हैं। इस मामले में आपके विषय चयन की बारीकी व अंदाज-ए-बयान की महीनता पाठक को बांधकर रख लेती है। घर-कार्यालय के साधारण क्रिया-कलाप तथा मामूली वस्तुओं को चुनते हुए आपने उस सत्य को टटोला है, जो पाठक को प्रभावित करता है, बाजारीकरण, मूल्य-वृद्धि, मध्यमवर्गीय जीवन के आर्थिक दबाव व नई पाढ़ी के साथ पुरानी पीढ़ी के विचारों के असामंजस्य को उभारने की भरसक कोशिश करता है।

अत्यन्त रोचक और मजेदार वार्तालाप के माध्यम से आपने ‘रोटेशन सिस्टम से’ कहानी में मध्यमवर्गीय आम पारिवारिक रिश्तों को खंगाला है। ये बातचीत निविड़ मध्य रात्रि को लेखक के घर में रखी डाॅयनिंग-टेबल की छः कुर्सियों के बीच हो रही है। ये कुर्सियां आपस में इस परिवार के सदस्यों की बुराई भी करती हैं और मानव प्रवृत्ति की आलोचना भी। वर्तमान बाजारीकरण के जमाने में बढ़ती कीमतों से समझौता करते हुए भारतीय अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में पिस रहा है। कहानी में दिखाया गया है कि एक डाॅयनिंग-टेबल खरीदने के लिए हम कितनी दुकानों के चक्कर काटते हैं, जिससे हमारे बजट की सीमा भी बनी रहे व वाजिब दाम में बेहतरीन चीज हाथ लग जाए। दूसरी ओर उपभोक्तावादी संस्कृति पर चोट करते हुए मौर्य जी लिखते हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार अपनी शान बघारने के लिए डाॅयनिंग-टेबल का दिखावा करने से नहीं चूकता। कहानीकार के भाषाई जादू ने डाॅयनिंग-चेयर्स की बातचीत को बड़ा दिलचस्प बना दिया है-‘‘मालिक भी अपने दोस्तों संग साहित्य जगत में सशक्त हस्ताक्षरों की कमी, या दिनों-दिन पाठकों की कमी होते जाने का मसला हो, या साहित्य-जगत की तीखी-चटपटी, लाग-लपेट बातें हों, सब कुछ इसी डाॅयनिंग-टेबल पर ही निबटाते हैं। अभी पिछले सण्डे ही देखा होगा, इनके पड़ोसी सक्सेना जी अपने खाली प्लाॅट में काम शुरू कराने आए थे। उन्हें भी जाने क्या सूझी...गिट्टी, मौरंग, सरिया, काॅरपेण्टर, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन आदि के बारे में उन्होंने इनसे औपचारिक पूछताछ क्या कर लिया, ये उन्हें यहीं डाॅयनिंग-टेबल तक खींच लाये। मालकिन से दो चाय बना लाने के लिए बोलते, पूरे शहर में कहां-कहां ठीक-ठाक बिल्डिंग-मैटेरियल्स और ठेकेदारों में कौन ईमानदार या ठग है, के बारे में विस्तारपूर्वक बताते, चर्चा करते, कई उदाहरण देते, बीच-बीच में दिलचस्प सुझाव भी दे दे रहे थे।’’- (कहानी संग्रह- यात्रीगण कृपया ध्यान दें, पृ-32) 

अतः मौर्य जी ने आम भारतीयों की फितरत की नब्ज पकड़ी है। साधारण परिवारों में बातचीत के ढ़र्रे को टटोला है। मेल-मिलाप, विचारों के आदान-प्रदान तथा पास-पड़ोस में अब भी बची हुई मिलनसार जीवटता को सहेजा है। कहानी में एक लेखक के स्वभाव व परिवारजनों में उसके लेखन के प्रति दृष्टिकोण को भी दर्शाया गया है। यह भाव आपकी एक और कहानी ‘नई रैक’ में पाठकों को अभिभूत कर देता है, जहां एक आम लेखक की जरूरी वस्तुओं नोट्स, कागज की कतरनों, किताबों, पुराने अखबारों, कापियों, पत्रिकाओं को रखने के लिए उसे अपने ही परिवार में खरी-खोटी सुननी पड़ती है। पर लेखक तो प्रतिबद्ध होता है, अपनी दृष्टि में भी और अपने लेखन के प्रति भी। इसीलिए उक्त कहानी का लेखक पत्नी की उलाहनाओं से परेशान होकर अपने लेखन व साहित्य से सम्बन्धित आवश्यक कागज-पत्रों को सहेजकर-समेटकर रखने के लिए पड़ोस के काॅरपेण्टर के पास एक नई रैक बनवाता है। इस लकड़ी की रैक को बनाने में उसकी काॅरपेण्टर और सामान बेचने वाले दुकानदार से हुई वार्तालाप बढ़ती हुई महंगाई की मार, मिस्त्रियों के नखरे, मध्यमवर्गीय भारतीय के हिसाब-किताब से भरी जिन्दगी का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती है। यही कहानी-कहन की सहज कला व लेखन का अंदाज मौर्य जी की कहानियों को अल्हदा वजूद देते हैं। एक रैक को बनवाने के लिए वह लेखक कितनी बार आगे-पीछे सोचता है, बाजारों की भाषा के चलताऊपन और ग्राहक को फंसाने-फुसलाने की तरकीब को व्यक्त करने में आपने कमाल दिखाया है। किस्सागोई के लहजे में कही गई आपकी कहानियां हमारे आस-पास मौजूद माहौल को और अधिक लेखन के दायरे में समेटती चलती हैं।

मानवीय संवेदनाओं के सूखते धरातल पर अब भी साहित्यकार की आशा जीवित है। ‘लोहे की जालियां’ कहानी में मौर्य जी ने पुराने रिश्तों, दोस्ती के मसृण तन्तुओं, परदुखकातरता तथा सहृदयता के महीन धागों को लोहे की जालियों से अधिक मजबूत दिखाया है। पुराने किराये के मकान में पांच हजार रूपये खर्च कर लगाए गए लोहे की जालियों का पैसा वसूलने के इरादे से गए लेखक को जब वहां अपने हाॅस्टल जीवन का पुराना जूनियर किरायेदार के रूप में मिलता है तो उसके इरादे पुरानी दोस्ती की यादों में धूमिल पड़ जाते हैं। एक साथ हाॅस्टल में बिताए गए दिनों की खुशनुमा यादें व एक-दूसरे की मदद में तत्पर उन दिनों की भावनाएं लेखक को कहीं भीतर तक तर-बतर कर देती हैं और वे जालियों से होने वाले उस जूनियर और उसके परिवार के लाभ को देखकर ही संतुष्ट हो जाता है। तभी तो कहानी के अंत में मौर्य जी लिखते हैंः-

‘‘जाहिर है, वो लोहे की जालियां, इंसानी रिश्तों की जंजीर से कमजोर साबित हुईं। फिर...जीवन में किसका एहसान हमें किस रूप में चुकाना पड़ जाय, कौन जानता है?’’

‘‘हां...हवा-प्रकाश के रूप में।’’

‘‘बेशक...कोट और जूतों के रूप में।’’

‘‘जाहिर है...लोहे की जालियों के रूप में भी...?’’- (कहानी संग्रह- साॅफ्ट काॅर्नर, पृ- 50)

उल्लेखनीय है कि लेखक ने अपने जूनियर को यह नहीं बताया कि ये लोहे की जालियां उन्होंने लगवाईं थीं, बल्कि जब उन्होंने देखा कि उन जालियों से उसे काफी आराम मिल रहा है तो वे गद्गद हो गए। मौर्य जी मानते हैं कि आज भी व्यावसायिक मनोवृत्ति, रूपये-पैसे के लिए भागने वाली जिन्दगी में मानवीय मूल्यों, परोपकार व निःस्वार्थ मित्रता के लिए कहीं जगह बची है।

आपकी कहानियों जैसे, ‘आप कैमरे की निगाह में हैं’, ‘पत्ता टूटा डाल से’, ‘आखिरी गेंद’, ‘फुटपाथ पर जिन्दगी’ आदि में भी आम जीवन में उपयोग आने वाली वस्तुओं के जरिये छीजते हुए संवेदनात्मक मूल्यों एवं अंतर्विरोधों को स्वर दिया गया है। आपकी ‘ग्लोब’ कहानी में वर्तमान समय में इंटरनेट, मोबाइल, लैपटाॅप में सिमटे हुए जीवन में दो पीढ़ियों के वैचारिक अंतर को दर्शाया गया है। पिछली पीढ़ी के लिए ग्लोब के माध्यम से दुनिया को देखने-बूझने का दृष्टिकोण निर्मित होता था। तब बड़ों के आदेशों के समक्ष मुंहजोरी करने का दुस्साहस जुटाना शायद भारी पड़ता था। वहीं वर्तमान पीढ़ी की हथेली में रखे मोबाइल व इंटरनेट ने उसकी हर जिज्ञासा को बड़ी आसानी से संतुष्ट कर दिया है। उसे उच्चाकांक्षी, अति आत्मविश्वासी व उत्साही बनाया है, तथा पुरानी पीढ़ी को फेसबुक, व्हाट्सएप, सोशल-मीडिया तथा बैंक के कामकाज, गैस की बुकिंग से लेकर रेलवे व अन्य रोजमर्रा के जीवन में मोबाइल की तकनीक को समझने के लिए नई पीढ़ी के समक्ष हथियार डालने पड़ते हैं। ये घर-घर की कहानी है। साथ ही लेखक दिखाते हैं कि वर्तमान पीढ़ी की परवरिश ने भी कहीं-न-कहीं उसकी सोच को प्रभावित किया है-‘‘कहां हमारी लौकी, बैगन, भिंडी, तरोई, कुंदरू, टिण्डा, देशी घी खाने वाली पीढ़ी और कहां ये पिज्जा-बर्गर, प्रोसेस्ड-फूड, नूडल्स और रिफाइण्ड तेलों से बने पदार्थ आदि खाने वाली पीढ़ी? भला क्या मुकाबला हमारा-इनका?’’- (कहानी संग्रह- साॅफ्ट काॅर्नर, पृ- 91)

कार्यालयीय जीवन की बारीकियों व मनोवृत्तियों को दर्शाते हुए आपने ‘बेकार कुछ भी नहीं होता’ कहानी बुनी है। इसमें ऑफिस के गेट पर पड़े दो पेंचों व बिना ढ़क्कन के पेन को उठाकर लाने वास्ते बाबू ने उनका सदुपयोग किया है। वास्तव में कहीं-न-कहीं लेखक द्वारा भारतीय जीवन में हर छोटी-से-छोटी वस्तु की उपयोगिता तथा बेकार समझी जाने वाली अति-साधारण वस्तुओं को सहेजकर चलने की मनेावृत्ति के लाभ को दिखाया है। मौर्य जी की कहानियों के विषय में साहित्यकार सुषमा मुनीन्द्र का कहना है कि ‘‘कहानियों में वे छोटे-छोटे विषय, उपादान, घटनाएं, हाशिये, दिनचर्या, परिवेश, चारीत्रिक बोध, धरातल, स्थानीयता, मनोविज्ञान, जरूरतें हैं, जहां आमतौर पर रचनाकारों की दृष्टि नहीं जाती या वे इन स्थितियों को कहानी के काबिल नहीं मानते।...रामनगीना मौर्य की कहानियों का स्वरूप अलग होता है, क्योंकि नामालूम-सी चीजों को कल्पना और सम्प्रेषण से अच्छा कथ्य बना देते हैं।...रामनगीना मौर्य कहानियों के अन्त में जो ट्विस्ट लाते हैं, वह कहानी के उद्देश्य को भली प्रकार स्पष्ट कर देता है।’’- (यात्रीगण कृपया ध्यान दें- दूसरी आवृत्ति, पृ-140) मौर्य जी के पाठक दैनन्दिन जीवन से चुने गए कहानियों के चरित्र से आसानी से रिलेट कर लेते हैं।

‘खूबसूरत मोड़’ कहानी संग्रह में परमानंद दास, नरोत्तम दास, सुरेन्द्र, सरन, सहाय, गुमानमल, राजन बाबू हमारे-आपके शहर, मुहल्ले, ऑफिस से निकलकर उनकी कहानियों के हिस्से बन गए हैं। उनकी कहानियां मानव-मनोविज्ञान की परतों को उघाड़ने में दक्ष हैं, और इसका श्रेष्ठ उदाहरण ‘खूबसूरत मोड़’ की रेवती खन्ना का चरित्र है। बीमार मां, अपनी तलाकशुदा जिन्दगी और पारिवारिक-आर्थिक दीनता को झेलती हुई रेवती क्यों अपने बचपन के मित्र सत्यजीत से मिलने से कतराती है, इसका खुलासा कहानी के अंत तक पहुंचते हुए पाठक के समक्ष होता है। बाल-मनोविज्ञान में अपनी पैठ बनाते हुए आपने ‘शास्त्रीय संगीत’ शीर्षक कहानी में दर्शाया है कि कई बार बच्चों को संगीत के माध्यम से चैन-सुकून मिलता है। यह कहानी संगीत-थेरेपी से रोग-निदान की संकल्पना की ओर भी इशारा करती है। इसके साथ ही मुफ्त में बढ़-चढ़कर सुझाव देने की आदत पर भी आपने भरसक व्यंग्य किया है।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि कहानीकार रामनगीना मौर्य जी की कहानियां आम भारतीय जीवन को आद्योपान्त निखारती हुई उसके भीतर तक पहुंचने का रचनात्मक प्रयास है। कहानियां बस, ट्रेन, ठेले, रिक्शा की यात्रा करती हैं। अखबार, पत्र-पत्रिकाओं, पेपर, पेंसिल, कम्प्यूटर, मोबाइल, लैपटाॅप, सब्जी-बाजार, सिनेमाघरों की उपयोगिता पर नजर दौड़ाती हैं। बैंकों, ऑफिसों, दुकानों, गलियों के जीवन से इत्तफाक रखती हैं। कई निर्जीव वस्तुओं के वार्तालाप से आपने जीवन के सजीव अंश को और अधिक सतर्क और सजग बनाया है। अक्सर मानव मन के हलचल, उहापोह, आशा-आकांक्षा को व्यक्त करने के लिए आपने निर्जीव वस्तुओं को कहानी में अहम भूमिका प्रदान की है। पीढ़ियों का संघर्ष दिखाने के लिए ग्लोब व कम्प्यूटर, रिश्तों की मसृणता को लोहे की जालियों, पति-पत्नी के नोंक-झोंक को डाॅयनिंग-चेयर्स व व्यावसायिक मोल-भाव को रैक के माध्यम से आपने बखूबी प्रकाशित किया है। अतः आपकी कहानियां मानवीय संवेदनाओं के साथ निर्जीव वस्तुओं की सक्रियता को भी साथ लेकर चलती हैं। आम चीजों के जरिये जिन्दगी के खास जज्बातों को बयान करने की आपकी कला पाठकों को आह्लादित करती है। डॉ. नीलोत्पल रमेश ने लिखा है कि ‘‘कथाकार रामनगीना मौर्य ने पाठकों को यह ध्यान दिलाने की कोशिश की है कि कहानी के लिए किसी विषयवस्तु का होना जरूरी नहीं है, बल्कि दैनिक क्रिया-कलापों के बीच में आए प्रसंगों पर भी कहानी लिखी जा सकती है। कथाकार ने निर्जीव वस्तुओं में संवाद करवाकर एक नई राह की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है।’’- (यात्रीगण कृपया ध्यान दें- दूसरी आवृत्ति, पृ-144)

समीक्षक  : 
डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी,
एसोसिएट प्रोफेसर, गोखले मेमोरियल गल्र्स काॅलेज, कोलकाता,
2-ए, उत्तर पल्ली, सोदपुर, कोलकाता- 700110,
मोब. नम्बर-9433675761


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Tuesday, April 16, 2024

प्रकृति, समाज, प्रेम, संस्कृति और नदियों को बयां करती कविताएँ

राकेश कबीर का कविता संग्रह ‘तुम तब आना’ चार विभागों में है। यह संग्रह लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित है। इस काव्य संग्रह में लगभग 97 कविताएं लिखी हैं जिसमें पहले विभाग में ‘कुछ अपनी बात कहूं’, ‘प्रकृति के रंग’, ‘नीति, अनीति, कुनीति’ और कोविड : दूसरी लहर, मौत का मंजर है। इस संग्रह की कविताओं में रचनाकार ने कई बिंदुओं पर साहित्य के माध्यम से अपनी बात बड़े सरल तरीके से कही है जिसमें कोई लाग लपेट नहीं मिलती। इस संग्रह के रचनाकार का क्षेत्र बृहत् बड़ा है, जिसमें वे कई तरह के समाज से जुड़ते हैं और वही जुड़ना लेखक को चारों दिशाओं में देखने के लिए तैयार करता है। काव्य शास्त्र में विद्वानों ने माना है कि काव्य के मूल प्रेरक तत्व को काव्यहेतु कहते हैं। अर्थात सही मायनों में कहे तो काव्य का अनिवार्य एवं एकमात्र हेतु है प्रतिभा, और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास प्रतिभा के ही परिष्कारक, पोषक एवं संवर्धक हेतु हैं।1 (भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र का संक्षिप्त विवेचन, अशोक प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 17) अत: कवि की प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास इस काव्य संग्रह में हैं। इस संग्रह को जब पाठक पढ़ेंगे तो, वे तमाम बिंदुओं से टकराएंगे और वही बात सिद्ध होगी कि ‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगै, घाव करें गंभीर’ कवि अपनी बात इतनी सपाट बयानी से कर देंगे कि इसका आभास पाठक वर्ग पर पड़ेगा। कविता संग्रह का शीर्षक ‘तुम तब आना’ अपने आप में कौतूहल पैदा करता है । ‘तुम तब आना’ यह किस के लिए कहा जा रहा है? कवि किसे कह रहा है कि ‘तुम तब आना’ अगर देखें तो हम जब किसी को इस वाक्य से कहते है तो विशेष समय और परिस्थिति को भांप कर ही कहते हैं। हम विशेष का ध्यान रखते हैं। और आने वाला हमारा कोई प्रिय हो तो हम नहीं चाहेंगे कि उसके आने में कोई बाधा या उसे हानि हो। दरअसल कवि प्रकृति प्रेमी हैं वसंत के खुशनुमा रंग बीत गए हैं और सूखे खुश्क मौसम की रुखाईयों के बाद कवि को वसंत आने का इंतजार है। इसी संदर्भ में जब पाठक इस संग्रह की कविताओं से गुजरेंगे तो पाठक ध्यान देंगे कि कवि का एक उद्देश्य है। प्रकृति, नदियां, समाज, संस्कृति आदि  इस संग्रह में रोचकता, गंभीरता, और जिज्ञासा पैदा करते हैं जिसमें प्रकृति से जुड़ीं कविताएं आज के समय को प्रासंगिक बनाती है।

कवि बसंत के लिए  कहते हैं कि –‘बसंत तो कब का बीत गया/जो फूल खिले थे खेतों में/सब पीले दाने बन गए/खेत उजाड़ और नीरस हो चुके/तुम अभी मत आना/कि इस सफेद धूप के जले–भुने मौसम को/मैं जरा अकेले निपट लूं/X   X    X    X    X/जब खेतों में धान की हरियाली/पसर जाए दूर तक/ इनके बीच/सारस के जोड़े /संगसंग विचरने लगें/तुम तभी आना’2 (वही पृष्ठ सं.18, 20 )
कवि प्रकृति के सुखद समय के आने की कामना कर रहे हैं। कवि की बारीक दृष्टि में बसंत का समय समाया हुआ है। जब खेत हरियाली से लहरा उठे, नए फूल खिल जाए, धूप गुनगुनी होने लगे, ग्रीष्म काल चला जाए और जब धान के खेतों में हरियाली पसर जाए दूर तक तब तुम आना। ये आना क्या है? यह कहना मानवीय सरोकार का है कि सद्भाव सभी प्राणी इस धरा पर खुश रहें। लोग मन से झूमे , किसान लहलहाती फसल को देख कर बाग बाग  हो जाएं, नव जोड़े खिले रहें । पशु पक्षी प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य से झूमे। इसलिए तुम तब आना’ कविता मानवीय संवेदना को लेकर चल रही है।
कवि अपनी बात में  ‘कविता मेरी सहयात्री’ में कहते हैं किइस खानाबदोश जिदंगी में जाने कहाँ-कहाँ जाना है, किन अनजाने वीराने रास्तों से गुजरना है, कुछ पता नहीं । चौदह साल की उम्र में गाँव छोड़ गोरखपुर गए पढ़ाई करने, बहुत कष्ट हुआ । दीवार में लगे कैलेंडर में पंद्रहवें दिन घर वापस लौटने के लिए गोल घेरा लगा देता था और हर रोज एक दिन कम होने और गाँव वापस जाने की ख़ुशी बढ़ती जाती। दो- तीन दिन बाद वापस आता, माँ गाँव के बाहर तक छोड़ने आती, हम दोनों रोते और फिर पन्द्रह दिनों का इंतजार 3 इस कविता संग्रह के पहले विभाग ‘कुछ अपनी तो कहूँ’ में अठारह कविताएँ हैं। जिसमें कवि के अपने चारों ओर चक्कर लगाता जीवन है,  मां परिवार, गाँव, समाज आदि हैं। कवि ने कविताओं के माध्यम से इन सब विषयों को कविता के माध्यम से उकेरा है। जैसे कि इस संग्रह की पहली कविता ‘लिट्टियाँ’ है । पूर्वांचल में लिट्टी एक पारंपरिक व्यंजन है जिसे आज विश्व स्तरीय पहचान मिल गई है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, व उत्तर भारत में लिट्टी मशहूर व्यंजनों में शामिल है। वहीं जब कवि अपने गाँव और अपनी माँ से दूर हैं तो उन्हें उनके द्वारा बनाई लिट्टियां याद आती हैं और साथ ही माँ का स्नेह याद करते हुए कवि व्यष्टि से समष्टि की ओर जाते हैं आज लाखों युवा अपने घर परिवार से दूर हैं उन्हें अपने परिवार की याद स्वतः ही आती है उस याद में माँ की स्मृतियों में जाना अपने में ही पीछे जाना है इस पर वे कहते हैं कि-
अपनी पसंद की चीजें
कब पकाती थी माँ
चूल्हे की जलती आग में
उसे तो हमने हमारी फरमाइशों को ही
बघारते देखा हरदम कड़ाही में
×     ×      ×    ×     ×
कचूर के पत्तों से लिट्टी की पीठ पर
छप जाती थी एक छापी
जैसे उसकी साड़ी पर
छपे होते थे कुछ डिजाइन
और गाती थी गीत समूह में
चूल्हे की आग, लिट्टी और संग साथ की ख़ुशी में।4 (वही पृष्ठ सं. 15 )
कवि राकेश कबीर की कविताओं में विविधता है और यह विविधता पाठक वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित करती है। प्रकृति से होते हुए वे अपने जीवन साथी के लिए भी समर्पित हैं । उनके काव्य में एक जिजीविषा है जो मुस्कुराहटें पैदा करती है। आज समाज में सम्मान और सद्भाव है तो खुशी और संतोष है। स्त्री को पुरुष समाज ने अपने से कमतर आंका है उसके लिए दोहरे मापदंड रखे। बराबरी का ढंग दिया ही नहीं जिस कारण स्त्री को समझा ही नहीं। कविता ‘तुम्हारी मुस्कुराहटें’ में वे कहते हैं-
तुम्हारी मुस्कुराहटें देखता हूं
तो लगता है
ये धरती रहेगी
फूल भी खिलेंगे
पंछी उड़ेंगे आसमान में
मुझसे बराबरी से टक्कर लेती
उम्मीद हो मेरी तुम साथी
हमराह, संगिनी
बधाइयाँ तुम्हें
मेरी जिंदगी की फिजा में
तुम्हारी मुस्कुराहटों के लिए5         (वही पृष्ठ सं.17 )
इस विषय में कहे तो प्रेम एक बेजोड़ संबंध है, जो अविरल धारा प्रवाह होता है।  प्रेम में जीवन अमृत रूपी लगता है जो जीवन की सार्थकता सिद्ध करता है। प्रेम से जुड़े साथी के साथ जीवन जीना और उसके अनुभव से होकर गुजरना ही जीवन की असल सार्थकता है। आगे वे अपनी एक कविता में कहते हैं-
तुम साथ नहीं हो तो ये
अजनबी शहर कितना उजड़ा सा लगता है
कितना पराया सा लगता है
मन के एक कोने में
एक कसक सी रहती है
क्यों न जिम्मेदारियों के
परों को काट फेंक दूं
और कह दूं जमाने से
हम अलग नहीं रहेंगे
तुम्हारी बकवास बंदिशों के डर से।6 (वही पृष्ठ सं.21 )
उपर्युक्त कविता को पढ़ कर कबीरदास की पक्तियां याद आती हैं कि-सांझ पड़े, बीतबै, चकवी दीन्ही रोय। चल चकवा व देश को जहां रैन नहिं होय।अर्थात् कबीरदास ने कहा है कि शाम होते ही चकवी रोने लगती, कबीर दास आगे कहते हैं कि चकवा ऐसी जगह चलो कि जहां रात नहीं होती हो। यही दशा इस कविता में देखने को मिलती है।
राकेश कबीर पेशे से एक प्रशासनिक अधिकारी हैं समय पर घर न पहुंचना और नन्ने बच्चे को यह कहना कि  यहीं तो बैठा रहता हूं मैं, तुम्हारे लौटने तक। पिता का पुत्र से स्नेह मार्मिकता भर देता है। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं
मेरे कंधों पर सवार होकर
आसमान को छू लेने की
उसकी मासूम ख्वाहिश
कितनी भली लगती है
×    ×     ×      ×
और अब दूर कहीं रहने को बेबस मेरे पास
नहीं होता कोई जवाब
×       ×       ×       ×
मैं हर रोज बोलता हूं एक झूठ
×        ×        ×       ×
बिताते हैं एक एक दिन
एक दूसरे के इंतजार में।7  (वही पृष्ठ सं.27,28 )
प्रकृति प्रेमी होना प्रत्येक मनुष्य को पसंद है लेकिन समय-समय पर उसका आभास होना अत्यन्त आवश्यक है। आज ऋतुएं बीत भी जाती हैं और नई युवा पीढ़ी के लोग उनसे अनभिज्ञ रहते हैं। लेकिन कवि की निगाहें ऋतुओं के प्रत्येक क्षण पर हैं। पूरब की अपेक्षा पश्चिम थोड़ा शुष्क क्षेत्रों में भी आता है । पूरब की आवो हवा में पलकर बड़े हुए व्यक्ति के लिए यह एक दम भिन्न ही लगेगा कि मौसम के मिजाज में इतनी तलखी है, थोड़ी फुआर हों। कवि जब पश्चिम में अपने तबादले के बाद आते हैं तो कम वर्षा वाले क्षेत्र की उमस भरी गर्मी व्याकुलता पैदा करती है। कवि बादलों को अपना साथी कहते है। पंक्तियों के माध्यम से देखा जा सकता है
एक गुजारिश की थी हमने
बादलों से
जब बीत गया था
आधा सावन सूखे- सूखे
कि आना इस ओर भी
पूरब से पश्चिम आ गया हूं मैं
छाए रहना देर तक8   (वही पृष्ठ सं.36 )
कवि बादलों से आधे सूखे सावन बीत जाने की बात कर रहे हैं उनका आवाह्न बादलों के लिए है। वे आगे कहते हैं कि बरसना भले ही कम लेकिन मेरे साथ बने रहना। यह साथ बने रहना कवि का बादलों के प्रति मित्रवत व्यवहार को दर्शाता है। कवि का तपती गर्मी में इन बदलों के बिना मन नहीं लग रहा। यहां कवि अपने गांव के मूल वातावरण को याद कर रहें हैं। कवि आगे कहते है कि एक अभी तक कोई घर नहीं है जिसे मैं अपना कह सकूं, ईंट पत्थर की दीवार व छत कितनी ही बदल गईं लेकिन जब तक तुम मेरे ऊपर नहीं मचलते तब तक यह खानाबदोश जीवन सब बर्बाद हो लगता है।  अतः कवि की दृष्टि व्यापक और मानवीय संवेदना से पूर्ण है। एक किसान जिस तरह से बादलों को देख प्रसन्न चित रहता है उसी प्रकार कवि बादलों को देख प्रसन्न चित हैं, वे कहते हैं-
जब तक तुम नहीं मचलते
काले दूधिया रंग में सर ऊपर
ये खानाबदोश सफ़र
और हरा- भरा शहर
सब बर्बाद लगते हैं9( वही पृष्ठ सं.37)
कविता संग्रह के पहले विभाग की आखिरी कविता ‘मोहल्ले गरीबों के’में गरीब बस्तियों का प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया गया है । कवि की दृष्टि पैनी है जिसमें नजरें उन बस्तियों पर पड़ जाती है जिनके नाम पर शासन द्वारा करोड़ों का धन आता है। लेकिन यह विकास कागजी ज्यादा और जमीनी कम ही होता है। गरीबों के मौहल्लों को देख कवि मन विचलित होता है वह पहचान लेता है कि उखड़े हुए रास्ते उन्हें पता बता देते हैं कि अमीरों के घर और गरीबों के घर किधर हैं जैसे
उखड़े हुए रास्ते
पता देते हैं कि
अमीरों के मुहल्ले में
किधर बसी हैं
गरीबों की बस्तियाँ 10 (वही पृष्ठ सं.41 )
मानव जीवन प्रकृति से जुड़ा है। यह जुड़ाव ही जीवन पनपाता है। जीवन अर्थात् जी और वन का मिला हुआ संयुक्त रूप है। ‘जी’ अर्थात् प्राण और ‘वन’ अर्थात् प्रकृति। अतः जब प्राण और वन का संयोग होता है तो जीवन शुरू होता है। कवि राकेश कबीर ने कविताओं में पर्यावरण के बदलते परिदृश्य पर बात कही है। आज वैश्वीकरण के बड़ते प्रभाव से अचानक मौसम में बदलते मिजाज को न समझना आम धारणा बन गई है। यह बात ‘अलीगढ़ में बारिश’ कविता के माध्यम से समझी जा सकती है-
‘सावन के महीने में
करते हैं तलाश बादलों की
×  ×  ×  ×
ये अपने शहर वाले
गर बरस गईं कुछ बूंदें
घंटे भर जमीन पर
गालियां देते हैं उफनाई नालियों को
यही अपने शहर वाले।’11(वही पृष्ठ सं.45 )
इसी प्रकार की अन्य कविताएं हैं जो बादलों के झमाझम बरसने की पुकार कर रही हैं जैसे ‘बरसों बादल प्यारे’ कविता में कवि कहते हैं कि बादलों वाला आसमान और बारिशों वाला आँगन देखने को तरस गई थी आँखें । अर्थात् कवि कहना चाहते हैं कि ये आँखें तरस गई है झमाझम बारिश को देखे हुए । सूखे मौसम को देख कर कवि मन झुलस गया है। कवि बादलों को आवाह्न करते हैं कि ‘बरसों भले ही कम , लेकिन कुछ दिन ये तम्बू लगाकर बैठे रहना इधर’ कवि का बादलों के प्रति यह आग्रह मानवीय सरोकार से ओतप्रोत है। जिसमें पृथ्वी के सभी जीव सुख से रह पाएंगे। मानवीय सरोकार इस कविता में विद्यमान हैं जैसे-
बादलों वाला आसमान
बारिशों वाला आँगन देखने को
तरस गईं थीं आँखें
×       ×      ×       ×
अब सुनो भाई बादल
बरसों भले ही कम
लेकिन कुछ दिन ये तम्बू
लगाकर बैठे रहना इधर12 ( वही पृष्ठ सं.49 )
राकेश कबीर की बादलों से तकरीर कविता में एक व्यंग है जिसमें वे बादलों से तकरीर करते हैं। कविता में कवि का बादलों से तकरीर करना और बड़ते प्रदूषण का स्तर इंगित करना और समस्या की जड़ की ओर इशारा करना यह बात महत्तवपूर्ण हो जाती है  कविता में कवि कहते हैं
‘और बादलों के टुकड़ों को सुनाई मैंने
एक डाँट भरी तकरीर
×        ×         ×       ×
माना नादान है आदमी
दिन रात धुआँ घुसेड़ता रहता है
ऊपर आसमान की नाक में चिमनियों से
और नीचे कतारें उसके मोटरों की
कालिख पोतती है हरियाली के मुँह पर’13(वही पृष्ठ सं.52, 53)
कवि कहते हैं कि माना कि आदमी नादान है जो दिन रात धुंआँ फैलाए जा रहा है और ऊपर आसमान में भूरे बादलों को काला स्याह कर उसका रंग रूप ही बदल रहा है। लेकिन फिर भी धरती तो जल रही है, और तपती हुई हवा, बच्चे, झुलसते हुए पेड़, गाय, भैंस, आदि प्राणी सब की जान आफत में पड़ी है। वे आगे कहते हैं-
प्यास बुझाने, जान बचाने के लिए
अब बरस जाओ इधर के सुखाड़ में14 ( वही पृष्ठ सं.53 )
इस प्रकार राकेश कबीर की कविताओं में मानवीय सरोकारों को देखा जा रखता है। कवि भली भांति जानता है कि आज प्रदूषण किन कारणों से फैल रहा है लेकिन फिर भी वह प्रकृति को क्षम्य होने और मानव जीवन को हर्ष करने के लिए कविता के माध्यम से बादलों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं।
राकेश कबीर ने नदियों को बचाने के लिए अनेक अथक परिश्रम किए हैं जिसमें उनके साथ प्रशासन ने भी काम किया है। लेकिन अपने स्तर पर नदियों को सूखने से बचाना और उन्हें लवा-लव बहते देखना यह सुखद अनुभूति है,मानव जीवन के लिए। नदियों पर केंद्रित उनकी पुस्तक ‘नदियों की तलाश में’( वाणी प्रकाशन ) जो एक आत्मकथात्मक ढंग से लिखा संग्रह है। छोटी नदियों के विषय में राकेश कबीर कहते हैं कि नदियों के बारे में प्राय: कम चर्चा होती है, परन्तु मेरी चिंता सदैव से प्रकृति के लोकतांत्रिक स्वरुप को प्रदर्शित करती छोटी नदियों के पक्ष में रही है, जो हमारे खेतों और गाँवों तक पानी लेकर आती हैं। जिससे हमें पेयजल और अतिक्रमण का शिकार होकर अपना अस्तित्व खो रही हैं इन्हें बचाना मानव जीवन के साथ-साथ समस्त जीव-जन्तु एवम् वनस्पतियों को बचाना है।15 कविता ‘लावारिस नदी का दर्द’ में कवि वहां के आम लोगों से इस सूखती ‘सोत नदी’ के विषय में जानने की कोशिश करते हैं लेकिन कोई मुनासिब जबाव कवि को नहीं मिलता वे कहते हैं-
सो गई सोत नदी
चिर निद्रा में
जिनको आई थी तू बसाने
लगे वही तुझे सुखाने
किनारों को मिलाने
तेरे बाँकपन को ममिटाने’16  ( वही पृष्ठ सं.57 )
कवि कहते हैं कि तू गहरी नींद में सो गई है सोत। जिन्हें आई थी तू बसाने वही अब तुझे मिटाने में लगे हैं अर्थात् कवि ने भू-माफिया और अतिक्रमण करते लालची किसानों की और संकेत किया है! नदी से सटे खेतों की सीमाएं अब नदी में जा मिली हैं नदी खेतों में धीरे धीरे विलीन हो गई है। वे आगे कहते हैं अब तुझ से दुर्गन्ध उठती है कीड़े बजबजा रहे हैं तू जिन्हें आई थी जिन्हें अमृत पिलाने वही अब तुझे मिटाने में लगे हैं । कवि कहते हैं कि जिन लोगों से भी पूछा तुम्हारे बारे में कुछ चुप रहे कुछ अनजान किसी ने तुम्हें लावारिस बताया। अर्थात्  तू आई जिन्हें बसाने वही लगे हैं तुझे मिटाने। सोत नदी के विषय में अमर उजाला ऑनलाईन 6 सितम्बर 2019 में प्रकाशित खबर के अनुसार सोत नदी की कुल लंबाई कहने को तो 220 किलोमीटर है मगर कुछ ही हिस्से में यह नदी लगती है। ज्यादातर हिस्सा तो नाले में बदल चुका है या फिर सूखा नजर आता है…नतीजा यह हुआ कि नदी के सूखे हिस्सों पर लोगों ने कब्जा कर लिया…. सोत नदी मुरादाबाद के जौधा से निकलती है और शाहजहांपुर जिले की सीमा में प्रवेश कर जाती है। बदायूं में नदी का 105 किलोमीटर हिस्सा।17 शाहजहांपुर जिले से होते हुए ‘सोत नदी’ गंगा नदी में शामिल हो जाती है।
‘दरख़्त’ कविता में कवि कहते हैं कि यह जलती चिलकती तेज धूप मुरझा देती है छांव दार बड़े-बड़े दरख़्तों को लेकिन यह अपनी छांव कहां छोड़ते हैं। कवि आगे कहते हैं कि ये बेचारे बेहाल हैं अभी तो बसंत में तो आईं थीं नई-नई ललाई हुए कोंपलें। फिर भी इनकी छाँव है इस धूप और गर्मी में इनके नरम पत्तों से। कवि ने कविता के माध्यम से संकेत किया है कि इस वैश्वीकरण के दौर में तापवृद्धि बढ़ रही है जिससे मानसून समय पर नहीं आ रहा। वर्षा कम हो रही है और शहरीकरण के दौर में पेड़ों की कटाई की जा रही है। कविता की पक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
जलती हुई सफेद धूप में
मुरझा जाते हैं रोज ही
×   ×    ×      ×
ये खड़े दरख़्त
बेचारे बेहाल हैं
अभी बसंत में ही तो आई थीं
नई- नई ललाई हुए कोंपलें
लो अब मुकाबिल हैं
गरम धूप और नरम पत्ते18 (वही पृष्ठ सं.67 )
संवेदनशील व्यक्ति हमेशा पर हित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाईतुलसीदास जी की यह पंक्ति को चरितार्थ करता है।सर्द रातेंऔरसर्द मौसम के पिल्ले’ कविता में संवेदनशील मन अभिव्यक्त होता है। कवि मन उन बेजुबान जानवरों की पीड़ा से दुखी है कि सर्द रात में बेसहारा बेजुबान जानवरों को समाज इतनी अमानवीय दृष्टि से क्यों देखता है। कवि इनके लिए शहरों से अधिक गाँवों को सुरक्षित मानते हैं गांव इन बेजुबानों के लिए दुर्घटना से रहित, वाहनों की रफ़्तार दूर हैं।  कवि ने बंदरों को लुटेरा और पैदाइशी मुफ्तखोर इंगित किया है। कविता के माध्यम से कवि ने वंचित समाज के जीवन को उकेरते हैं। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं-
‘रोते रहे कुत्ते रातभर
मोहल्ले के
गर्म लिहाफों में लिपटे हुए
कोसते रहे लोग कुत्तों को रात- भर
×  ×  ×  × ×  ×
परन्तु सच ये है कि
घनघोर ठंड में आज की रात
फिर एक पिल्ला मर गया।’19 ( वही पृष्ठ सं.74)
निष्कर्ष अंततः कवि राकेश कबीर आरम्भ से गांव से जुड़ा महसूस करते हैं। प्रकृति से जुड़े रहना कवि के सहज ही स्वभाव में है, जिसमें उनके कवि मन पर प्रकृति और टटके गंवईपन की सौंध्यता की छाप रहती है। कवि का यह गंवईपन उन्हें प्रकृति के नज़दीक ले जाता है। आज वैश्वीकरण के दौड़ में अनेकों युवा पीढ़ी शामिल है वह अपना भौतिक विकास करके अपने प्रकृति मन को कहीं गहरी खाई में दफनाते जा रहे हैं। इस बीच अपने को जिंदा रखाना और पुरजोर से यह कहना कि‘कविता मेरी सहयात्री’ बड़ा ही जीवंत है। इस काव्य संग्रह में कई जोड़ मिलेंगे जो अपने को एक दूसरे से जोड़ें हुए हैं और असल बात यह है कि यह संग्रह एक गुलदस्ता है। पाठक वर्ग को इस गुलदस्ते में तरह-तरह रंग देखने को मिलेंगे अर्थात् कविताएं बहुत कुछ बयां करती चलेंगी। स्वयं रचनाकार इस संग्रह के लिए कहते हैं इस संग्रह की कविताओं में वर्तमान परिस्थितियों से संवाद, बचपन की स्मृतियां, बार बार उजड़ते बसने का दर्द और धूर्त प्रवृति के जातिवादियों, सत्तालोभियों और उनकी पद लोलुपता से क्षोभ की भी अभिव्यक्ति हुई है।”20 ( वही पृष्ठ सं.9 ) संग्रह में कवि के साथ का वातावरण, वर्तमान समय की परिस्थितियां और प्रासंगिकता विद्यमान हैं। कवि मन पेशेगत से होते हुए समाज के समक्ष बड़ी बारीकी से सृजन कर कविता के माध्यम से इस संग्रह में ला पाए है।

पुस्तक  : तुम तब आना…
लेखक: डॉ. राकेश कबीर
आवरण: डॉ.लाल रत्नाकर प्रकाशन।
लोकभारती: प्रकाशन, प्रयागराज
संस्करण : प्रथम 2023
मूल्य : ₹ 495

संपर्क : 
विरेश ‘श्रीराजे’
शोधार्थी (पीएच.डी.) 
दिल्ली विश्वविद्यालय

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