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संस्कृतियों की अन्तर्भुक्ति पर शोधपरक उपन्यास- रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़

“पुई के सवाल पर देवकी सोखा गंभीर हो गये, कुछ क्षण मौन रहने के बाद बोले- ई दुनियाँ विश्वास पर टिकी है बाबू! आप पढ़े लिखे लोग को जितना विश्वास अपनी किताब, वेद-शास्तर पर है, उतना ही मुझे वामति माई पर है।”
अचल पुलस्तेय के उपन्यास “रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़” की शुरुआत सुदूर पूर्व मिजोरम निवासी जेएनयू की शोध छात्रा लल्लीम पुई के इस सवाल से होती है। जिसका जवाब भोजपुरी इलाके के एक गाँव तप्पाडोमागढ़ के लोक आस्था केन्द्र वामाई माई देवगढ़ के अनपढ़ सेवक देवकी सोखा शिक्षित लोगों की आस्था और शास्त्रों  पर सवाल उठाते हुए अपनी आस्था के प्रतिफल से देते हैं। सवाल आगे बढ़ता है और चीनी नाक-नक्श की वजह से मिजो लड़की के भारतीय होने के संदेह तक पहुँच जाता है। जिसके जबाब में पुई अपने सहयोगी संजय से कहती है- “संजय! हम भी उतने ही भारतीय हैं, जितने तुम हो, दोनों की एक समस्या यह है, कि हम भारत की समग्रता से अनभिज्ञ हैं। हमें भी भारतीय होने पर उतना ही गर्व है जितना तुम्हें, पर हिन्दी भाषी हमारी भारतीयता को स्वीकार नहीं करते है, इसीलिए रिसर्च के लिए मैंने नार्थईस्ट के बजाय हिन्दी भाषी प्रदेश के गाँव को चुना है। जिससे मैं विशाल भारत को समझ सकूँ, भारतीय होने की सार्थकता सिद्ध कर सकूँ।”
बात सार्थकता की है तो, उसे सिद्ध करने में लल्लीम पुई एक भोजपुरिया गाँव का सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, आर्थिक अध्ययन करने में विविध संस्कृतियों के जंगल में पहुँच जाती है। फिर सवाल दर सवाल और समाधान में कथा आगे बढ़ते हुए तप्पोडोमागढ़ से मिजोरम के गाँव गुलसिल पहुँच जाती है।
सामान्यतः भारत और भारतीय संस्कृति की चर्चा करते समय महाकाव्यों-पुराणों पर आधारित एक आदर्श संस्कृति पर हम ठहर जाते है। यदि  इससे आगे बढ़े तो प्रान्तीय, भाषाई, संस्कृतियों से आगे नहीं बढ़ पाते हैं, परन्तु डॉ. पुलस्तेय के उपन्यास “रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़” पढ़ने पर लगता है कि भारतीय संस्कृति कोई एक संस्कृति न होकर अनेक संस्कृति दर संस्कृतियों का समुच्चय है। जिसमें करीब दो तिहाई संस्कृतियाँ कथित भारतीय संस्कृति के आवरण से ढक दी गयी हैं। यही बात इस कृति के शीर्षक को सार्थक करती हुई इसे वास्तव शोध प्रबंध बना देती है।  

पुलस्तेय ने भोजपुरी अँचल के एक गाँव तप्पा डोमागढ़ के बहाने भोजपुरी संस्कृति में अन्तर्निहित अनेक कुल संस्कृतियों का रेशा-रेशा उघाड़ देते हैं। सबसे अहम बात यह है कि उपन्यास की नायिका मिजोरम की आदिवासी लड़की लल्लीम पुई को भोजपुरी संस्कृति की अध्येता के रुप प्रस्तुत कर इसे भोजपुरी-मिजो संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन बनाते हुए समग्र भारत की विविधता का दर्शन करा देते है। 
डॉ. अचल पुलस्तेय गैर साहित्यिक विधा आयुर्वेद चिकित्सक है शायद इसीलिए देश-समाज की नब्ज पकड़ कर आदिम काल से आज तक की विविध कुल-कबीलों के सांस्कृतिक अन्तर्भुक्ति की जटिलताओं को दृश्यात्मक कथा के रुप में प्रस्तुत कर दिया है। रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़ एक परिक्षेत्र विशेष के निवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश ही नहीं डालती, उनके सामाजिक इतिहास पर शोध के नये द्वार भी खोलती है। 
लेखक की दृष्टि से गाँव-जवार, खेत-खलिहान, ताल, पोखर जब पाठक देखता है तो उसके समक्ष एक खूबसूरत भारत होता है, विविधता एक लयबद्धता में उपस्थित होती है। कथाकार के अनुसार “असल में अभी तक के सामाजिक अध्ययनों में सूक्ष्म अन्तर्भुक्त संस्कृतियों और परम्पराओं की उपेक्षा की गयी है। नगरीय, शास्त्रीय संस्कृतियों में उन्हें समाहित कर जातीय-वर्गीकरण कर देखा जाता रहा है। जबकि यहाँ प्रत्येक कुल परिवार की अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं, जो कालगति से एक दूसरे में अन्तर्भुक्त हो गयी हैं। जिसके गहराई में जाने पर वर्ण व्यवस्था की अवधारणा सांस्कृतिक के बजाय राजनैतिक दिखने लगती है।”
लेखक ने वर्णव्यवस्था के इतिहास और छूआ-छूत, भेद-भाव के शिकार सांस्कृतिक कुलों की स्वतंत्र उद्दात् संस्कृति और अन्तर्भुक्ति प्रक्रिया को अद्भुत कलात्मक तरीके से वर्णन किया है, जो हीनता से मुक्त कर गर्वबोध का कारक बन जाती है।
संस्कृतियों के अन्तर्भुक्ति का यह विस्तार सम्पूर्ण भारत में देखा जा सकता है। यही प्रक्रिया है जो समग्र भारत को एक सूत्र में बाँधती है। सुदूर पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति भोजपुरी भाषी जीवन में किस तरह घुल मिली हुई है, इसकी नजीर देवकी सोखा के इस लोक मंत्र में दिखती है-
           “कामरु देश कमीक्षा देवी जहाँ बसे ईस्माईल जोगी,
            ईस्माईल जोगी की लगी फुलवारी 
            फूल लोढ़े लोना चमारिन
            वामति लेई वोहि फूल की की सुबास
            कल्यानी कल्यान कर ।
           सारा धरती आकाश आग हवा नीर क्षीर बसे तुहीं माई
           दुहाई कमरु कमिक्षा माई की,दोहाई लोना चमारिन की ।”
यह शाबर मंत्र है, अर्थात शबर, आदिवासी का मंत्र, जिसमें मुसलमान ईस्माइल जोगी देवी कामाख्या के सिद्ध है, तो अछूत कही जाने वाले कुल की लोना चमारिन भी दिव्य शक्ति से सम्पन्न है।
इस तरह समाज में हेय समझे जाने वाले वर्ग और कृत्य की ऐतिहासिकता का जिस प्रकार उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है, उसे शोध संदर्भ के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
वर्तमान समस्याओं, बेरोजगारी, बीमारी, महामारी, सामाजिक, पारिवारिक विघटन, गाँवों से पलायन, शहरीकरण, सिस्टम से हताशा के कारण दैवीय आस्था का दृश्यात्मक वर्णन इस उपन्यास को भोजपुरी-मिजो लोक संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए विषमता और स्त्री-दलित विमर्श, को नया आयाम देती देश-दुनियाँ के वर्तमान परिदृश्य का दस्तावेज बना देती है।
इसीलिए इस अध्ययन परक उपन्यास की नायिका मिजो शोधछात्रा लल्लीम पुई, संजय, देवकी सोखा, फेंकू, जैसे यथार्थ लगते है। लल्लीम पुई भले मिजोरम की हो पर देवकी, फेंकू, रिंकुआ, माट्साब, लाला, मिसराइन, चम्पा, काजल, मंजु, संजय, मेजर रघुनाथगिरी, प्रधान शिवचरन यादव, लालबाबा, वामाचार्य, तुफानी सोखा आदि सभी आपके आस-पास बदले नामों से मिल जायेंगे। थोड़ी कोशिश करने पर किसी यूनिवर्सिटी में लल्लीम पुई भी मिल जायेगी, जहाँ शिक्षा और शोध के विडम्बनाओं से रूबरु करा देगी।
दर असल तप्पाडोमागढ़ देश का घटक नहीं प्रतिनिधि है। जैसे दुनियाँ के हर देश-प्रदेश, जनपद की अपनी सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, आस्था और परम्परायें हैं वैसे ही भोजपुरिया गाँवों में जातियों के नाम पर बसे टोलों की अपनी-अपनी सभ्यता, संस्कृति, आस्था और परम्परायें हैं। इस विविधता के बावजूद जैसे देश, प्रदेश, जनपद एक दिखते है, वैसे ही ये गाँव भी एक दिखते हैं, परन्तु गहराई में जाने पर विविध लोक कुल संस्कृतियों का स्वतंत्र अस्तित्व उभर आता है। जिसे तप्पा डोमागढ़ के बहाने अचल पुलस्तेय ने सहेजने का प्रयास किया है। शास्त्रों से इतर लोक संस्कृतियों का एक व्यापक संसार है। भारतीय संस्कृति की आरोपित चादर को चीरकर विविधता के तहखाने में उतरने पर, इतिहास बनते खेत-खलिहान, बाग, नदी, जंगल, गीत, देवकी सोखा का पचरा, मोनक्का बुआ का फगुआ, देवकुरि, कुलदेवी, राहबाबा, काशीदास बाबा, जोगीबीर, डीह, काली, बकरे की बलि, दुबई का फोन, हरिकिर्तन, मृदंग, हुरका, नगाड़ा, तिलक, ब्याह, श्राद्ध, बर्थडे की भव्यता, कर्ज, शराब के अंग्रेजी-देशी सरकारी ठेके, चुनावी तिकड़म, अवैध महुए की दारु, पुलिस, आबकारी, दारु से देवताओं का तर्पण, दुकानें, डीजे, पंचायत, धोबिअऊ, गोंड़ऊ, फरुआही, विदेशिया नाच, महामारी, मुकदमा, आरक्षण विवाद, भूतों का अखाड़ा, इन्टर्नेट, फेसबुक, ह्वाटस्अप, स्कूटी, बोलेरो, ट्रैक्टर, भेंड़, बकरी, स्कूल, यूनिवर्सिटी, पत्रकारिता, टीवी,पूर्व सैनिक की पीड़ा, बेरोजगारी, अस्पताल, स्कूल, पोखरा, मंदिर, मस्जिद, चर्च, मेला, खिचड़ी, होली, मिजो पर्व पावलकूट, चपचारकूट, अफसर बनने में असफल रिंकुआ का पागलपन, लालबाबा, वामाचार्य का बौद्धिक, आध्यात्मिक विमर्श, हिंग्लिस, हिन्दी, ठेठ भोजपुरी आदि सब एक साथ चलते दिखते हैं। 
वामतिमाई, कुलदेवी, डीह जैसे ग्राम देवताओं की पूजा परम्पराओं को पढ़े-लिखे विकसित लोग उपेक्षित करते जा रहे हैं, परन्तु उन्हें केद्र बना कर तीन सौ पृष्ठ लिखना संभवतः लोकस्थापना का पहला कदम है।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसकी नायिका अपने कार्य से प्रेम करती है, किसी राजकुमार या किसी भोले भाले नायक की तलाश नहीं है उसे। अमूमन ऐसी औपन्यासिक कृति भारतीय भाषाओं में दुर्लभ है, जिसका मुख्य बिन्दु प्रेम न होने के बावजूद एक साँस में पढ़ने को विवश करती है।
भारत और भारत को लोगों को भली भाँति समझने के लिए लोक को अच्छी तरह बूझना भी आवश्यक है और इसके लिए कोटि जन की कोटि जीवन-परंपराओं को जानना भी आवश्यक है, अतीत को समझने के लिए नहीं, वर्तमान-भविष्य को सँवारने और लोकतन्त्र को पुष्ट करने के लिए मिजोरम की लल्लीन पुई जैसी हजारों शोधार्थियों-शोध परियोजनाओं की जरूरत है। 
International Society for Folk Narrative Research (ISFNR) द्वारा आयोजित कांग्रेस में चालीस देशों के लोक अध्ययन विशेषज्ञों ने बार-बार कहा कि There are so many nationalities in India अर्थात भारत में बहुत सारी राष्ट्रीयताएँ हैं,जो पहले संस्कृति की एक धारा को वे राष्ट्रीयता मान कर चल रहे थे, यदि वे "रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़" को पढ़ेंगे तो देखेंगे कि एक भोजपुरी अंचल में ही संस्कृतियों का मेला लगा है। 
इस औपन्यासिक कृति की शुरुआत तो गाँव से होती है, अंत होते-होते पर देश-दुनियाँ में फैल जाती है। शोधपूर्ण पुस्तक भोजपुरी-मिजो संस्कृति के अध्येताओं के लिए उपयोगी हो सकती है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और देश के पूर्वोत्तर की लोक संस्कृति को एक पुस्तक में समेटकर दृश्यात्मक भाषा शैली में प्रस्तुत करना वास्तव में कठिन काम है।
भोजपुरिया अंचल में लोकजीवन और आस्था का ऐसा औपन्यासिक विश्लेषण विकास और आधुनिकता के बर खिलाफ ढेर सारे सवाल भी खड़ा करता है। ग्रामीण जीवन के क्षरणशील मूल्यों का सजीव चित्र और उन तत्वों की तलाश जो मिज़ोरम और भोजपुरी जीवन में समान रूप से उपस्थित है, जिसके अध्ययन के लिए पृष्ठ भूमि तैयार करती है यह किताब । नायिका पुई की भाव विह्वल विदाई विकसित वर्ग की संवेदना पर ढेर सारे सवाल भी छोड़ जाती है। यह कहानी इस उत्तर आधुनिक भारत में समरसता सामुदायिकता के अंत का गाथा भी है। विघटन के दौर में ऐसी कृति का आना एक आशा की किरन जैसी है। राष्ट्र की एकता की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष पहचानने के लिए विविधता को जानना  आवश्यक है और इसके लिए “रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़” जैसी कृतियाँ महत्वपूर्ण है। 

किताब-रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़
लेखक-डा.आर.अचल पुलस्तेय
मूल्य-600 रू पेपर बैक
प्रकाशक-नम्या प्रेस 213 वर्धन हाउस 7/28, 
अंसारी रोड,दरियागंज,दिल्ली

समीक्षक- उद्भव मिश्र 
देवरिया, उत्तर प्रदेश
(*वरिष्ठ समीक्षक एवं जनसंस्कृति मंच के उत्तर प्रदेश पार्षद है )

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