Ticker

6/recent/ticker-posts

नैतिकता के सवाल और एकेडमिया

भी प्राणियों में मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिसके पास सोचने-समझने और बुद्धि के उपयोग की अधिक क्षमता है। यही वजह है कि वह निरंतर जीवन की बेहतरी के लिए प्रयासरत रहता है। इसी प्रयास में वह तमाम अन-सुलझे सवालों का जवाब ढूंढता है। सवालों का संबंध चेतना से है और चेतना तभी आती है जब हम चिंतन करते हैं, चिंतन भी तभी संभव है जब अध्ययन की लालसा हो या सही मौका मिले और सही मौका तभी मिल सकता है जब सामाजिक व्यवस्था लोकतांत्रिक हो, लोकतंत्र भी वहीं हो सकता है जहाँ नैतिकता जीवित रहे। असल में नैतिकता मनुष्य का वह स्वाभाविक गुण है जिससे मनुष्य स्वयं के प्रति उत्तरदायी होता है। दुनिया के तमाम संगठनों, संस्थानों और समुदायों की भी नैतिकता तय की जाती है, अपने आप में यह एक आदर्श स्थिति है। इसी आदर्श के दायरे में व्यक्ति, समाज, समुदाय, संगठन और संस्थानों को रहना होता है। नैतिकता के दायरे में ही सभी नियम या कानून तैयार किये जाते हैं। हालाँकि, नैतिकता मनुष्य का एक ऐसा गुण है जो हर परिस्थिति में उसके साथ रहती है, लेकिन कई बार मनुष्य की दूसरी प्रवृतियाँ इसे अपने अधिपत्य में ले लेती हैं। नतीजतन, लोभ, भय और क्रोध का साम्राज्य कायम होने लगता है। ऐसी स्थिति से ही बचने हेतु शिक्षा और शिक्षण-संस्थानों की जरूरत पड़ती है। आदि से लेकर अभी तक तमाम गुरुकुल और शिक्षण-संस्थान अगली पीढ़ी की बेहतरी के लिए नैतिकता का पाठ पढ़ाते चले आये हैं।

यद्यपि ज्ञान-विज्ञान की मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका सदैव से रही है, लेकिन बहस-मुबाहिसे की जरूरत भी कम नहीं है। ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान की प्रेरणा बहस-मुबाहिसों से ही मिलती है। दुनिया भर के सभी देश ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान हेतु निरंतर प्रयास करते रहे हैं। अपने देश भारत में भी इस प्रवृति को देखा जा सकता है। शास्त्रार्थ का जिक्र करें तो हमे बहुत पीछे जाना पड़ेगा, और वहाँ एक लंबी परम्परा दिखाई देती है। लेकिन आधुनिक समय की भी बात करें तो देश भर के सभी उच्च शिक्षण-संस्थान/विश्वविद्यालय आदि, अनुसन्धान हेतु तमाम शोध-सेमिनार आयोजित करते रहे हैं, लेकिन गंभीर बहस-मुबाहिसों के संबंध में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे कई संस्थानों की एक लम्बी परंपरा रही है। कभी सेमिनारों के बहाने तो कभी एकल व्याख्यान के बहाने इन संस्थानों ने तमाम विषयों पर अनुसंधान के लिए चर्चा-परिचर्चा आयोजित की, यह अलग बात है कि इस समय में भी सेमिनारों के प्रमाण-पत्र किलो के भाव से खरीदने और बेचने वालों की कमी नहीं रही है। यदि इस अपवाद को दरकिनार कर देखें तो उस समय में परिणाम जाहिराना तौर पर सार्थक रहा है। लेकिन 2014 में आयी प्रचण्ड बहुमत की सरकार ने इस पर जो मार की कि सब बेड़ा गर्क कर दिया। कुछ भी ऊल-जुलूल करने में माहिर इस सरकार ने सबसे पहले तो बजट में कटौती करके उच्च शिक्षा की जड़ में पानी की जगह तेजाब डालना शुरू किया। बाद में शोध की नैतिकता का हवाला देते हुए झुनझुना बजाने वाली एक बैंड पार्टी तैयार की; जिसे यूजीसी केयर कहते हैं। इसका काम शोध-जर्नलों/पत्रिकाओं की निगरानी का है। आगे, यूजीसी केयर और अकादमिक सेमिनारों पर ही अपनी बात जारी रखूँगा। लेकिन इसी के साथ यह बताते चलूँ कि मेरा यह विश्लेषण केवल हिंदी भाषा और साहित्य के अनुसंधान-क्षेत्र के संदर्भ में है।

तो चलिए, सबसे पहले उच्च शिक्षण-संस्थानों में होने वाले बहस-मुबाहिसों अर्थात सेमिनारों से शुरू करते हैं। विदित है कि प्रचण्ड बहुमत की सरकार आने से पहले उच्च-शिक्षण संस्थानों में होने वाले सेमिनारों के लिए संस्थान के पास पर्याप्त धन होता था। जिसके उपयोग से सेमिनार में वक्ताओं और प्रतिभागियों के आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था की जाती थी। सेमिनारों के विषय सामाजिक सरोकारों से जुड़े होते थे। विषय से संबंधित तथ्यों और तर्कों को प्रस्तुत करने में किसी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं थी। प्रमाण के लिए दलित साहित्यऔर स्त्री विमर्शजैसे विषयों पर हुए तमाम सेमिनारों में हुई बहसों को उठाकर देखा जा सकता है। बहरहाल, मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि इस प्रकार के आयोजनों से शोधार्थियों को सीधा लाभ होता था। क्योंकि, ऐसे आयोजनों में देश-विदेश के (तथाकथित) बड़े-से-बड़े विद्वानों को (कथित) छोटे-से-छोटे संस्थान भी अपने यहाँ बुला लेते थे। इससे शोधार्थियों में विषय के प्रति रुचि हमेशा बनी रहती थी। विद्वानों से मिलना, उनसे बातें करना, साक्षात्कार लेना आदि उनके लिए प्रेरणा के श्रोत होते। हैदराबाद विश्वविद्यालय के मेरे एक मित्र बताते हैं कि- 'काशीनाथ सिंह के साथ उन्होंने लगभग एक महीना समय बिताया।' आगे वे बताते हैं कि नामवर सिंह को तो अन्य विभाग वाले भी आमंत्रित करते थे।यहाँ मेरी जिज्ञासा यही है कि क्या यह बगैर भत्ते के संभव था? शायद नहीं ! खैर, वह एक अलग समय था और अलग माहौल भी।

हालिया हालात देखें, तो सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में बजट कम करने का नतीजा यह हुआ कि आजकल सेमिनारों में प्रतिभागियों से न सिर्फ भारी फीस वसूली जाने लगी है, बल्कि सेमिनार में आने-जाने और रहने की व्यवस्था भी उनकी अपनी जिम्मेदारी पर छोड़ दी जाती है। ऐसे में बताइये, कोई क्यों सेमिनार कराएगा और कोई क्यों किसी सेमिनार में शिरकत करेगा/करेगी? आज के सेमिनारों के विषय भी तो देखिये- कुछ तो मीडिया में आध्यात्मिकता की तलाश कर रहे हैं तो कुछ रामायण में विज्ञान और मिसाइल की तकनीकी का ब्लू-प्रिंट ढूंढ रहे हैं।



इसके अलावा एक और प्रवृति तेजी से प्रचलन में आ रही है। यह विश्वविद्यालयों के बारे में तो नहीं है लेकिन कॉलेजों ने इस संस्कार को हाथों हाथ लेना शुरू कर दिया है। बात यह है कि आजकल सेमिनार आयोजन को भी ठेके पर दिया जाने लगा है। इसमें वक्ता बुलाने से लेकर प्रतिभागियों के आलेखों को पुस्तकाकार करने तक की सभी जिम्मेदारी ठेका लेने वाली एजेंसी या व्यक्ति को सौंप दिया जाता है। महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों के कॉलेजों में आजकल यह खूब प्रचलन में है।    

खैर, अभी तो, महामारी का दौर है, लेकिन क्या ही कहें! यह तो और भी सुविधाजनक व्यवस्था हो गयी है। इसी दौरान एक नामी विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसरों ने बाकायदा तीन-चार ठो 'फैकेल्टी डेवलमेंट प्रोग्राम (FDP)' ऑनलाइन चलाकर हजारों की संख्या में प्रमाण-पत्र बाँट दिए। यह बात बहुत ही सरल और सामान्य-सी दिख रही है, लेकिन, है नहीं। इसके लिए थोड़ा-सा गणित का सहारा लेना पड़ेगा- मसलन, एक FDP में तकरीबन एक हजार प्रतिभागी हिस्सा लेते हैं, इसके लिए फीस है 1000 से 1500 सौ रुपये। उदाहरण के लिए हम एक हजार से एक हजार में गुणा कर देते हैं, कुल योग होता है 10 लाख रुपये। जहाँ तक मेरी जानकारी है कि महामारी के बाद से प्रोफेसर साहबों ने चार या पाँच FDP सम्पन्न कराए हैं। इसके आगे अब गणित की जरुरत नहीं, आप खुद समझ सकते हैं। आदरणीय मोदी जी ने 'आपदा में अवसर’ का ठीक ही सुझाव दिया था।

अब चलते हैं यूजीसी केयर और पत्रिकाओं की तरफ। तो जनाब इधर भी हालात-ए-मंजर कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता। सरकारी आदेशों की तरह यूजीसी केयर का उद्देश्य भी बहुत उच्च कोटि का है, यथा- शोध-प्रकाशनों की विश्वसनीयता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक व्यक्ति की शैक्षिक छवि का प्रतिनिधित्व नहीं करती अपितु संस्था और राष्ट्र की शैक्षिक छवि का भी प्रतिनिधित्व करती है। पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध लेखों की संख्या, विश्व स्तर पर स्वीकार किये गए संकेतकों में से एक है जो संस्थागत रैंकिंग, संकाय सदस्यों की नियुक्तियों और पदोन्नति और शोध डिग्री प्रदान करने सहित विभिन्न शैक्षिक उद्देश्यों के लिए माने जाते हैं। संदिग्ध/उप-मानक पत्रिकाओं में प्रकाशन प्रतिकूल प्रभाव डालता है जिससे दीर्घकालिक शैक्षिक क्षति होती है और छवि धुंधली हो जाती है।बिल्कुल सही बात है साहब, छवि तो धुंधली होती ही है। लेकिन हैं कहाँ श्रीमान आप लोग? क्या लगता है, शीशे के वातानुकूलित कमरों से यथार्थ की जमीन नजर आएगी? बिल्कुल नहीं, शायद कभी नहीं! यदि सच में यूजीसी केयर को धुंधली होती छवि की चिंता है तो उनसे कहना चाहूँगा कि समय निकालकर आईये कभी यथार्थ की गलियों में और अपने चरण-कमल धरातल पर उतारकर टहलिए कुछ देर।

बहरहाल, मुझे पता है वे कभी इस पर गौर नहीं फरमाएंगे, इसलिए जरुरी है कि मैं अपनी बात जारी रखूं। तो हालात-ए-मंजर यह है कि यूजीसी केयर में शामिल अधिकतर पत्रिकाएँ (हिंदी की पत्रिकाएँ) डंके की चोट पर धंधा कर रही है। एक लेख छापने का रेट लगभग 2000 रूपये तय कर रखी हैं। यदि आपकी लेख लिखने की योग्यता नहीं है तो भी आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है; इन पत्रिकाओं द्वारा ‘रेडी टू सेल’ वाली व्यवस्था भी है, मतलब, लेख भी तैयार किया हुआ मिल जायेगा, बस 5000 तक होने चाहिए आपकी जेब में। तो चलिए, यहाँ भी थोड़ा सा गणित का सहयोग ले लेते हैं- एक ऐसी ही पत्रिका है जिसके एक अंक में तक़रीबन 65 शोध-आलेख प्रकाशित हुए हैं। यदि एक आलेख की कीमत 2000 है तो 65 का गुणा करने पर उक्त पत्रिका ने एक लाख तीस हजार रूपये का सीधा धंधा किया। प्रकाशन के बाद एक प्रति की कीमत 300 रूपये अलग है। यहाँ भी यदि एक अंक की 500 प्रतियां भी बिकती हैं तो प्रकाशन का खर्च इसी से निकल जायेगा। अब अनुमान लगाइए कि ऐसी पत्रिकाएँ शोध की नैतिकता और गुणवत्ता का कितना ख्याल रखती होंगी !

कुछ तो ऐसी पत्रिकाएँ हैं जो किसी भी लेख को अपने पूर्व प्रकाशित अंक में कभी भी शामिल कर लेती हैं। हाल ही में बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की तरफ से सहायक प्राध्यापक के लिए मांगे गए आवेदन की अंतिम तिथि तक ऐसी पत्रिकाओं ने काफी बेहतर प्रदर्शन करते हुए अच्छा व्यापार किया। प्रमाण के लिए लेखक द्वारा मेल किये गए लेख का समय और पत्रिका के अंक में शामिल लेख के समय से मिलान किया जा सकता है। लेकिन यहाँ सवाल तो यह है कि इतनी गहनता से जाँच-पड़ताल आखिर करेगा कौन? ‘केयरभी तो केयरकरने में लगा है।   

अब यहाँ पर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पत्रिकाएँ ऐसा करती क्यों हैं? तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि- बिना किसी आर्थिक मदद के शोध-पत्रिका निकालना गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं है। पहले की तुलना में पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या का ग्राफ काफी नीचे आया है। इंटरनेट और सूचना क्रांति के बाद दुनिया भर की सामग्री फ्री में उपलब्ध है। धीरे-धीरे लोग मोबाइल की दुनियां में घुसते जा रहे हैं। रहन-सहन और पढ़ने-लिखने की शैली में लगातार बदलाव देखा जा सकता है। किसी के पास समय नहीं है कि अपनी ढ्योरी के सामने कुर्सी लगाकर इत्मिनान से किसी शोध-पत्रिका का अध्ययन करे। संपादक के रूप में काम करते हुए मुझे लगभग 6 वर्ष हो गए, अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि लेखकों के लिखे हुए को अंतिम रूप से अवलोकन हेतु वापस उनके पास भेजने पर अपने लेख को भी वे नहीं पढ़ते। पिछले एक अंक में भोजपुरी सिनेमा पर एक नामी प्रोफेसर ने लेख भेजा था, अंतिम रूप से अवलोकन हेतु उनका वह लेख उन्हें मेल किया तो उनका इगो-हर्ट हो गया, बोले- छापना हो तो छापिये नहीं तो कोई जरुरी नहीं है। ऐसे प्रोफेसर खुद को देव-तुल्य समझते हुए सूरज के सातों घोड़ो में अपनी गिनती करना नहीं भूलते सच तो यह है कि नौकरी और प्रमोशन के लिए API का तकाजा न हो तो कौन ऐसा है जो शोध-पत्रिकाओं में अपना लेख भेजेगा ? जबकि फेसबुक पर ही अपने विचार लिखकर तारीफ़ बटोरी जा सकती है। ऐसे में यूजीसी केयर द्वारा पत्रिकाओं की केवल एक सूची बना देने से ही शोध की नैतिकता और गुणवत्ता तय नहीं हो जाती। जाहिर सी बात है कि जब कोई पत्रिका यूजीसी केयर में शामिल की जाती है तो उसकी गुणवत्ता जरुर देखी जाती होगी! तो, ऐसी गुणवत्ता वाली पत्रिकाओं के लिए सरकार द्वारा क्यों न आर्थिक मदद मुहैया कराई जाए? जहाँ एक तरफ शोध और अनुसन्धान के लिए करोड़ों खर्च कर दिए जाते हैं वहाँ क्या थोड़ी राशि शोध-पत्रिकाओं के लिए नहीं खर्च की जा सकती है?            

यहाँ पर आपका सवाल हो सकता है कि यदि मेरा यह दावा सही है तो पत्रिकाओं के नाम का खुलासा क्यों नहीं कर देते? तो सुनिए, किसी बात का खुलासा करना या प्रमाण देना मेरी जिम्मेदारी नहीं है, इसी की निगरानी के लिए यूजीसी केयर बना है, वह जाँच करे। क्या उसकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती? फिर भी एक क्लू जरुर दे सकता हूँ यदि सच में इस बात का खुलासा करना है तो केयर में शामिल (केयर के पहले से प्रतिष्ठित और पूरी ईमानदारी से निकलने वाली पत्रिकाओं को छोड़कर) उन सभी पत्रिकाओं के संपादकों/प्रकाशकों के बैंक का स्टेटमेंट निकलकर देख लीजिये, सारा सच सामने आ जायेगा।

यह अंक -

            पत्रिका का यह 23वां अंक है। इस अंक में शोध-आलेखों, कहानियों और कविताओं के अलावा तीन महत्त्वपूर्ण और चर्चित कृतियों की समीक्षा भी शामिल है। विषयों की विविधता ही इस अंक की विशेषता है। इस अंक में रचनात्मक सहयोग देने वाले सभी साथियों का आभार। बाकी, इस अंक का सही मूल्यांकन तो सुधी पाठक ही कर सकते हैं।    


-महेश सिंह    

Post a Comment

0 Comments