आशा भोंसले की गायकी में स्त्री-स्वतंत्रता और समानता | महेश सिंह

हिंदी सिनेमा के लंबे इतिहास में आशा भोंसले को सिर्फ एक पार्श्व गायिका के रूप में देखना मुझे लगता है हमारी अधूरी समझ होगी। साठ और सत्तर के दशक का भारतीय समाज और सिनेमा एक बहुत ही तयशुदा रास्ते पर चल रहा था। उस समय फिल्मों में औरतों की दो मुख्य छवियां होती थीं। एक तरफ मुख्य नायिका होती थी, जो एक आदर्श महिला मानी जाती थी। उसका काम दुख सहना, परिवार के लिए त्याग करना और खामोश रहना था। संगीत की दुनिया में इस 'आदर्श' नायिका के लिए एक खास तरह की धीमी और गंभीर आवाज पहले से तय थी।

दूसरी तरफ वे औरतें थीं जो आधुनिक कपड़े पहनती थीं, क्लब में जाती थीं या फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं निभाती थीं। समाज की नजर में ये औरतें 'अच्छी' नहीं मानी जाती थीं। सिनेमा में जब इन दूसरी तरह की औरतों के लिए गाने की बात आई, तो उस समय की ज्यादातर स्थापित गायिकाओं ने ऐसे गानों से दूरी बनाए रखी। यहीं से आशा भोंसले का असली सफर शुरू होता है। उन्होंने उन गानों को गाना स्वीकार किया जिन्हें गाने से बाकी लोग बचते थे।  
जब हम उनके द्वारा गाया यह 'पिया तू अब तो आजा' सुनते हैं, तो लगता है कि यह नाच-गाने और तेज वाद्ययंत्रों वाला संगीत है। लेकिन ठहर कर समझें तो इस गाने के भीतर उस समय के समाज पर सीधा प्रहार है। इस गाने में जो औरत है, वह अपनी इच्छाओं और अपनी कामुकता को लेकर किसी तरह के दबाव या शर्मिंदगी में नहीं है। वह अपनी जरूरत और अपनी चाहत को बहुत ही खुलकर और बेखौफ होकर सामने रख रही है। उस दौर के समाज में जहां एक आम औरत का अपनी इच्छाओं के बारे में बात करना भी गलत माना जाता था, वहां आशा भोंसले ने अपनी आवाज से एक बहुत ही निडर और बेबाक उदाहरण पेश किया। 'मोनिका ओ माय डार्लिंग' के बीच में उनकी जो तेज और हाफती हुई आवाज है, वह किसी भी तरह के अपराधबोध से मुक्त एक आजाद औरत की आवाज है।  
इसी तरह 'ओ हसीना जुल्फों वाली' और 'जवानी जानेमन हसीन दिलरुबा' जैसे गानों को देखें। इन गानों में आशा भोंसले की आवाज बहुत ही तेज गति से चलती है। 'जवानी जानेमन' गाने में एक ऐसी औरत है जो खुद शिकार नहीं है, बल्कि वह सामने वाले को चुनौती दे रही है। ‘शिकारी खुद यहां शिकार हो गया’ जैसी पंक्तियों को आशा भोंसले ने जिस ऊर्जा के साथ गाया है, वह औरतों की एक नई और मजबूत छवि गढ़ता है। औरतें सिर्फ कोमल या कमजोर नहीं होतीं, वे तेज, चतुर और अपने फैसले खुद लेने वाली भी हो सकती हैं। आशा भोंसले ने पश्चिमी धुनों और तेज संगीत के बीच अपनी आवाज को कभी दबने नहीं दिया।  

हालाँकि आशा ताई की पहचान सिर्फ इसी तेज या आधुनिक संगीत तक सीमित नहीं है। वह आम जिंदगी और रोजमर्रा के प्यार को भी अपनी आवाज में जगह देती हैं। 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' गाना इसका सबसे सटीक उदाहरण है। इस गाने की शुरुआत गिटार की धुन और कांच के गिलास के टकराने की आवाज से होती है। जब आशा भोंसले गाना शुरू करती हैं, तो उनकी आवाज में कोई भारीपन या दुख नहीं होता। उनकी आवाज में एक नई उम्र की लड़की की सामान्य खुशी और अल्हड़पन है। इससे पहले हिंदी फिल्मों में प्यार को एक बहुत ही भारी, जानलेवा और अलौकिक जज्बे की तरह दिखाया जाता था, जिसके लिए नायक-नायिका मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे। लेकिन आशा भोंसले के इस गाने में प्यार एक बहुत ही स्वाभाविक और आम प्रक्रिया है।
यही बात 'ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा' और 'एक मैं और एक तू' जैसे गानों पर लागू होती है। ये दोनों गाने युगल गीत (डुएट) हैं जहां आशा भोंसले एक पुरुष गायक के साथ गा रही हैं। इन गानों में एक बहुत ही बराबरी का संवाद है। यह एक ऐसी बातचीत है जहां पुरुष हावी नहीं है और औरत कमजोर नहीं है। 'ना बोले तुम' गाने में जो एक चुलबुलापन है, वह बताता है कि प्यार कोई आसमान से उतरी हुई चीज नहीं है। यह धूप में खिलने वाले फूल की तरह रोजमर्रा का सहज एहसास है। आशा जी ने इसे गाते हुए यह स्थापित किया कि औरतों का प्रेम सिर्फ त्याग और आंसुओं से नहीं बनता, बल्कि उसमें हंसी, मजाक और बराबरी का पूरा हिस्सा होता है। यहां औरत कोई देवी न होकर एक आम इंसान है जो बिना कुछ कहे भी अपने साथी को समझ सकती है और उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकती है।
औरत के अपने अधिकार और अपनी मर्जी की बात 'अभी ना जाओ छोड़कर' गाने में और भी गहराई से सामने आती है। हिंदी फिल्मों में यह एक बहुत ही आम दृश्य होता था कि जब नायक कहीं जा रहा होता है, तो नायिका या तो सिर्फ आंसू बहाती है या दूर से उसे जाते हुए देखती है। लेकिन इस गाने में स्थिति बिल्कुल अलग है। इसमें नायिका अपने प्रेमी को पूरे अधिकार के साथ रोक रही है। वह कह रही है कि ‘दिल अभी भरा नहीं’। यह एक ऐसी स्त्री की मांग है जो अपने भावनात्मक खालीपन को समझती है और उसे छिपाने के बजाय खुलकर सामने रखती है। इसमें एक तरह की जिद है, एक मनुहार है और अपने रिश्ते पर अपना पूरा हक जताने की भावना है। यह अपने आप में एक बहुत ही आधुनिक और स्पष्ट सोच है जहां औरत जानती है कि उसे अपने समय और अपने रिश्ते से क्या चाहिए और वह उसे मांगने में संकोच नहीं करती।
आशा भोंसले की गायकी का एक और बहुत ही मजबूत और अलग पक्ष 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं' जैसी गजल में देखने को मिलता है। एक तरफ जहां वह पाश्चात्य संगीत पर क्लब में गाती हुई एक आधुनिक लड़की की बेबाक आवाज बनती हैं, वहीं दूसरी तरफ वह कोठे पर बैठी एक तवायफ की पीड़ा और उसके अनुभव को भी उसी गहराई से सामने लाती हैं। इस गजल में शास्त्रीय संगीत की बहुत गहरी पकड़ दिखाई देती है। उर्दू शब्दों का बिल्कुल साफ और सटीक उच्चारण है। यहां तवायफ को समाज सिर्फ भोग की एक वस्तु मानता है, लेकिन आशा भोंसले की आवाज उस तवायफ को एक गरिमा प्रदान करती है। ‘कहने को तो दुनिया में मैखाने हजारों हैं’ गाते हुए उनकी आवाज में जो एक ठहराव और समाज के दोहरेपन पर जो एक व्यंग्य है, वह बहुत ही स्पष्ट है।  
उनके अपने जीवन का यथार्थ और गायकी का संघर्ष 'दो लफ्जों की है दिल की कहानी' गीत में एकदम साफ झलकता है। इस गीत की शुरुआत इतालवी भाषा से होती है और फिर यह जीवन के सुख और दुख को बहुत ही सामान्य तरीके से स्वीकार करने की बात करता है। आशा भोंसले का अपना व्यक्तिगत जीवन भी कभी आसान नहीं रहा। बहुत छोटी उम्र में पति से अलग होना, अकेले अपने बच्चों की जिम्मेदारी उठाना, और एक ऐसे सिनेमा जगत में अपनी जगह बनाना जहां पहले से ही बड़ी और स्थापित गायिकाओं का राज था, यह सब एक स्त्री के लिए कोई सामान्य बात नहीं कही जा सकती। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें जो गाने मिले, उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं चुने थे, बल्कि वह उनकी उनकी जरूरत थी। लेकिन उन्होंने मुश्किलों से भागने या हार मानने के बजाय उन मुश्किल हालातों को ही अपना पेशा और अपनी ताकत बना लिया। इस गाने में उनकी आवाज में जो एक परिपक्वता और जीवन को जस का तस स्वीकार करने की जो समझ है, वह उनके अपने जीवन का अनुभव है।

जब हम 'इंतहा हो गई इंतजार की' गाना सुनते हैं, तो देखते हैं कि गाने का पहला हिस्सा पूरी तरह से पुरुष की बेचैनी, उसकी शिकायत और उसके इंतजार से भरा हुआ। लेकिन जैसे ही आखिरी हिस्से में आशा भोंसले की आवाज ‘लो मैं आ गई’ के साथ जुड़ती है, पूरे गाने का माहौल एक अजीब से ठहराव में बदल जाता है। पुरुष के तेज और अनियंत्रित जज्बातों को एक स्त्री की उपस्थिति और उसकी शांत आवाज कैसे संभाल सकती है, यह इस गाने के ढांचे में बहुत स्पष्ट है। इसी तरह 'प्यार का दर्द है मीठा मीठा' में वह रिश्तों के दर्द को जीवन का  स्वाभाविक हिस्सा मानती हैं। यह सच है कि रिश्तों में दर्द होता है, लेकिन उस दर्द से टूटने के बजाय उसे जीवन का एक हिस्सा मानकर आसानी से जिया जा सकता है। 'ये देख के दिल झूमा' गाने में प्रकृति और प्रेम को देखकर जो खुशी मिलती है, उसे उन्होंने बिल्कुल एक छोटे बच्चे जैसी खुशी और स्पष्टता के साथ उन्होंने गाया है।
अगर इन सभी गानों को एक साथ रखकर आशा भोंसले के सफर को देखा जाए, तो यह एक ऐसी कामकाजी और स्वतंत्र स्त्री की कहानी बन जाती है जिसने किसी भी तय ढांचे के सामने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने सिनेमा में उन औरतों की पैरवी की और उन्हें आवाज दिया जिन्हें समाज आमतौर पर सुनना या देखना पसंद नहीं करता था। उनके गायन में कहीं भी कला का कोई झूठा दिखावा या बनावटीपन नहीं है। उन्होंने अपनी कला और अपनी मेहनत के जरिए यह साबित किया है कि कोई भी औरत अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है और समाज में अपने हिस्से की जगह तय कर सकती है।  

लेखक : महेश सिंह 
पता : गिरिडीह, झारखंड 
ईमेल : mahesh.pu14@gmail.com
 

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