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Showing posts from August, 2025

सामाजिक परिवर्तन में फोटोग्राफी की भूमिका

तस्वीरें हमारे जीवन का एक अनमोल हिस्सा होती हैं। छोटी से छोटी तस्वीर में भी एक पूरी दुनिया समा सकती है, चाहें वह एक बच्चे की हँसी हो, सूर्यास्त की लालिमा हो या किसी अनजान जगह की सुंदरता इत्यादि। लेकिन, तस्वीरें केवल खूबसूरती को ही कैद नहीं करतीं बल्कि इतिहास की सच्चाई को सहेजती हैं और समयानुसार उन्हें उजागर करती हैं। कई बार इन तस्वीरों की वजह से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन भी देखने मिलता है। तस्वीरें खींचने की कला को अंग्रेजी में फोटोग्राफी कहा जाता है। इस कला की अहमियत के कारण हर साल 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है। इस लेख में, हम फोटोग्राफी की शुरुआत और इसके कुछ ऐतिहासिक किस्सों के बारे में विस्तार से बात करेंगे। फोटोग्राफी की शुरुआत तकरीबन दो सौ साल पहले शुरू हुई थी। उससे पहले यादों को सहेजने का एकमात्र तरीका चित्रकारी था। लेकिन 1826 में, फ्रांस के जोसेफ नाइसफोर नीप्स ने दुनिया की पहली स्थायी तस्वीर खींची। यह तस्वीर उनकी खिड़की से दिखने वाले दृश्य की थी, जिसे बनाने में लगभग आठ घंटे से ज्यादा का समय लगा था। इसे देखकर लोग पहली बार यह जान पाये कि किसी दृश्य को कागज पर...

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आदिवासियों का विस्थापन : कारण, प्रभाव और समाधान

विश्व की लगभग 47.6 करोड़ आबादी, यानी कुल जनसंख्या का लगभग छह प्रतिशत, आदिवासी समुदायों की है। इन समुदायों का अपनी भूमि, परंपराओं और प्रकृति से गहरा जुड़ाव है, इसलिए वे कभी उसे छोड़ना नहीं चाहते। बावजूद इसके उनका विस्थापन होता रहा है। आज भी यह विस्थापन लगातार जारी है जिसे एक गंभीर वैश्विक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखकर 2001 में डरबन घोषणा में उनके आत्मनिर्णय, भूमि और संसाधन अधिकारों को मान्यता दी गयी थी, मगर इसका उल्लंघन आज भी जारी है।  इस लेख में आदिवासियों के विस्थापन (खासकर 2001 के बाद) के कारणों का विश्लेषण एवं उनके प्रभावों की पड़ताल करते हुए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। चित्र : गूगल से साभार संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार विश्व मे आदिवासी समुदायों की संख्या 37 से 50 करोड़ के बीच हैं। वे अपनी पैतृक भूमि पर निर्भर हैं। उनकी संस्कृति और आजीविका प्रकृति से जुड़ी है, मगर विकास परियोजनाएं और पर्यावरणीय बदलाव उन्हें उखाड़ रहे हैं। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक ढांचे नष्ट हो रहे हैं। डरबन घोषणा में उनके अधिकारों क...

प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान (संदर्भ : प्रेमचंद) और काव्य पाठ का आयोजन

जन संस्कृति मंच, गिरिडीह द्वारा दिनांक 03.08.25 को 'प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान' के तहत 'हिंदी-उर्दू लेखन (संदर्भ : प्रेमचंद) एवं कवि गोष्ठी' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम दो सत्रों में था। पहला सत्र व्याख्यान एवं दूसरा सत्र काव्य गोष्ठी का था।  व्याख्यान सत्र के मुख्य वक्ता थे डॉ. गुलाम समदानी और डॉ. शैलेन्द्र कुमार शुक्ल। डॉ. समदानी ने कहा कि प्रेमचंद भारतीय जीवन के कथाकार थे और उनकी ख्याति अंतरराष्ट्रीय है। प्रेमचंद की रचनाशीलता के केंद्र में थी आजादी और उनकी कोशिश मानव हृदय में जड़ जमाई हर तरह की गुलामी को निकाल बाहर करना था। इसके लिए उन्होंने आम अवाम की भाषा को अपनाया। हिंदी-उर्दू  के माध्यम से उन्होंने किसानों, मजदूरों, बच्चों, दलितों और महिलाओं के जीवन की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत की।  डॉ. शैलेन्द्र कुमार शुक्ल ने कहा कि सांप्रदायिकता कभी धर्म को तो कभी भाषा को आधार बनाती है। उन्होंने प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू के उस वक्तव्य का जिक्र किया जिसमें उन्होंने लेखन के लिए आम आदमी की समझ की भाषा को जरूरी बताया था। शैलेन्द्र ने प्रेमचंद की भाषा को भारतीय स...