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मामूली चीजें वास्तव में मामूली नहीं होतीं

छोटी-छोटी बातों को लेकर दुखी होना मनुष्य का सामान्य स्वभाव है। खुश होना भी इसी के दायरे में आता है। मतलब यह कि सुख और दुख जीवन के सहचर हैं। यह दोनों भाव मनुष्य में कभी-कभी व्यक्तिगत स्तर पर उभरते हैं तो कभी-कभी पारिवारिक स्तर पर। सामुदायिक स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर इसका उभार विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ऐसी विशेष परिस्थितियाँ कई प्रकार की होती हैं। यथा; व्यापक स्तर पर नाश और निर्माण। लेकिन विशेष परिस्थितियों वाले लक्षण जब सामान्य अवस्था में दिखाई देने लगें और गाहे-ब-गाहे कोई व्यक्ति इसे प्रकट करने की चेष्टा करे तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति आसानी से किसी को भी सम्मोहित करने की कला में पारंगत हो चुका है। आमतौर पर यह गुण अभिनय करने वाले कलाकारों में देखा जाता रहा है। सम्मोहन की इसी कला की वजह से अभिनेता दर्शकों के बीच मे लोकप्रिय होते हैं। 

यह तो हुई एक बात, दूसरी बात समय को लेकर है। समय इस सृष्टि की सबसे ताकतवर चीज है। यह समय की ही ताकत है कि ऊपर बताया गया गुण अभिनेताओं के अंतस्थल से निकलकर नेताओं और न्यूज़ चैनलों के एंकरों की ललाट पर आकर बैठ गया है। समय की इस ताकत ने उक्त गुण के उद्देश्य में भी अप्रत्याशित रूप से घाल-मेल किया है। पहले का उद्देश्य आमजन का मनोरंजन था लेकिन वर्तमान में जनता को मूर्ख बनाकर आए दिन लम्पटई करते हुए ताण्डव करना भर रह गया है।

एक दिन मेरे एक मित्र एक घटना सुनाने लगे। आइये सुनते हैं, उन्हीं की जुबानी- चूहा मारना मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। साँप या बिच्छू को मारने से मैं सदैव परहेज करता आया हूँ। कहने का मतलब यह है कि- 'जीवों की हत्या करना मेरी सोच से भी बाहर की चीज है।' लेकिन एक मिनट, रुकिए यहाँ ! हाँ, तो इससे यह मत समझ लीजिये कि मैंने कभी चूहा, साँप और बिच्छू नहीं मारा है। अरे भई, आत्मरक्षा भी तो कोई चीज होती है ! है कि नहीं ! एक दो बार तो इसी आत्मरक्षा के चलते चूहों को झाड़ू से पीट-पीट कर मार डाला। इसके लिए दुःख तो हुआ लेकिन उतना नहीं। मुझे याद है कि एक या दो घण्टे बाद मैं भूल गया कि मैंने चूहा मारा है। लेकिन कल की घटना ! ओह ! क्या बताऊँ... करुणा, दया, दुख सब एक साथ ! सच कहूँ तो, अभी तक उससे उबर नही पाया हूँ।

दरअसल हुआ यह था कि मेरे घर में चूहों ने आतंक मचा रखा था। पत्नी और बच्चे यहाँ थे तो यह मेरी बहुत बड़ी चिंता नहीं थी। आजकल वे गाँव गए हैं इसलिए अकेले ही जीवन कट रहा है। परसों रात में किचन से किसी बर्तन के गिरने की आवाज आई। जाकर देखा तो चूहों की संसद चल रही थी, मुझे देखते ही खर-खर-खर-खर भागे। वहीं खड़ा होकर सोचने लगा- 'आखिर इनको कैसे भगाया जाय यहाँ से !' झाड़ू से मारना तो बिल्कुल भी नहीं चाहता था। अचानक दिमाग में आया कि बाजार में इनको चिपकाने वाला कोई गोंद मिलता है। दूसरे दिन बाजार से उसे खरीद लाया और शाम को किचन में रख दिया। चूहों को आकर्षित करने हेतु एक-दो मुंगफली के दाने भी उसपर रख दिये। 

रात का भोजन करके अभी सोने ही जा रहा था कि चीं-चीं-चीं की आवाज सुनायी दी। मन में खुशी की एक लहर सी दौड़ पड़ी- 'लगता है एक ठो धरा गया।' सोचने लगा - 'यह तो बढ़िया है घर लाकर जगह पर रख दीजिये, चूहे अपने आप चिपक जाएंगे।' आत्मा को सुकून मिलता हुआ महसूस किया। थोड़ी देर बाद मन हुआ- 'जरा देखूँ तो, किस हालत में है वह', इसलिए किचन में देखने चला गया। गोंद में दो चूहे चिपके हुए छटपटा रहे थे। 'चलो, मुक्ति मिली इनसे' सोचकर मन में बहुत प्रसन्नता हुई। विचार आया कि रातभर छोड़ दूँ तो घर के सारे चूहे एक साथ ही इसमे चिपक जाएंगे। इसलिए बिस्तर पर सोने चला आया।



भाई साहब क्या बताऊँ आपको, मैंने सोचा कि आसानी से नींद आ जायेगी लेकिन नींद की जगह बार-बार गोंद में चिपके उन दोनों चूहों का दृश्य मानस पटल पर उभरने लगा। उसमें उनकी कातर भाव लिए आँखें दिखीं। ऐसा लगा, मानो मुझसे वे रहम की भीख माँग रहे हों और मैं किसी क्रूर शासक की तरह उनको तड़पा-तड़पाकर कर सजाएँ मौत दे रहा हूँ। मुझे महसूस हुआ कि उनकी जगह यदि मुझे किसी ने उसी तरह गोंद में चिपका दिया होता तो ? मैं उनके दर्द और तड़प से दुखी होने लगा। मुझे अपराध का बोध हुआ- ओह ! यह मैंने क्या कर दिया..! एक बार फिर से किचन की तरफ भागा। इस बार उन्हें बचाने के उद्देश्य से गया। जाकर देखा तो दोनों चूहे अपनी शक्तिभर गोंद से छुटकारा प्राप्त करने हेतु प्रयास करते-करते थक-हारकर शांत हो चुके थे। मेरी आहट पाकर फिर से चीं-चीं कर हिलने-डुलने लगे। अब उनके शरीर का एक हिस्सा गोंद में पूरी तरह चिपक चुका था, पूँछ भी। जब उन्हें अपने हाथ से छुड़ाने का प्रयास किया तो वे और जोर-जोर से चीं-चीं करने लगे। और अधिक जोर लगाने पर लगा कि उनकी चमड़ी उनसे अलग हो जाएगी तो डर के मारे छोड़ दिया। चमड़ी उखड़ने की कल्पना से ही मेरी आत्मा काँप उठी। ओह ! इतनी क्रूरता ! पता नहीं कैसे इतिहास में क्रूर शासक अपने गुलामों की चमड़ी उधेड़ते होंगे ? दोनों चूहों की रूह में समा चुकी मौत की दहशत को मैंने महसूस किया। अपराधबोध में खुद को धिक्कारा और उन्हें वैसे ही छोड़कर वापस बिस्तर पर आ गया।

सच कहूँ तो मुझे बड़ी दया आ रही थी उनपर। मेरे अंदर का इंसान दुखी हो रहा था। उस समय बाजार से खरीदकर लाया गया वह गोंद मुझे पूँजीवाद का एक ऐसा भयानक अस्त्र लगा जो बड़ी आसानी से अपनी जाल में फँसा लेता है और आहिस्ता-आहिस्ता तड़पाकर मारता है। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा मैं एक तरफ सोने का प्रयत्न कर रहा था तो दूसरी तरफ हृदय, मस्तिष्क का सहयोग लेकर उन्हें बचाने की युक्ति ढूंढने में मशगूल था। अंततः कोई युक्ति नहीं सूझी तब मस्तिष्क ने हृदय से कहा- ‘जब उनकी मौत तय ही है तो क्यों न जल्दी मौत दे दी जाय।‘ लेकिन हृदय अब दूसरी गलती नहीं करना चाह रहा था। इस लिए न चाहते हुए भी मैं एकबार फिर से बिस्तर से उठकर किचन में गया, रात के दो बज रहे थे। चीं-चीं-चीं की आवाज अब कराहने जैसी हो गयी थी। उन्हें गोंद सहित उठाया और खिड़की खोलकर घर के बाहर फेंक दिया। और इस तरह काफी देर बाद जब दुःख की तीव्रता कम हुई तब चैन से सो पाया।“

उपर्युक्त घटना में देखा जा सकता है कि दुःख का वास्तविक कारण सहृदयता और व्यक्ति के आपसी संबंधों की निकटता है। यही बात सुख के लिए भी लागू होती है। यदि गौर फरमाएंगे तो सहज ही पता चलेगा कि चूहों को घर से बाहर फेक देने के बाद मित्र का दुःख कम हुआ। जाहिर है उस समय उसकी करुणा चूहों के प्रति थी। लेकिन इससे यह नहीं प्रमाणित होता है कि वह बाकी के सभी चूहों के लिए उतना ही दुखी होगा। इसी तर्ज पर हम देख सकते हैं कि घर या आपसी संबंधों से जुड़ी घटना से हमें ज्यादा से ज्यादा दुःख होगा, टोला-मोहल्ला, गाँव-जवार और जाति-समुदाय से जुड़ी घटना से हमें थोड़ा कम दुःख होगा और जिले व राज्य-देश से जुड़ी घटना से और थोड़ा कम दुःख होगा। यहाँ सम्भव है कि सबके लिए तात्कालिक तीव्रता कुछ समय के लिए समान हो लेकिन दुःख सबसे ज्यादा देर तक वहीं टिका रह सकता है जहाँ हृदय की निकटता होगी।

आज के समय में यह सामान्य सी बात हो चुकी है कि अपनी जाति और धर्म को लेकर हमारे माननीय नेतागण किसी के साथ हत्या, बलात्कार आदि की घटना होने पर दौड़े-भागे चले आते हैं, उनके प्रति अपनी संवेदनाएँ प्रकट करते हैं, उनके दुःख से दुखी होते हैं। इसी तरह न्यूज़ चैनलों के एंकरों को भी दुखी होते हुए देखा जा सकता है। वैसे उनके दुख की तीव्रता को मापने का पैमाना अभी इस कायनात ने इजाद नहीं किया है, लेकिन उनके चिघाड़ने की आवाज सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कितने दुखी होते होंगे। बहरहाल मैं कभी-कभी सोचता हूँ क्या वे सच में दुखी होते होंगे ? या महज नौटंकी करते हैं ? अपने आपको शत-प्रतिशत सही होने का दावा तो नहीं कर सकता लेकिन उनका दुःख मुझे नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं लगता।

अपने आपको हिन्दुओं का ठेकेदार घोषित किये नेता पाकिस्तान के हिन्दुओं के साथ घटी किसी घटना से दुखी तो होते हैं लेकिन दलितों के साथ होता हुआ अत्याचार उन्हें नजर नहीं आता। उन्हें झारखण्ड की अंकिता के साथ हुई घटना के लिए दुखी होते हुए देखा जा सकता है और यह सही भी है ऐसी किसी भी घटना के लिए प्रत्येक मानव को दुखी होना चाहिए लेकिन कुशीनगर की अंजू सिंह के लिए उनमे से किसी की आवाज का  न निकलना उनको संदेह के दायरे में खड़ा करता है। हर दिन तमाम घटनाएँ हो रही हैं, इसे आप खुद भी देख सकते हैं, इसमें ज्यादा मेहनत की जरुरत नहीं है। आपको सिर्फ दो-तीन की वर्ड गूगल पर टाइप कर के सर्च करना है; चाकू से गोदकर हत्या, दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या, सामूहिक बलात्कार, रेप इत्यादि; हर दिन का सारा डिटेल आपके सामने होगा। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है कि क्या वे तथाकथित ठेकेदार इन सभी घटनाओं के लिए दुखी होते होंगे ? शायद नहीं ! यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यही बात इस्लाम या अन्य धर्म के ठेकेदारों पर भी लागू होती है।   

इसी तरह अभी हाल ही में दिल्ली के एक नेता मुसलमानों के सम्पूर्ण बहिष्कार की बात करते हुए नजर आये। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि यदि वे मांसाहारी होंगे तो जाहिर है किसी समारोह, घर या होटल में तो खाते ही होंगे, ऐसे में क्या वे बता सकते हैं कि उस चिकन या मटन को किसने काटा है ? जो कुर्ता-पजामा वे पहने हैं क्या वह सनातनी पहनावा है ? और भी कई छोटे-छोटे सवाल हैं जो ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए।

कुछ ऐसी ही हालत आजकल के न्यूज़ चैनलों के एंकरों का है। उदाहरण के तौर पर ‘न्यूज़ इण्डिया 18’ के एंकर अमन चोपड़ा और अमिश देवगन का जिक्र करना चाहूँगा। एक फिल्म आई है आदिपुरुष, आजकल इसको लेकर ये दोनों एंकर रायता फैलाये हुए हैं। अमन चोपड़ा अपने एक डिबेट में रावण को अहंकारी, अत्याचारी और बुराई का प्रतीक बताते हैं तो अमिश देवगन उसे सबसे बड़ा ब्राह्मण, विद्वान और ज्ञानी साबित करने पर तुले हुए हैं। एक ही चैनल के दो कार्यक्रमों में दिखाई देता यह विरोधाभास आखिर किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए है। फिल्म के पात्रों के पहनावे और हुलिए को लेकर ये दोनों बहुत दुखी हैं। होना भी चाहिए आखिर यह अपनी संस्कृति और विरासत के साथ खिलवाड़ करने का मामला है। लेकिन सवाल तो फिर भी बनता है- क्या रामानंद सागर ने रावण और हनुमान को देखा था जो उनका हुलिया बनाकर लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘रामायण’ में दिखाया था ? सवाल तो यह भी बनता है कि अमिश देवगन के उसी डिबेट में एक वक्ता सीता और सनी लियोनी की तुलना करते हुए अपनी बात रखता है और अमिश देवगन इसका विरोध भी नहीं करते, ऐसा क्यों ?

ऐसी तमाम छोटी-छोटी चीजें हैं जिन्हें नोटिस किया जाय तो हजारों पृष्ठों की कई किताबें तैयार की जा सकती हैं। अभी तक के लिए इतना ही।

           

 

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