साहित्य, समाज, संस्कृति और सिनेमा का वैचारिक मंच

Thursday, January 12, 2023

युवाओं के मसीहा : स्वामी विवेकानंद

भारत में न जाने कितने युवा पैदा हुए, लेकिन ऐसा क्या था उस युवा में जिसके जन्मदिन को हम युवा दिवस के रुप में मनाते हैं। या यूं कहें कि उसने ऐसे कौन से कार्य किए जिससे वह आज भी हम युवाओं के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। जब कोई व्यक्ति अपने समय की समस्याओं से सीधे टकराकर मानवता के लिए पथ प्रदर्शित करने का कार्य करता है तो वह चिरस्मरणीय बन जाता है। ऐसे समय में जब दुनिया हमें नकारात्मक नजरिए से देख रही थी, हम उसके लिए अशिक्षित-असभ्य थे। तब उठो जागो और लक्ष्य तक पहुंचे बिना न रुको का नारा देकर भारतीय जनमानस में नवचेतना का संचार करने वाला वहीं युवा था, जिसे आगे चलकर दुनिया ने स्वामी विवेकानंद के नाम से जाना।

            भारतीय धर्म, दर्शन, ज्ञान एवं संस्कृति के स्वर से दुनिया को परिचित कराने वाले युवा ही हम सभी का प्रेरक हो सकता है। अपनी अपार मेधा शक्ति के चलते उसने न केवल अमेरिकी धर्म संसद में अपनी धर्म-संस्कृति के ज्ञान का डंका बजाकर उसकी श्रेष्ठता को प्रमाणित किया, अपितु विश्व की भारत के प्रति दृष्टि में बदलाव को रेखांकित किया। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो स्वामी विवेकानंद का धार्मिक सम्मेलन में भाषण में भारत की स्थिति में उस समय परिवर्तन किया, जब संपूर्ण विश्व का दृष्टिकोण भारत के प्रति नकारात्मक था।”


आज भारत का हर युवा स्वामी विवेकानंद के शिकागो में दिए गए भाषण से परिचित है, लेकिन इतना ही नहीं उन्होने इससे इतर भी बहुत कुछ किया है जिस पर हमें दृष्टि डालनी चाहिए। हमें उनके साहित्य को पढ़ना चाहिए जिन्होंने कभी कहा था कि “पुस्तकालय महान व्यायामशाला है, जहां हमें मन को स्वस्थ करने के लिए जाना चाहिए। वास्तव में युवाओं के लिए पुस्तक मानसिक व्यायाम शाला ही है। स्वामी विवेकानंद को पुस्तकों से अतिशय प्रेम रहा और उनकी एकाग्रता के अनेक रोचक प्रश्न जो हमें यदा-कदा पढ़ने सुनने को मिलते रहते हैं। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि “खुद को कमजोर समझना पाप है” जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं कर सकते तब तक आप भगवान पर भी विश्वास नहीं कर सकते।

“मैं उस प्रभू का सेवक हूँ, अज्ञानी लोग जिसे मनुष्य कहते हैं” कि मान्यता वाले स्वामी विवेकानंद मानवता की सेवा व जन परोपकार की भावना से रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इससे जुड़े युवा शिक्षित संन्यासी भारतीय किसानों तथा मजदूरों के बच्चों को उन्हीं के गांव में रहकर शिक्षा देते थे, वह भी निःशुल्क। बदले में ग्रामवासियों को केवल उनके भोजन की व्यवस्था करनी होती थी। भारतीयों की आर्थिक स्थिति भी पर इनका ध्यान था। इसलिए युवाओं को उद्यमशील बनाना चाहते थे। इस प्रकार हम देखें कि स्वामी विवेकानंद कितने क्रियाशील थे, उनका मानना था कि यदि हमें सौ निष्ठावान कार्यकर्ता मिल जाए तो मैं भारत की कायापलट कर सकता हूं।” युवाओं की शक्ति की पहचान उन्हे थी। वे बराबर उनकी दशा-दिशा को सुधारने के लिए प्रयासरत रहे। इन्होंने नारियों के सम्मान की बात कही। उनका मानना था कि “बिना स्त्रियों की दशा में परिवर्तन किए हम विश्व कल्याण की बात नहीं कर सकते।” सर्वधर्म समभाव तथा वसुधैव कुटुंबकम का मूल मंत्र लेकर संपूर्ण विश्व में उसे व्याप्त करने वाले स्वामी विवेकानंद सभी धर्मों के लक्ष्य को एक ही मानते हैं। ठीक वैसे, जैसे सभी नदियों का लक्ष्य सागर में मिलना है, उसी प्रकार सभी धर्म हमें मनुष्यत्व की ओर ले जाते हैं। धर्मों की विविधता को भी वे उसी प्रकार से देखते हैं, जैसे विविध मार्गों के होने से यातायात की सुगमता।

शिक्षा को लेकर स्वामी विवेकानंद काफी चिंतनशील थे। उनका मानना है कि स्वस्थ मस्तिष्क में ही स्वस्थ शरीर निवास करता है। अतः शिक्षा को अर्जित करने के लिए मस्तिष्क का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। आज के गिरते शिक्षा स्तर का एक कारण सोशल साइट्स पर उपलब्ध कूड़ा-कचरा भी है, जो मानव मस्तिष्क की मेमोरी के बड़े भाग को कवर करके रखता है। शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता कि अभिव्यक्ति है।” स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि यदि शिक्षा का अर्थ सूचनाओं से होता तो पुस्तकालय संसार के सर्वश्रेष्ठ संत बन जाते, विश्वकोश ऋषि होते।वे युवाओं को ऐसी शिक्षा देने के पक्षधर रहे जो उनके मानस की शक्ति को बढ़ाकर उसमें उत्तम विचार पैदा कर सकें जिससे ये युवा स्वावलंबी बन सकें।

युवाओं के प्रेरक स्वामी विवेकानंद आत्ममंथन हेतु बराबर प्रेरित करते हैं। अपने दीपक आप बनों की मान्यता वाले स्वामी विवेकानंद का प्रसिद्ध कथन है कि दिन में एक बार व्यक्ति को स्वयं से मिलना चाहिए, वरना वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति से मिलने से वंचित रह जाएगा। आधुनिक युवा जब भी स्वामी विवेकानंद के समीप जाएगा, उनके विचारों पर दृष्टि डालेगा तो वह कभी भी खुद को हताश या निराश नहीं पाएगा या यह कहें कि उसे कभी भी खाली हाथ नहीं लौटना पड़ेगा। अतः हम सभी को विवेकानंद के विचार तथा उनके साहित्य को सँजोकर रखना होगा, जिससे हम बेहतर व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में अपनी समिधा को अर्पित कर सकें।


योगेश मिश्र (असिस्टेंट प्रोफेसर)

संपर्क : 6394667552

Share:

Wednesday, January 4, 2023

घुमंतू समुदाय की दुश्वारियां सामने लाता है ‘साँप’ उपन्यास

नवादी लेखक संघ (जलेस) समय-समय पर महत्त्वपूर्ण किताबों की समीक्षा-गोष्ठियों का आयोजन करता है अपनी नई सीरीज में जलेस ने ‘नदी पुत्र’ (रमाशंकर सिंह), ‘प्रेमाश्रम’ (प्रेमचंद) के बाद 11दिसंबर, को हरिकिशन सिंह सुरजीत सभागार,नई दिल्ली में रत्नकुमार सांभरिया लिखित ‘साँप’ उपन्यास पर समीक्षा-गोष्ठी का आयोजन किया|  गोष्ठी की अध्यक्षता कवि-आलोचक डॉ. चंचल चौहान ने की

अपने अध्यक्षीय संबोधन में चंचल चौहान ने "सांप" उपन्यास को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह घुमंतू समुदाय की कठिन जीवन स्थितियों और संघर्षों को आधार बनाकर लिखा गया है उन्होंने उपन्यास की वस्तु और शैली की प्रशंसा की चंचल जी ने कहा कि जिस घुमंतू समुदाय के पास कोई नहीं जाता उनके बीच रहकर, बारीकी से पर्यवेक्षण करके सांभरिया जी ने यह श्रमसाध्य कार्य किया है
वरिष्ठ कवि एवं आलोचक डॉ. एन. सिंह ने विमल मित्र और अमृतलाल नागर जैसे समर्थ कथाकारों के हवाले से कहा कि वे बहुत दिनों से किसी ऐसे दलित उपन्यास की तलाश में थे जो ‘खरीदी कौड़ियों के मोल’ तथा ‘बूँद और समुद्र’ जैसा हो एन. सिंह ने कहा कि ‘साँप’ उपन्यास भी अपनी सहज भाषा-शैली और यथार्थपरक दृष्टि के कारण पाठकों को अनायास अपना-सा लगने लगता है 
कथालोचक महेश दर्पण का मंतव्य था कि बिना घनिष्ठ परिचय के ऐसी भाषा नहीं लिखी जा सकतीशुरू से डेढ़ सौ पृष्ठों तक यह उपन्यास बहुत सधी और सहज भाषा में आगे बढ़ता है उपन्यास में स्त्री का बाहर निकलना महत्वपूर्ण है उपन्यास का मुख्य पात्र लखीनाथ सपेरा व्यक्ति से समाज की यात्रा कराता है यह डिटेलिंग का उपन्यास है उन्होंने इस उपन्यास के सम्पादन की ज़रूरत बताई 
वरिष्ठ कथाकार हरियश राय ने कहा कि कौतूहल या औत्सुक्य इस उपन्यास की विशेषता है अपने शुरुआती हिस्से में उपन्यास बहुत सधा हुआ है लखीनाथ धीरोदात्त नायक है वह विचलन का शिकार नहीं होता मिलन देवी और धर्मकंवर उपन्यास के सकारात्मक चरित्र हैं उपन्यास में यथार्थ से कल्पना की यात्रा होती है सपेरों की जीविका कैसे चलेगी, इस प्रश्न पर उपन्यास मौन है सपेरे अपना पेशा छोड़ने के बाद मजदूरी करने लगते हैं विजयदान देथा और अमरकांत की रचनात्मक भाषा से रत्नकुमार की लेखनी को समीकृत करते हुए हरियश राय ने कहा कि स्थानीयता ‘साँप’ उपन्यास की बहुत बड़ी खूबी है
आलोचक प्रेम तिवारी ने इस उपन्यास में विकसित प्रेम संबंध को कथा का प्राणतत्व बताया उन्होंने कहा कि मिलन देवी और लखीनाथ मिलकर भी नहीं मिल पाते, रचनाकार की यह ‘नैतिकता’ अखरती है साँप की विषयवस्तु नई लेकिन ढांचा पुराना है उपन्यास में आँचलिकता के पूरे लक्षण दिखाई देते हैं कथाकार डॉ. टेकचंद ने समकाल की रोशनी में उपन्यास की व्याख्या की उन्होंने कहा कि आज जिंदा को मारकर नकली की प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है दलितों, आदिवासियों पर होने वाली हिंसा का उल्लेख करते हुए टेकचंद ने कहा कि देश में देश बेगाना है उपन्यास में स्त्रियों का करेक्टर ठीक से गढ़ा गया है उच्च वर्गीय लोगों में कभी कभी मसाणियाँ बैराग पैदा होता है जैसे इस उपन्यास के सेठ-सेठानियों में है हाँ, मिलन देवी में यह भाव स्थायी रूप से आता है उन्होंने कहा कि उपन्यास में यूटोपिया- डिस्टोपिया का द्वंद्व ठीक से नहीं बन पा रहा है मिलन देवी समस्या का समाधान कर देती हैं| कई चरित्र सपाट भी हुए हैं
विमर्शकार डॉ. छोटूराम मीणा ने कहा कि उपन्यास का नायक लखीनाथ अपनी शर्तों पर जीने वाला व्यक्ति है सपरानाथ खल पात्र है| उन्होंने कहा कि पितृसत्ता घुमंतू जातियों में भी है लेकिन भिन्न प्रकार की उनके अनुसार यह उपन्यास क्रिमिनल ट्राइब एक्ट 1871 को ध्वस्त करता है उपन्यास में राजस्थानी के शब्द हैं और हरियाणवी के भी इन शब्दों से पठनीयता में बाधा नहीं आती आलोचक डॉ. सरोज कुमारी ने 35 अध्यायों और 400 से अधिक पृष्ठों में रचित इस कृति को स्त्री प्रधान उपन्यास बताया उपन्यास से साँपों की दिनचर्या सामने आती है| उपन्यास में देशज शब्दों की भरमार है जिससे दिक्कत होती है सरोज कुमारी ने कहा कि इस उपन्यास को पाठ्यक्रम में लगाया जाना चाहिए
इतिहासविद और आलोचक रमाशंकर सिंह ने कहा कि हमें दलित विमर्श से बाहर जाकर ‘साँप’ के बारे में बात करनी होगी घुमंतू जातियाँ धरती बिछाती हैं, आकाश ओढ़ती हैं यह मानवीय अनुभव जानने के लिये ही इतिहासकार साहित्य की तरफ आ रहे हैं उपन्यास के कवर पेज पर किए गये दावे कि यह हाशिए के समाज का पहला उपन्यास है आपत्ति जताते हुए वक्ता ने कहा कि पहले भी इस विषय पर कई कृतियाँ लिखी जा चुकी हैं रमाशंकर सिंह ने कहा कि मनुष्य की महानता की बिजली घूमंतू लोगों पर टूटी हैं, जानवरों पर ख़ास तौर से

‘साँप’ के लेखक रत्नकुमार सांभरिया ने अपने वक्तव्य में कहा कि जहाँ रांगेय राघव का ‘कब तक पुकारूँ’ उपन्यास करनट जाति पर, मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास कबूतरा जाति पर, मणिमधुकर का उपन्यास ‘पिंजरे में पन्ना’ गाड़िया लोहार जाति पर तथा शरद सिंह का उपन्यास ‘पिछले पन्ने की औरतें’ बेड़िया जाति पर केंद्रित है, वही ‘साँप’ उपन्यास सपेरा- कालबेलिया, कंजर, मदारी, कलंदर, कुचबंद, नट, बाजीगर, भांड-बहुरुपिया जैसी खानाबदोश-घुमंतू जनजातियों के सामूहिक वर्ग-संघर्ष का प्रतिफलन है इस संघर्ष में उनके जीव जानवर सहभागी होते हैं।
आभार ज्ञापन करते हुए जलेस के महासचिव डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि ‘साँप’ एक यादगार उपन्यास साबित होगा उपन्यास का मर्म नायक लखीनाथ सपेरा का यह उत्साह भरा और दर्द में डूबा कथन है, “साब हम, धरती बिछावां, आकास ओढ़ां, अपना पसीना से नहा लेवां अर भूख खाकै सो जावां” 
कार्यक्रम का संचालन बजरंग बिहारी ने किया संगोष्ठी में रेखा अवस्थी, संपत सरल, हीरालाल नागर, संदीप मील, रामधन गांगिया, सुशील उपाध्याय, हरेन्द्र तिवारी, शुभम, काजल आदि लेखक व शोधार्थी उपस्थित रहे 

प्रस्तुति- जनवादी लेखक संघ

Share:
COPYRIGHT © 2024 परिवर्तन वेब पोर्टल (ALL RIGHTS RESERVED). Powered by Blogger.

Total Pageviews

Followers

Slider image 1

Slider image 1
coba ahh