विश्व की लगभग 47.6 करोड़ आबादी, यानी कुल जनसंख्या का लगभग छह प्रतिशत, आदिवासी समुदायों की है। इन समुदायों का अपनी भूमि, परंपराओं और प्रकृति से गहरा जुड़ाव है, इसलिए वे कभी उसे छोड़ना नहीं चाहते। बावजूद इसके उनका विस्थापन होता रहा है। आज भी यह विस्थापन लगातार जारी है जिसे एक गंभीर वैश्विक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखकर 2001 में डरबन घोषणा में उनके आत्मनिर्णय, भूमि और संसाधन अधिकारों को मान्यता दी गयी थी, मगर इसका उल्लंघन आज भी जारी है। इस लेख में आदिवासियों के विस्थापन (खासकर 2001 के बाद) के कारणों का विश्लेषण एवं उनके प्रभावों की पड़ताल करते हुए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार विश्व मे आदिवासी समुदायों की संख्या 37 से 50 करोड़ के बीच हैं। वे अपनी पैतृक भूमि पर निर्भर हैं। उनकी संस्कृति और आजीविका प्रकृति से जुड़ी है, मगर विकास परियोजनाएं और पर्यावरणीय बदलाव उन्हें उखाड़ रहे हैं। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक ढांचे नष्ट हो रहे हैं। डरबन घोषणा में उनके अधिकारों को मान्यता दी गयी थी और 2007 में संयुक्त राष्ट्र की आदिवासी जनजातियों पर घोषणा (UNDRIP) ने इन्हें और मजबूत किया। फिर भी, ह्यूमन राइट्स वॉच और सर्वाइवल इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स के अनुसार, खनन, बांध और संरक्षण परियोजनाएं उनकी सहमति के बिना उन्हें विस्थापित करती हैं। भारत में, वन अधिकार अधिनियम (2006) लागू होने के बावजूद आदिवासियों को ओडिशा के नियामगिरी और छतीसगढ़ में हसदेव को बचाने हेतु आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
यह तथ्य पूरी तरह सत्य है कि पूरे विश्व में लोग शहरों की चकाचौंध की तरफ भागते हुए नजर आते हैं। आदिवासियों का भी शहरी क्षेत्रों की ओर जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं, लेकिन उनका यह पलायन उनकी पसंद नहीं बल्कि मजबूरी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट्स के अनुसार, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में आदिवासी शहरों की ओर बड़ी संख्या में गए हैं। 2012 की जनगणना के अनुसार बोलिविया में 40 प्रतिशत आदिवासी अब शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। भारत में भी झारखंड और छत्तीसगढ़ के जंगल क्षेत्रों में तेजी से हो रहे खनन और औद्योगिक परियोजनाओं ने आदिवासियों को शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में धकेल दिया है। वहाँ वे अपनी परंपराएं और सामुदायिकता की संस्कृति को छोड़ने हतु विवश हैं। अपनी मिट्टी से अलग होकर शहरों में आये तमाम परिवार, जो कभी जंगल और खेती पर निर्भर थे, अब मजदूरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां उन्हें अपनी पहचान का खतरा तो है ही, नश्लीय भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है।
विस्थापन का सबसे बड़ा कारण पैतृक भूमि पर अतिक्रमण है। खनन, तेल और गैस उद्योग आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर रहे हैं। अमेज़ॅन वॉच और RAISG की 2021 की रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेज़ॅन में अधिकांश तेल और खनन परियोजनाएं आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। 2007 में, संयुक्त राष्ट्र ने किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले आदिवासी समुदायों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) को सार्वभौमिक रूप से अपनाने का आह्वान किया था। और उससे भी पहले, 1989 में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने कन्वेंशन संख्या 169 पारित किया था, जिसने आदिवासी और जनजातीय लोगों के अधिकारों पर एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज़ बनाया था। मगर ग्लोबल विटनेस की 2022 की रिपोर्ट्स बताती हैं कि कंपनियां अक्सर बिना परामर्श के काम शुरू करती हैं। पेरू में 2009 का बागुआ संघर्ष इसका उदाहरण है, जहां सहमति के अभाव में हिंसा भड़की। भारत में भी, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा के खनन क्षेत्रों में आदिवासियों की सहमति को नजरअंदाज किया जाता है।
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर होने वाला 'हरित उपनिवेशवाद' भी आदिवासियों को विस्थापित करने में पीछे नहीं है। तंजानिया में मासाई समुदायों को न्गोरोंगोरो संरक्षण क्षेत्र से और युगांडा में बटवा समुदायों को ब्विंडी राष्ट्रीय उद्यान से हटाया गया। द गार्जियन और मॉन्गबे की 2023 की जांच के अनुसार, कंबोडिया और केन्या में कार्बन क्रेडिट परियोजनाएं, इस विस्थापन का कारण बन रही हैं। यह विरोधाभास है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए बनाई गई नीतियां आदिवासियों के अधिकारों का हनन करती हैं। मानवाधिकार उल्लंघन आदिवासियों के विस्थापन के मूल कारणों में से एक हैं। UNDRIP आत्मनिर्णय को उनका मौलिक अधिकार मानता है, लेकिन इसका कार्यान्वयन कमजोर है। भारत में संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत आदिवासियों को स्वायत्तता दी गई है, मगर केंद्रीकृत नीतियां इसे कमजोर करती हैं। झारखंड का पथलगड़ी आंदोलन आदिवासियों के आत्मनिर्णय की मांग का ही प्रतीक है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में तो कई रिहायशी स्कूलों ने आदिवासी बच्चों की सांस्कृतिक पहचान तक छीन ली है। भारत में भी मुख्यधारा की शिक्षा कमोबेश इसी दिशा में अग्रसर है। असल में नीति निर्माण में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व सीमित है, जिससे उनकी आवाज दब जाती है।
सशस्त्र संघर्ष आदिवासियों के लिए विस्थापन का एक और कारण हैं। कोलंबिया में, UNHCR की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, 3.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी 17 प्रतिशत विस्थापित लोगों का हिस्सा है। पापुआ न्यू गिनी में सैन्यीकरण ने हजारों आदिवासियों को विस्थापित किया। भारत में, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भूमि और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए हो रहे संघर्ष को भी इस दृष्टि से देखा जा सकता है। ये संघर्ष शक्ति शून्य पैदा करते हैं, जिसका फायदा अवैध खनन और संसाधन निष्कर्षण के लिए उठाया जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने भी आदिवासियों के लिए खतरा बढ़ाया है। IPCC की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, वे सूखे, बाढ़ और समुद्र स्तर वृद्धि से असमान रूप से प्रभावित हैं, जबकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उनका योगदान नगण्य है। बोलिविया में लेक पोपो का सूखना इसका उदाहरण है। अलजजीरा की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और खनन ने इस झील को नष्ट किया, जिससे उरु-उरु मछुआरे खदानों में मजदूरी करने को मजबूर हुए। भारत के भी कई क्षत्रों में सूखा और बाढ़ ने आदिवासियों की खेती को प्रभावित किया, जिससे उन्हें शहरों की ओर पलायन करना पड़ा। आदिवासियों की आजीविका प्रकृति पर निर्भर होती है, इसलिए पर्यावरणीय बदलाव उनकी सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिरता को खतरे में डालते हैं।
आइए, अब देखते हैं कि विस्थापन के प्रभाव क्या-क्या हैं ! UNESCO की रिपोर्ट्स के अनुसार, पैतृक भूमि से वियोग सांस्कृतिक प्रथाओं और भाषाओं को नष्ट करता है। FAO के अनुसार, विस्थापित आदिवासियों में खाद्य असुरक्षा बढ़ती है, और WHO की रिपोर्ट्स पारा विषाक्तता जैसे स्वास्थ्य खतरों की पुष्टि करती है। The Lancet के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापन से अवसाद और मानसिक तनाव बढ़ता है। शहरी क्षेत्रों में अधिकतर आदिवासी झुग्गियों में रहते हैं, जहां बुनियादी सेवाओं की कमी और भेदभाव आम है। भारत के कई शहरों की झुग्गियों में रहने वाले तमाम संथाल परिवार अब अपनी भाषा और रीति-रिवाजों को भूल रहे हैं।
विस्थापन की इस समस्या के समाधान हेतु, एक अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की जरूरत है। जिसमे सबसे पहले तो आदिवासियों की पैतृक भूमि को कानूनी मान्यता दी जाए। वन अधिकार अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करना और गैर-मान्यता प्राप्त भूमि को मान्यता देना भी जरूरी है। सभी परियोजनाओं में FPIC को अनिवार्य किया जाए, और स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित हों। इसके अलावा संरक्षण परियोजनाओं में आदिवासियों को सह-प्रबंधक बनाया जाए। कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं के लिए कठोर ऑडिट हो, ताकि कंबोडिया जैसे मामलों को रोका जा सके। साथ ही आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान को भी संरक्षण में शामिल किया जाना जरूरी है। उन्हें नीति निर्माण में प्रतिनिधित्व दिया जाए। भारत में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार) अधिनियम को मजबूत किया जाए। जबरन आत्मसात्करण की नीतियां खत्म हों, और आदिवासियों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता केंद्र बनें। अवैध खनन पर सख्त कानून लागू हों। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए, बोलिविया जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक आजीविका के लिए प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी जाए।
शहरी क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास सुनिश्चित किया जाय। उनकी भाषाओं और प्रथाओं के लिए सांस्कृतिक केंद्र बनें। मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयां और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं शुरू हों। संयुक्त राष्ट्र के तहत एक वैश्विक आदिवासी अधिकार निगरानी संगठन भी बनाना होगा। लेकिन इसके लिए आदिवासी नेताओं को शामिल करना और विश्व बैंक से फंडिंग प्राप्त करना जरूरी है।
इस तरह इन समाधानों को यदि चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाय तो निश्चित तौर पर विस्थापन की समस्या से निजात पाया जा सकता है।
संदर्भ : संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, Amnesty International, Survival International, Amazon Watch, RAISG (2020-2023), UNHCR, IDMC (2022), The Guardian, Mongabay (2023), Al Jazeera, BBC (2016-2018), IPCC (2022).
संपर्क - महेश सिंह, mahesh.pu14@gmail.com
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