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प्रकृति, समाज, प्रेम, संस्कृति और नदियों को बयां करती कविताएँ

राकेश कबीर का कविता संग्रह ‘तुम तब आना’ चार विभागों में है। यह संग्रह लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित है। इस काव्य संग्रह में लगभग 97 कविताएं लिखी हैं जिसमें पहले विभाग में ‘कुछ अपनी बात कहूं’, ‘प्रकृति के रंग’, ‘नीति, अनीति, कुनीति’ और कोविड : दूसरी लहर, मौत का मंजर है। इस संग्रह की कविताओं में रचनाकार ने कई बिंदुओं पर साहित्य के माध्यम से अपनी बात बड़े सरल तरीके से कही है जिसमें कोई लाग लपेट नहीं मिलती। इस संग्रह के रचनाकार का क्षेत्र बृहत् बड़ा है, जिसमें वे कई तरह के समाज से जुड़ते हैं और वही जुड़ना लेखक को चारों दिशाओं में देखने के लिए तैयार करता है। काव्य शास्त्र में विद्वानों ने माना है कि काव्य के मूल प्रेरक तत्व को काव्यहेतु कहते हैं। अर्थात सही मायनों में कहे तो काव्य का अनिवार्य एवं एकमात्र हेतु है प्रतिभा, और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास प्रतिभा के ही परिष्कारक, पोषक एवं संवर्धक हेतु हैं।1 (भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र का संक्षिप्त विवेचन, अशोक प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 17) अत: कवि की प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास इस काव्य संग्रह में हैं। इस संग्रह को जब पाठक पढ़ेंगे तो, वे तमाम बिंदुओं से टकराएंगे और वही बात सिद्ध होगी कि ‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगै, घाव करें गंभीर’ कवि अपनी बात इतनी सपाट बयानी से कर देंगे कि इसका आभास पाठक वर्ग पर पड़ेगा। कविता संग्रह का शीर्षक ‘तुम तब आना’ अपने आप में कौतूहल पैदा करता है । ‘तुम तब आना’ यह किस के लिए कहा जा रहा है? कवि किसे कह रहा है कि ‘तुम तब आना’ अगर देखें तो हम जब किसी को इस वाक्य से कहते है तो विशेष समय और परिस्थिति को भांप कर ही कहते हैं। हम विशेष का ध्यान रखते हैं। और आने वाला हमारा कोई प्रिय हो तो हम नहीं चाहेंगे कि उसके आने में कोई बाधा या उसे हानि हो। दरअसल कवि प्रकृति प्रेमी हैं वसंत के खुशनुमा रंग बीत गए हैं और सूखे खुश्क मौसम की रुखाईयों के बाद कवि को वसंत आने का इंतजार है। इसी संदर्भ में जब पाठक इस संग्रह की कविताओं से गुजरेंगे तो पाठक ध्यान देंगे कि कवि का एक उद्देश्य है। प्रकृति, नदियां, समाज, संस्कृति आदि  इस संग्रह में रोचकता, गंभीरता, और जिज्ञासा पैदा करते हैं जिसमें प्रकृति से जुड़ीं कविताएं आज के समय को प्रासंगिक बनाती है।

कवि बसंत के लिए  कहते हैं कि –‘बसंत तो कब का बीत गया/जो फूल खिले थे खेतों में/सब पीले दाने बन गए/खेत उजाड़ और नीरस हो चुके/तुम अभी मत आना/कि इस सफेद धूप के जले–भुने मौसम को/मैं जरा अकेले निपट लूं/X   X    X    X    X/जब खेतों में धान की हरियाली/पसर जाए दूर तक/ इनके बीच/सारस के जोड़े /संगसंग विचरने लगें/तुम तभी आना’2 (वही पृष्ठ सं.18, 20 )
कवि प्रकृति के सुखद समय के आने की कामना कर रहे हैं। कवि की बारीक दृष्टि में बसंत का समय समाया हुआ है। जब खेत हरियाली से लहरा उठे, नए फूल खिल जाए, धूप गुनगुनी होने लगे, ग्रीष्म काल चला जाए और जब धान के खेतों में हरियाली पसर जाए दूर तक तब तुम आना। ये आना क्या है? यह कहना मानवीय सरोकार का है कि सद्भाव सभी प्राणी इस धरा पर खुश रहें। लोग मन से झूमे , किसान लहलहाती फसल को देख कर बाग बाग  हो जाएं, नव जोड़े खिले रहें । पशु पक्षी प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य से झूमे। इसलिए तुम तब आना’ कविता मानवीय संवेदना को लेकर चल रही है।
कवि अपनी बात में  ‘कविता मेरी सहयात्री’ में कहते हैं किइस खानाबदोश जिदंगी में जाने कहाँ-कहाँ जाना है, किन अनजाने वीराने रास्तों से गुजरना है, कुछ पता नहीं । चौदह साल की उम्र में गाँव छोड़ गोरखपुर गए पढ़ाई करने, बहुत कष्ट हुआ । दीवार में लगे कैलेंडर में पंद्रहवें दिन घर वापस लौटने के लिए गोल घेरा लगा देता था और हर रोज एक दिन कम होने और गाँव वापस जाने की ख़ुशी बढ़ती जाती। दो- तीन दिन बाद वापस आता, माँ गाँव के बाहर तक छोड़ने आती, हम दोनों रोते और फिर पन्द्रह दिनों का इंतजार 3 इस कविता संग्रह के पहले विभाग ‘कुछ अपनी तो कहूँ’ में अठारह कविताएँ हैं। जिसमें कवि के अपने चारों ओर चक्कर लगाता जीवन है,  मां परिवार, गाँव, समाज आदि हैं। कवि ने कविताओं के माध्यम से इन सब विषयों को कविता के माध्यम से उकेरा है। जैसे कि इस संग्रह की पहली कविता ‘लिट्टियाँ’ है । पूर्वांचल में लिट्टी एक पारंपरिक व्यंजन है जिसे आज विश्व स्तरीय पहचान मिल गई है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, व उत्तर भारत में लिट्टी मशहूर व्यंजनों में शामिल है। वहीं जब कवि अपने गाँव और अपनी माँ से दूर हैं तो उन्हें उनके द्वारा बनाई लिट्टियां याद आती हैं और साथ ही माँ का स्नेह याद करते हुए कवि व्यष्टि से समष्टि की ओर जाते हैं आज लाखों युवा अपने घर परिवार से दूर हैं उन्हें अपने परिवार की याद स्वतः ही आती है उस याद में माँ की स्मृतियों में जाना अपने में ही पीछे जाना है इस पर वे कहते हैं कि-
अपनी पसंद की चीजें
कब पकाती थी माँ
चूल्हे की जलती आग में
उसे तो हमने हमारी फरमाइशों को ही
बघारते देखा हरदम कड़ाही में
×     ×      ×    ×     ×
कचूर के पत्तों से लिट्टी की पीठ पर
छप जाती थी एक छापी
जैसे उसकी साड़ी पर
छपे होते थे कुछ डिजाइन
और गाती थी गीत समूह में
चूल्हे की आग, लिट्टी और संग साथ की ख़ुशी में।4 (वही पृष्ठ सं. 15 )
कवि राकेश कबीर की कविताओं में विविधता है और यह विविधता पाठक वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित करती है। प्रकृति से होते हुए वे अपने जीवन साथी के लिए भी समर्पित हैं । उनके काव्य में एक जिजीविषा है जो मुस्कुराहटें पैदा करती है। आज समाज में सम्मान और सद्भाव है तो खुशी और संतोष है। स्त्री को पुरुष समाज ने अपने से कमतर आंका है उसके लिए दोहरे मापदंड रखे। बराबरी का ढंग दिया ही नहीं जिस कारण स्त्री को समझा ही नहीं। कविता ‘तुम्हारी मुस्कुराहटें’ में वे कहते हैं-
तुम्हारी मुस्कुराहटें देखता हूं
तो लगता है
ये धरती रहेगी
फूल भी खिलेंगे
पंछी उड़ेंगे आसमान में
मुझसे बराबरी से टक्कर लेती
उम्मीद हो मेरी तुम साथी
हमराह, संगिनी
बधाइयाँ तुम्हें
मेरी जिंदगी की फिजा में
तुम्हारी मुस्कुराहटों के लिए5         (वही पृष्ठ सं.17 )
इस विषय में कहे तो प्रेम एक बेजोड़ संबंध है, जो अविरल धारा प्रवाह होता है।  प्रेम में जीवन अमृत रूपी लगता है जो जीवन की सार्थकता सिद्ध करता है। प्रेम से जुड़े साथी के साथ जीवन जीना और उसके अनुभव से होकर गुजरना ही जीवन की असल सार्थकता है। आगे वे अपनी एक कविता में कहते हैं-
तुम साथ नहीं हो तो ये
अजनबी शहर कितना उजड़ा सा लगता है
कितना पराया सा लगता है
मन के एक कोने में
एक कसक सी रहती है
क्यों न जिम्मेदारियों के
परों को काट फेंक दूं
और कह दूं जमाने से
हम अलग नहीं रहेंगे
तुम्हारी बकवास बंदिशों के डर से।6 (वही पृष्ठ सं.21 )
उपर्युक्त कविता को पढ़ कर कबीरदास की पक्तियां याद आती हैं कि-सांझ पड़े, बीतबै, चकवी दीन्ही रोय। चल चकवा व देश को जहां रैन नहिं होय।अर्थात् कबीरदास ने कहा है कि शाम होते ही चकवी रोने लगती, कबीर दास आगे कहते हैं कि चकवा ऐसी जगह चलो कि जहां रात नहीं होती हो। यही दशा इस कविता में देखने को मिलती है।
राकेश कबीर पेशे से एक प्रशासनिक अधिकारी हैं समय पर घर न पहुंचना और नन्ने बच्चे को यह कहना कि  यहीं तो बैठा रहता हूं मैं, तुम्हारे लौटने तक। पिता का पुत्र से स्नेह मार्मिकता भर देता है। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं
मेरे कंधों पर सवार होकर
आसमान को छू लेने की
उसकी मासूम ख्वाहिश
कितनी भली लगती है
×    ×     ×      ×
और अब दूर कहीं रहने को बेबस मेरे पास
नहीं होता कोई जवाब
×       ×       ×       ×
मैं हर रोज बोलता हूं एक झूठ
×        ×        ×       ×
बिताते हैं एक एक दिन
एक दूसरे के इंतजार में।7  (वही पृष्ठ सं.27,28 )
प्रकृति प्रेमी होना प्रत्येक मनुष्य को पसंद है लेकिन समय-समय पर उसका आभास होना अत्यन्त आवश्यक है। आज ऋतुएं बीत भी जाती हैं और नई युवा पीढ़ी के लोग उनसे अनभिज्ञ रहते हैं। लेकिन कवि की निगाहें ऋतुओं के प्रत्येक क्षण पर हैं। पूरब की अपेक्षा पश्चिम थोड़ा शुष्क क्षेत्रों में भी आता है । पूरब की आवो हवा में पलकर बड़े हुए व्यक्ति के लिए यह एक दम भिन्न ही लगेगा कि मौसम के मिजाज में इतनी तलखी है, थोड़ी फुआर हों। कवि जब पश्चिम में अपने तबादले के बाद आते हैं तो कम वर्षा वाले क्षेत्र की उमस भरी गर्मी व्याकुलता पैदा करती है। कवि बादलों को अपना साथी कहते है। पंक्तियों के माध्यम से देखा जा सकता है
एक गुजारिश की थी हमने
बादलों से
जब बीत गया था
आधा सावन सूखे- सूखे
कि आना इस ओर भी
पूरब से पश्चिम आ गया हूं मैं
छाए रहना देर तक8   (वही पृष्ठ सं.36 )
कवि बादलों से आधे सूखे सावन बीत जाने की बात कर रहे हैं उनका आवाह्न बादलों के लिए है। वे आगे कहते हैं कि बरसना भले ही कम लेकिन मेरे साथ बने रहना। यह साथ बने रहना कवि का बादलों के प्रति मित्रवत व्यवहार को दर्शाता है। कवि का तपती गर्मी में इन बदलों के बिना मन नहीं लग रहा। यहां कवि अपने गांव के मूल वातावरण को याद कर रहें हैं। कवि आगे कहते है कि एक अभी तक कोई घर नहीं है जिसे मैं अपना कह सकूं, ईंट पत्थर की दीवार व छत कितनी ही बदल गईं लेकिन जब तक तुम मेरे ऊपर नहीं मचलते तब तक यह खानाबदोश जीवन सब बर्बाद हो लगता है।  अतः कवि की दृष्टि व्यापक और मानवीय संवेदना से पूर्ण है। एक किसान जिस तरह से बादलों को देख प्रसन्न चित रहता है उसी प्रकार कवि बादलों को देख प्रसन्न चित हैं, वे कहते हैं-
जब तक तुम नहीं मचलते
काले दूधिया रंग में सर ऊपर
ये खानाबदोश सफ़र
और हरा- भरा शहर
सब बर्बाद लगते हैं9( वही पृष्ठ सं.37)
कविता संग्रह के पहले विभाग की आखिरी कविता ‘मोहल्ले गरीबों के’में गरीब बस्तियों का प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया गया है । कवि की दृष्टि पैनी है जिसमें नजरें उन बस्तियों पर पड़ जाती है जिनके नाम पर शासन द्वारा करोड़ों का धन आता है। लेकिन यह विकास कागजी ज्यादा और जमीनी कम ही होता है। गरीबों के मौहल्लों को देख कवि मन विचलित होता है वह पहचान लेता है कि उखड़े हुए रास्ते उन्हें पता बता देते हैं कि अमीरों के घर और गरीबों के घर किधर हैं जैसे
उखड़े हुए रास्ते
पता देते हैं कि
अमीरों के मुहल्ले में
किधर बसी हैं
गरीबों की बस्तियाँ 10 (वही पृष्ठ सं.41 )
मानव जीवन प्रकृति से जुड़ा है। यह जुड़ाव ही जीवन पनपाता है। जीवन अर्थात् जी और वन का मिला हुआ संयुक्त रूप है। ‘जी’ अर्थात् प्राण और ‘वन’ अर्थात् प्रकृति। अतः जब प्राण और वन का संयोग होता है तो जीवन शुरू होता है। कवि राकेश कबीर ने कविताओं में पर्यावरण के बदलते परिदृश्य पर बात कही है। आज वैश्वीकरण के बड़ते प्रभाव से अचानक मौसम में बदलते मिजाज को न समझना आम धारणा बन गई है। यह बात ‘अलीगढ़ में बारिश’ कविता के माध्यम से समझी जा सकती है-
‘सावन के महीने में
करते हैं तलाश बादलों की
×  ×  ×  ×
ये अपने शहर वाले
गर बरस गईं कुछ बूंदें
घंटे भर जमीन पर
गालियां देते हैं उफनाई नालियों को
यही अपने शहर वाले।’11(वही पृष्ठ सं.45 )
इसी प्रकार की अन्य कविताएं हैं जो बादलों के झमाझम बरसने की पुकार कर रही हैं जैसे ‘बरसों बादल प्यारे’ कविता में कवि कहते हैं कि बादलों वाला आसमान और बारिशों वाला आँगन देखने को तरस गई थी आँखें । अर्थात् कवि कहना चाहते हैं कि ये आँखें तरस गई है झमाझम बारिश को देखे हुए । सूखे मौसम को देख कर कवि मन झुलस गया है। कवि बादलों को आवाह्न करते हैं कि ‘बरसों भले ही कम , लेकिन कुछ दिन ये तम्बू लगाकर बैठे रहना इधर’ कवि का बादलों के प्रति यह आग्रह मानवीय सरोकार से ओतप्रोत है। जिसमें पृथ्वी के सभी जीव सुख से रह पाएंगे। मानवीय सरोकार इस कविता में विद्यमान हैं जैसे-
बादलों वाला आसमान
बारिशों वाला आँगन देखने को
तरस गईं थीं आँखें
×       ×      ×       ×
अब सुनो भाई बादल
बरसों भले ही कम
लेकिन कुछ दिन ये तम्बू
लगाकर बैठे रहना इधर12 ( वही पृष्ठ सं.49 )
राकेश कबीर की बादलों से तकरीर कविता में एक व्यंग है जिसमें वे बादलों से तकरीर करते हैं। कविता में कवि का बादलों से तकरीर करना और बड़ते प्रदूषण का स्तर इंगित करना और समस्या की जड़ की ओर इशारा करना यह बात महत्तवपूर्ण हो जाती है  कविता में कवि कहते हैं
‘और बादलों के टुकड़ों को सुनाई मैंने
एक डाँट भरी तकरीर
×        ×         ×       ×
माना नादान है आदमी
दिन रात धुआँ घुसेड़ता रहता है
ऊपर आसमान की नाक में चिमनियों से
और नीचे कतारें उसके मोटरों की
कालिख पोतती है हरियाली के मुँह पर’13(वही पृष्ठ सं.52, 53)
कवि कहते हैं कि माना कि आदमी नादान है जो दिन रात धुंआँ फैलाए जा रहा है और ऊपर आसमान में भूरे बादलों को काला स्याह कर उसका रंग रूप ही बदल रहा है। लेकिन फिर भी धरती तो जल रही है, और तपती हुई हवा, बच्चे, झुलसते हुए पेड़, गाय, भैंस, आदि प्राणी सब की जान आफत में पड़ी है। वे आगे कहते हैं-
प्यास बुझाने, जान बचाने के लिए
अब बरस जाओ इधर के सुखाड़ में14 ( वही पृष्ठ सं.53 )
इस प्रकार राकेश कबीर की कविताओं में मानवीय सरोकारों को देखा जा रखता है। कवि भली भांति जानता है कि आज प्रदूषण किन कारणों से फैल रहा है लेकिन फिर भी वह प्रकृति को क्षम्य होने और मानव जीवन को हर्ष करने के लिए कविता के माध्यम से बादलों तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं।
राकेश कबीर ने नदियों को बचाने के लिए अनेक अथक परिश्रम किए हैं जिसमें उनके साथ प्रशासन ने भी काम किया है। लेकिन अपने स्तर पर नदियों को सूखने से बचाना और उन्हें लवा-लव बहते देखना यह सुखद अनुभूति है,मानव जीवन के लिए। नदियों पर केंद्रित उनकी पुस्तक ‘नदियों की तलाश में’( वाणी प्रकाशन ) जो एक आत्मकथात्मक ढंग से लिखा संग्रह है। छोटी नदियों के विषय में राकेश कबीर कहते हैं कि नदियों के बारे में प्राय: कम चर्चा होती है, परन्तु मेरी चिंता सदैव से प्रकृति के लोकतांत्रिक स्वरुप को प्रदर्शित करती छोटी नदियों के पक्ष में रही है, जो हमारे खेतों और गाँवों तक पानी लेकर आती हैं। जिससे हमें पेयजल और अतिक्रमण का शिकार होकर अपना अस्तित्व खो रही हैं इन्हें बचाना मानव जीवन के साथ-साथ समस्त जीव-जन्तु एवम् वनस्पतियों को बचाना है।15 कविता ‘लावारिस नदी का दर्द’ में कवि वहां के आम लोगों से इस सूखती ‘सोत नदी’ के विषय में जानने की कोशिश करते हैं लेकिन कोई मुनासिब जबाव कवि को नहीं मिलता वे कहते हैं-
सो गई सोत नदी
चिर निद्रा में
जिनको आई थी तू बसाने
लगे वही तुझे सुखाने
किनारों को मिलाने
तेरे बाँकपन को ममिटाने’16  ( वही पृष्ठ सं.57 )
कवि कहते हैं कि तू गहरी नींद में सो गई है सोत। जिन्हें आई थी तू बसाने वही अब तुझे मिटाने में लगे हैं अर्थात् कवि ने भू-माफिया और अतिक्रमण करते लालची किसानों की और संकेत किया है! नदी से सटे खेतों की सीमाएं अब नदी में जा मिली हैं नदी खेतों में धीरे धीरे विलीन हो गई है। वे आगे कहते हैं अब तुझ से दुर्गन्ध उठती है कीड़े बजबजा रहे हैं तू जिन्हें आई थी जिन्हें अमृत पिलाने वही अब तुझे मिटाने में लगे हैं । कवि कहते हैं कि जिन लोगों से भी पूछा तुम्हारे बारे में कुछ चुप रहे कुछ अनजान किसी ने तुम्हें लावारिस बताया। अर्थात्  तू आई जिन्हें बसाने वही लगे हैं तुझे मिटाने। सोत नदी के विषय में अमर उजाला ऑनलाईन 6 सितम्बर 2019 में प्रकाशित खबर के अनुसार सोत नदी की कुल लंबाई कहने को तो 220 किलोमीटर है मगर कुछ ही हिस्से में यह नदी लगती है। ज्यादातर हिस्सा तो नाले में बदल चुका है या फिर सूखा नजर आता है…नतीजा यह हुआ कि नदी के सूखे हिस्सों पर लोगों ने कब्जा कर लिया…. सोत नदी मुरादाबाद के जौधा से निकलती है और शाहजहांपुर जिले की सीमा में प्रवेश कर जाती है। बदायूं में नदी का 105 किलोमीटर हिस्सा।17 शाहजहांपुर जिले से होते हुए ‘सोत नदी’ गंगा नदी में शामिल हो जाती है।
‘दरख़्त’ कविता में कवि कहते हैं कि यह जलती चिलकती तेज धूप मुरझा देती है छांव दार बड़े-बड़े दरख़्तों को लेकिन यह अपनी छांव कहां छोड़ते हैं। कवि आगे कहते हैं कि ये बेचारे बेहाल हैं अभी तो बसंत में तो आईं थीं नई-नई ललाई हुए कोंपलें। फिर भी इनकी छाँव है इस धूप और गर्मी में इनके नरम पत्तों से। कवि ने कविता के माध्यम से संकेत किया है कि इस वैश्वीकरण के दौर में तापवृद्धि बढ़ रही है जिससे मानसून समय पर नहीं आ रहा। वर्षा कम हो रही है और शहरीकरण के दौर में पेड़ों की कटाई की जा रही है। कविता की पक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
जलती हुई सफेद धूप में
मुरझा जाते हैं रोज ही
×   ×    ×      ×
ये खड़े दरख़्त
बेचारे बेहाल हैं
अभी बसंत में ही तो आई थीं
नई- नई ललाई हुए कोंपलें
लो अब मुकाबिल हैं
गरम धूप और नरम पत्ते18 (वही पृष्ठ सं.67 )
संवेदनशील व्यक्ति हमेशा पर हित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाईतुलसीदास जी की यह पंक्ति को चरितार्थ करता है।सर्द रातेंऔरसर्द मौसम के पिल्ले’ कविता में संवेदनशील मन अभिव्यक्त होता है। कवि मन उन बेजुबान जानवरों की पीड़ा से दुखी है कि सर्द रात में बेसहारा बेजुबान जानवरों को समाज इतनी अमानवीय दृष्टि से क्यों देखता है। कवि इनके लिए शहरों से अधिक गाँवों को सुरक्षित मानते हैं गांव इन बेजुबानों के लिए दुर्घटना से रहित, वाहनों की रफ़्तार दूर हैं।  कवि ने बंदरों को लुटेरा और पैदाइशी मुफ्तखोर इंगित किया है। कविता के माध्यम से कवि ने वंचित समाज के जीवन को उकेरते हैं। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं-
‘रोते रहे कुत्ते रातभर
मोहल्ले के
गर्म लिहाफों में लिपटे हुए
कोसते रहे लोग कुत्तों को रात- भर
×  ×  ×  × ×  ×
परन्तु सच ये है कि
घनघोर ठंड में आज की रात
फिर एक पिल्ला मर गया।’19 ( वही पृष्ठ सं.74)
निष्कर्ष अंततः कवि राकेश कबीर आरम्भ से गांव से जुड़ा महसूस करते हैं। प्रकृति से जुड़े रहना कवि के सहज ही स्वभाव में है, जिसमें उनके कवि मन पर प्रकृति और टटके गंवईपन की सौंध्यता की छाप रहती है। कवि का यह गंवईपन उन्हें प्रकृति के नज़दीक ले जाता है। आज वैश्वीकरण के दौड़ में अनेकों युवा पीढ़ी शामिल है वह अपना भौतिक विकास करके अपने प्रकृति मन को कहीं गहरी खाई में दफनाते जा रहे हैं। इस बीच अपने को जिंदा रखाना और पुरजोर से यह कहना कि‘कविता मेरी सहयात्री’ बड़ा ही जीवंत है। इस काव्य संग्रह में कई जोड़ मिलेंगे जो अपने को एक दूसरे से जोड़ें हुए हैं और असल बात यह है कि यह संग्रह एक गुलदस्ता है। पाठक वर्ग को इस गुलदस्ते में तरह-तरह रंग देखने को मिलेंगे अर्थात् कविताएं बहुत कुछ बयां करती चलेंगी। स्वयं रचनाकार इस संग्रह के लिए कहते हैं इस संग्रह की कविताओं में वर्तमान परिस्थितियों से संवाद, बचपन की स्मृतियां, बार बार उजड़ते बसने का दर्द और धूर्त प्रवृति के जातिवादियों, सत्तालोभियों और उनकी पद लोलुपता से क्षोभ की भी अभिव्यक्ति हुई है।”20 ( वही पृष्ठ सं.9 ) संग्रह में कवि के साथ का वातावरण, वर्तमान समय की परिस्थितियां और प्रासंगिकता विद्यमान हैं। कवि मन पेशेगत से होते हुए समाज के समक्ष बड़ी बारीकी से सृजन कर कविता के माध्यम से इस संग्रह में ला पाए है।

पुस्तक  : तुम तब आना…
लेखक: डॉ. राकेश कबीर
आवरण: डॉ.लाल रत्नाकर प्रकाशन।
लोकभारती: प्रकाशन, प्रयागराज
संस्करण : प्रथम 2023
मूल्य : ₹ 495

संपर्क : 
विरेश ‘श्रीराजे’
शोधार्थी (पीएच.डी.) 
दिल्ली विश्वविद्यालय

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निराला : आत्महन्ता आस्था और दूधनाथ सिंह

कवि-कथाकार और आलोचकीय प्रतिभा को अपने व्यक्तित्व में समोये दूधनाथ सिंह एक संवेदनशील , बौद्धिक , सजगता सम्पन्न दृष्टि रखने वाले शीर्षस्थ समकालीन आलोचक हैं। आपके अध्ययन-विश्लेषण का दायरा व्यापक और विस्तीर्ण है। निराला साहित्य के व्यक्तित्व के विविध पक्षों और उनकी रचनात्मकता के सघन अनुभव क्षणों  का गहरा समीक्षात्मक विश्लेषण आपने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘ निराला: आत्महन्ता आस्था ’’ (1972) में किया है।             दूधनाथ सिंह जी सर्वप्रथम पुस्तक के शीर्षक की सार्थकता को विवेचित करते हुए लिखते हैं कि कला और रचना के प्रति एकान्त समर्पण और गहरी निष्ठा रखने वाला रचनाकार बाहरी दुनिया से बेखबर ‘‘ घनी-सुनहली अयालों वाला एक सिंह होता है , जिसकी जीभ पर उसके स्वयं के भीतर निहित रचनात्मकता का खून लगा होता है। अपनी सिंहवृत्ति के कारण वह कभी भी इस खून का स्वाद नहीं भूलता और हर वक्त शिकार की ताक में सजग रहता है- चारों ओर से अपनी नजरें समेटे , एकाग्रचित्त , आत्ममुख , एकाकी और कोलाहलपूर्ण शान्ति में जूझने और झपटने को तैयार।...... इस तरह यह एकान्त-समर्पण एक प्रकार का आत्मभोज होता है: कला-रचना के प्रति यह अन

एक आदिवासी भील सम्राट ने प्रारंभ किया था ‘विक्रम संवत’

-जितेन्द्र विसारिया जैन साहित्य के अनुसार मौर्य व शुंग के बाद ईसा पूर्व की प्रथम सदी में उज्जैन पर गर्दभिल्ल (भील वंश) वंश ने मालवा पर राज किया। राजा गर्दभिल्ल अथवा गंधर्वसेन भील जनजाति से संबंधित थे,  आज भी ओडिशा के पूर्वी भाग के क्षेत्र को गर्दभिल्ल और भील प्रदेश कहा जाता है। मत्स्य पुराण के श्लोक के अनुसार :           सन्तैवाध्रा  भविष्यति दशाभीरास्तथा नृपा:।           सप्तव  गर्दभिल्लाश्च  शकाश्चाष्टादशैवतु।। 7 आंध्र, 10 आभीर, 7 गर्दभिल्ल और 18 शक राजा होने का उल्लेख है। 1 पुराणों में आन्ध्रों के पतन के पश्चात् उदित अनेक वंश, यथा (सात श्री पर्वतीय आन्ध्र (52 वर्ष), दस आभीर (67 वर्ष) सप्त गर्दभिल्ल (72 वर्ष) अठारह शक (183 वर्ष) आठ यवन (87 वर्ष) इत्यादि सभी आन्ध्रों के सेवक कहे गये हैं। इन राजवंशों में सप्त गर्दभिल्लों का उल्लेख है। जैनाचार्य मेरुतुंग रचित थेरावलि में उल्लेख मिलता है कि गर्दभिल्ल वंश का राज्य उज्जयिनी में 153 वर्ष तक रहा। 2 'कलकाचार्य कथा' नामक पाण्डुलिपि में वर्णित जैन भिक्षु कलकाचार्य और राजा शक (छत्रपति शिवाजी महाराज वस्तु संग्रहालय, मुम्बई) (फोटो : विकि