साहित्य, समाज, संस्कृति और सिनेमा का वैचारिक मंच

Tuesday, December 30, 2025

जनपक्षधर लेखन के उत्तरदायित्व का बोध कराता रहेगा रामदेव सिंह 'कलाधर' सम्मान : डॉ. रमाशंकर सिंह


रिपोर्ट : डॉ. रवीन्द्र पीएस    
भलुआ | देवरिया

दिनांक 28 दिसंबर 2025 को ग्राम भलुआ, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश में 'स्व. विंध्याचल सिंह स्मारक न्यास द्वारा संचालित 'ग्रामीण पुस्तकालय' के स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह, परिचर्चा और कविता पाठ का आयोजन किया गया। 

कार्यक्रम के शुभारंभ में अतिथियों को असमिया गमछा और भारतीय संविधान की प्रस्तावना भेंट कर स्वागत किया गया। ग्रामीण पुस्तकालय के उदेश्य और इसकी संकल्पना को साकार करने की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए न्यास के अध्यक्ष, परिवर्तन पत्रिका के सम्पादक एवं शिक्षक डॉ. महेश सिंह ने बताया कि मेरे जीवन में पुस्तकालयों ने क्रान्तिकारी भूमिका निभाई है। मैं इंटरमीडियट की पढ़ाई करने के बाद रोजी-रोटी की तलाश में गोवा गया था। वहीं गोवा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एसी का काम करने के दौरान पढ़ने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ी, फलस्वरुप मैंने आगे के वर्षों में परास्नातक और पीएचडी की उपाधि हासिल की। आज झारखण्ड राज्य में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। अपने अनुभवों, कठिनाइयों और संघर्षों को ध्यान में रखते हुए यह विचार आया कि पुस्तक और प्रेरणा के अभाव में कोई भी पढ़ाई से वंचित न होने पाए। इसीलिए अपने गाँव, क्षेत्रवासियों और मित्रों के सहयोग से इस पुस्तकालय को मूर्त रूप दे सका। इसका उद्देश्य मात्र पुस्तकें उपलब्ध करवाना नहीं वरन एक ऐसा मंच प्रदान करना है जो हमारी तार्किक और वैज्ञानिक सोच का विस्तार करे और हमारी वैचारिकी को एक आकर दे सके। इसी क्रम में हम समय-समय पर विभिन्न वैचारिक कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं और शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले युवाओं एवं जन पक्षधर वैचारिकी के संवाहक रचनाकारों को सम्मानित भी करते हैं। 

तदुपरान्त कार्यक्रम में पधारे अतिथिओं का परिचय देते हुए, उनके साहित्यिक योगदान पर संचालक डॉ. रवीन्द्र पीएस ने प्रकाश डाला। पुन: डॉ. महेश सिंह ने न्यास द्वारा प्रति वर्ष दिए जाने वाले तीनों सम्मानों- 'रामदेव सिंह 'कलाधर' साहित्य सम्मान', 'बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान' तथा 'प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान' के बारें में बताया। उन्होंने कहा कि रामदेव सिंह 'कलाधर' राष्ट्रीय चेतना, लोक संस्कृति एवं बाल साहित्य के स्थापित रचनाकार रहे हैं। इसका प्रमाण न केवल उनकी प्रकाशित-अप्रकाशित पाण्डुलिपियों से मिलता है, बल्कि उनके समकालीन राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' आदि से हुए पत्राचार से भी मिलता है। 
यह भूमि तथागत बुद्ध के कार्यस्थल का केंद्रीय क्षेत्र रही है और इसी रूप में इसकी वैश्विक पहचान है, इसलिए हम गोरखपुर मंडल स्तर का 'बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान' देते हैं। भलुआ गाँव के ही गाँव-गवईं जीवन, सामाजिक रूढ़ि खंडन और किसान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील कवि रहे प्रेमचंद श्रीवास्तव की स्मृति में जनपद देवरिया के उदीयमान कवि को 'प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान' प्रदान करते हैं। 
मंच की ओर से वर्ष 2025 का 'रामदेव सिंह 'कलाधर' साहित्य सम्मान' के लिये शोधार्थी एवं लेखक, चर्च क्राइस्ट महाविद्यालय कानपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. रमाशंकर सिंह, 'बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान' के लिये लेखक, रंगकर्मी और पुरातत्त्वविद डॉ. रमाकांत कुशवाहा 'कुशाग्र' तथा 'प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान के लिये देवरिया जनपद के उदीयमान कवि सच्चिदानंद पाण्डेय के नामों की घोषणा की गई। 

कार्यक्रम संचालक डॉ. रवीन्द्र पीएस ने इन तीनों रचनाकारों के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने डॉ. रामशंकर सिंह के बांस पर आश्रित जातियों, घुमन्तु एवं विमुक्त समुदायों के इतिहास, संस्कृति, राजनीति और जीवन बोध पर लेखन कार्य तथा इनके चर्चित शोध ग्रन्थ 'नदी पुत्र' का विशेष उल्लेख किया। डॉ. रामाकांत कुशवाहा की बुद्ध सम्बंधी पुस्तकों यथा; बुद्ध के वंशज, बुद्ध और सम्राट अशोक, खत्तिय जातियाँ एवं बौद्ध स्थलों की पुरातत्व विभाग की सहायता से पहचान और संरक्षण के उनके विशेष प्रयास पर चर्चा किया। 


तत्पश्चात प्रो. असीम सत्यदेव, प्रो. अनिल राय एवं किसान नेता शिवाजी राय ने डॉ. रमाशंकर सिंह को 'रामदेव सिंह 'कलाधर' साहित्य सम्मान' का सम्मान पत्र, अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न एवं सम्मान राशि (₹5100) देकर अलंकृत किया। डॉ. रमाकांत कुशवाहा 'कुशाग्र' को 'बोधिसत्व लोक-कला एवं संस्कृति सम्मान' से प्रो. असीम सत्यदेव, साहित्यकर्मी जय प्रकाश मल्ल, वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह ने सम्मान पत्र, अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न एवं सम्मान राशि (₹2100) एवं कवि सच्चिदानंद पाण्डेय को 'प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान' प्रो. असीम सत्यदेव, डॉ. राम नरेश राम, डॉ. विश्वम्भर नाथ प्रजापति ने सम्मान पत्र, अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न एवं सम्मान राशि (₹1100) प्रदान कर सम्मानित किया। 
इस अवसर पर डॉ. रमाशंकर सिंह ने न्यास के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सुखद है कि हासिये पर डाले गये लोगों पर चुपचाप कार्य करने वालों पर भी साहित्य समीक्षकों की दृष्टि है। प्राय: यह देखा गया है कि वंचित समाज का कोई भी व्यक्ति जब पद, धन और प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है तो अपने समाज से मुँह मोड़ लेता है। आप सभी मेरे लिये कामना कीजियेगा कि मैं कभी पथविचलित न होऊँ और जनपक्षधर साहित्य सृजन कर परिधि पर पड़े लोगों की आवाज बना रहूं। यह सम्मान मुझे जनपक्षधर लेखन के उत्तरदायित्व का बोध कराता रहेगा। 


डॉ. रमाकांत कुशवाहा ने अपने उद्बोधन में कहा कि बुद्ध के नाम से सम्मान की परम्परा सुखद अनुभूति कराती है। यह धरती बुद्ध की है, यहाँ भाषाई और पुरातात्विक आधार पर गंभीर शोध और उत्खनन तमाम प्रचलित मान्यताओं से इतर नई पहचान और दृष्टि दे सकती है। यह सम्मान मेरे लिये प्रेरणा है कि मैं अपने बौद्ध साहित्य और इतिहास पर जारी शोध की गंभीरता को बरकरार रखूँ। वर्तमान समय में बुद्ध और बौद्ध साहित्य में शोधार्थियों की रूचि और जिज्ञासा में वृद्धि नये-नये दृष्टिकोण को जन्म दे रही है। 
कवि सच्चिदानंद पाण्डेय ने इस सम्मान के लिये न्यास का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि नये रचनाकारों के लिये सम्मान और मंच दुर्लभ होते हैं। न्यास ने ग्रामीण पुस्तकालय के माध्यम से हमें एक स्थाई मंच प्रदान किया है, जो नये रचनाकारों के लिए उर्वर भूमि तैयार करेगा। इस अवसर पर भलुआ ग्राम सभा के दो मेधावी विद्यार्थियों आयुष कुमार मल्ल एवं ज्योति विश्वकर्मा को भी सम्मानित किया गया। 
*परिचर्चा सत्र : 'डिजिटल माध्यम : साहित्य के समक्ष चुनौती एवं अवसर'* 
परिचर्चा को प्रारम्भ करते हुए जनवादी लेखक संघ, गोरखपुर के अध्यक्ष जय प्रकाश मल्ल 
ने कहा कि डिजिटल माध्यम ने हमारी पहुंच में विस्तार किया है। एक सतर्क अध्येता को पुस्तकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को परस्पर पूरक के रूप में देखना चाहिए। 
किसान नेता एवं ग्रामीण पुस्तकालय नेटवर्क से जुड़े शिवाजी राय ने कहा कि एक व्यक्ति नागरिक बोध के अभाव में सही संघर्ष के बिंदुओं की पहचान नहीं कर पाता ऐसे में लोकतान्त्रिक संस्थाएँ भी व्यापक रूप से प्रभावकारी सिद्ध नहीं हो पाती। पुस्तकें इतिहास-संस्कृति की समझ को विकसित करती हैं और लोकतान्त्रिक मूल्यों का संवहन करने योग्य बनाती हैं। डिजिटल आंधी के युग में भी ग्रामीण पुस्तकालय की श्रृंखला को इसी रूप में देखा जाना समीचिन होगा। 
वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी ने कहा कि डिजिटल माध्यम हमें अपार सूचनाओं तक पहुंचा तो रहा है परन्तु इस पर अत्यधिक निर्भरता मानव मनोविज्ञान पर नकरात्मक प्रभाव डाल रही है। व्यापक पैमाने पर लोग स्मृतिदोष, अत्यधिक उत्तेजना और अधीरता के शिकार हो रहे हैं। हमारी एक अंगुली पर सूचनाएं उपलब्ध हो तो रही हैं परन्तु उसके उचितानुचित के निर्धारण का कोई पैमाना नहीं है और सेंशरशिप का अभाव नैतिक संकट उत्पन्न कर रहा है। यह माध्यम किताबों की तरह विविध स्तरीय कसौटी से नहीं गुजरता इसलिए डिजिटल माध्यम प्रामाणिकता, नैतिकता और सामाजिक मूल्यों के संवहन में पुस्तकों का विकल्प नहीं बन सकती। 
वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह ने अपने वक्तव्य में आगाह किया कि डिजिटल माध्यमों तक अबाध पहुँच मनुष्य का असामाजीकरण कर अमानवीय बना सकती है। इसलिए हमें याद रखनी चाहिए कि यह तकनीकी मनुष्य के लिये है न कि मनुष्य इसके लिये। दुनिया के बहुत देशों में इसके प्रयोग के उचित प्रबंधन की दिशा में गम्भीर चिंतन कर यथोचित प्रतिबन्ध लगाए गये हैं। 
मुख्य वक्ता के रूप में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनिल राय ने स्व. विंध्याचल सिंह स्मारक न्यास के द्वारा तीनों सम्मान प्राप्त करने वाले व्यक्तिओं के चयन पर सुखद आश्चर्य करते हुए बधाई दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि जहाँ आज तमाम साहित्यकार सत्तासीनों की प्रशंसा में भाट-चारण बन कर पद और अलंकरण पाने का तिकड़म कर रहे हैं और समादृत हो रहे हैं। वहीं इस तरह की लोक समर्पित संस्थाएं ऐसे साहित्य साधकों को सम्मानित कर जनपक्षधरता के प्रेरणा स्रोतों की स्थापना करती हैं। यह अपने आप में सत्ता अलंकरण के समक्ष एक समानांतर आंदोलन है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों की सीमाओं का रेखांकन करते हुए बताया कि यह स्रोत हमारी किसी जिज्ञासा पर अंतिम परिणाम मात्र देती है और प्रक्रियागत चीजों के लिये ये पुस्तकों को ही सन्दर्भित करती हैं। पुस्तकें हमें केवल तथ्यात्मक सूचनायें नहीं देती वरन एक सूचना के साथ उससे जुड़े सम्पूर्ण तंत्र को प्रस्तुत करती हैं और इस रूप में वे हमें प्रसंग का विस्तृत बोध कराती हैं। इसलिए पुस्तकें सदैव प्रासंगिक और प्रामाणिक ज्ञान के लिये अनिवार्य थीं और रहेंगी। ऐसे में ग्रामीण पुस्तकालय पुस्तक उपलब्ध कराने के साथ ही साथ बौद्धिक विमर्श के मंच बन नये वैचारिक आंदोलनों के मार्ग प्रशस्त करेंगे। 
इस सत्र के अध्यक्ष प्रो. असीम सत्यदेव ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी वक्ताओं के वक्तव्यओं पर टिप्पणी करते कहा कि आजकल सत्ता संस्थाओं में जो पढ़ाया जाना चाहिए उसे नहीं पढ़ाया जा रहा है, और जो नहीं पढ़ाया जाना चाहिए उसे पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में ग्रामीण पुस्तकालयों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। पुस्तकालयों में जन-संघर्ष, लोक पक्षधर, लोकतान्त्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और जेन्डर न्यून्ट्रल जैसे विषयों पर पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। जहाँ तक डिजिटल माध्यमों की बात है तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कौन किस उद्देश्य से कर रहा है। मुझे लगता है कि सूचना को यदि तेजी से फैलाना हो तो डिजिटल माध्यम जरूरी है और गंभीर चिंतन के लिये पुस्तकों से ज्यादा किसी और माध्यम पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। 
इस परिचर्चा में डॉ. अचल पुलस्तेय, डॉ. चतुरानन ओझा, डॉ. हितेश सिंह, डॉ. राम नरेश, डॉ. विश्वम्भर नाथ प्रजापति, किसान नेता अरविंद सिंह, डॉ. संजय कुमार बौद्ध आदि ने ग्रामीण पुस्तकालयों की प्रासंगिकता और डिजिटल माध्यम एवं उसके साहित्य संबंध पर अपना विचार व्यक्त किया। 
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में विविध भावभूमि पर स्वलिखित कविताओं का पाठ हुआ। वरिष्ठ कवि जय प्रकाश मल्ल ने 'बिखरे-बिखरे प्रश्न?', 'कविताओं में जीवन' 'आवाहन', कवि एवं संपादक अचल पुलस्तेय ने 'एक देश है', कौशलेन्द्र मिश्र ने 'तकनीक की संगत से आई नई है रंगत....', 'भारी जिम्मा आ गईल बा अब हमरा गांव प..', कवि इंद्र कुमार यादव ने 'अरावली', 'धर्म', युवा कवि प्रवीण त्रिपाठी ने 'कैसे जुड़ेगा रिश्ता हम पहले से रिश्तेदार हैं..' कवि एवं संपादक महेश सिंह ने 'दिखा नहीं पाता कोई करामात मदारी',' मुल्क में गर साँप और बन्दर नहीं होते' डॉ. रवीन्द्र पीएस ने ''मैं चाहता हूँ कि मुझे मेरी माँ के नाम से जाना-पहचाना जाये' एवं 'बसंत के आने का मतलब मेरे राशन के कनस्तर का खाली होना है', कवि योगेंद्र पाण्डेय ने 'जन-स्वराज फिर कब होगा', स्थापित कवि अभिषेक कुमार ने 'पूर्णता को प्राप्त करने की ख्वाहिश', 'थोड़ा-सी जगह कविताओं के लिए' जैसी कविताओं का पाठ किया। इन कविताओं में व्यंग्य, प्रेम, विसंगति, स्थानीयता, पर्यावरणीय चिंता और मानवीय संवेदनाओं के भाव सघन रूप से परिलक्षित हो रहे थे। कार्यक्रम देर शाम तक चला। दोनों सत्रों का संचालन डॉ. रवीन्द्र पीएस ने किया। सम्मानित रचनाकारों, अतिथियों, कवियों और व्यवस्था में संलग्न सहयोगियों के प्रति धन्यवाद एवं आभार ज्ञापन पंकज शर्मा ने किया।
इस कार्यक्रम में ग्राम भलुआ और क्षेत्र के सैकड़ो श्रोता व साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। 
प्रस्तुति : डॉ. रवीन्द्र पीएस
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Saturday, December 20, 2025

भौगोलिक तथ्यों को कविता में समझाने की अद्भुत क़वायद

रामदेव सिंह 'कलाधर' (जन्मतिथि 23 फरवरी 1908, देहावसान 04 अप्रैल 1984) राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त समकालीन महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी रचनाओं में राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। 


रामदेव सिंह 'कलाधर' ने हिंदी भाषा, भोजपुरी लोक भाषा और बाल साहित्य सम्बन्धी विपुल मात्रा में विविधतापूर्ण कविताएं लिखी हैं। 23 से अधिक कविता संग्रह हिंदी भाषा में, भोजपुरी लोक साहित्य में छः से अधिक और बाल साहित्य में 12 से अधिक उनके संग्रह हैं! पांच भागों में उन्होंने भूगोल जैसे जटिल और तथ्यपरक विषय को कविता शैली में लिखी है जो भूगोल जैसे विषय में बच्चों की समझ विकसित करने और उनके लर्निंग आउटकम में सहायक है।

भूगोल कलाधर (भाग एक से पांच तक) एक अत्यंत मौलिक और शिक्षाप्रद कृति है, जो भूगोल जैसे तथ्यपरक विषय को कविता के रसपूर्ण माध्यम से प्रस्तुत करती है। स्व. रामदेव सिंह 'कलाधर' एक कुशल शिक्षक थे। साथ ही साथ वे उच्च कोटि के कवि और समालोचक भी थे। इस पुस्तक की समीक्षा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह उभर कर आता है कि लेखक ने कठिन भौगोलिक आँकड़ों और विवरणों को पद्यात्मक रूप देकर विद्यार्थियों के लिए उसे कंठस्थ करना सुगम बना दिया है। पुस्तक के प्रकाशक सुजान सिंह "सुजान" ने अपनी प्रस्तावना में स्पष्ट किया है कि इस पद्यात्मक शैली से बच्चे 'दिन दूनी रात चौगुनी' उन्नति करेंगे क्योंकि छंदों की गति पर भूगोल को याद करना सरल हो जाता है । 


पुस्तक का आरंभ उत्तर प्रदेश की जलवायु के वर्णन से होता है। लेखक ने ऋतुओं के चक्र को बहुत ही सरल पंक्तियों में पिरोया है। वे लिखते हैं कि ऋतु की गति जो ठीक वर्षभर रहती है, वही जलवायु है, जबकि थोड़े दिनों की स्थिति को मौसम कहते हैं। ग्रीष्म ऋतु का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि "मई-जून में गर्मी अतिशय, 'लू' चलती है पोखरे ताल, और सूख सरिताएं जाती, जन-जन होते बहुत बेहाल।"  इन पंक्तियों के माध्यम से विद्यार्थी न केवल मौसम के नाम जानते हैं, बल्कि उनके प्रभावों और प्रकृति को महसूस कर सकते हैं। इसी प्रकार वर्षा और शीत ऋतु का भी उन्होंने सजीव चित्रण किया गया है। 

प्राकृतिक वनस्पति और कृषि के क्षेत्र में यह पुस्तक जानकारी का खजाना जान पड़ती है। हिमालय की ढालों पर पाए जाने वाले शंकुल वनों, देवदार और चीड़ के वृक्षों का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि "चीड़ वृक्ष की लीसा से तो बनता तारपीन का तेल, जड़ी-बूटियों का मिल जाना सबको जँचता मानों खेल।" 

कृषि खंड में उत्तर प्रदेश की तीन प्रमुख फसलों- जायद, रबी और खरीफ को वर्गीकृत किया गया है। फसलों के नाम याद रखने के लिए उन्होंने दोहे जैसी शैली अपनाई है जैसे "गेहूं आलू जौ चना, अलसी मटर प्रधान, सरसो से सब्जी सजै, सजै हमारे कान।"


प्राथमिक स्तर के बच्चे चीजों को गेयता रूप में जल्दी सीखते हैं! इस प्रकार की रोचक शैली बच्चों के दिमाग में सूचनाओं को स्थाई रूप से अंकित करने में सहायक सिद्ध होती है।

उद्योग-धंधों और उत्तर प्रदेश के प्रमुख नगरों का विवरण इस पुस्तक का एक अन्य सशक्त पक्ष है। कवि ने प्रत्येक शहर की विशेषता को उसकी पहचान के साथ जोड़ा है। कानपुर के विषय में वे लिखते हैं कि "कपड़े-चमड़े के तो अच्छे होते कारोबार हैं, साइकिल बिजली पंखे के भी तो होते ब्यापार हैं।"  वहीं वाराणसी के लिए उनकी पंक्तियाँ हैं "यहाँ रेशमी साड़ी बनती सुन्दरता की जान है, डीजल इंजन बनते-रहते बहुत बड़ा सम्मान है।" इसी प्रकार आगरा के ताजमहल, फिरोजाबाद की चूड़ियों और मिर्जापुर के कालीन का वर्णन भी अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।

लेखक का व्यक्तित्व भी इस पुस्तक की गहराई को बढ़ाता है। परिचय खंड से ज्ञात होता है कि कलाधर जी राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत थे। जब अन्य कवि प्रेम गीतों में व्यस्त थे, तब वे अपनी रचनाओं द्वारा स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे। उनकी देशभक्ति उनके इस संकल्प में झलकती है कि "मैं पुजारी देश का हूँ, देश ही भगवान मेरा।" वे सादा जीवन और उच्च विचार के समर्थक थे और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय तक साहित्य और शिक्षा की सेवा की।

उनके इस संग्रह में भौगोलिक क्षेत्रों के विभाजन के अंतर्गत भावर, तराई और दक्षिण के पठारी भाग का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। तराई क्षेत्र की बीमारियों जैसे फाइलेरिया और मलेरिया का उल्लेख कर उन्होंने भूगोल को जनस्वास्थ्य से भी जोड़ दिया है। दक्षिण के पठारी भाग की वीरता का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि "बुन्देले पच्छिमी भाग में, पूरब मिलें बघेले, बडे बहादुर होते हैं ये, लडते थे असि ले ले।" ऐसी पंक्तियाँ भूगोल के साथ-साथ क्षेत्रीय इतिहास और संस्कृति का बोध भी कराती हैं।


निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 'भूगोल कलाधर' केवल एक कविता संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक पाठ्यपुस्तक की तरह है। जो बाल मनोविज्ञान को समझते हुए लिखी है। यह शिक्षा उद्देश्यों (लर्निंग आउटकम) को पाने की दिशा में एक बेहतरीन प्रयोग है। उनकी पद्यमय कहन शैली यह प्रमाणित करती है कि यदि विषय को अरुचिकर तथ्यों के बजाय लयबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाए, तो वह ज्ञान 'वरदान' सिद्ध होता है।  कलाधर जी ने अपनी लेखनी से भूगोल को जो सरलता प्रदान की है, वह आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है। पुस्तक के अंत में दी गई प्रार्थना और विभिन्न विद्वानों जैसे डॉ. विद्यानिवास मिश्र और डॉ. राम कुमार वर्मा की सम्मतियाँ इस कृति की साहित्यिक और शैक्षणिक महत्ता पर मुहर लगाती हैं। यह पुस्तक ग्रामीण परिवेश के एक महान शिक्षक की मेधा और उनकी अपनी मिट्टी के प्रति समर्पण का जीवंत दस्तावेज़ है।

डॉ. रवीन्द्र पीएस

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Sunday, December 14, 2025

इश्क, इंक़लाब और इंसानियत के शैलेन्द्र

सिनेमा, साहित्य कला के वह माध्यम हैं जिसके ज़रिये समाज के यथार्थ को सामने लाया जाता है। हालांकि सिनेमा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मनोरंजन भी होता है लेकिन उसके साथ देखने वाले दर्शकों को अगर मानव जीवन के विभिन्न रूपों का साक्षात्कार कराया जाए और समाज से परिचित कराया जाता है तो यह सिनेमा की अप्रतिम सफलता भी होगी। साथ ही सिनेमा में हम कई बार देखते हैं कि उसके गीत के बोल समय के दायरे को लांघ कर युग सत्य के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। साहिर लुधियानवी हिन्दी या ये कहें कि भारतीय सिनेमा के उन चंद गीतकारों में से हैं जिन्होंने अपने गीतों के बोल के माध्यम से समाज, मानव जीवन-चेतना के कई रूपों को अभिव्यक्त किया है, स्वर दिया है। इश्क, इंक़लाब और इंसानियत के शब्दशिल्पी  के रूप में शैलेन्द्र को याद किया जाए तो कोई गुरेज नहीं हैं. शैलेन्द्र जिसकी गीत-धारा ने हिंदी सिनेमा को मानवीय संवेदना, सामाजिक न्यायबोध और दार्शनिक गहराई से जोड़ने में एक सफल भूमिका निभाई है। वे अपने गीतों में केवल गीतकार के रूप में  नहीं, बल्कि आम आदमी की तरफ़ से बोलने वाले ‘लोक–दर्शनिक’ के रूप में उभरकर सामने आते हैं, जिनके शब्द आज के विभाजित, हिंसक और बाज़ार-संचालित समय में एक तरह की नैतिक और भावनात्मक शरणस्थली के रूप में प्रतीत होते हैं। हिंदी सिनेमा और गीतों के बारे में लिखने पढने वाले विद्वानों ने शैलेन्द्र को ऐसे रचनाकार के रूप में देखा है जिसने भक्ति, सूफ़ी, लोक और प्रगतिशील परंपराओं की मानवीय धारा को फ़िल्मी गीतों में पिरोकर एक लोकप्रिय, पर गंभीर काव्य-संसार रचा, जो पीढ़ियों के बीच पुल की तरह काम करता है।

आज के समय में शैलेन्द्र वस्तुतः उस सांस्कृतिक और नैतिक संसार के प्रतिनिधि रचनाकार है जहाँ कविता, संगीत और जन–जीवन एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए थे। वे ऐसे दौर के गीतकार हैं, जब स्वतंत्रता के बाद का भारत अपने सपनों, टूटनों और पुनर्निर्माण के बीच झूल रहा था, इसीलिए उनके गीतों में प्रेम के साथ-साथ भूख, बेरोज़गारी, विस्थापन और अन्याय के स्वर बराबर मौजूद रहते हैं। आज के आर्थिक असमानता, सांप्रदायिक तनाव और मीडिया–केंद्रित जनमत के समय में उनके स्वर और ज़्यादा अर्थपूर्ण हो उठते हैं। शैलेन्द्र की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे सिस्टम के बाहर खड़े आम आदमी की तरफ़ से बोलते हैं, पर उनकी भाषा किसी ‘एंग्री यंग मैन’ की हिंसक हुंकार नहीं, बल्कि करुणा, व्यंग्य और आत्मालोचना से भरी हुई मानवीय आवाज़ है। हिन्दी फिल्मों  के गीतकारों में शैलेन्द्रय एक ऐसा नाम है, जिन्होंने कई ऐसे गीत लिखे, जो लोगों के दिल को आज भी छू जाते हैं। भाषा पर उनका अधिकार तो था ही, लेकिन उसके साथ सादगी और गहराई भी थी। भारत के विभाजन पर लिखी उनकी कविता 'जलता है पंजाब' सुनकर राजकपूर प्रभावित हुए थे और उन्होंहने फिल्मोंो के लिये गीत लिखने का निवेदन किया, लेकिन शैलेन्द्र् ने मना कर दिया था। बाद में उन्होंने उनकी फिल्म बरसात के लिये दो गीत 'बरसात में' और 'पतली कमर' लिखा। दोनों ही गीत सुपर हिट हुए। आवारा हूं, रमैया वस्ताववैया, दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर, मेरा जूता है जापानी, आज फिर जीने की तमन्ना  है, आज भी लोग गुनगुनाते हैं। हिन्दी फिल्म गीत लेखन में शैलेन्द्र विद्रोह और यथार्थ को अभिव्योक्तह करने वाले गीतकार के रूप में पहचाने जाते हैं।
आज का युवा वैश्वीकरण और नगरीकरण के बीच असुरक्षित, अस्थायी कामगारों के अनुभव को जी रहा है। बेघर, अस्थाई नौकरी करने वाले युवक की पहचान संकट, समाज से अस्वीकार और अपने भीतर मनुष्यता बचाए रखने की प्रयास, ये सब मिलकर आज के प्रवासी मजदूरों, गिग इकोनॉमी के डिलीवरी बॉय और महानगरों के सिंगल रूम में रहने वाले छात्रों युवा मन तक फैली हुई है और उसकी बेचैनी को छूते हैं। यह पंक्ति आज युवा पीढ़ी के उस द्वंद्व का संकेत बनती है जहाँ वे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार और डिजिटल संस्कृति का हिस्सा हैं, पर अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भाषा और मोहल्ले की स्मृतियों से पूरी तरह कटना नहीं चाहते। आज की राजनीति, मीडिया और डिजिटल संस्कृति में जब भाषा तेज़, आक्रामक और ध्रुवीकृत होती जा रही है, तब शैलेन्द्र की सरल, बोलचाल वाली, पर गहन भाषा एक वैकल्पिक नैतिक सौंदर्य-बोध का संकेत देती है। उनकी पंक्तियाँ गाँव–कस्बों से लेकर शहरों की बस्तियों, फ़ैक्टरी-मज़दूरों, किसान आंदोलनों और छात्र–युवा हलकों तक आज भी गूँजती हैं; हाल के अध्ययनों में युवाओं द्वारा “मेरा जूता है जापानी” जैसे गीत के माध्यम से राष्ट्र, वर्ग और धर्म की समकालीन समझ को परखा गया है, जो उनकी प्रासंगिकता को नए अर्थों में सामने लाता है।  इस तरह शैलेन्द्र की स्मृति केवल नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि वर्तमान भारत की जटिलताओं पर विचार करने का एक जीवित उपकरण बन जाती है, जहाँ उनके गीत विकास, शांति, प्रेम और बहुलता जैसे आदर्शों को सुलभ भाषा में दुबारा प्रस्तावित करते हैं।


शैलेन्द्र के मानवतावाद की सबसे तीखी और साफ़ अभिव्यक्ति “सजन रे झूठ मत बोलो” जैसे गीतों में दिखाई देती है। यहाँ वे किसी धार्मिक उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि जीवन से तपे हुए साधारण आदमी की तरह कहते हैं कि अंतिम विश्राम में न धन काम आएगा, न झूठी प्रतिष्ठा; काम आएगा केवल ईमानदार कर्म। आज के दौर में जब भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़ा, ट्रोल–संस्कृति और दोगलेपन पर आधारित “इमेज” बनाना आम है, यह गीत अपने भीतर एक नैतिक प्रतिरोध की तरह खड़ा होता है। कॉर्पोरेट–जॉब, राजनीति या डिजिटल इन्फ्लुएंसर कल्चर में “प्रोजेक्टेड इमेज” और “वास्तविक चरित्र” के बीच का फासला जितना बढ़ता है, उतना ही यह गीत एक चेतावनी और आत्म–समीक्षा की आवाज़ के रूप में प्रासंगिक होता जाता है। “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार” और “तू प्यार का सागर है” जैसे गीत आज की मानसिक स्वास्थ्य–बहस में खास महत्व रखते हैं। लगातार प्रतिस्पर्धा, अकेलापन और अवसाद से जूझती पीढ़ी के लिए ये गीत बताते हैं कि मनुष्य का असली अर्थ उसके रिश्तों, करुणा और साझा दुख–सुख में है। “किसी की मुस्कुराहटों…” में किसी अनाम ‘अच्छे इंसान’ की कल्पना है जो अपने लाभ–हानि से ऊपर उठकर दूसरों की खुशी में खुशी ढूँढता है; यह विचार आज की ‘माई–ब्रांड, माई–फॉलोअर्स’ वाली सेल्फ–सेंटरिक संस्कृति के बिल्कुल उलट खड़ा होता है। “तू प्यार का सागर है” में भक्ति रूपक के माध्यम से पाप, अपराध-बोध और मुक्ति की चर्चा है, इसे आज एक ऐसे व्यक्ति की आंतरिक टूटन के रूप में देखा जा सकता है जो समाज के दबाव, अपने अपराध–बोध और अकेलेपन के बीच किसी नैतिक–आत्मिक सहारे की तलाश में है। यहाँ शैलेन्द्र धर्म को संकीर्ण अनुष्ठान नहीं, बल्कि करुणा और क्षमा का व्यापक मानवीय भाव मानते हैं।  
शैलेन्द्र की प्रासंगिकता का एक बड़ा आयाम वर्ग–चेतना और श्रम–सम्मान है। “अजब तेरी दुनिया, ऐ मेरे मालिक” या किसान–मजदूर की त्रासदी पर लिखे उनके गीत आज के किसान आंदोलनों, कॉरपोरेट–कृषि, ठेका–मजदूरी और असंगठित क्षेत्र की शोषणकारी स्थितियों के संदर्भ में नए अर्थ लेते हैं। जब भूमिहीन मजदूर या छोटे किसान आत्महत्या के कगार पर पहुँचते हैं, तो शैलेन्द्र के गीतों की पंक्तियाँ उनके मौन प्रतिरोध की आवाज़ बनती महसूस होती हैं। इसी तरह “सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी” जैसे गीतों में व्यवस्था द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले भोले इंसान की करुण–विडंबना है, वह ईमानदार है, पर “चालाक” नहीं, इसलिए बार-बार हार जाता है। यह चरित्र आज भी हर उस ईमानदार कर्मचारी, शिक्षक, पत्रकार या एक्टिविस्ट में दिखता है जो सिस्टम की चालबाज़ियों से हारते हुए भी अपनी नैतिकता नहीं छोड़ पाता। “वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ” जैसे गीत आज की ‘एग्ज़िस्टेंशियल क्राइसिस’ के सन्दर्भ में पढ़े जा सकते हैं। अकेली भीड़, सोशल मीडिया की भीड़ में घिरे हुए लोग, लेकिन भीतर से खाली और असंबद्ध इस मनःस्थिति के बीच शैलेन्द्र का यह गीत जीवन की नश्वरता, रिश्तों की अस्थायीता और अन्ततः स्वयं से सामना करने की अनिवार्यता की बात करता है। यह गीत किसी धार्मिक मोक्षवाद की ओर नहीं, बल्कि एक तरह के आत्म–साक्षात्कार की ओर इशारा करता है कि अंत में मनुष्य को अपने निर्णयों, पाप–पुण्य और कर्मों का भार स्वयं ही उठाना है। इस तरह शैलेन्द्र का दार्शनिक पक्ष आज के युवाओं की ‘आइडेंटिटी–क्राइसिस’ और ‘पर्पज़–सर्च’ में आश्चर्यजनक रूप से संवाद करता है।  
फिल्म-संगीत के इतिहास में भी शैलेन्द्र की पहचान ‘पीपुल्स पोएट’ के रूप में दर्ज हो चुकी है, जिसे राजकपूर का पुश्किन कहा जाना और गुलज़ार जैसे समकालीन गीतकारों द्वारा उन्हें सर्वोत्तम गीतकार मानना और पुष्ट करता है। आलोचकों के अनुसार शैलेन्द्र की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने प्रेम-गीतों की सीमाओं को तोड़ कर ग़रीबी, विस्थापन, श्रम, हाशियाकृत समुदायों और अस्तित्वगत प्रश्नों को मुख्यधारा के सिनेमा के भीतर जगह दिलाई और इस तरह गीत को मनोरंजन से आगे बढ़ाकर सामाजिक, नैतिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाया। आज के दौर में, जब सिनेमा और संगीत बड़े कॉरपोरेट ढाँचे के भीतर पैकेज्ड प्रोडक्ट में बदलते दिखाई देते हैं, शैलेन्द्र को याद करना मानो उस समय को याद करना है जब गीत मनुष्य की तकलीफ़, उम्मीद और संघर्ष की असल आवाज़ हुआ करता था। शैलेन्द्र केवल अतीत के किसी “क्लासिक गीतकार” की तरह नहीं, बल्कि मानवतावादी विवेक के स्थायी स्रोत के रूप में पढ़े, सुने  और जिए जाने वाले गीतकार के रूप में आज भी अपने शब्दों के माध्यम से हम सबके बीच हैं।

संपर्क : डॉ विजय कुमार हिंदी विभाग शास. तिलक महाविद्यालय 9968981725


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Wednesday, December 10, 2025

साहिर लुधियानवी : मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया

हिंदी फ़िल्म संगीत का इतिहास केवल मनोरंजन की कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के अंतःसंसार का जीवंत दस्तावेज़ भी है। इस इतिहास में कुछ गीतकार ऐसे हुए जिन्होंने प्रेम, विरह और सौंदर्य के पार जाकर मनुष्य, व्यवस्था और सत्ता से प्रश्न किए। इन्हीं में सबसे तेजस्वी नाम है साहिर लुधियानवी। उनके फ़िल्मी गीत केवल धुनों के साथ बँधी भावनाएँ नहीं, बल्कि प्रगतिशील चेतना के घोष-पत्र हैं। उन्होंने सिनेमा के लोकप्रिय माध्यम को सामाजिक आलोचना की धार प्रदान की और शोषण, युद्ध, वर्गभेद, स्त्री-पीड़ा और मानवीय गरिमा जैसे विषयों को गीतों के केंद्र में रखा।


        साहिर लुधियानवी का साहित्यिक संस्कार प्रगतिशील लेखक संघ की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हुआ था। उर्दू शायरी की परंपरा में पले-बढ़े साहिर ने रोमैंटिक भाषा को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। उनके लिए कविता सत्ता-प्रतिष्ठानों की शोभा बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का शस्त्र थी।लाहौर में साहिर ने ‘अदब-ए-लतीफ’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया, लेकिन प्रगतिशील विचारों के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ वारंट जारी कर दिया। 1949 में वे भारत आ गए और मुंबई में ‘शाह राह’ व ‘प्रीतलड़ी’ पत्रिकाओं से जुड़े। फिल्मी दुनिया में ‘बाजी’, ‘नौजवान’ और ‘साधना’ जैसी फिल्मों के गीतों से उन्होंने प्रसिद्धि पाई। फ़िल्मों में आने के बाद भी उन्होंने इस वैचारिक निष्ठा को त्यागा नहीं। जहाँ अधिकांश गीतकार प्रेम को निजी अनुभूति तक सीमित रखते थे, वहीं साहिर ने प्रेम को सामाजिक अन्याय के संदर्भ में देखा। उनकी दृष्टि में प्रेम भी तभी सार्थक है जब समाज न्यायपूर्ण हो। 
        साहिर लुधियानवी के फिल्मी गीत प्रगतिशील विचारधारा के प्रखर वाहक हैं, जो नारी शोषण, मजदूर वर्ग के संघर्ष, युद्ध की विभीषिका और सामाजिक असमानता के खिलाफ विद्रोह की आवाज बुलंद करते हैं। उनके गीतों में व्यक्तिगत अनुभवों से उपजा करुण रोष सार्वभौमिक मानवतावादी संदेश बन जाता है, जो पितृसत्तात्मक समाज और पूंजीवादी शोषण को चुनौती देता है साहिर की प्रगतिशील चेतना किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ी एक आंतरिक नैतिक क्रांति है। वे प्रेम को भी सामाजिक प्रश्नों से अलग नहीं देखते। उनकी दृष्टि में जब तक समाज न्यायपूर्ण नहीं होगा, तब तक प्रेम भी अधूरा रहेगा।“ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है”—सिर्फ़ एक असफल कवि की चीख़ नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के विरुद्ध एक मौन विद्रोह है। इसमें महलों, ताजों और तख़्तों की भव्यता के पीछे छिपे हुए खोखलेपन को उघाड़ दिया गया है। यह गीत बताता है कि जब समाज का आधार अन्याय हो, तो सारी सफलता, सारी प्रतिष्ठा व्यर्थ है। 
        साहिर ने श्रमिक जीवन को पहली बार फ़िल्मी गीतों में सम्मान की भाषा दी। उनके गीतों में मज़दूर कोई दीन-हीन पात्र नहीं, बल्कि इतिहास का रचयिता है। फ़िल्म नया दौर का गीत—“साथी हाथ बढ़ाना”—सामूहिकता का एक ऐसा महामंत्र है, जो अकेलेपन की दीवारों को तोड़ता है। यह गीत केवल काम करने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि यह विश्वास जगाता है कि परिवर्तन अकेले नहीं, साथ चलकर आता है।इसी तरह फ़िल्म धूल का फूल का मानवीय गीत—“तू हिन्दू बनेगा न मुस्लिम बनेगा”—एक सम्प्रदायमुक्त समाज की स्पष्ट कल्पना करता है। यह गीत धर्म को नहीं, मनुष्यता को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित करता है। 
        साहिर के गीतों में स्त्री केवल प्रेम की प्रतिमा नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय की सबसे गहरी शिकार भी है। उनके यहाँ स्त्री करुणा का विषय नहीं, बल्कि एक प्रश्न है—जिसके उत्तर समाज को देने हैं। फ़िल्म साधना में लिखे गीत वेश्या जीवन के अँधेरे को उजाले में लाते हैं। यहाँ स्त्री ‘पाप’ की प्रतीक नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की शिकार है, जो उसे पहले गिराती है और फिर उसे ही कलंकित करती है। यह दृष्टि अपने समय से बहुत आगे की थी। 
        साहिर की प्रगतिशीलता केवल करुणा नहीं, आलोचना भी है। वे विकास और आधुनिकता के नाम पर खड़ी की जा रही झूठी चमक से प्रभावित नहीं होते। उनके गीत चमकदार शहरों के पीछे छिपे अकेलेपन और नैतिक दरिद्रता को उजागर करते हैं। फ़िल्म वक्त के गीतों में समय केवल घड़ी की सुई नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का साक्षी बन जाता है। ‘वक्त’ साहिर के लिए एक ऐसा प्रतीक है, जो हर मनुष्य से पूछता है—तुम किस कीमत पर यह सुविधा भरा जीवन जी रहे हो? 
         निर्देशक गुरुदत्त के साथ साहिर की रचनात्मक सहभागिता हिंदी सिनेमा का एक स्वर्ण अध्याय है। फ़िल्म काग़ज़ के फूल में गीत कथा के समानान्तर नहीं, बल्कि उसकी आत्मा बन जाते हैं। यहाँ गीत केवल भावनाएँ नहीं रचते, बल्कि दर्शक की नैतिक चेतना को झकझोरते हैं। यह सहयोग कला और विचार के दुर्लभ संतुलन का उदाहरण है। 


         साहिर की सबसे बड़ी ताक़त उनकी भाषा है। उन्होंने जटिल राजनीतिक विचारों को सरल शब्दों की धुन पर बैठा दिया। उनकी प्रगतिशीलता भाषणों की तरह बोझिल नहीं, बल्कि नदी की तरह स्वाभाविक है। उनके गीतों में हमें नारा नहीं, सवाल मिलते हैं। और सवाल ही वह बीज होते हैं, जिनसे बदलाव की फसल उगती है। फिर भी साहिर कोई पूर्ण क्रांतिकारी संत नहीं थे। कुछ गीतों में वे नियति, समय और भाग्य के आगे असहाय दिखते हैं। कई बार उनका विद्रोह बाहरी व्यवस्था से अधिक आंतरिक पीड़ा बन जाता है। लेकिन यही विरोधाभास उन्हें और मानवीय बनाता है। वे पत्थर नहीं, जीवित मनुष्य थे—संवेदनाओं से भरे हुए। 
       साहिर ने यह सिद्ध किया कि फ़िल्मी गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जनचेतना का विश्वविद्यालय हो सकते हैं। उन्होंने वह रास्ता चुना, जहाँ लोकप्रियता और वैचारिक ईमानदारी एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री बन सकें। आज, जब फ़िल्मी गीत अक्सर केवल शरीर और बाज़ार के इर्द-गिर्द घूमते हैं, साहिर की पंक्तियाँ एक स्मृति की तरह नहीं, बल्कि एक चेतावनी की तरह सामने खड़ी होती हैं—कि शब्दों की भी एक नैतिक ज़िम्मेदारी होती है। 
        साहिर लुधियानवी के फ़िल्मी गीतों की प्रगतिशीलता किसी युग की वस्तु नहीं, बल्कि एक सतत चेतना है। उनके शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने समय में थे। वे हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची कला वही है, जो सत्ता से प्रश्न करे, अन्याय से टकराए और मनुष्य के पक्ष में खड़ी हो। उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने फ़िल्मी गीत को सजावट नहीं रहने दिया—उसे विवेक बना दिया। और शायद यही कारण है कि उनके गीत आज भी हवा में तैरते हैं। नई पीढ़ियों को जागृत करने के लिए, नई सुबह की तलाश मे। 
        साहिर की रचनात्मकता पूर्णतः निष्कलुष नहीं थी। कुछ गीतों में वे भी तत्कालीन फ़िल्मी समाज की माँगों के अनुसार पारंपरिक रोमांटिक रूढ़ियों को अपनाते दिखाई देते हैं। कभी-कभी उनका विद्रोह व्यवस्था पर सीधे प्रहार करने के बजाय दर्शन और नियति की ओर मुड़ जाता है।परंतु यह उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनके भीतर चल रहे नैतिक संघर्ष का प्रमाण है। 
         एक फ़िल्मी गीतकार के रूप में साहिर लुधियानवी ने सिनेमा को केवल मनोरंजन उद्योग नहीं रहने दिया—उसे सामाजिक संवाद का मंच बनाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोकप्रियता और प्रतिबद्धता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उनका सबसे बड़ा योगदान यही है कि उन्होंने शब्दों को बाज़ार का गुलाम बनने से बचाया। आज जब गीत विज्ञापन की भाषा बनते जा रहे हैं, साहिर के गीत हमें याद दिलाते हैं कि शब्द केवल बिकने की चीज़ नहीं—वे समाज की आत्मा भी होते हैं। साहिर लुधियानवी हिंदी सिनेमा के इतिहास में केवल एक गीतकार नहीं, बल्कि एक विचारधारा का नाम हैं—एक ऐसा नाम, जो आज भी सवाल बनकर हमारे भीतर गूंजता है।

संपर्क : आदित्य विक्रम सिंह 
may2fair@gmail.com 
लेखक भारतीय रेलवे के एक उपक्रम में कार्यरत है।  


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Tuesday, November 4, 2025

आप जैसा कोई : जितने तुम उतनी मैं का द्वंद्व

फिल्में समाज का सिर्फ अहम हिस्सा हैं, ये सिर्फ हमारा मनोरंजन नहीं करती बल्कि हमें बहुत कुछ सिखाती भी हैं। जीवन की  असंख्य घटनाओं एवं बनते-बिगड़ते  संबंधों आदि  महत्वपूर्ण विषयों पर बनी फिल्में हमें सिर्फ सोचने के लिए प्रेरित नहीं करती बल्कि जीवन को जीने का सलीका भी सीखा जाती हैं। अन्य कला माध्यमों से विशिष्ट यह विधा तकनीक से लैश दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यमों में होने की वजह से  देखने वालों  को ज्यादा प्रभावित करती है।



एक समय सिनेमा मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम था। फैंटेसी,एक्शन,लटके -झटके, गानों से भरपूर फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाती थीं। टिकट की लंबी कतारें। ब्लैक में टिकट खरीदने का जुनून सब कुछ था।पर हाल के वर्षों में फिल्म और दर्शक दोनों के स्वाद में थोड़ा बदलाव आया है। दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा अब जीवन के निकट के विषयों पर बनी फिल्मों में रूचि लेने लगा है।

सबसे अच्छी बात यह है कि इन दिनों भारत में  बनने वाली कई फिल्में विशुद्ध रूप से जीवन के ज्यादा करीब हैं। ऐसी फिल्मों को पर्दें पर या जादू के पिटारे को खोलते हुए मोबाइल पर या किसी भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इसे देखना बेहद दिलचस्प होता है। हमारी दिलचस्पी तब और बढ़ जाती है जब फिल्म समसामयिक मुद्दे पर बनी हो। इन दिनों जिस तरह से लेट मैरिज का ट्रेंड चला है और उस लेट मैरिज में क्या संभावनाएं और क्या समस्याएं हैं, इन दोनों पक्षों पर ‘आप जैसा कोई’ फिल्म में बहुत प्रभावी ढंग से फिल्माया गया है। खासकर जब दो मैच्योर और वर्किंग लोग शादी करने का सोचते हैं तो क्या होता है, इस फिल्म में देखना दिलचस्प है।  

यह फिल्म  कई अवसरों पर एक नैरेटर की तरह हमें यह बताती है कि ‘जितने तुम उतनी मैं’ बस इतना ही होना होता है प्यार में। प्यार बहुत कुछ नहीं चाहता है बस वो इतना चाहता है कि जिन गलतियों के लिए आप खुद को माफ कर सकते हैं उन गलतियों के लिए आप सामने वाले को भी माफ कर दें। जब उसके साथ कोई भी खड़ा न हो उस समय आप खड़े रहें और उसे समझे जिसे आप प्यार करते हैं। आप प्यार में उसे मुक्त करें न कि उसे बांध कर रखें। किसी भी रिश्ते में लिमिट तय करने की बजाय उसकी खुशियों में और उसके गम में साथ रहें। प्यार बस हर पल में साथ रहना चाहता है। हाल ही में विवेक सोनी के निर्देशन में नेटफिलिक्स पर रिलीज हुई ‘आप जैसा कोई’ फिल्म कई महत्वपूर्ण मुद्दों को एक साथ हमारे सामने प्रस्तुत करती है। हालांकि हर फिल्म किसी न किसी सामाजिक मुद्दे या प्रश्नों के साथ आती है और समाज के ऐसे  मुद्दों पर गंभीरता से सोचने के लिए उकसाती भी है। 'आप जैसा कोई' फिल्म में भी एक साथ कई मुद्दों -वर्जिनिटी, पुरूष प्रधान समाज की सोच, बढ़ती उम्र में हो रही शादियों की परेशानियां और स्त्री स्वतंत्रता को प्रमुखता से उठाया है। यह फिल्म हमें बताती है कि कहने को तो हम 21वीं सदी में गुजर-बसर कर रहे हैं लेकिन आज भी पुरूष सत्तात्मक समाज की सोच नहीं बदली है। आज भी पुरूषों के लिए लड़कियों की वर्जिनिटी बहुत बड़ा मुद्दा है जिसे इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है। शादी के लिए जब लड़की की तलाश की जाती है ,तब लड़के के मन में यह इच्छा होती है कि उसकी होने वाली पत्नी वर्जिन हो। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण  है कि वर्जिन लड़कियां ही खोजी जाती हैं लड़के नहीं।

इस फिल्म की शुरूआत एक संस्कृत टीचर श्रीरेणु त्रिपाठी के जीवन पर आधारित है। इसमें दिखाया गया है कि शिक्षक की भूमिका निभा रहे आर .माधवन अधेड़ उम्र में विवाह के लिए लड़की खोज रहें हैं लेकिन अधिकतर लड़कियां या तो उनकी उम्र की वजह से उनसे विवाह करने से मना कर देती हैं या फिर संस्कृत के शिक्षक होने की वजह से उन्हें लगता है कि श्रीरेणु बहुत बोरिंग होंगे। यह भी एक बड़ी बात है कि संस्कृत या हिंदी पढ़ने या पढ़ाने वाले लोगों के संदर्भ में यह सोच है कि वह पढ़ाता क्या होगा या पढ़ता क्या होगा। उन्हें नहीं मालूम की हिंदी, संस्कृत या किसी भी विषय का अपना एक इतिहास है जिसे पढ़ा या समझा जाना बेहद जरूरी है। दूसरी बात की ऐसे विषयों को पढ़ने या पढ़ाने वालों को लोग बोरिंग समझते हैं। मुझे एक घटना याद आ रही है चूंकि मैं खुद भी हिंदी की विद्यार्थी रही हूं इसलिए मुझे मालूम है कि लोग हिंदी विषय को लेकर किस तरह से सोचते हैं। मैंने जब ग्रेजुएशन में हिंदी ऑनर्स लेकर पढ़ाई शुरू की तो कुछ लोगों का कहना था हिंदी पढ़कर क्या होगा। उसमें पढ़ते क्या हैं। ऐसे कई सवाल उन सभी ने एक साथ दागे थे। आज जब मैं खुद एक कॉलेज में पढ़ाती हूं तो अपनी पहली क्लास में सबसे पहले हिंदी पढ़कर क्या होता है और क्या हो सकता है बताती हूं । हिंदी में रोज़गार और आगे बढ़ने की संभावनाओं को देखकर विद्यार्थी दंग रह जाते हैं। मैं यह गर्व से बताती हूं कि अगर आपकी भाषा ठीक है और आप मेहनत करते हैं तो आप जीवन में जरूर सफल होंगे।

वैसे इस फिल्म में आगे यह भी दिखाया गया है कि अमूमन जब हम लेट मैरिज करते हैं तो लड़कों को लड़की खोजने और लड़कियों को लड़के खोजने में दिक्कत होती है। ऐसी स्थिति में वे सोशल साइट्स या अन्य  प्लेटफार्मों पर मन बहलाने का विकल्प तलाशते हैं। संस्कृत शिक्षक भी अपने अकेलेपन से निजात पाने के लिए एक ऐप्प की ओर रुख करता है।दरअसल शादी के लिए कोई बात नहीं बनती देख श्रीरेणु के मित्र नमित दास (दीपक) उन्हें एक डेटिंग ऐप्प पर लड़कियों से बात कर दिल बहलाने की सलाह देता है और श्रीरेणु इस सलाह को मानकर एक लड़की से बात भी करने  लगता है।आजीवन लड़कियों से दूर रहने वाला जब पहली बार अजनबी लड़की से बात करता है तब उसकी धड़कनें तेज हो जाती हैं और मन में तरह-तरह के ख्याल हिचकोले मारने लगते हैं।

इसी दौरान श्रीरेणु को उसकी भाभी कुसुम त्रिपाठी (आयेशा रजा) कोलकाता में रहने वाली मधु बोस (फातिमा सना शेख) से मिलाती है जो कोलकाता में फ्रेंच पढ़ाती है। जमशेदपुर में रहने वाला श्रीरेणु जब कोलकाता की मधु बोस से मिलता है तो उसे यकीन ही नहीं होता कि इतनी पढ़ी-लिखी सुंदर लड़की ने उससे शादी के लिए हां कैसे कर दिया। वह सोचता है जरूर इसके अफेयर रहे होंगे या इसमें कोई गड़बड़ी  होगी। 



हालांकि इस फिल्म में कोलकाता की मधु बोस के माध्यम से फिल्मकार ने आज की आधुनिक लड़कियों की तरफ और खासकर अपने फैसले खुद लेने वाली लड़कियों के जीवन की ओर संकेत किया  है। मधु बोस एक बंगाली परिवार में पली-बढ़ी है। अमूमन बंगाली परिवार के लोग ज्यादा खुले विचार वाले होते हैं। पुरुषों के साथ बैठना,खाना-पीना और अपने विचार साझा करना उनके जीवन का अहम हिस्सा होता है। वहीं श्रीरेणु के परिवार में महिलाओं को जॉब तक करने की अनुमति नहीं है। श्रीरेणु की भाभी क्लाउड किचेन खोलना चाहती है लेकिन इस पर उसके भैया कहते हैं कि तुम चुल्हे में आग लगाओं मेरे पैसे में नहीं और बात को टाल जाते हैं। वह अपनी बेटी को भी बार-बार घर के काम सीखने को कहते हैं जबकि वह पढ़ने में अच्छी है और उसे जॉब प्लेसमेंट भी मिल रहा है लेकिन उसे नौकरी करने की अनुमति नहीं मिलती है। फिल्म में इन दोनों घरों में महिलाओं की स्थिति एवं अंतर को बखूबी दिखाया गया है।

फिल्म में ट्वीस्ट तब आता है जब श्रीरेणु को शक होता है कि डेटिंग एप पर रोमांटिक बात करने वाली लड़की की आवाज और मधु बोस की आवाज एक जैसी है। वह इस बात की पुष्टि करने के लिए मधु से पूछता है और जब मधु इस बात को स्वीकार कर लेती है कि उसने भी एक समय अपने टूटे दिल को बहलाने के लिए इस डेटिंग ऐप पर अकांउट बनाया था। मधु बोस की यह सहज स्वीकारोक्ति श्रीरेणु को बर्दाश्त नहीं होती। पुरूष सत्तात्मक समाज किस प्रकार से सोचता है इसका उदाहरण इस घटना के माध्यम से निर्देशक दिखाना चाहते हैं कि दोनों एक ऐप पर एक दूसरे से बात कर रहे थे, लेकिन बात करने का परिणाम यह हुआ कि इससे स्त्री के चरित्र पर सवाल उठाए गये जबकि श्रीरेणु ने खुद को कुछ नहीं कहा। दोनों प्रेम में थे एक दूसरे को स्वीकार कर आगे बढ़ सकते थे लेकिन पुरुष सत्तात्मक सोच रखने वाले श्री रेणु को यह हरगिज बर्दाश्त नहीं कि उसकी होने वाली पत्नी किसी डेटिंग ऐप पर किसी से बात करें। जबकि वह खुद भी उस ऐप पर वही काम कर रहा था। इसी बात पर श्रीरेणु मधु से सगाई के बाद शादी करने से मना कर देता है। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच तकरार को दिखाया गया है जो एक फिल्मी ड्रामा में  होता है । इसके अलावा भी कई ऐसी छोटी-छोटी घटनाएं दर्शकों के सामने आती हैं ,जो कई अनछुए पहलुओं को हमारे सामने रखती है।   

दरअसल हमारे समाज में शुरू से स्त्रियों की जिस छवि को देखने की कोशिश की जाती रही है, वह है  घरेलू , सहनशील, चरित्रवान और समर्पित स्त्री की। सबसे पहले महिलाओं के लिए जरूरी है - घर का काम-काज सीखना ।जबकि घर के घरेलू कामकाज का संबंध  पुरूष के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना एक स्त्री के लिए। लेकिन हमारा समाज घर के काम-काम की ज़िम्मेदारी महिलाओं के ऊपर छोड़ देता है। नतीजन होता यह है कि महिलाएं अगर वर्किंग हैं तब भी उन्हें काम से लौट कर वापस काम पर ही लौटना पड़ता है। हालांकि कुछ सालों में यह परिदृश्य थोड़ा बदला जरूर है ।अब कुछ पुरुष भी किचेन में महिलाओं का हाथ बंटाते हैं।यह हमारे समाज की विडंबना है कि बचपन से  लड़कों को यह नहीं सिखाया जाता है कि तुम घर का काम सीख लो आगे जरूरत पड़ेगी । जबकि  एक लड़की को बचपन से यही सुनाया और सिखाया जाता है कि घर का काम सीख लो ससुराल में करना पड़ेगा। फिल्म में कई जगहों पर ऐसे दृश्य देखने को मिलेंगे।

फिल्म के अंत में श्रीरेणु का मेल इगो थोड़ा शांत होता है और फिर वह मधु बोस को एक और मौका देने की सोचता है और उससे कहता है कि वह उसे सबकुछ अलाऊ करेगा, पर लिमिट में। इस पर मधु बोस का जवाब स्वाभिमान और अपनी स्वायत्तता से भरा होता है। वह बहुत आत्मविश्वास के साथ एक  महत्वपूर्ण  बात कहती है -

'प्रेम हमें बांधता नहीं है, न ही स्वामितत्व का भाव रखता है ।बल्कि वह जितनी मैं उतनी तुम की भावना में व्यक्त होता है ।'

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर आप प्रेम में लिमिट तय करने लगेंगे या शर्ते रखेंगे तो वह प्यार नहीं बल्कि समझौता होगा जो इन दिनों के रिश्तों में दिखाई पड़ता है। प्रेम बस आपसे प्रेम की उम्मीद करता है और प्रेम को दूसरे की स्वायत्तता और स्वीकार्यता के साथ ही हासिल किया जा सकता है।हम जब  उसे किसी शर्त से हासिल करने की कोशिश करेंगे तब प्रेम अपनी स्वाभाविकता खो देगा।इस संदर्भ में कबीर दास का यह कथन याद करना चाहिए " प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए। राजा प्रजा जो ही रुचे, सीस दे ही ले जाए। "वैसे इस फिल्म को भी एक हैप्पी एंडिंग के साथ समाप्त किया गया है। इस फिल्म के गाने कर्णप्रिय और लोगों के बीच काफी पॉपुलर हैं। सभी कलाकारों की एक्टिंग कमाल की है।सिनेमाटोग्राफी लाजवाब है। साउंड इंफेक्ट भी प्रभावशाली है।कुछ खामियों के साथ कम बजट में बनने वाली यह महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है।

संपर्क : मधु सिंह, प्राध्यापिका

हिंदी विभाग, खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज, कोलकाता

madhucute6@gmail.com 


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Thursday, September 11, 2025

समाज की स्मृति और अनुभवों का सार 'काका के कहे किस्से'

लोककथाएँ, छोटे-छोटे किस्से और कहावतें किसी भी समाज की स्मृति और अनुभवों का सार होती हैं। वे न केवल मनोरंजन का साधन बनती हैं बल्कि पीढ़ियों के अनुभव, मूल्य और जीवन-दर्शन को संप्रेषित करने का भी काम करती हैं। "काका के कहे किस्से" इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का एक ईमानदार और सहज प्रयास है। पुस्तक के लेखक अमित कुमार मल्ल ने यहां न तो मौलिकता का दावा किया है और न ही किसी साहित्यिक प्रयोगवाद की दुहाई दी है। प्रस्तावना में लेखक का यह कथन विशेष ध्यान खींचता है कि “मैं यह दावा नहीं करता कि किस्से मौलिक हैं और न ही इनमें मौलिकता ढूँढी जानी चाहिए। इनमें बहुत से ऐसे किस्से व कहावतें हैं, जिन्हें आप पहले कहीं पढ़ चुके होंगे या सुन चुके होंगे। किस्से से अधिक महत्वपूर्ण है किस्से को पेश किए जाने का ढंग और उससे निकला संदेश।” इस कथन में लेखक का उद्देश्य साफ झलकता है कि वे इन कहानियों को ‘बौद्धिक संपदा’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘सामूहिक लोक-संपत्ति’ के रूप में देख रहे हैं। यहां मौलिकता का आग्रह छोड़कर, संदेश की पुनर्प्रस्तुति पर जोर दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि इन किस्सों का उद्देश्य ‘नएपन’ से अधिक ‘संदेश’ है और यही पुस्तक की सबसे बड़ी ईमानदारी है। यह पुस्तक 48 छोटे-छोटे प्रसंगों और उनके साथ जुड़े अनुभवों और जीवन-मूल्यों का संकलन है। अंत में ‘कहावतें’ नामक एक अलग खंड भी दिया गया है, जिसमें लोक-ज्ञान की संक्षिप्त और सारगर्भित पंक्तियाँ दर्ज (84 कहावतें) हैं। अनुक्रम से यह स्पष्ट है कि पुस्तक के प्रसंग विविध जीवन-स्थितियों और मानवीय व्यवहारों को छूते हैं — जैसे- काम, योग्यता, समानता, मीन-मेख निकालना, पैसा पैसे को खींचता है,  कलयुगी पैरोकार, जैसा सोच वैसे फल पावे, नियमित जीवन, असली पतिव्रता, सीखे के सीख , भय का असर, गृहस्थ की भक्ति,  माधुर्य की पहचान, भगवान जो करते हैं अच्छा ही होता है इत्यादि। इन शीर्षकों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लेखक ने पारिवारिक, सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों के विविध रंग समेटने का प्रयास किया है। 
इस पुस्तक की कहानियाँ और किस्से को मूलतः चार प्रमुख विषय-समूहों में विभाजित करके देखना ज्यादा उचित व तार्किक होगा।
1. व्यक्तिगत और आत्मिक मूल्य:
मन कर रहा है, स्व-निर्भरता, सच्चाई, हर स्थिति में, जैसा सोचा वैसा फल पावे जैसे शीर्षक आत्म-संयम, साहस, कर्म और चिंतन की शक्ति पर जोर देते हैं। इन प्रसंगों में यह संदेश बार-बार आता है कि व्यक्ति अपने विचारों और कर्मों का परिणाम स्वयं भोगता है।
2. सामाजिक और पारिवारिक मूल्य: 
अपना-अपना धर्म,  गृहस्थ की भक्ति, समानता, नियमित जीवन, सदाचारी, चीनी बाप-बेटे का आपसी विश्वास जैसे किस्से पारिवारिक रिश्तों, सामाजिक सद्भाव और भरोसे की महत्ता को रेखांकित करते हैं।
3. जीवन-दर्शन और व्यावहारिकता:
हर स्थिति में, दूर की सोच, संतुलन, भगवान जो करते हैं, अच्छा ही होता है, मातृभाषा की पहचान, असली पतिव्रता, सीखे की सीख, भय का असर इत्यादि किस्से जीवन की अनिश्चितताओं को स्वीकारने और उनसे सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निपटने की प्रेरणा देते हैं।
4. शिक्षात्मक और प्रेरक प्रसंग:
लालच और जीवन का अन्तर्सम्बन्ध, सीख की सीख, सजा का स्तर, कमजोर की परिभाषा जैसे किस्से पाठक को सीख देते हैं कि पद, प्रतिष्ठा या शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण नैतिक मूल्यों की स्थिरता है।
मसलन, ‘समानता’ नामक किस्से से यह स्पष्ट ध्वनित होता है कि मजदूरी केवल अनाज या पैसे से नहीं, बल्कि मान-सम्मान और व्यवहार से भी मापी जाती है। रामसुमेर अधिक मजदूरी (5 सेई) देने के बावजूद मजदूर नहीं जुटा पाए जबकि उनका पट्टीदार कम मजदूरी (4 सेई) देकर भी मजूरों को आकर्षित करता रहा। मजदूरन का यह कथन — “इ कम मजूरी देन जरूर, लेकन बराबर मान के हँसी-ठिठोली भी करेन, जेसे काम बोझ नाही लागेला।” एक सामाजिक सत्य को उद्घाटित करता है — आर्थिक प्रोत्साहन तभी प्रभावी होता है जब उसके साथ मानवीय गरिमा और अपनापन भी हो। "असली पतिव्रता" यह कथा पतिव्रता की पारंपरिक परिभाषा को तोड़ते हुए एक व्यावहारिक और विडंबनापूर्ण सच्चाई सामने लाती है। राजमहल की महिलाएँ मानसिक व भावनात्मक कारणों से स्वयं को ‘पूर्ण पतिव्रता’ मानने से इनकार करती हैं, जबकि एक वेश्या स्वयं को "पूर्ण पतिव्रता" घोषित करती है —“मेरा पति पैसा है। मैं पैसे के प्रति सदैव निष्ठावान रही।” यह कथन व्यंग्य के माध्यम से मानव समाज में निष्ठा, मूल्य और दृष्टिकोण की सापेक्षता को उजागर करता है। महात्मा का इस बात को स्वीकार करना यह संकेत देता है कि परिभाषाएँ और आदर्श भी परिस्थितियों के अनुसार बदलते हैं। "योग्यता" नामक कथा में गोलू का तर्क था कि तीरथ ने गाँव में अस्पताल और सड़क बनवाकर विकास कार्य किए हैं, इसलिए उसे वोट मिलना चाहिए। परंतु बूढ़ी काकी का उत्तर — “ठीक बा, ऊ कवनो काम नइखे कइले। लेकिन ऊ केहू क कुछ बिगड़लो त नइखे।” यह बताता है कि ग्रामीण समाज में चुनाव का मूल्यांकन केवल किए गए कामों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के नकारात्मक प्रभाव की अनुपस्थिति से भी होता है। यहाँ ‘नुकसान न पहुँचाना’ भी ‘योग्यता’ का एक मानदंड बन जाता है। इन कथाओं में लोकभाषा, मुहावरे और ग्रामीण कहावतों का प्रयोग इन्हें जीवन्त और विश्वसनीय बनाता है। हर कहानी में पात्रों का संवाद केवल घटनाक्रम को नहीं बढ़ाता, बल्कि पाठक के सामने एक सामाजिक विमर्श खोल देता है। व्यंग्य, हास्य और नैतिक शिक्षा का संयोजन इन्हें ‘कथोपकथन शैली’ का उत्कृष्ट उदाहरण बनाता है।
"काका के कहे किस्से" केवल कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि ग्रामीण अनुभवों का वह दर्पण है जिसमें मानवीय स्वभाव, लालच, निष्ठा, सम्मान, सतर्कता और भाग्य जैसे शाश्वत विषय प्रतिबिंबित होते हैं। इसकी प्रासंगिकता इसलिए भी स्थायी है क्योंकि इसमें वर्णित मूल्य समय, समाज और पीढ़ी — सभी से परे हैं। इन कथाओं को पढ़ते हुए पाठक न केवल मनोरंजन पाता है, बल्कि जीवन को देखने की एक नई दृष्टि भी हासिल करता है। लेखक की भाषा सरल, स्पष्ट और बोलचाल के मुहावरों से युक्त है। चूंकि इन किस्सों का आधार मौखिक परंपरा है, इसलिए भाषा में आडंबर नहीं है। संवाद-शैली का उपयोग पाठक को सीधे ‘काका’ के सामने बैठा देता है, मानो वे खुद यह प्रसंग सुना रहे हों। वाक्य छोटे और प्रभावी हैं, जिससे संदेश सीधे हृदय तक पहुँचता है। उदाहरण के तौर पर, कई किस्सों का अंत एक पंक्ति में सारांश देकर किया गया है — यह न केवल पढ़ने में सहजता लाता है बल्कि संदेश को भी स्मरणीय बना देता है। पुस्तक में प्रत्येक किस्सा अलग शीर्षक के साथ दिया गया है, जिससे पाठक अपनी रुचि के अनुसार चयन कर सकता है। प्रत्येक किस्से का आकार 1-2 पृष्ठ का है, जो त्वरित पठन के लिए उपयुक्त है। अंतिम खंड ‘कहावतें’ एक तरह से पूरी पुस्तक का सार है — छोटे-छोटे वाक्यों में बड़े जीवन-सत्य। पुस्तक के सकारात्मक पक्षों की चर्चा करें तो पहला की यह हर किस्से का निष्कर्ष स्पष्ट और सरल है, जिससे सभी आयु वर्ग के पाठक इसे समझ सकते हैं। दूसरा अधिकांश किस्से सीधे हमारे रोज़मर्रा के जीवन और अनुभवों से जुड़े हैं। तीसरा छोटी-छोटी कहानियाँ पाठक का ध्यान बनाए रखती हैं। चौथा पुस्तक मौखिक लोककथाओं और कहावतों के संरक्षण का कार्य करती है और पांचवां यद्यपि किस्से मौलिक नहीं, लेखक का प्रस्तुतीकरण उन्हें नया रूप देता है। पुस्तक के नकारात्मक पक्ष नहीं बल्कि साहित्यिक पाठकों की अपेक्षा को लक्षित करते हुए इसका विश्लेषण किया जाए तो मौलिक रचनाओं की अपेक्षा रखने वाले पाठकों के लिए "सीमित आकर्षण" चूँकि लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है कि सामग्री संकलित है, इसलिए नयेपन के खोजी पाठकों को यह थोड़ा साधारण लग सकता है। साथ ही भाषा सहज है, लेकिन कुछ जगहों पर साहित्यिक चातुर्य और रूपक-शक्ति का उपयोग इसे और प्रभावशाली बना सकता था। किस्सों के मूल स्रोत या कहावतों की उत्पत्ति का उल्लेख होता तो यह शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी हो सकता था।
इस तरह यह पुस्तक केवल किस्सों का संग्रह नहीं बल्कि भारतीय लोक-मनीषा का जीवित दस्तावेज है। आज के डिजिटल और भागमभाग भरे युग में जब पारंपरिक कहानियाँ और कहावतें स्मृति से लुप्त हो रही हैं, यह संकलन उन्हें फिर से पाठकों के सामने लाता है। इसका महत्त्व इस बात में है कि यह पीढ़ियों के अनुभवों, नैतिकता और व्यवहारिक बुद्धि को सरल तरीके से नई पीढ़ी तक पहुँचाता है। यह पाठक को यह भी याद दिलाता है कि ‘नैतिक शिक्षा’ केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के संवादों, किस्सों और कहावतों से भी मिलती है।

पुस्तक : काका के कहे किस्से
लेखक: अमित कुमार मल्ल
प्रकाशक: शिल्पायन बुक्स
मूल्य: रू 195 (पेपर बैक)
                                                               
समीक्षक: डॉ. सुबोध ठाकुर
सहायक प्राध्यापक (हिंदी)
सरकारी विनयन, वाणिज्य एवं विज्ञान कॉलेज 
उमरपाडा, सूरत , गुजरात
9540304668
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Wednesday, September 10, 2025

ठा. पूरन सिंह स्मृति 'सूत्र सम्मान 2025' कोलकाता के युवा कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा को

लोक कवि ठा. पूरन सिंह की स्मृति में प्रतिवर्ष युवा कविता के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित "सूत्र सम्मान" इस वर्ष (2025) कोलकाता के युवा कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा को दिये जाने का निर्णय सूत्र समिति द्वारा लिया गया है। कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा को छ.ग. के सांस्कृतिक नगरी कोण्डागाँव में 25 अक्टूबर 2025 को "सूत्र एवं ककसाड़, साहित्यिक पत्रिका" के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में ठा. पूरन सिंह स्मृति "सूत्र सम्मान-2025" प्रदान किया जायेगा।

युवा कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा का जन्म 01 नवम्बर 1975 को उ.प्र. के बुलन्दशहर में हुआ है। बी.ई., एम. टेक, पी. एच. डी. किये डॉ. सुनील कुमार शर्मा, हिन्दी के संभावनाशील कवि है, सुनील की कविताओं में जो अनगढ़ जीवन है वह उम्मीद की तरह है। डॉ. सुनील कुमार शर्मा ने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम करते हुए आधुनिक तकनीक को रचना के स्तर आगे बढ़ाया है। वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह के अलावा प्रौद्योगिकी पर डॉ. शर्मा के शोधपूर्ण किताबें प्रकाशित है। हिन्दी के महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में युवा कवि सुनील कुमार शर्मा की कविताएं, गजलें, समीक्षाएं व तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लेख आदि प्रकाशित होती रहती है। वर्तमान में डॉ. सुनील कुमार शर्मा कोलकाता में कार्यकारी निदेशक के पद पर भारतीय रेलवे में पदस्थ हैं।

विदित हो कि ठा. पूरन सिंह स्मृति "सूत्र सम्मान" वर्ष 1997 से देश के किसी एक संभावनाशील युवा कवि-लेखक को दिया जा रहा है। यह 28वाँ सम्मान है। इसके पूर्व युवा कवि अशोक शाह, प्रत्तापराव कदम, नासिर अहमद सिकदर, रजत कृष्ण, निर्मल आनंद, संजीव बख्शी, विनय सौरभ, एकांत श्रीवास्तव, अग्निशेखर, बसंत त्रिपाठी, सुरेश सेन निशांत, विमलेश त्रिपाठी, रेखा चमोली, सौरभ राय, आत्मारजन, बहादुर पटेल, राजकिशोर राजन, सतीश कुमार सिंह, माधव राठौड़, भास्कर चौधुरी, सूर्यप्रकाश जीनगर, ओमप्रकाश मिश्र, संजय अलंग, डॉ. जमुना बीनी और शरद कोकास को ठा. पूरन सिंह स्मृति "सूत्र सम्मान" से नवाजा गया है।
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Tuesday, August 19, 2025

सामाजिक परिवर्तन में फोटोग्राफी की भूमिका

तस्वीरें हमारे जीवन का एक अनमोल हिस्सा होती हैं। छोटी से छोटी तस्वीर में भी एक पूरी दुनिया समा सकती है, चाहें वह एक बच्चे की हँसी हो, सूर्यास्त की लालिमा हो या किसी अनजान जगह की सुंदरता इत्यादि। लेकिन, तस्वीरें केवल खूबसूरती को ही कैद नहीं करतीं बल्कि इतिहास की सच्चाई को सहेजती हैं और समयानुसार उन्हें उजागर करती हैं। कई बार इन तस्वीरों की वजह से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन भी देखने मिलता है। तस्वीरें खींचने की कला को अंग्रेजी में फोटोग्राफी कहा जाता है। इस कला की अहमियत के कारण हर साल 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है। इस लेख में, हम फोटोग्राफी की शुरुआत और इसके कुछ ऐतिहासिक किस्सों के बारे में विस्तार से बात करेंगे।

फोटोग्राफी की शुरुआत तकरीबन दो सौ साल पहले शुरू हुई थी। उससे पहले यादों को सहेजने का एकमात्र तरीका चित्रकारी था। लेकिन 1826 में, फ्रांस के जोसेफ नाइसफोर नीप्स ने दुनिया की पहली स्थायी तस्वीर खींची। यह तस्वीर उनकी खिड़की से दिखने वाले दृश्य की थी, जिसे बनाने में लगभग आठ घंटे से ज्यादा का समय लगा था। इसे देखकर लोग पहली बार यह जान पाये कि किसी दृश्य को कागज पर हमेशा के लिए उतारा जा सकता है। सन 1839 में, लुई दागुएर्रे ने डागोरोटाइप तकनीक विकसित की, जिसने फोटोग्राफी को और आसान बना दिया। इस तकनीक में चांदी की परत वाली प्लेट पर प्रकाश की मदद से तस्वीरें बनाई जाती थीं। 19 अगस्त 1839 को फ्रांस सरकार ने इस तकनीक को दुनिया के लिए मुफ्त कर दिया ताकि हर कोई इसका इस्तेमाल कर सके। यही वह ऐतिहासिक दिन था, जिसे आज हम विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाते हैं।
 (दुनिया की पहली तस्वीर जो खिड़की से ली गयी थी)

फोटोग्राफी की दुनिया के कुछ किस्से बड़े रोमांचक हैं। सन 1839 में अमेरिकी फोटोग्राफर रॉबर्ट कॉर्नेलियस ने दुनिया की पहली सेल्फी खींची। उन्होंने अपना कैमरा सेट किया, लेंस का कवर हटाया और दौड़कर फ्रेम में आ गए। आज हम स्मार्टफोन से सेल्फी लेते हैं, जो हमारे लिए एक सामान्य बात है, लेकिन उस समय यह एक बड़ी उपलब्धि थी। कॉर्नेलियस ने इस तस्वीर के पीछे लिखा, 'द फर्स्ट लाइट पिक्चर एवर टेकेन 1839'। अमेरिका की लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में इस तस्वीर को आज भी संरक्षित किया गया है। एक और रोचक किस्सा सन 1861 का है, जब स्कॉटिश वैज्ञानिक जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने पहली रंगीन तस्वीर बनाई थी। उन्होंने लाल, हरे और नीले फिल्टर का उपयोग करके एक रिबन की तस्वीर खींची और फिर उन्हें मिलाकर एक रंगीन तस्वीर बनाई। उस समय यह तस्वीर किसी चमत्कार से कम नहीं थी। जाहिर है कि यही तस्वीर आज की रंगीन फोटोग्राफी का आधार बनी।
फोटोग्राफी की ताकत सिर्फ खूबसूरत तस्वीरें खींचने तक सीमित नहीं है बल्कि इसे समाज को बदलने हेतु एक शक्तिशाली हथियार के रूप में देखा जा सकता है। इसका एक मार्मिक उदाहरण है दक्षिण अफ्रीकी फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर की तस्वीर, जिसे दुनिया 'द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल' के नाम से जानती है। कार्टर दक्षिण अफ्रीका के बैंग-बैंग क्लब का हिस्सा थे। यह क्लब रंगभेद और गृहयुद्ध की तस्वीरें खींचता था। बात 1993 की है, सूडान में भयंकर अकाल और गृहयुद्ध चल रहा था। कार्टर संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन के तहत वहाँ की स्थिति की तस्वीर लेने गए थे। अयोड गाँव में उन्होंने एक ऐसी तस्वीर खींची, जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। इस तस्वीर में एक कुपोषित बच्चा है जिसका नाम 'कोन्ग न्योंग' था। वह बच्चा संयुक्त राष्ट्र के खाद्य केंद्र की ओर जा रहा था, जो अभी आधा मील दूर था। भुखमरी की भयावहता देखिये कि उसके अंदर इतनी भी ताकत नहीं थी, कि वह चल सके इसलिए जमीन पर रेंग रहा था। उसके ठीक पीछे एक गिद्ध बैठा है, जो शायद उस बच्चे के मरने का इंतज़ार कर रहा था। 
 (द वल्चर एंड द लिटिल गर्ल)

कार्टर ने इस तस्वीर को खींचने के लिए लगभग 20 मिनट तक इंतज़ार किया, ताकि गिद्ध और बच्चे का सही फ्रेम मिल सके। तस्वीर खींचने के बाद उन्होंने गिद्ध को भगाया, लेकिन बच्चे को कोई मदद नहीं दी। यह तस्वीर 26 मार्च 1993 को 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' में छपी और दुनिया भर में सनसनी बन गई। इस तस्वीर ने सूडान के अकाल की भयावहता को उजागर किया और मानवीय सहायता के लिए लाखों रुपये जुटाने में मदद की। लेकिन इस तस्वीर ने कार्टर को भारी आलोचना का सामना भी करवाया। लोगों ने सवाल उठाया कि उन्होंने बच्चे की मदद क्यों नहीं की। कुछ ने तो उन्हें 'गिद्ध जैसा' तक कहा। कार्टर ने बाद में बताया कि उस समय फोटो जर्नलिस्ट्स को भुखमरी के शिकार लोगों को छूने की मनाही थी, क्योंकि इससे बीमारी फैलने का खतरा था। फिर भी, इस तस्वीर ने कार्टर को अंदर तक तोड़ दिया।
सन 1994 में, इस तस्वीर के लिए कार्टर को पुलित्जर पुरस्कार मिला। यह उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सम्मान था। लेकिन इस सम्मान के बावजूद, कार्टर गहरे अवसाद में चले गए। तस्वीर को लेकर हुई आलोचनाओं के साथ उनके निजी जीवन की समस्याएँ और युद्ध व हिंसा की भयावह तस्वीरों ने उनके अंदर अपराधबोध पैदा कर दिया। 27 जुलाई 1994 को पुरस्कार जीतने के चार महीने बाद, कार्टर ने जोहान्सबर्ग में अपनी ट्रक में कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तता से आत्महत्या कर ली। वह केवल 33 साल के थे। उनके सुसाइड नोट में लिखा हुआ मिला कि वह हत्याओं, लाशों, और भुखमरी की त्रासदी की यादों से त्रस्त हैं। 
 (टैंक मैन)

केविन कार्टर की तस्वीर अकेली नहीं है, जिसने दुनिया को आईना दिखाया हो। फोटोग्राफी के इतिहास में कई ऐसी तस्वीरें हैं, जिन्होंने समाज को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 1989 में, चीन के तियानमेन स्क्वायर में एक अकेला व्यक्ति टैंकों के सामने खड़ा था। इस तस्वीर को, जिसे 'टैंक मैन' के नाम से जाना जाता है, फोटोग्राफर जेफ विडेनर ने खींचा। यह तस्वीर लोकतंत्र की मांग का प्रतीक बन गई और दुनिया भर में लोगों को प्रेरित किया। इसी तरह 1984 में, स्टीव मैककरी की 'अफगान गर्ल' तस्वीर ने नेशनल ज्योग्राफिक के कवर पर जगह बनाई। इस तस्वीर में एक अफगानी शरणार्थी लड़की की गहरी हरी आँखें थीं। इस तस्वीर ने शरणार्थियों की पीड़ा को दुनिया के सामने लाने का काम किया। बाद में, 2002 में, मैककरी ने उस लड़की 'सरबत गुला' को फिर से ढूंढा और विस्तार से उसकी कहानी को प्रस्तुत किया। अब उसके पास अपना खुद का बड़ा मकान है, जिसे अफगान सरकार ने मुहैया कराया था।
 (अफगान गर्ल)

1968 में, नासा के अपोलो 8 मिशन की 'अर्थराइज' तस्वीर ने पृथ्वी को अंतरिक्ष से दिखाया। इस तस्वीर ने लोगों को हमारी धरती की नाजुकता का अहसास कराया और पर्यावरण संरक्षण की भावना को जागृत किया। 1972 में, निक उत की वियतनाम युद्ध की तस्वीर 'द टेरर ऑफ वॉर' ने एक नन्ही लड़की, किम फूक, को नेपलम हमले से भागते हुए दिखाया। इस तस्वीर ने युद्ध की भयावहता को उजागर किया और शांति के लिए वैश्विक आंदोलन को बल दिया। भारत में, रघु राय की 1971 के बांग्लादेश युद्ध की तस्वीरों ने शरणार्थियों की तकलीफ को सबके सामने रखा। इस तरह इन तस्वीरों ने फोटोग्राफी की ताकत को न सिर्फ स्थापित किया बल्कि यह भी बताया कि फोटोग्राफी कला और सौंदर्य के साथ-साथ सामाजिक बदलाव एवं क्रांति का हथियार भी है।
 (अर्थराइज )

फोटोग्राफी ने समाज पर भी कई तरह से प्रभाव डाला है। यह इतिहास को संजोने का एक अनोखा तरीका है। भारत में स्वतंत्रता संग्राम की तमाम तस्वीरें हमें उस दौर की भावनाओं से परिचय कराती हैं। सामाजिक बदलाव में भी इसने बड़ी भूमिका निभाई है। 1930 के दशक में डोरोथिया लैंग की तस्वीर 'माइग्रेंट मदर' ने अमेरिका की गरीबी को उजागर कर लोगों को गरीबों की मदद के लिए प्रेरित किया। भारत में 2004 की सुनामी की तस्वीरें या 2013 की केदारनाथ त्रासदी की तस्वीरों ने लोगों को मदद के लिए आगे आने को प्रेरित किया। 
 (माइग्रेंट मदर)

ऐसी तमाम कहानियों को देख-सुनकर हमारा मन रोचकता से भर जाता है लेकिन हम नहीं जानते कि इन तस्वीरों को खींचने के लिए फोटो जर्नलिस्ट्स कितने मुश्किल हालातों में काम करते हैं। कई बार इन तस्वीरों के चक्कर मे उनकी जान तक चली जाती है। वाकई, दुनिया तक सच को पहुँचाने की उनकी यह जिद्द सलामी के काबिल है। उनकी तस्वीरें न केवल खबर बनती हैं, बल्कि इतिहास का हिस्सा भी बन जाती हैं।
कला को एक नया आयाम देने में भी फोटोग्राफी की अहम भूमिका है। मशहूर फोटोग्राफर एन्सल एडम्स ने प्रकृति की तस्वीरों को इतना खूबसूरत बनाया कि लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हुए। भारत की दयानिता सिंह ने अपनी तस्वीरों से आम लोगों की कहानियाँ दुनिया तक पहुंचाईं। आज हर कोई अपने स्मार्टफोन से तस्वीरें खींचकर अपनी कहानी बता सकता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, और टिकटॉक जैसे मंचों ने फोटोग्राफी को एक वैश्विक भाषा बना दिया है। भारत की सांस्कृतिक विविधता- जैसे दीवाली की रोशनी, होली के रंग, या ताजमहल की खूबसूरती- इन मंचों के जरिए दुनिया भर में पहुंचती है। इस तरह फोटोग्राफी समाज को एक-दूसरे से जोड़ता है और संस्कृतियों के बीच समझ बढ़ाता है।
फोटोग्राफी ने शिक्षा और विज्ञान को भी प्रभावित किया है। नासा की अंतरिक्ष तस्वीरें हमें ब्रह्मांड की विशालता दिखाती हैं और बच्चों को विज्ञान के लिए प्रेरित करती हैं। मेडिकल फोटोग्राफी ने डॉक्टरों को बीमारियों को समझने में मदद की है। भारत में जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे कई संस्थान फोटोग्राफी कोर्स चलाते हैं, जो युवाओं को इस कला में करियर बनाने का मौका देते हैं।
देश की अर्थव्यवस्था में भी फोटोग्राफी का योगदान है। भारत में वेडिंग फोटोग्राफी अरबों रुपये का उद्योग है, जिसमें लाखों लोग काम करते हैं। फैशन, विज्ञापन, और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी जैसे क्षेत्रों ने भी रोजगार के नए अवसर खोले हैं। फोटोग्राफी ने पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दिया है। जंगलों की कटाई, समुद्रों में प्लास्टिक प्रदूषण या ग्लोबल वॉर्मिंग की तस्वीरें लोगों को जागरूक करती हैं। मिसाल के तौर पर, समुद्र में फंसे कछुए की तस्वीर ने सिंगल-यूज प्लास्टिक के खिलाफ अभियान को बल दिया।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि तस्वीरें कला, इतिहास, समाज, पर्यावरण, रोजगार आदि के साथ-साथ व्यक्ति विशेष के जीवन में भी क्रांतिकारी बदलाव लाने में सहयोगी हैं।

संपर्क : महेश सिंह, 
गिरिडीह, झारखंड mahesh.pu14@gmail.com
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Saturday, August 9, 2025

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आदिवासियों का विस्थापन : कारण, प्रभाव और समाधान

विश्व की लगभग 47.6 करोड़ आबादी, यानी कुल जनसंख्या का लगभग छह प्रतिशत, आदिवासी समुदायों की है। इन समुदायों का अपनी भूमि, परंपराओं और प्रकृति से गहरा जुड़ाव है, इसलिए वे कभी उसे छोड़ना नहीं चाहते। बावजूद इसके उनका विस्थापन होता रहा है। आज भी यह विस्थापन लगातार जारी है जिसे एक गंभीर वैश्विक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखकर 2001 में डरबन घोषणा में उनके आत्मनिर्णय, भूमि और संसाधन अधिकारों को मान्यता दी गयी थी, मगर इसका उल्लंघन आज भी जारी है।  इस लेख में आदिवासियों के विस्थापन (खासकर 2001 के बाद) के कारणों का विश्लेषण एवं उनके प्रभावों की पड़ताल करते हुए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।


संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार विश्व मे आदिवासी समुदायों की संख्या 37 से 50 करोड़ के बीच हैं। वे अपनी पैतृक भूमि पर निर्भर हैं। उनकी संस्कृति और आजीविका प्रकृति से जुड़ी है, मगर विकास परियोजनाएं और पर्यावरणीय बदलाव उन्हें उखाड़ रहे हैं। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक ढांचे नष्ट हो रहे हैं। डरबन घोषणा में उनके अधिकारों को मान्यता दी गयी थी और 2007 में संयुक्त राष्ट्र की आदिवासी जनजातियों पर घोषणा (UNDRIP) ने इन्हें और मजबूत किया। फिर भी, ह्यूमन राइट्स वॉच और सर्वाइवल इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स के अनुसार, खनन, बांध और संरक्षण परियोजनाएं उनकी सहमति के बिना उन्हें विस्थापित करती हैं। भारत में, वन अधिकार अधिनियम (2006) लागू होने के बावजूद आदिवासियों को ओडिशा के नियामगिरी और छतीसगढ़ में हसदेव को बचाने हेतु आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा।  
यह तथ्य पूरी तरह सत्य है कि पूरे विश्व में लोग शहरों की चकाचौंध की तरफ भागते हुए नजर आते हैं। आदिवासियों का भी शहरी क्षेत्रों की ओर जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं, लेकिन उनका यह पलायन उनकी पसंद नहीं बल्कि मजबूरी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट्स के अनुसार, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में आदिवासी शहरों की ओर बड़ी संख्या में गए हैं। 2012 की जनगणना के अनुसार बोलिविया में 40 प्रतिशत आदिवासी अब शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। भारत में भी झारखंड और छत्तीसगढ़ के जंगल क्षेत्रों में तेजी से हो रहे खनन और औद्योगिक परियोजनाओं ने आदिवासियों को शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में धकेल दिया है।  वहाँ वे अपनी परंपराएं और सामुदायिकता की संस्कृति को छोड़ने हतु विवश हैं। अपनी मिट्टी से अलग होकर शहरों में आये तमाम परिवार, जो कभी जंगल और खेती पर निर्भर थे, अब मजदूरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां उन्हें अपनी पहचान का खतरा तो है ही, नश्लीय भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है।


विस्थापन का सबसे बड़ा कारण पैतृक भूमि पर अतिक्रमण है। खनन, तेल और गैस उद्योग आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर रहे हैं। अमेज़ॅन वॉच और RAISG की 2021 की रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेज़ॅन में अधिकांश तेल और खनन परियोजनाएं आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। 2007 में, संयुक्त राष्ट्र ने किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले आदिवासी समुदायों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) को सार्वभौमिक रूप से अपनाने का आह्वान किया था। और उससे भी पहले, 1989 में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने कन्वेंशन संख्या 169 पारित किया था, जिसने आदिवासी और जनजातीय लोगों के अधिकारों पर एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज़ बनाया था। मगर ग्लोबल विटनेस की 2022 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि कंपनियां अक्सर बिना परामर्श के काम शुरू करती हैं। पेरू में 2009 का बागुआ संघर्ष इसका उदाहरण है, जहां सहमति के अभाव में हिंसा भड़की। भारत में भी, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा के खनन क्षेत्रों में आदिवासियों की सहमति को नजरअंदाज किया जाता है।
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर होने वाला 'हरित उपनिवेशवाद' भी आदिवासियों को विस्थापित करने में पीछे नहीं है। तंजानिया में मासाई समुदायों को न्गोरोंगोरो संरक्षण क्षेत्र से और युगांडा में बटवा समुदायों को ब्विंडी राष्ट्रीय उद्यान से हटाया गया। द गार्जियन और मॉन्गबे की 2023 की जांच के अनुसार, कंबोडिया और केन्या में कार्बन क्रेडिट परियोजनाएं, इस विस्थापन का कारण बन रही हैं। यह विरोधाभास है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए बनाई गई नीतियां आदिवासियों के अधिकारों का हनन करती हैं। मानवाधिकार उल्लंघन आदिवासियों के विस्थापन के मूल कारणों में से एक हैं। UNDRIP आत्मनिर्णय को उनका मौलिक अधिकार मानता है, लेकिन इसका कार्यान्वयन कमजोर है। भारत में संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत आदिवासियों को स्वायत्तता दी गई है, मगर केंद्रीकृत नीतियां इसे कमजोर करती हैं। झारखंड का पथलगड़ी आंदोलन आदिवासियों के आत्मनिर्णय की मांग का ही प्रतीक है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में तो कई रिहायशी स्कूलों ने आदिवासी बच्चों की सांस्कृतिक पहचान तक छीन ली है। भारत में भी मुख्यधारा की शिक्षा कमोबेश इसी दिशा में अग्रसर है। असल में नीति निर्माण में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व सीमित है, जिससे उनकी आवाज दब जाती है।


सशस्त्र संघर्ष आदिवासियों के लिए विस्थापन का एक और कारण हैं। कोलंबिया में, UNHCR की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, 3.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी 17 प्रतिशत विस्थापित लोगों का हिस्सा है। पापुआ न्यू गिनी में सैन्यीकरण ने हजारों आदिवासियों को विस्थापित किया। भारत में, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए हो रहे संघर्ष को भी इस दृष्टि से देखा जा सकता है। ये संघर्ष शक्ति शून्य पैदा करते हैं, जिसका फायदा अवैध खनन और संसाधन निष्कर्षण के लिए उठाया जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने भी आदिवासियों के लिए खतरा बढ़ाया है। IPCC की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, वे सूखे, बाढ़ और समुद्र स्तर वृद्धि से असमान रूप से प्रभावित हैं, जबकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उनका योगदान नगण्य है। बोलिविया में लेक पोपो का सूखना इसका उदाहरण है। अलजजीरा की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और खनन ने इस झील को नष्ट किया, जिससे उरु-उरु मछुआरे खदानों में मजदूरी करने को मजबूर हुए। भारत के भी कई क्षत्रों में सूखा और बाढ़ ने आदिवासियों की खेती को प्रभावित किया, जिससे उन्हें शहरों की ओर पलायन करना पड़ा। आदिवासियों की आजीविका प्रकृति पर निर्भर होती है, इसलिए पर्यावरणीय बदलाव उनकी सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिरता को खतरे में डालते हैं।
आइए, अब देखते हैं कि विस्थापन के प्रभाव क्या-क्या हैं ! UNESCO की रिपोर्ट्स के अनुसार, पैतृक भूमि से वियोग सांस्कृतिक प्रथाओं और भाषाओं को नष्ट करता है। FAO के अनुसार, विस्थापित आदिवासियों में खाद्य असुरक्षा बढ़ती है, और WHO की रिपोर्ट्स पारा विषाक्तता जैसे स्वास्थ्य खतरों की पुष्टि करती है। The Lancet के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापन से अवसाद और मानसिक तनाव बढ़ता है। शहरी क्षेत्रों में अधिकतर आदिवासी झुग्गियों में रहते हैं, जहां बुनियादी सेवाओं की कमी और भेदभाव आम है। भारत के कई शहरों की झुग्गियों में रहने वाले तमाम संथाल परिवार अब अपनी भाषा और रीति-रिवाजों को भूल रहे हैं।
चित्र : महेश सिंह

विस्थापन की इस समस्या के समाधान हेतु, एक अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की जरूरत है। जिसमे सबसे पहले तो आदिवासियों की पैतृक भूमि को कानूनी मान्यता दी जाए। वन अधिकार अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करना और गैर-मान्यता प्राप्त भूमि को मान्यता देना भी जरूरी है। सभी परियोजनाओं में FPIC को अनिवार्य किया जाए, और स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित हों। इसके अलावा संरक्षण परियोजनाओं में आदिवासियों को सह-प्रबंधक बनाया जाए। कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं के लिए कठोर ऑडिट हो, ताकि कंबोडिया जैसे मामलों को रोका जा सके। साथ ही आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान को भी संरक्षण में शामिल किया जाना जरूरी है। उन्हें नीति निर्माण में प्रतिनिधित्व दिया जाए। भारत में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार) अधिनियम को मजबूत किया जाए। जबरन आत्मसात्करण की नीतियां खत्म हों, और आदिवासियों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता केंद्र बनें। अवैध खनन पर सख्त कानून लागू हों। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए, बोलिविया जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक आजीविका के लिए प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जाए। 
शहरी क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास सुनिश्चित किया जाय। उनकी भाषाओं और प्रथाओं के लिए सांस्कृतिक केंद्र बनें। मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयां और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं शुरू हों। संयुक्त राष्ट्र के तहत एक वैश्विक आदिवासी अधिकार निगरानी संगठन भी बनाना होगा। लेकिन इसके लिए आदिवासी नेताओं को शामिल करना और विश्व बैंक से फंडिंग प्राप्त करना जरूरी है। 
इस तरह इन समाधानों को यदि चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाय तो निश्चित तौर पर विस्थापन की समस्या से निजात पाया जा सकता है।  

संदर्भ : संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, Amnesty International, Survival International, Amazon Watch, RAISG (2020-2023), UNHCR, IDMC (2022), The Guardian, Mongabay (2023), Al Jazeera, BBC (2016-2018), IPCC (2022).

संपर्क - महेश सिंह, 
गिरिडीह, झारखंड mahesh.pu14@gmail.com
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