संरचनावाद वास्तव में अंग्रेजी शब्द 'स्ट्रक्चरलिज्म' का हिंदी पर्याय है, जो पाश्चात्य समीक्षा जगत से हिंदी में आया और 1960 के दशक के फ्रांस में विकसित बौद्धिक विश्लेषण एवं चिंतन की वह पद्धति बनी जिसने पूरे विश्व के ज्ञान-विज्ञान के प्रतिमानों को आधारभूत रूप से बदल दिया। संरचनावाद एक व्यापक और गहन बौद्धिक व्यवस्था का सिद्धांत है, जिसकी व्याप्ति में जीवविज्ञान, अर्थशास्त्र, नृत्तत्वशास्त्र और साहित्य जैसे परस्पर भिन्न प्रतीत होने वाले विषयों को भी एक ही सूत्र में समेटा जा सकता है। इस विचारधारा की सबसे मौलिक स्थापना यह है कि संसार की कोई भी वस्तु अपने आप में पूर्ण या स्वतंत्र इकाई नहीं है; हर वस्तु का एक अवयव होता है और उसके अपने विशिष्ट घटक होते हैं जो आपस में एक गहरे और अनिवार्य संबंध से जुड़े रहते हैं। संरचनावाद के अनुसार, किसी भी घटक का अस्तित्व उसके अकेलेपन में नहीं, बल्कि उसके संबंधों में निहित है। वह एक ओर अपने निकटवर्ती घटक से संबद्ध होता है और दूसरी ओर उस पूरे अवयवी या संपूर्ण इकाई के साथ जिसे हम 'संरचना' कहते हैं। इसी विवेचन की पद्धति को जब अकादमिक धरातल पर परखा गया, तब इसे 'संरचनावाद' का नाम दिया गया। यदि हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में झांकें तो संरचना को बौद्धिक चिंतन की विषय-वस्तु बनाने का प्रयास अरस्तू की कालजयी कृति 'पोएटिक्स' (Poetics) तक पीछे जाता है, जहाँ उन्होंने रूप और संगठन के महत्व को रेखांकित किया था। सत्रहवीं शताब्दी में जहाँ इसका प्रयोग प्रायः 'बनावट' के अर्थ में किया गया, वहीं अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी तक आते-आते यह भौतिक और प्राणि जगत की कार्य प्रणालियों को वैज्ञानिक ढंग से समझने का मुख्य आधार बन गया। जैसा कि डॉ. बच्चन सिंह अपनी पुस्तक 'हिंदी आलोचना के बीज शब्द' में स्पष्ट करते हैं, 'संरचनावाद का आगमन हिंदी में पाश्चात्य स्रोतों के माध्यम से हुआ, लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।'
संरचनावाद को एक सुव्यवस्थित और अकादमिक पद्धति के रूप में स्थापित करने का वास्तविक श्रेय स्विस भाषाविद फर्डिन्वेन्ड सास्योर को दिया जाता है। सास्योर ने अपनी विख्यात कृति 'कोर्स इन जनरल लिंग्विस्टिक्स' (Course in General Linguistics) के माध्यम से भाषा की आंतरिक बुनावट का जो ब्यौरा प्रस्तुत किया, उसने आधुनिक भाषाविज्ञान की दिशा ही बदल दी। सास्योर का सबसे मौलिक तर्क यह था कि भाषा के दो अनिवार्य रूप होते हैं—'लांग' (Langue) और 'परोल' (Parole)। 'ल लांग' को हम एक अमूर्त और अंतर्वैयक्तिक भाषा व्यवस्था कह सकते हैं, जो पूरे समाज में वैचारिक संप्रेषण को संभव बनाती है। यह व्यवस्था किसी व्यक्ति विशेष की इच्छा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि भाषा समुदाय के सभी सदस्यों के लिए एक अनिवार्य सामाजिक अनुबंध की तरह होती है। इसके विपरीत, 'ल परोल' व्यक्ति-विशेष की वह तात्कालिक और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है जिसे वह दैनिक जीवन में प्रयोग करता है। सास्योर ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि परोल का क्षेत्र अत्यंत सीमित, व्यक्तिगत और निरंतर परिवर्तनशील है; इसीलिए राम द्वारा उच्चारित शब्द और श्याम द्वारा उच्चारित उसी शब्द के उच्चारण और लहजे में भिन्नता हो सकती है। इसी परिवर्तनशीलता के कारण परोल का वैज्ञानिक अध्ययन करना संभव नहीं है। ज्ञान का असली अनुसंधान तो 'लांग' के उन नियमों में छिपा होता है जो अदृश्य रूप से परोल को नियंत्रित करते हैं।
भाषा को संकेतों की एक जटिल प्रणाली के रूप में परिभाषित करते हुए सास्योर ने इसके दो अभिन्न अंगों का प्रतिपादन किया—संकेतक (Signifier) और संकेतित (Signified)। संकेतक वह भौतिक ध्वनि, चित्र या लिखित शब्द है जो हमारी इंद्रियों को संकेत देता है, जबकि संकेतित वह मानसिक विचार या अर्थ है जो समाज उस संकेत के साथ जोड़ देता है। इन दोनों के मिलन से ही 'चिह्न' या 'प्रतीक' की रचना होती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि संकेतक और संकेतित के बीच का संबंध पूरी तरह से 'स्वच्छंद' (Arbitrary) और सामाजिक नियमों पर आधारित होता है। जैसे, चौराहे पर जलने वाली लाल बत्ती स्वयं में 'खतरा' नहीं है, बल्कि समाज ने सर्वसम्मति से उसे खतरे के अर्थ में परिभाषित किया है। अर्थ की यह सामाजिक निर्मिति ही संरचनावाद का प्राण है। यदि हम इसे भारतीय संदर्भ में देखें, तो सास्योर का यह 'संकेतक-संकेतित' संबंध भारतीय 'शब्द-शक्ति' विमर्श के काफी निकट प्रतीत होता है। आचार्य मम्मट और विश्वनाथ ने जिस प्रकार 'अभिधा' और 'लक्षणा' के माध्यम से शब्द और अर्थ के संबंधों की व्याख्या की, वह संरचनावाद के भाषाई विश्लेषण को एक नया भारतीय आयाम प्रदान करती है। भारतीय दर्शन का 'स्फोट सिद्धांत' भी इसी ओर संकेत करता है कि शब्द के उच्चारित होने के बाद जो अर्थ का 'विस्फोट' मस्तिष्क में होता है, वह एक सामूहिक भाषाई व्यवस्था का ही परिणाम है। प्रो. सत्यदेव मिश्र अपनी कृति 'पाश्चात्य काव्यशास्त्र: अधुनातन संदर्भ' में इसी भाषाई बुनावट की ओर संकेत करते हैं।
संरचनावाद के विकास और इसे नृविज्ञान के साथ जोड़ने में दूसरा ऐतिहासिक नाम क्लाउड लेवी स्ट्रास का है। स्ट्रास ने सास्योर की भाषाई पद्धति का अत्यंत मौलिक प्रयोग सांस्कृतिक परिदृश्यों, मिथकों और रक्त संबंधों के रहस्यों को सुलझाने के लिए किया। उन्होंने यह क्रांतिकारी विचार दिया कि जिस प्रकार भाषा के पीछे एक व्याकरण कार्य करता है, उसी प्रकार मानव समाज की हर संस्कृति के पीछे भी एक 'सांस्कृतिक व्याकरण' होता है। स्ट्रास का मानना था कि दुनिया के विभिन्न कोनों में प्रचलित मिथक भले ही ऊपरी तौर पर अलग दिखें, लेकिन उनके पीछे का बुनियादी ढांचा या 'लांग' एक जैसा ही होता है। उन्होंने अपनी शोधपरक व्याख्याओं में सिद्ध किया कि मानव मस्तिष्क की संरचना ही कुछ ऐसी है कि वह संसार को 'विरोधी जोड़ों' (Binary Opposites) में देखता है, जैसे- जीवन और मृत्यु, प्रकृति और संस्कृति, पुरुष और स्त्री। कोई भी सांस्कृतिक चिह्न कभी अकेले में अर्थ पैदा नहीं करता, बल्कि वह अपने विरोधी के संदर्भ में ही पहचाना जाता है। स्ट्रास ने यह भी रेखांकित किया कि अक्सर मिथकों को रचने वाले या उनका पालन करने वाले लोग भी उनके भीतर छिपे गूढ़ अर्थों और संरचनात्मक नियमों से अनजान रहते हैं, क्योंकि ये नियम अवचेतन स्तर पर कार्य करते हैं।
साहित्यिक आलोचना के धरातल पर रोलाँ बार्थ ने संरचनावाद को एक नया विस्तार दिया। बार्थ ने 'मिथोलॉजीज़' (Mythologies) और 'द फैशन सिस्टम' (The Fashion System) जैसी रचनाओं में यह दिखाया कि कैसे विज्ञापन, कुश्ती के खेल, टी.वी. धारावाहिक और यहाँ तक कि पाक कला भी संकेतों की एक भाषा की तरह काम करते हैं। बार्थ का 'लेखक की मृत्यु' (Death of the Author) वाला विचार विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसे उन्होंने अपने संकलन 'इमेज-म्यूजिक-टेक्स्ट' (Image-Music-Text) में विस्तार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जैसे ही कोई रचना पूरी होकर पाठक के सामने आती है, उस पर लेखक का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। अर्थ लेखक की व्यक्तिगत भावनाओं में नहीं, बल्कि उस 'पाठ' (Text) की अपनी आंतरिक संरचना में सिमट जाता है। बार्थ के अनुसार, साहित्य निर्माण की प्रक्रिया में पांच प्रमुख नियम (व्याख्या संहिता, चिह्न संहिता, प्रतीकात्मकता, क्रिया व्यापारिक संहिता और सांस्कृतिक संहिता) एक सूक्ष्म संजाल की तरह सक्रिय रहते हैं। यदि हम इस विचार की तुलना भारतीय 'साधारणीकरण' के सिद्धांत से करें, तो हम पाते हैं कि जिस प्रकार साधारणीकरण में कवि का व्यक्तिगत भाव 'लोक-भाव' बन जाता है, वैसे ही संरचनावाद में लेखक का निजी अनुभव 'भाषाई संरचना' में विलीन हो जाता है। जैसा कि रामचंद्र तिवारी ने 'भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की रूपरेखा' में विश्लेषण किया है, यह सिद्धांत साहित्य को लेखक की निजी संपत्ति से मुक्त कर एक सामाजिक उत्पाद बना देता है।
संरचनावाद की इस यात्रा में लुई अल्थ्यूसर और माइकेल फूको जैसे विचारकों ने सत्ता और विचारधारा के साथ इसके संबंधों को उजागर किया। अल्थ्यूसर ने मार्क्सवादी नजरिए से यह समझाने का प्रयास किया कि भाषा और विचार व्यक्तिगत नहीं होते, बल्कि वे उन 'वैचारिक संरचनाओं' (Ideological Apparatuses) की देन होते हैं जिनमें हम सांस लेते हैं। हम जो सोचते हैं, वह दरअसल उस व्यवस्था का नतीजा है जो हमें एक खास तरह से सोचने के लिए 'इंटरपेलेट' (Interpellate) यानी पुकारती है। यहाँ संरचनावाद केवल साहित्य की समीक्षा नहीं रह जाता, बल्कि वह समाज की गहरी परतों को खोलने वाला एक राजनैतिक हथियार बन जाता है। मार्क्सवादी संरचनावाद ने यह स्पष्ट किया कि सत्य कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि वह ऐतिहासिक और सामाजिक संरचनाओं के भीतर निर्मित एक उत्पाद है।
हालांकि, संरचनावाद की अपनी सीमाएं भी हैं। इसकी सबसे बड़ी आलोचना यह कहकर की जाती है कि यह 'मानवीय संवेदना' और 'इतिहास' को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देता है। यह किसी कृति को एक स्थिर और जड़ ढांचे के रूप में देखता है, जबकि साहित्य निरंतर परिवर्तनशील और प्रवाहमान होता है। संरचनावाद पाठ को एक बंद कमरे की तरह मान लेता है जहाँ केवल भाषा के खेल चलते हैं, लेकिन पाठक के अपने अनुभव और इतिहास की भूमिका यहाँ गौण हो जाती है। इसी कमी को दूर करने के लिए आगे चलकर 'उत्तर-संरचनावाद' का उदय हुआ। जाक देरिदा ने सास्योर की 'स्थिर संरचना' को चुनौती दी और कहा कि अर्थ कभी भी निश्चित नहीं होता; वह निरंतर सरकता रहता है (Difference)। देरिदा के 'विखंडन' (Deconstruction) ने संरचनावाद की जड़ों को हिला दिया और यह सिद्ध किया कि किसी भी पाठ का कोई एक अंतिम अर्थ संभव नहीं है।
आज के हिंदी आलोचना परिदृश्य में संरचनावाद एक अनिवार्य विमर्श है। डॉ. गोपीचंद नारंग ने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक 'संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र' में इन सिद्धांतों को भारतीय संदर्भों में स्थापित करने का सबसे गंभीर प्रयास किया है। संरचनावाद का मानना है कि किसी भी रचना का मूल्यांकन केवल उसके 'कथ्य' (Content) के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी 'बुनावट' (Texture) के आधार पर भी किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब हम प्रेमचंद के 'गोदान' को पढ़ते हैं, तो संरचनावादी नजरिया हमें होरी की त्रासदी देखने के साथ-साथ उन सामाजिक और भाषाई संकेतों को पकड़ने की भी प्रेरणा देता है जो उस समय के ग्रामीण भारत की सामंती और औपनिवेशिक संरचना का निर्माण कर रहे थे।
निष्कर्षतः, संरचनावाद वह वैज्ञानिक दृष्टि है जिसने हमें यह आभास कराया कि हम दुनिया को वैसा नहीं देखते जैसी वह है, बल्कि वैसा देखते हैं जैसी हमारी भाषा और समाज की संरचना हमें दिखाती है। यह हमें एक ऐसी आलोचनात्मक चेतना प्रदान करता है जो हमें शब्दों के पीछे छिपे सत्ता के खेल और संस्कृति के गुप्त कोड्स को समझने में मदद करती है। भले ही उत्तर-संरचनावाद ने इसकी स्थिरता पर सवाल उठाए हों, लेकिन आज भी किसी भी गहरे विश्लेषण की शुरुआत संरचनावाद के उसी मूलभूत प्रश्न से होती है कि- "इस रचना के पीछे का वह ढांचा क्या है जो इसे अर्थ प्रदान कर रहा है?" यह पद्धति हमें आभास कराती है कि हम जिसे अपनी मौलिक अभिव्यक्ति समझते हैं, वह दरअसल भाषा और संस्कृति की उस महा-संरचना का ही एक अंश है जो सदियों से हमारे अस्तित्व को आकार दे रही है। अतः, संरचनावाद का अध्ययन केवल साहित्य मात्र का अध्ययन नहीं, बल्कि मानव मेधा और उसकी सृजन प्रक्रिया के गुप्त मानचित्र को खोजने का एक अनंत प्रयास है।
संदर्भ सूची :
1. सास्योर, फर्डिनाेंड डी (1916, कोर्स इन जनरल लिंग्विस्टिक्स, कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस।
2. बार्थ, रोलाँ (1977), इमेज-म्यूजिक-टेक्स्ट।
3. नारंग, गोपीचंद (1993), संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र, साहित्य अकादमी, दिल्ली।
4. सिंह, बच्चन (2001), हिंदी आलोचना के बीज शब्द, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली।
5. मिश्र, सत्यदेव (1998), पाश्चात्य काव्यशास्त्र : अधुनातन संदर्भ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।
6. तिवारी, रामचंद्र (1997), भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की रूपरेखा, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।
7. लेवी स्ट्रास, क्लाउड (1958), स्ट्रक्चरल एंथ्रोपोलॉजी।
8. अल्थ्यूसर, लुई (1970), आइडियोलॉजी एंड आइडियोलॉजिकल स्टेट अपरेटस।
संपर्क : गिरिडीह, झारखंड
ईमेल : mahesh.pu14@gmail.com

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