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Tuesday, October 11, 2022

मामूली चीजें वास्तव में मामूली नहीं होतीं

छोटी-छोटी बातों को लेकर दुखी होना मनुष्य का सामान्य स्वभाव है। खुश होना भी इसी के दायरे में आता है। मतलब यह कि सुख और दुख जीवन के सहचर हैं। यह दोनों भाव मनुष्य में कभी-कभी व्यक्तिगत स्तर पर उभरते हैं तो कभी-कभी पारिवारिक स्तर पर। सामुदायिक स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर इसका उभार विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ऐसी विशेष परिस्थितियाँ कई प्रकार की होती हैं। यथा; व्यापक स्तर पर नाश और निर्माण। लेकिन विशेष परिस्थितियों वाले लक्षण जब सामान्य अवस्था में दिखाई देने लगें और गाहे-ब-गाहे कोई व्यक्ति इसे प्रकट करने की चेष्टा करे तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति आसानी से किसी को भी सम्मोहित करने की कला में पारंगत हो चुका है। आमतौर पर यह गुण अभिनय करने वाले कलाकारों में देखा जाता रहा है। सम्मोहन की इसी कला की वजह से अभिनेता दर्शकों के बीच मे लोकप्रिय होते हैं। 


यह तो हुई एक बात, दूसरी बात समय को लेकर है। समय इस सृष्टि की सबसे ताकतवर चीज है। यह समय की ही ताकत है कि ऊपर बताया गया गुण अभिनेताओं के अंतस्थल से निकलकर नेताओं और न्यूज़ चैनलों के एंकरों की ललाट पर आकर बैठ गया है। समय की इस ताकत ने उक्त गुण के उद्देश्य में भी अप्रत्याशित रूप से घाल-मेल किया है। पहले का उद्देश्य आमजन का मनोरंजन था लेकिन वर्तमान में जनता को मूर्ख बनाकर आए दिन लम्पटई करते हुए ताण्डव करना भर रह गया है।

एक दिन मेरे एक मित्र एक घटना सुनाने लगे। आइये सुनते हैं, उन्हीं की जुबानी- चूहा मारना मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। साँप या बिच्छू को मारने से मैं सदैव परहेज करता आया हूँ। कहने का मतलब यह है कि- 'जीवों की हत्या करना मेरी सोच से भी बाहर की चीज है।' लेकिन एक मिनट, रुकिए यहाँ ! हाँ, तो इससे यह मत समझ लीजिये कि मैंने कभी चूहा, साँप और बिच्छू नहीं मारा है। अरे भई, आत्मरक्षा भी तो कोई चीज होती है ! है कि नहीं ! एक दो बार तो इसी आत्मरक्षा के चलते चूहों को झाड़ू से पीट-पीट कर मार डाला। इसके लिए दुःख तो हुआ लेकिन उतना नहीं। मुझे याद है कि एक या दो घण्टे बाद मैं भूल गया कि मैंने चूहा मारा है। लेकिन कल की घटना ! ओह ! क्या बताऊँ... करुणा, दया, दुख सब एक साथ ! सच कहूँ तो, अभी तक उससे उबर नही पाया हूँ।

दरअसल हुआ यह था कि मेरे घर में चूहों ने आतंक मचा रखा था। पत्नी और बच्चे यहाँ थे तो यह मेरी बहुत बड़ी चिंता नहीं थी। आजकल वे गाँव गए हैं इसलिए अकेले ही जीवन कट रहा है। परसों रात में किचन से किसी बर्तन के गिरने की आवाज आई। जाकर देखा तो चूहों की संसद चल रही थी, मुझे देखते ही खर-खर-खर-खर भागे। वहीं खड़ा होकर सोचने लगा- 'आखिर इनको कैसे भगाया जाय यहाँ से !' झाड़ू से मारना तो बिल्कुल भी नहीं चाहता था। अचानक दिमाग में आया कि बाजार में इनको चिपकाने वाला कोई गोंद मिलता है। दूसरे दिन बाजार से उसे खरीद लाया और शाम को किचन में रख दिया। चूहों को आकर्षित करने हेतु एक-दो मुंगफली के दाने भी उसपर रख दिये। 

रात का भोजन करके अभी सोने ही जा रहा था कि चीं-चीं-चीं की आवाज सुनायी दी। मन में खुशी की एक लहर सी दौड़ पड़ी- 'लगता है एक ठो धरा गया।' सोचने लगा - 'यह तो बढ़िया है घर लाकर जगह पर रख दीजिये, चूहे अपने आप चिपक जाएंगे।' आत्मा को सुकून मिलता हुआ महसूस किया। थोड़ी देर बाद मन हुआ- 'जरा देखूँ तो, किस हालत में है वह', इसलिए किचन में देखने चला गया। गोंद में दो चूहे चिपके हुए छटपटा रहे थे। 'चलो, मुक्ति मिली इनसे' सोचकर मन में बहुत प्रसन्नता हुई। विचार आया कि रातभर छोड़ दूँ तो घर के सारे चूहे एक साथ ही इसमे चिपक जाएंगे। इसलिए बिस्तर पर सोने चला आया।

भाई साहब क्या बताऊँ आपको, मैंने सोचा कि आसानी से नींद आ जायेगी लेकिन नींद की जगह बार-बार गोंद में चिपके उन दोनों चूहों का दृश्य मानस पटल पर उभरने लगा। उसमें उनकी कातर भाव लिए आँखें दिखीं। ऐसा लगा, मानो मुझसे वे रहम की भीख माँग रहे हों और मैं किसी क्रूर शासक की तरह उनको तड़पा-तड़पाकर कर सजाएँ मौत दे रहा हूँ। मुझे महसूस हुआ कि उनकी जगह यदि मुझे किसी ने उसी तरह गोंद में चिपका दिया होता तो ? मैं उनके दर्द और तड़प से दुखी होने लगा। मुझे अपराध का बोध हुआ- ओह ! यह मैंने क्या कर दिया..! एक बार फिर से किचन की तरफ भागा। इस बार उन्हें बचाने के उद्देश्य से गया। जाकर देखा तो दोनों चूहे अपनी शक्तिभर गोंद से छुटकारा प्राप्त करने हेतु प्रयास करते-करते थक-हारकर शांत हो चुके थे। मेरी आहट पाकर फिर से चीं-चीं कर हिलने-डुलने लगे। अब उनके शरीर का एक हिस्सा गोंद में पूरी तरह चिपक चुका था, पूँछ भी। जब उन्हें अपने हाथ से छुड़ाने का प्रयास किया तो वे और जोर-जोर से चीं-चीं करने लगे। और अधिक जोर लगाने पर लगा कि उनकी चमड़ी उनसे अलग हो जाएगी तो डर के मारे छोड़ दिया। चमड़ी उखड़ने की कल्पना से ही मेरी आत्मा काँप उठी। ओह ! इतनी क्रूरता ! पता नहीं कैसे इतिहास में क्रूर शासक अपने गुलामों की चमड़ी उधेड़ते होंगे ? दोनों चूहों की रूह में समा चुकी मौत की दहशत को मैंने महसूस किया। अपराधबोध में खुद को धिक्कारा और उन्हें वैसे ही छोड़कर वापस बिस्तर पर आ गया।

सच कहूँ तो मुझे बड़ी दया आ रही थी उनपर। मेरे अंदर का इंसान दुखी हो रहा था। उस समय बाजार से खरीदकर लाया गया वह गोंद मुझे पूँजीवाद का एक ऐसा भयानक अस्त्र लगा जो बड़ी आसानी से अपनी जाल में फँसा लेता है और आहिस्ता-आहिस्ता तड़पाकर मारता है। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा मैं एक तरफ सोने का प्रयत्न कर रहा था तो दूसरी तरफ हृदय, मस्तिष्क का सहयोग लेकर उन्हें बचाने की युक्ति ढूंढने में मशगूल था। अंततः कोई युक्ति नहीं सूझी तब मस्तिष्क ने हृदय से कहा- ‘जब उनकी मौत तय ही है तो क्यों न जल्दी मौत दे दी जाय।‘ लेकिन हृदय अब दूसरी गलती नहीं करना चाह रहा था। इस लिए न चाहते हुए भी मैं एकबार फिर से बिस्तर से उठकर किचन में गया, रात के दो बज रहे थे। चीं-चीं-चीं की आवाज अब कराहने जैसी हो गयी थी। उन्हें गोंद सहित उठाया और खिड़की खोलकर घर के बाहर फेंक दिया। और इस तरह काफी देर बाद जब दुःख की तीव्रता कम हुई तब चैन से सो पाया।“

उपर्युक्त घटना में देखा जा सकता है कि दुःख का वास्तविक कारण सहृदयता और व्यक्ति के आपसी संबंधों की निकटता है। यही बात सुख के लिए भी लागू होती है। यदि गौर फरमाएंगे तो सहज ही पता चलेगा कि चूहों को घर से बाहर फेक देने के बाद मित्र का दुःख कम हुआ। जाहिर है उस समय उसकी करुणा चूहों के प्रति थी। लेकिन इससे यह नहीं प्रमाणित होता है कि वह बाकी के सभी चूहों के लिए उतना ही दुखी होगा। इसी तर्ज पर हम देख सकते हैं कि घर या आपसी संबंधों से जुड़ी घटना से हमें ज्यादा से ज्यादा दुःख होगा, टोला-मोहल्ला, गाँव-जवार और जाति-समुदाय से जुड़ी घटना से हमें थोड़ा कम दुःख होगा और जिले व राज्य-देश से जुड़ी घटना से और थोड़ा कम दुःख होगा। यहाँ सम्भव है कि सबके लिए तात्कालिक तीव्रता कुछ समय के लिए समान हो लेकिन दुःख सबसे ज्यादा देर तक वहीं टिका रह सकता है जहाँ हृदय की निकटता होगी।

आज के समय में यह सामान्य सी बात हो चुकी है कि अपनी जाति और धर्म को लेकर हमारे माननीय नेतागण किसी के साथ हत्या, बलात्कार आदि की घटना होने पर दौड़े-भागे चले आते हैं, उनके प्रति अपनी संवेदनाएँ प्रकट करते हैं, उनके दुःख से दुखी होते हैं। इसी तरह न्यूज़ चैनलों के एंकरों को भी दुखी होते हुए देखा जा सकता है। वैसे उनके दुख की तीव्रता को मापने का पैमाना अभी इस कायनात ने इजाद नहीं किया है, लेकिन उनके चिघाड़ने की आवाज सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कितने दुखी होते होंगे। बहरहाल मैं कभी-कभी सोचता हूँ क्या वे सच में दुखी होते होंगे ? या महज नौटंकी करते हैं ? अपने आपको शत-प्रतिशत सही होने का दावा तो नहीं कर सकता लेकिन उनका दुःख मुझे नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं लगता।

अपने आपको हिन्दुओं का ठेकेदार घोषित किये नेता पाकिस्तान के हिन्दुओं के साथ घटी किसी घटना से दुखी तो होते हैं लेकिन दलितों के साथ होता हुआ अत्याचार उन्हें नजर नहीं आता। उन्हें झारखण्ड की अंकिता के साथ हुई घटना के लिए दुखी होते हुए देखा जा सकता है और यह सही भी है ऐसी किसी भी घटना के लिए प्रत्येक मानव को दुखी होना चाहिए लेकिन कुशीनगर की अंजू सिंह के लिए उनमे से किसी की आवाज का  न निकलना उनको संदेह के दायरे में खड़ा करता है। हर दिन तमाम घटनाएँ हो रही हैं, इसे आप खुद भी देख सकते हैं, इसमें ज्यादा मेहनत की जरुरत नहीं है। आपको सिर्फ दो-तीन की वर्ड गूगल पर टाइप कर के सर्च करना है; चाकू से गोदकर हत्या, दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या, सामूहिक बलात्कार, रेप इत्यादि; हर दिन का सारा डिटेल आपके सामने होगा। मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है कि क्या वे तथाकथित ठेकेदार इन सभी घटनाओं के लिए दुखी होते होंगे ? शायद नहीं ! यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यही बात इस्लाम या अन्य धर्म के ठेकेदारों पर भी लागू होती है।   

इसी तरह अभी हाल ही में दिल्ली के एक नेता मुसलमानों के सम्पूर्ण बहिष्कार की बात करते हुए नजर आये। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि यदि वे मांसाहारी होंगे तो जाहिर है किसी समारोह, घर या होटल में तो खाते ही होंगे, ऐसे में क्या वे बता सकते हैं कि उस चिकन या मटन को किसने काटा है ? जो कुर्ता-पजामा वे पहने हैं क्या वह सनातनी पहनावा है ? और भी कई छोटे-छोटे सवाल हैं जो ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए।

कुछ ऐसी ही हालत आजकल के न्यूज़ चैनलों के एंकरों का है। उदाहरण के तौर पर ‘न्यूज़ इण्डिया 18’ के एंकर अमन चोपड़ा और अमिश देवगन का जिक्र करना चाहूँगा। एक फिल्म आई है आदिपुरुष, आजकल इसको लेकर ये दोनों एंकर रायता फैलाये हुए हैं। अमन चोपड़ा अपने एक डिबेट में रावण को अहंकारी, अत्याचारी और बुराई का प्रतीक बताते हैं तो अमिश देवगन उसे सबसे बड़ा ब्राह्मण, विद्वान और ज्ञानी साबित करने पर तुले हुए हैं। एक ही चैनल के दो कार्यक्रमों में दिखाई देता यह विरोधाभास आखिर किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए है। फिल्म के पात्रों के पहनावे और हुलिए को लेकर ये दोनों बहुत दुखी हैं। होना भी चाहिए आखिर यह अपनी संस्कृति और विरासत के साथ खिलवाड़ करने का मामला है। लेकिन सवाल तो फिर भी बनता है- क्या रामानंद सागर ने रावण और हनुमान को देखा था जो उनका हुलिया बनाकर लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘रामायण’ में दिखाया था ? सवाल तो यह भी बनता है कि अमिश देवगन के उसी डिबेट में एक वक्ता सीता और सनी लियोनी की तुलना करते हुए अपनी बात रखता है और अमिश देवगन इसका विरोध भी नहीं करते, ऐसा क्यों ?

ऐसी तमाम छोटी-छोटी चीजें हैं जिन्हें नोटिस किया जाय तो हजारों पृष्ठों की कई किताबें तैयार की जा सकती हैं। अभी तक के लिए इतना ही।

लेखक : महेश सिंह

गिरिडीह, झारखंड 

 

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Wednesday, March 9, 2022

शैलीबद्धता और कहानी का रंगमंच विशेष संदर्भ : देवेंद्र राज अंकुर

स्तानिस्लावस्की के अभिनय सिद्धांत की परम्परा को नाट्य जगत मे एक वरदान के रुप मे माना जाता रहा हैं, इस सिद्धांत से प्रभावित होकर अनेक नाट्ककारों व निर्देशकों ने संसारिक जीवन के अनुभवो को हूबहू मंच पर ला कर रंगमंच के इतिहास मे क्रांति ला दी, परंतु विश्वयुद्ध की त्रासदी ने मानवीय मूल्यों व मानव के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया, इन्ही प्रश्नो ने एक नए रंगमंच को जन्म दिया, इन विचारो से प्रभावित हो कर नाट्क लिखे और खेले जाने लगे, इसी विचार ने बॉक्स रंगमंच के बंधे बंधाये खांचे से रंगमंच को बाहर निकाला और अनेक नई शैलियों और फार्मों का उदय हुआ, जिसमे विसंगति के नाटक, प्रयोगवादी रंगमंच, टोटल थियटर व शैलीबद्ध अभिनय आदि का जन्म हुआ। 

शैलीबद्धता दो विपरीत तत्वो का संयोग हैं , जब दो विपरीत तत्व एक ही समय पर एक काम करने लगते हैं तो एक अनचाही स्थिति रचित होने लगती हैं  तब यह बनी बनायी धारणा, सोच ओर आदर्श को तोड़ देती हैं ।

शैलीबद्ध अभिनय रंगमंच का एक सशक्त माध्यम हैं , जो रंगमंच की इच्छापूर्ति का माध्यम हैं , शैलीबद्ध अभिनय अपने साथ सभी प्रकार की शैलियों, फार्मों आदि को आने का निमंत्रण देता हैं , ताकि रचना प्रक्रिया मे किसी प्रकार की बाधा न हो, stylization शब्द माना कि western का हैं  लेकिन यह हमारे भारत से ही विदेशों मे गया हैं, संस्कृत नाटकों मे यह शैलीबद्ध के रुप मे प्रयोग होता रहा हैं, अंग संचालन, हस्तमुद्राओं, चारि, लयबद्धता व गीत-संगीत आदि से परिपूर्ण अभिनय ही शैलीबद्धता की पहचान हैं । वर्तमान में निर्देशक आंगिक अभिनय की तकनीकों का समिश्रण और नाट्य धर्मी नियमों को छूता हुआ वह शैलीबद्धता का निर्माण करता हैं । शैलीबद्ध अभिनय नाट्यधर्मी के नृत्य, गीत, संगीत से परिपूर्ण अभिनय की निर्मिति हैं । विदेशों मे stylization का प्रयोग हमारे भारत से प्रभावित हैं , देवेन्द्र राज अंकुर जी कहते हैं  – “यूनानी नाट्क, शेक्स्पीयर के नाटक, मोलियर के नाटक, बेन जान्सन के नाट्क, मार्लो के नाट्क कहने का तात्पर्य ये हैं  कि यर्थाथवादी दौर से पहले किसी भी देश और भाषा के नाटकों को उठा लीजीये, वे पूरी तरह से शब्द बहुल नाट्क हैं , और तुर्रा यह कि वे पूरी तरह से नाट्यधर्मी रंग परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं , जो अपनी मंचीय अभिव्यक्ति मे अधिक से अधिक शैलीबद्ध रंग तत्वों यथा गीत, संगीत, मुद्राओ एवं गतियो का प्रयोग करते हैं

प्रसिद्ध रंग-निर्देशक रतन थियम (नाटयदर्शन, 2012) नाट्यशास्त्र को भारतीय प्रदर्शंनकारी कलाओं का बीज मानते हैं। जिसकी जड़ों से सारी कलाओं का जन्म हुआ, चाहे भरत मुनि हो, अरस्तु या ज़ियामी सभी कला गुरुओं ने कला को बहुत करीब से जाना, मनुष्य के बारे मे, सौंन्दर्य के मापद्ण्ड क्या हैं? आदि पर गहन अध्ययन किया, उन्होने यह नही कहा कि यही करना चाहिए। उन्होने प्रदर्शन की तकनीकों को परिष्कृत करने, अंगो मे परिष्कार लाने, मानवीय सम्वेदना को अभिव्यक्त करने के लिए क्या-क्या ढंग हो सकते हैं? रस को कितने तरीके से व्यक्त कर सकते हैं? आदि से परिचित कराया, इसके बाद स्तानिस्लावस्की, आर्तो, ब्रेख्त, और ग्रोतोवस्की भारत आए उन्होने नाट्यशास्त्र को पढ़ा, उसे सराहा और ग्रहण भी किया। रंगमंच मे अभिनय की जड़ें किसी स्थान विषेश से नही हैं , इसकी जड़े बहुत ही विशाल हैं  यह लेन-देन की एक प्रक्रिया हैं, एक कला दूसरी कला से प्रभावित है। 

शैलिबद्धता और नाट्यधर्मिता -

भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के अध्याय 13 के अंतर्गत नाटक मे रोचकता व सौंदर्य लाने के उद्देश्य से नाट्यधर्मी रुढ़ियो का वर्णन किया है, इस प्रकार शैलिबद्धता और नाट्यधर्मिता ऐतिहासिक एवं पौराणिक कहानियों मे चमत्कारिक दृश्यों को पैदा करने मे सहायक भूमिका निभाते हैं, नाट्यधर्मी का क्षेत्र अति व्यापक हैं, यह लोकधर्मी के यथार्थ से आगे जाने का मार्ग हैं, जैसे- एक पात्र का अनेक पात्रों में समाहित होने व बाहर निकलने की प्रक्रिया, पात्रों के अंग संचालन मे रोचकता व लयात्मकता, संसारिक गतिविधियों का प्रतिकात्मक दृश्यांकन आदि अनेक सम्भावनाओं का द्वार खोलती हैं।  

जब भी हम नृत्य या अन्य शास्त्रिय कला रुपों को देखते हैं, तो हम पाते हैं कि इन कलाओं मे प्रयोग होने वाली मुद्रायें, गति, भाव- भंगिमायें सभी कुछ हमारे रोज़ के जीवन का विस्तार लिए हुए हैं , इन्हे एक विशेष उदेश्य के लिये सौंद्र्यपूर्ण व प्रस्तुतिपरक रूप से व्यवस्थित किया गया हैं, नृत्य मे शरीर का कोइ भी भाग सीधे सीधे गति नही करता है, यह हमेशा तिरछा ओर विपरित दिशा की ओर गति करता है, “संस्कृत नाटकों की प्रस्तुति करते समय, उक्त परम्परा के जीवंत तत्व का समयानुकूल एवं उचित प्रयोग करना चाहिये, परम्परा को उसी रुप मे न लेते हुए उसके बेमेल अंशों का एकदम तिरस्कार करना और उसमे से सार तत्व का स्वीकार करना ही सृजनात्मकता का सबसे बड़ा लक्षण है, यहाँ निषेध का अर्थ हैं परम्परा के आंतिरक स्वरुप को उसकी समग्रता मे देखना।

इस प्रकार समान शैलीबद्द अभिनय भी इसी सिधान्त का अनुसरण करता हैं। देवेंद्र राज अंकुर के कहानी के रंगमंच मे भी हम पाते हैं कि निर्देशक बिना शब्दों व कहानी के आशय मे फेर बदल किए, मंच पर शैलिबद्द दृश्यों को रचते हैं, यहाँ कहानी को बोलना, संवाद, व भाव सभी कुछ कहानी के अनुरुप होते हुए गति और दृश्य में भिन्नता लिए हुए होते हैं। कहानी के रंगमंच मे अभिनेता, सूत्रधार और पात्र सभी का वास्तविक और काल्पनिक रुप एक ही मंच पर एक ही समय पर हो सकता हैं, यहाँ अभिनेता, पात्र और सूत्रधार सभी मंच पर अपनी उपस्थिति, एक साथ दर्ज कराते हैं, वास्तविक वातावरण जो कि शब्दो के साथ-साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं, अनायास ही शैलीबद्धता का रुप धारण करते जाते हैं।

आज ग्लोब्लाइजेशन युग हैं, व्यक्ति मशीनीकरण के युग में हैं। आज के व्यक्ति का साथी व्यक्ति न हो कर मशीन हैं, आज का व्यक्ति मशीन आश्रित हैं, ऐसे मे वह भावना शुन्य हो जाता हैं। इसके विपरीत आज का रंगमंच इसी स्थिति से जूझते हुए अभिनेता केंन्द्रित व अभिनेता प्रधान्य हो गया हैं। यहाँ अभिनेता अपने पूर्व अनुभव के साथ मंच पर एक स्वतंत्र स्थिति का बोध कराता है, सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि शैलिबद्धता रंगमंच को किसी सीमा रेखा से नही बांधती। शैलीबद्ध शब्द आते ही विषय ग्लोबल हो जाता हैं। यहाँ अभिनेता किसी भी तरह के चरित्र या मंच सामग्री से बंधा नही होता, इसलिए यहाँ आहार्य नगण्य हो जाता है, कहने का तात्पर्य यह है कि अभिनेता को अपने चरित्र का चित्रण करने के लिए किसी आभूषण या उस चरित्र की पहचान का वस्त्र पहनने की आवश्यकता नही हैं, यहाँ  अभिनेता का अभिनय महत्वपूर्ण हो जाता है।  जबकि नाट्यशास्त्र के 19वें अध्याय मे भरत ने आहार्य का विस्तृत वर्णन करते हुए अभिनेता के लिय आहार्य को महत्वपूर्ण माना हैं, जिसके दवारा अभिनेता अपनी व्यक्तिगत पहचान छुपा कर एक दूसरे चरित्र मे आने के लिए रंगो, कपड़ों, गहनों व मुखौटों का सहारा लेता हैं, जबकि अंकुरजी के कहानी के रंगमंच मे ऐसा नही हैं। अभिनेता अपनी वास्तविक रुप व वेषभूषा के साथ मंच पर आंगिक व वाचिक अभिनय द्वारा गतिशील रहते हुए घटनाओं का दृश्य निर्माण कर सकता है, यहाँ अभिनेता मंच के एक कोने मे खड़े होकर कहानी कहते हुए सूत्रधार भी हो सकता हैं, और एक व्यक्ति विशेष भी। वह घटना का वर्णन इस प्रकार करता हैं, जैसे कि वह घटना उसकी आंखों के सामने घटित हो चुकी है, वह कहानी का वर्णन इस प्रकार करता हैं, जैसे कि वह अपना अनुभव दर्शको से बाट रहा हो। मुख्यता नाटक तीन स्थितियों से हो कर गुजरता हैं - प्रारम्भ, मध्य और अंत। नायक चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति मे हो अंत मे वह फलागम को प्राप्त करता ही है।

एक सुखद अंत भारतीय रंगमंच की विशेषता रही है, साथ ही नाटक का अंत मे किसी परिणाम तक पहुचना अनिवार्य रहा हैं (महेश आनंद, 1997) । अंकुर जी कहानी के रंगमंच में इस तरह के किसी भी नियम का पालन करने को विवश नही हैं। कहानीकार कहानी का अंत जिस प्रकार से करता है अंकुरजी भी उसी प्रकार उसका अंत करते हैं। ज़रुरी नही है कि अंत सुखद हो या वो अपने परिणाम तक पहुचे, हो सकता हैं कि कहानी के मध्य में ही कहानी का अंत हो जाय और आगे का परिणाम दर्शकों के लिय छोड़ दिया जाय। अंकुरजी अंग्रेजी के शब्द लाउडथिंकिंग (loud thinking) का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि इसका मतलब जोर-जोर से सोचना, जिसमे पात्र के स्मृति को याद करना, कहानी का तीसरे पुरुष मे लिखा होना, जैसे दो अभिनेताओ के बीच बात चीत करते हुए कहानी का नैरेशन सुनाने की तरह संवाद के रुप मे बोल कर शेयर कर लेना, दूसरी कोशिश में सीधे-सीधे अपने ही बारे मे थर्ड पर्सन के रुप मे अभिनेता दवारा सुनाया जाना, और फिर जो भी दृश्य हैं, उसमे वह पात्र खुद ही हिस्सा लेने लगे। डॉ. अनूपम आनन्द लीलामे अभिनय के तीन स्तर को देखते हैं, पहले एक व्यक्ति, दूसरा एक अभिनेता, तीसरा अभिनेता द्वारा किए जाने वाली भूमिका, डॉ अनुपम आनंद लिखते हैं कि- ब्रह्म चराचर मे व्याप्त है, अभिव्यक्त है, सर्वशक्तिमान है, वो अपने आप को लोक मे व्यक्त करने के लिए लीला का बाना धारण करता है, ब्रह्म एको अह् बहुस्यामीके रुप मे घोषित करता है, अभिनेता भी इन तीनो स्तरो को एक साथ मंच पर जीता हैं। और दर्शक भी एक साथ स्वीकार करता है, यह लीला तत्व की विशेषता है, अंकुर जी लाउडथिंकिग द्वारा इस प्रक्रिया को समझाते हुए कहते हैं कि – “आवाज की तर्ज पर अभिनेता वर्तमान मे भी उपस्थित है और दूसरे पीछे भी लौटता है, वह चरित्र भी हो सकता है और उसी वक्त अपने ही उपर टिप्पणी भी कर रहा होता है

अनुपम आनन्द कहते हैं कि- यह प्रक्रिया भारतीय शास्त्रों से भिन्न है। अभिनय की इस पद्धति में व्यक्ति का स्तित्व बना रहता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति, अभिनेता और पात्र तीनो मंच पर स्वतंत्र विचरण करते हुए अपनी अपनी भूमिका अदा करते हैं। यहाँ निर्देशक के लिए सबसे चुनौती पूर्ण होता है, कहानी की आंतरिक बुनावट से उभरे दृश्य रूपों को उभारना। यहाँ नाटक की तरह स्पष्ट दृश्य योजना या फिर संवादों की नाटकीयता नही होती हैं, यहाँ निर्देशक को उन दृश्योंकी कल्पना करनी पड़ती है, जो पात्र के मन मे चल रही होती है। जैसा कि लेखक ने कहानी मे पात्र के सोचने की स्थिति के बारे मे लिखा है। 

इस वास्तविक वातावरण का जोकि शब्दो द्वारा तैयार होता हैदृश्य के साथ ज़रुरी नही हैं कि  तालमेल हो। यहाँ अभिनेता, पात्र और सूत्रधार सभी मंच पर स्वतंत्र विचरण करते हैं, संवाद बोलते समय अभिनेता की मन: स्थिति कैसी बन रही है,  वह या तो शब्दों द्वारा दृश्यों का सृजन करे या फिर उससे उलट कुछ अलग कर डाले, यहाँ  अभिनेता की गति और मन:स्थिति के बीच कुछ भी तय नही हैं (अनुभव: मध्य प्रदेश नाट्य कला संस्थान, निर्मल वर्मा की तीन कहाँनियों का मंचन,भोपाल)।

जब भी कोई शैलीबद्ध दृश्य आंखो के आगे आता है तो अचानक से हम भ्रमित हो जाते हैं और अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगते हैं, अपना खुद का अर्थ तैयार करते हैं और हम खुद को उस कहानी के साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं। यहाँ अभिनेता की गति और कहानी दोनों में मिलान नही भी हो सकता है, जब कहानी को उसके लिखे हुए रुप मे ही अभिनेता बोल रहा हो तब कहानी यर्थाथ में और कल्पना दोनों में चलती है। जबकि अभिनेता की गति लयात्मक और संकेतात्मक भी हो सकती है। जैसे अभिनेता कहानी कहते-कहते एक स्टूल पर चढा, अभिनेता का स्टूल पर चढना वास्तव मे स्टूल पर चढ़ना न हो कर वह पात्र के प्रगति का या छत पर चढ़ने का सूचक हो सकता है। अंकुर जी के कहानी के मंचन मे, बहुतायत से हम ऐसा देख सकते है, यहाँ दर्शक दृश्य देख कर सही-सही स्थिति का विश्लेषंण नही कर सकते। जैसा कि यर्थाथवादी नाटकों में होता हैं, अनेकार्थ का द्वार खुल जाता है। यहाँ शास्त्रीय और यर्थाथवादी रुप दीखता है, और दोनो मिल कर शैलिबद्धता की रचना करते हैं । 

साहित्य और शैलिबद्धता दोनों अपने में ही एक विरोधाभासी शब्द हैं, और अंकुर जी ने इन दोनों का ही प्रयोग कहानी के मंचन में करके एक अनोखा तरीका इजाद किया। इस प्रयोग मे नाट्यशास्त्र का नाट्यधर्मी रुप भी है। साथ ही अभिनय के सभी प्रकार आंगिक, वाचिक, आहार्य तथा सात्विक की भी अहम भूमिका हैं।  इसके साथ ही जनांतिक, अपवारित व आकाशभाषित जो कि सिर्फ संस्कृत नाटकों में ही प्रयोग होते थे, अंकुरजी अपने कहानी के मंचन मे बड़ी ही कुशलता से प्रयोग करते हैं। जैसा कि रमेश चंद्र शाह की तीन कहाँनियों के मंचन जिनमें कहानी आज की तारीख मे, पक्ष, तथा अभिभावक के अभ्यास से प्रस्तुति तक की प्रक्रिया के दौरान के अनुभव मे पाया कि मंच पर अभिनेता, सूत्रधार, व पात्र का एक- दूसरे में समाहित होने और निकलने की प्रक्रिया चलती रहती है।  कहानी कहना और संवादों के साथ उसे क्रिया रुप मे लाना, आखों  के द्वारा व भाव- भन्गिमाओं के द्वारा दृश्यो का निर्माण, वस्तुओं के प्रयोग का माइम करना, अभिनय का यथार्थ के करीब पहुच कर उस यथार्थ का टूटन, यह बनने और टूटने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। कहानी पक्षमे कहानी की लाइन इस प्रकार है- छोटा था तभी से सोचा करता था माँ को अपने पास ही रखूंगा हमेशा, वैसा भी नही हो पाया, वो सपना पूरा होने की नौबत ही नही आई, अब तो असम्भव ही है, अब तो माँ भी बहुत बूढ़ी हो गई, आंखो मे जाने क्या हो गया है दिखाई भी नही देता, आपरेशन के बाद भी हालत जरा भी नही सुधरी, किसी दिन माँ भी...! 

अभिनय करते समय कहानी की प्रकृति वही होती है। लेकिन अभिनय की कहानी से भिन्न, जैसे अभिनय मे यतीन और मनोरमा दोनो द्वारा संवाद की तरह बोलना, यकायक यतीन और मनोरमा का आलाप लेते हुए कहानी का बोलना, गति का भी लयात्मक हो जाना, जोकि दृश्य का यथार्थ को तोड़कर शैलिबद्ध हो जाना । यहाँ सूत्रधार, अभिनेता, पात्र तथा व्यक्ति सभी एक ही समय पर एक ही मंच पर उपस्थित रहते हुए अपनी अपनी भूमिका निभाते हैं, कब सूत्रधार पात्र बन जाता है और पात्र सूत्रधार, इस तरह की प्रक्रिया बराबर मंच पर चलती रहती है, यहाँ सूत्रधार ही कहानी कहते-कहते कहानी का किरदार बन जाता है, जो घटना घटित हो चुकी है, उसका वर्णन और उस घटना का दृश्यांकन (जो की अतीत में घट रही थी)। जबकि संस्कृत नाटकों में दो तरह के पात्र होते हैं, एक तो वो अभिनेता जो शारीरिक भाषा द्वारा दृश्य रचना करते थे जिन्हे शोभनिका कहा जाता था तथा दूसरे वे जो कहानी का वर्णन करते थे जिन्हे ग्रंथिका कहा जाता था, बाद मे वह कथिका के रुप मे सामने आई।(Sanskrit drama in Performance, page 13) बाद मे इसी प्रक्रिया ने रंगमंच का रुप लिया होगा, जहाँ कथा वाचक के वाचन के अनुरुप अभिनेता शारीरिक क्रिया करके दृश्य का निर्माण करता रहा होगा। यहाँ अभिनय का रुप नाट्यधर्मी ही रहा होगा, इसी प्रकार कहानी के रंगमंच में भी अभिनेता घटनाओं का मर्म समझ कर उस काल का आनंद लेता है, और शारीरिक एवं  शाब्दिक दोनो स्तर से दृश्य का निर्माण करता हैं। (संगीता गुंदेचा,2012)

प्रसिद्ध रंग निर्देशक कावालम नारायण पनिक्कर कहते हैं कि- लोकधर्मी स्तर पर हम सिर्फ वस्तु की अवस्था का सृजन कर सकते हैं, जबकि नाट्यधर्मी मे अभिनेता वस्तु के सत्व मे डूबता है, उसका आनंद लेता हैं, और अपने शारीरिक भंगिमाओ से वस्तु के आंतरिक लक्षणों को व्यक्त कर दर्शकों के सामने उस अदृश्य वस्तु को साकार करता है

महेश चम्पकलाल शाह ने भी नाट्यम के लेख निर्देशक का रंगमंचमे कहा है कि- यथार्थवादी शैली में खेले जाने वाला नाटक अभिनेता की कल्पना को सन्कुचित कर देता है। शैलीबद्द अभिनय द्वारा अभिनेता मनोवैज्ञानिक यथार्थ तथा चरित्र चित्रण की तफसीलो में न जाकर अपनी भाव, मुद्राओं और देह का उचित इस्तेमाल आदि उपकरणों के जरिये मंच पर नये बिम्ब रचता है। इस नये शिल्प की खोज भारत और विदेशों में  यर्थाथवादी और प्रकृतवादी प्रवृतियों के खिलाफ प्रतिक्रिया से जन्मी है। जो 1850 के करीब विश्व रंगमंच में छाने लगी।(नाटयम नाट्य परिषद, सागर प्रकाशन)

कहानी के रंगमंच मे अभिनेता शब्दों का शैलीबद्ध संसार रचता है। तात्पर्य वस्तु व घटनाओं की हूबहू उपस्थिति न होकर उनके होने का आभास शब्दों व भाव भंगिमाओं द्वारा साकार करना। जैसे मंच सामग्री के रुप मे एक सीढ़ी का तरह तरह से प्रयोग। कहानी अभिभावकके मंचन मे राजा का सीढ़ी के ऊपर गुस्से से लेट जाना और उसके अभिभावक के द्वारा जोकि सूत्रधार की भी भूमिका कर रहे हैं, राजा द्वारा की गई तत्काल प्रतिक्रिया का वर्णन भी करते जाना। यहाँ दर्शकों को पात्र और सूत्रधार का आभास एक ही समय मे एक ही अभिनेता मे देखने को मिल जाता है । 

नाट्यशास्त्र मे नट्न या की तीसरी विधा नाट्य है, इसमें सम्पूर्ण अभिनय होता है, और रस की पूरी सामग्री प्रस्तुत की जाती है, और दर्शक के हृदय मे रस का संचार किया जाता है। भरत ने भी आंगिक आदि अभिनयों से युक्त सुख-दुखादि से समन्वित लोक स्वभाव को अभिनय कहा है। कहानी के रंगमंच में दर्शक को रस प्रदान करने के लिए आंगिक तथा वाचिक ही सम्पूर्ण है। इस शैली मे अभिनय के दो अन्य प्रकारों की कोई खास आवशयकता नही पड़ती। जब प्रेक्षक तक शब्दों व भाव भंगिमाओं द्वारा ही रस का संचार असानी से हो जा रहा है, तो अंगहार व मेकअप आदि की आवश्यकता गौंण हो जाती है । (पारसनाथ दिवेदी, 2004)

नंदिकेश्वरवाचिक अभिनय को नाट्य का शरीर कहते है, इसी प्रकार और अभिनेता इसी आधार को ग्रहण करते हैं, नाटय में जिस वार्तालाप या कथोपकथन का प्रयोग किया जाता है वह जीवन की सम्पूर्ण परिस्थिति के साथ सजीव रुप मे प्रयुक्त हो सकता है, प्राचीन काल में साहित्यिक और जीवन की भाषा मे अंतर नही रहा है, उस समय साहित्य की भाषा वही थी जो साधारण बोल- चाल की भाषा थी। नाटयशास्त्र मे भाषा के प्रकार व प्रयोग की उपयोगिता का विस्तार से वर्णन है । 

अंकुर जी ने कहानी के रंगमंच में नाटयशास्त्र की उक्तियों व प्राचीन काल से चली आ रही कहानी सुनाने व किस्सागोई की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उसको दृश्य रुप मे प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार कहानी मे यर्थाथ व कल्पना का मिश्रण एक साथ होता है उसी प्रकार कहानी के रंगमंच मे कहानी के इस गुण को साक्षात करने में  शैलीबद्ध अभिनय की भूमिका भी अहम् है। शैलीबद्ध अभिनय के मुख्य तत्वो को दिए गए चित्र मे दर्शाया गया है-                                                 

सन्दर्भ सूची :

           शास्त्री, बाबूलाल शुक्ल। नाटयशास्त्र दूसरा अध्याय। चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी।

           Mishra, Dr. B. B. “Bharat Aur Unka Natya Shastra” National publishing house, New Delhi। (1988)।

           Gundecha, Sangeeta, “ Rang prasang”  NSD New Delhi  (july-dec. 2001)

           त्रिपाठी, राधावल्लभ, “नाटयम:अंक3नाट्यपरिषद सागर प्रकाशन, मई 1983

           Bose, mandkranta, “Movements And MimesD K.” print world (p) Ltd. New Delhi।(2007)। Print

           Schramm, Harold, “Musical Theatre In India”, University of Texas PressUK, (2007)। E-book

           Vajpeyi, Udayan, “KNPanikkar The Theatre of Rasa”, Niyogi booksNew Delhi, (2012)। Pri

           Guntecha, Sangeeta, “Natyadarshan: KN Panikkar Habib Tanveer Ratan Thiyam se Sanvad”Vani PrakashanNew Delhi। (2012)। Print

           अंकुर, देवेंद्रराज, पहला रंग: कहानी के भीतर से उभरता कहानी का रंगमंच

           आनंद, महेश, कहानी का रंगमंच, पेज 68,

           त्रिपाठी, राधावल्लभ, “नाटयम45नाट्यपरिषद सागर प्रकाशन।

           Baumer, M.,Van,Rachel and Brandon,James, R. “Sanskrit Drama in Performance”, page 3

           शाह, रमेश चंद शाह, “रमेश चंद शाह की तीन कहानियॉ

           मिश्र, सत्यदेव, “पाश्चात्य काव्यशात्र:अधुनातन संधर्भ”,ज्ञान भारती, इलाहाबाद प्रकाशन।

           विश्वंभरन, एम.एस., “नाट्यम:भास की रंगदृष्टि- मध्यम व्यायोग के संधर्भ मे

           दिवेदी, डॉ पारसनाथ,”नाट्यशास्त्र का इतिहास”, चौखम्बा सुर प्रकाशन, 2004।

           Prasanna, “Indian Method in Acting”National School of Drama। 2013-14।

           

संपर्क : अनीता गुप्ता शोधार्थी, नाटयकला विभाग, पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी, पॉन्डिचेरी मोबा.  09487655738  anitarangbhoomi@gmailcom

परिवर्तन, अंक 2 अप्रैल-जून 2016 में प्रकाशित

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Monday, January 31, 2022

यह खेल खत्म करों कश्तियाँ बदलने का (आदिवासी विमर्श सपने संघर्ष और वर्तमान समय)

“सियाह रात नहीं लेती नाम ढ़लने का

यही वो वक्त है सूरज तेरे निकलने का

कहीं न सबको संमदर बहाकर ले जाए

ये खेल खत्म करो कश्तियाँ बदलने का”[1]

आज के समय एवं समाज का मूल्यांकन करे तो हम देखते हैं कि यह फर्क करना मुश्किल है कि भूमण्डलीकरण ने इस पर अपना प्रभाव डाला या अपना प्रकोप फैलाया। वास्तव में इसकी जगमगाहट आँखों में चुभती सी मालूम होती है। एक तरफ समाज क्रांन्तिकारी परिवर्तनों का गवाह बना रहा, वहीं एक समाज ऐसा भी रहा जो गौरवहीन, गतिहीन और निष्क्रिय बना रहा। इस समाज की पहचान कभी सम्मानजनक नहीं रही बल्कि उसे (बर्बर), हिंसक, असभ्य, गंवारू पंरपरा का ही माना गया तथा इसे मुख्यधारा से अलग ही रखा गया ना ही सभ्य समाज ने इसे अपना हिस्सा माना और न ही इस समाज ने कभी स्वयं सभ्य समाज में शामिल होने की चेष्टा ही की। इस आदिवासी समाज का आहत इतिहास आज भी हमारे सामने उपलब्ध है और अपने साथ हुए इस सौतेले व्यवहार पर सवाल उठाता है-

रोशनी की हमारी खोज खत्म हो चुकी है।

 अब हम अंधेरा ही ओढ़ते बिछाते हैं।

 हमारे हिस्से अंधेरा ही आया है

 और अब उसी में अपना काम निकालना सीख गये हैं

 अंधेरों के अलावा रोशनी का भी[2]

उत्तर आधुनिक समय वंचितों का मुक्ति संग्राम कहा गया। आधुनिकता में परंपरागत शोषक वर्ग ने अपने चोले को बदलकर नया रूप ले लिया और शोषण का क्रम बदस्तूर जारी रहा है। दलित वर्ग दलित ही बना रहा। अतः उत्तर आधुनिकता ऐसे लोगो की आवाज थी, जिन्हें अब भी अपनी बेहतर जिन्दगी का इंतजार था। इसी घटनाक्रम ने विभिन्न विमर्शों को जन्म दिया, जिनमें से एक आदिवासी विमर्श था। आदिवासी विमर्श में पहली बार आदिवासी समुदाय की बेहतरी एवं बढ़ोत्तरी के लिये आवाज उठाई गई- यह बात सही है कि प्रारम्भ में मार्क्‍स पूंजीवादी विकास की क्रांतिकारी सम्भावनाओं को लेकर बहुत उत्साहित थे। उन्हें लगता था कि पूंजीवाद औपनिवेशक समाजों को तबाह तो कर रहा है लेकिन इसी क्रम में वह उन समाजों में नई शक्तियों को भी जन्म दे रहा है। ये नई शक्तियाँ एक आधुनिक समाज को जन्म देगी और इन समाज की सदियों पुरानी जड़ता को तोड़ेगी[3]

प्रश्न यह उठता है कि यह आदिवासी विमर्श किस तरह के समाज का प्रतिनिधित्व करता है। क्या इस दुनिया के भीतर इनकी कोई अलग दुनिया है या इन्होनें खुद अपनी अलग दुनिया बना ली। एक सूरत यह भी हो सकती है कि अपनी विषम जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों, रीति-रिवाजों, त्योहारों एवं सांस्कृतिक विरासत, जो इन्हें पंरपरा से मिली थी, को सहेज कर रखने की फिक्र या विवशता ने मजबूरन इनकी दुनिया को अलग कर दिया और अपने ही घर में ये समाज एक अजनबीपन की जिन्दगीं जीने को मजबूर हुआ हो। लेकिन इस बेगानेपन के बावजूद उनका अपना निजी इतिहास जरूर होगा। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि उस इतिहास का जिक्र करने से इतिहासकारों ने हमेशा नजरे चुराई जैसा कि ये पंक्तियां चीख-चीख कर कहती हैं-

“तुम हमारा जिक्र इतिहास में नहीं पाओगे

क्योंकि तुमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है

छूटी हुई जगह दिखे जहां-जहां या दबी हुई चीखों का एहसास हो

समझना हम वही मौजूद है।“[4]

फोटो : गूगल से साभार 


ये दबी हुई चीखें जिन्हें निर्ममता से दबा दिया गया था, ये बताने के लिये पर्याप्त हैं कि कहीं तो कुछ ऐसा हुआ जिसने इस समाज को नुकसान पहुँचाया वास्तव में यह एक गहरी साजिश थी जिसने आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास को आहत इतिहास में तब्दील कर दिया। उन्हें जानबूझकर मुख्य धारा से परे कर दिया और इसका प्रमुख कारण था उनकी संस्कृति का बहुत ज्यादा उर्वर होना। आदिकाल से ही ये वनों एवं निर्जनों में निवास करने वाली तथा प्रकृति पर बहुत ज्यादा आश्रित जनजाति थी। प्राकृतिक संसाधन बहुतायत मात्रा में इनके यहा उपलब्ध थे जिन पर मुख्य धारा के निवासियों ने नजर गड़ाई और उस पर अपने अधिकार को पुख्ता करने के लिये इस आदिवासी समाज के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिया। जैसा हरिराम मीणा ने आदिवासी कौनमें स्पष्ट किया है। सतयुग-त्रेता-द्वापर काल खण्डों में इन आदिवासियों को असुर दैत्य, दानव, प्रेत न जाने क्या-क्या संज्ञाये देकर मनुष्य जाति होने से नकारते रहने का दुष्चक्र रचा गया।[5]

आदिवासी समाज के सामने एक ओर तो अपनी जड़ को बचाने की जद्दोजहद थी, वहीं दूसरी ओर सबसे बड़ी चुनौती अपने अस्तित्व को बचाने के लिये करनी थी। इनको मुख्य धारा से अलग-थलग करने की साजिश थी इसीलिये विद्वान समाज ने इन्हें सुरएवं असुरदो भागों में विभाजित कर दिया। मुख्य धारा से दूर रखने का यह सबसे आसान तरीका था जहाँ किसी भी प्रकार के प्रतिरोध की भी गुंजाइश नहीं थी। समाज से उनका परिचय एक बर्बर, असभ्य, असुर के रूप में कराया गया, जिससे आमजनमानस में उनके  प्रति एक नकारका भाव पैदा हो जाये। उनका जिक्र भर आने मात्र से लोगो के मन में घृणा का भाव पैदा हो जाये और बिना किसी प्रयास से उनकी सांस्कृतिक एवं सामाजिक विरासत को खत्म किया जा सके। ग्लोबल गांव के देवतामें रणेन्द्र ने यही चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि -असुरों के बारे में मेरी धारणा थी कि खूब लंबे चैड़े काले कलूटे, भयानक दांत-वांत निकले हुए माथे पर सींग-वींग लगे होगें। लेकिन लालचन को देखकर सब उलट-पुलट हो रहा था। बचपन की सारी कहानियां उलटी धूम रही थी।[6]

            औद्योगिकीकरण ने चारो ओर एक उल्लास का वातावरण बनाया और इसी ने आदिवासी समाज की चीखों को भी जन्म दिया। यहीं से इस समुदाय के समक्ष अपनी संस्कृति की रक्षा का प्रश्न खड़ा हो गया। पूंजीवादी युग ने देशों की सीमाओं को तोड़ दिया और देशों को एक गांव में तब्दील कर दिया। बाजार व्यवस्था ने कच्‍चे माल की मांग में तेजी पैदा कर दिया अतः सीधे-सीधे वन एवं निर्जन प्रदेशों को निशाना बनाया गया। जिस समाज ने अपने निजी एवं अथाह परिश्रम से इस संस्कृति की रक्षा की थी। अपने ऊपर हुए इस अतिक्रमण से विस्मित रह गया परिणमास्वरूप उसने अपनी आत्मरक्षा के लिये गुहार लगाई पर वह पूंजीवाद की सुनामी में बह गई। मजबूरन उसे प्रतिरोध का सहारा लेना पड़ा। जिसके विरोध में उसे विभिन्न नामों (दस्सु, चोर, डकैत, बर्बर) आदि से नवाजा गया। आज चारो ओर से एक निश्चित साजिश के तहत आदिवासियों को मुख्य धारा में आने से रोका जा रहा है। यथास्थिति में बनायें रखने के लिये लोग उन्हें जनजातियकहकर लोग उनके आदिवासी होने की अवधारणा को मानने से इंकार करते रहें हैं, वहीं इनके परम्परागत समाज और संस्कृति की व्याख्या अपने अनुरूप कर उन पर अपने विचारों को थोपने लगे।[7] ये वे लोग हैं जो अपनी सभ्यता संस्कृति को श्रेष्ठ बनाकर उन्हें घृणा और हेय दृष्टि से देखते हैं। पिछड़ा असभ्य जंगली दोयम दर्जे का प्राणी मानते हैं।

            ऐसा कभी नहीं था कि आदिवासी समाज ने विकास न चाहा हो उसकी आंखों में अच्छी जिन्दगी एवं सुनहरे भविष्य के सपने थे। वह भी अपने समाज एवं संस्कृति को मुख्य धारा में चाहता था। उसे उम्मीद थी कि समय के इस परिवर्तन में उनकी पांरपरिक खानाबदोशी संस्कृति को एक निश्चित आधार मिलेगा, किन्तु मुख्य धारा के लोगो का नजरिया उनके प्रति जस का तस बना रहा और वे इतनी आसानी से अपने पंरपरागत पूर्वाग्रहों से मुक्ति नहीं पा सके परिणामतः आदिवासी समुदाय की कठिनाइयां और ज्यादा बढ़ गई। शहरयार की पंक्तियां मौंजू हैं-

धुँए के बादलों में छुप गये उजले मकां सारे

ये चाहा था कि मंजर शहर का बदला हुआ देखें

हमारी बेहिसी पे रोने वाला भी नहीं कोई

चलो जल्दी चलो फिर शहर को जलता हुआ देखें।[8]

वास्तव में इस शोषण प्रक्रिया का मुख्य कारण था आदिवासी समाज का प्रतिरोध के बिना सब कुछ सहन करना। वास्तव में ये अपने सीमित संशाधनों के साथ खुश थे इन्होनें कभी पलटकर विरोध करने का साहस नहीं किया। ये अपनी ही निजी संस्कृति में मस्त रहने वाले लोग थे। अतः धीरे-धीरे ये जकड़ते चले गये। तो क्या प्रतिकार न करना इनकी मजबूरी थी, या इस समाज का हर हाल में शांतिपूर्ण जिंदगी जीना ही मकसद था। ये सीधे सादे लोग थे, जिन्हें इस व्यर्थ के झंझटों से कोई सारोकार ही नहीं था, किन्तु शोषण इस हद तक बढ़ा कि इनके लिये सारे रास्ते ही बंद हो गये अतः संघर्ष का कारण बना उनका विकल्पहीन हो जाना। ये संघर्ष भी मजूबरी में चुना गया।       

यानी कि हजारों हजार साल से पीछे टूटते-टूटते इस पाट पर/धरती का आखिरी छोर। अब यहाँ से कहाँ ? नष्ट करने की प्रक्रिया तो आज भी जारी है। जमीन और बेटियाँ चुप-चुप, शान्त-शान्त, किन्तु रोज छीनी जा रही हैं।[9]

शोषण का प्रमुख कारण इस समाज का बहुत ज्यादा अंधविश्वास और धार्मिक मान्यताओं में यकीन करना था। उन्होनें आधुनिक समाज की प्रमुख पहचान अस्पताल, विश्वविद्यालय और लोकतंत्र पर यकीन नहीं किया और इन तीनों ही चीजों से पर्याप्त उदासीन बने रहे। परिणामतः ज्ञान समाज से क्रेन्द्र और परिधि के रिश्ते में अनचाहे ही बंध गये और इसका फायदा मूल समाज ने आसानी से उठाया और सारे कानून, नियम अपने अनुसार, अपने फायदे के लिये गढ़ लिये और इनको लगातार पंगु बनाते रहे। आदिवासी समुदाय की इसी एक मान्यता को संजीव ने जंगल जहाँ शुरू होता हैमें दर्शाया हैं - साँप की डसी थी, दुलारी धीया न जलाई जा सकती थी, न गाड़ी। बड़े-बुढे़ जो कहते हैं वही करना होता है। बनकटा गाँव के बड़े बुढ़ों की राय है कि लाश का परवाह कर दिया जाय। कई बार तो गंगा मइया खुद है खींच लेती है विष और मुर्दा जी उठता है।[10]  

आधुनिक समय में आदिवासी समाज की प्रमुख समस्या है उनमें नेतृत्व का आभाव आदिवासी समाज की वस्तुस्थिति को समझकर उनको जोरदार तरीके से समाज के सामने रखने तथा अपनी बात कहने वाले व्यक्तित्वका अभाव निरन्तर इस समाज में रहा है अतः मजबूरन उन्हे दूसरो पर यकीन करना पड़ता है और इसी बात का फायदा उठाकर वह व्यक्ति समाज इनका शोषण करता है। लोकतांत्रिक युग में भी आदिवासी समाज मात्र वोट बैंकबनकर रह गया उसकी पूंछ सिर्फ चुनाव के समय ही होती है इसके बाद उन्हें कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता है। मलाल इस बात का था कि सरकार जब चाहती तभी ऐसा कर सकती थी। मगर उसने उसे तब मारा जब चुनाव में उसने इनके प्रतिद्विन्द्वी का साथ दिया। आज अगर दूसरी पार्टी जीती होती तो पशुराम मारा जाता और प्रेमा पुरस्कृत होता। तो क्या डाकुओं का अभ्युदय संरक्षण और सशक्तीकरण वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था की आंतरिक मांग है ? क्या डाकू उन्मूलन संभव नहीं क्योंकि डाकुओं की शिनाख्त आसान नहीं ? क्या वक्त अंतिम पड़ाव पर खड़ा है यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं।[11]

जीवन के हर स्तर पर इनके साथ भेदभाव किया जाता रहा है। इन्हीं की जमीन पर बड़े-बड़े विद्यालय बने पर इनके ही बच्चे यहाँ नहीं पढ़ सकते थे जबकि वह विद्यालय बने आदिवासी समाज के बच्चों की बेहतरी के लिये और उन पर कब्जा है बड़े-बड़े बाबुओं, अफसरों के बेटो को शिक्षा में असमानता के द्वारा इनका मानसिक शोषण होता है। इनको इतनी ही शिक्षा दी जाती है जिससे ये मुख्य समाज में न आये और भूल से आ भी जाते तो सिर्फ क्लर्क, चपरासी ही बने। ग्लोबल गाँव के देवता में रणेन्द्र ने रूमझुम के मुख से कहलवाया है- आखिर हमारी छाया से क्यो चिढ़ते हैं ये लोग माड़-भात खिलाकर अधपड़-अनपढ़ शिक्षको के भरोसे, फुसलावन स्कूल के हमारे बच्चे ज्यादा से ज्यादा स्किल्ड लेबर, पिऊन, क्लर्क बनेंगे और क्या यही हमारी औकात है शिक्षा तक बात नहीं बनती बल्कि नौकरियों में इनके साथ भेद-भाव किया जाता है। इनकी शिक्षा के मुताबिक इनको नौकरी नहीं दी जाती है। जिससे समाज में भी बार-बार इनको जलील होना पड़ता है। नया काम सिखाने के बदले उन्हें बात-बात पर जलील किया जाता था।[12]

रुमझुम के संस्कृत आनर्स इतिहास की जानकारी से उनको मतलब नहीं था। वह फील्ड में लेबर के साथ मेठ का काम करना चाहता था तो उसे एकाउंट्स के कैश बुक थमा दिये गये। एकाउन्ट में मन नहीं लगता। गलतियाँ होती तो और जोरदार माईनिग आफिस का इसे चपरासी भी मजाक उड़ाता और यह बात रूमझुम के दिल पर दिल पर लगती।[13]

            समस्या यह है कि सरकारी योजनाएं तो बनती है पर उनका दूर-दूर तक इस समुदाय से वास्ता ही नहीं होता है। बल्कि वो बड़ी-बड़ी कंपनियों के हित में होती है और नाम दे दिया जाता है आदिवासी समुदाय के लिये।इसके बाद सबकुछ सभ्य समाज के हिसाब से शुरू होता है ।जैसे ही विरोध होता है, एक चादर  फ़ैला दी जाती है।जिसे असभ्यता एवं बर्वरता का मुखौटा  पहनाया जाता है। तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सबसे पहले अपने साथ नत्थी असभ्य बर्वर जैसे शब्दों से दूरी बनाना जरूरी है - यहाँ दुर्गावती जलाशय परियोजना में चोरो आदिवासियों के कई गाँव दूर-क्षेत्र में पड़ रहे थे। विस्थापन मोर्चा ने बाँध के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था किन्तु कोर्ट का निर्णय बाँध के पक्ष में आ गया। आंदोलन की कमर टूट गई। विस्थापन अवश्यम्भावी था। अतः पुनर्वास को लेकर हलचल शुरू हुई थी। जीवेश जी और ऋषभ को अपने शोध के लिये मैटेरियल्स यहीं मिलने थे। यही होना था फील्ड सर्वे और जमीनी अध्ययन।[14]  

            आदिवासी विमर्श यद्यपि थोड़ा देरी से समाज एवं साहित्य में आया और यदि कहा जाये कि अभी इसने अपनी प्रौढ़ा अवस्था को प्राप्त नहीं किया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज हम आदिवासी साहित्य का समग्र विवेचन करें जो हमें  एक सीमित साहित्य ही उपलब्ध मिलता है। इन सबके बावजूद एक अच्छी बात है वह यह है कि आदिवासी विमर्श में कोई प्रतिबंध नहीं है कि सिर्फ आदिवासी समाज के लोग ही आदिवासी विमर्श के बारे में अच्छा लिख पायेगें उनकी संवेदना को समझ पायेगें, जैसा कि स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के बारे में कहा गया कि पीडि़त व्यक्ति ही पीड़ा को समझ पायेगापर यहाँ ऐसा कुछ नहीं है और यह इस विमर्श की सफलता के लिये बहुत आवश्यक है। आदिवासी समाज की पीड़ा को समझकर सिर्फ सहानुभूति दिखाने भर जरूरत नहीं है, जरूरत है एक ठोस रणनीति के तहत उन पर हो रहे अत्याचारों का डटकर मुकाबला करने की तभी इस विमर्श की सफलता एवं सार्थकता सिद्ध होगी।

            जरूरत है तकनीकी विकास के साथ-साथ मनुष्यता को बचाये रखने की जो कि बहुत तेजी से आपके समाज से गुम होती जा रही है सिर्फ नारेबाजी से काम नहीं चलने वाला बल्कि उस त्रासदी को जो सदियों से आदिवासी समाज के साथ बीत रही है कि समझने की जरूरत है, तभी इस समस्या का सही निदान संभव हो पायेगा। शेरजंग गर्ग की पक्तियों में समझे तो -

मेरे समाज की हालत सही-सहीं मत पूँछ

 कहाँ-कहाँ से गया टूट आदगी मत पूँछ

हरेक शख्स शामिल है जहाँ नौटंकी में

वहाँ है आदमी ज्यादा या त्रासदी मत पूँछ।[15]

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची

 


[1] पुस्तक वार्ता - द्वैमासिक पत्रिका, सं. राकेश श्रीमाल, अंक 48-49, सितम्बर दिसम्बर पृष्ठ-23

[2] कथा पत्रिका, सं. मार्कण्डेय अंक 14 अक्टूबर 2009, पृष्ठ-127

[3] साखी त्रैमासिक पत्रिका, सं. सदानन्द शाही, अंक 18-19 अक्टूबर 08, मार्च 09 ,पेज-56

[4] समकालीन जनमत, सं. सुधीर सुमन अंक 2 वर्ष 25 मई 06,पेज-42

[5] आदिवासी कौन, सं. रमणिका गुप्ता, राधाकृष्ण प्रकाशन दरियागंज, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2008 ,पृष्ठ-7

[6] ग्लोबल गाँव के देवता, रणेन्द्र, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, तृतीय संस्करण 2011 पृष्ठ-11

[7] आदिवासी कौन, सं. रमणिका गुप्ता, राधाकृष्ण प्रकाशन दरियागंज, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2008, पृष्ठ-108

[8] दैनिक जागरण, दैनिक अखबार, इलाहाबाद संस्करण वर्ष 2013

[9] ग्लोबल गाँव के देवता, रणेन्द्र, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, तृतीय संस्करण, नई दिल्ली,पृष्ठ-108

[10] जंगल जहाँ से शुरू होता है, संजीव ,पृष्ठ-22

[11] अनुसंधान, त्रैमासिक शोध पत्रिका, सं. शगुफ्ता नियाज अप्रैल, जून 2014 पृष्ठ-38

[12] ग्लोबल गाँव के देवता, रणेन्द्र, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, तृतीय संस्करण, नई दिल्ली,पृष्ठ-19

[13] वही, पृष्ठ-64

[14] रात बाकी व अन्य कहानियाँ, रणेन्द्र, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010, पृष्ठ-10

[15] नूतनवाग्‍धारा, सं. अश्विनीकुमार शुक्ल,डॉ गया प्रसाद सनेही अंक 1, जनवरी मार्च 2010,पृष्ठ-17

संपर्क : शोध छात्रहिन्दी विभागडॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालयसागरम.प्र. मोबाइल- 09179613730 gaur.abhishek12@gmail.com


परिवर्तन, अंक 2 अप्रैल-जून 2016 में प्रकाशित
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