भारतीय समाज की यह विडंबना रही है कि यहाँ नायकों को भगवान बनाकर उनकी विचारधारा को दफन कर दिया जाता है। अंबेडकर के साथ भी यही हुआ। जिस तेजी से उनकी तस्वीरों पर मालाएं चढ़ाई जा रही हैं, उस तेजी से उनकी किताबों और उनके द्वारा दिए गए संवैधानिक मूल्यों और विचारों को नहीं पढ़ा जा रहा है।
आज बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के व्यक्तित्व और उनके योगदान को भक्ति और श्रद्धा की चाशनी में डुबाने का प्रयास भरसक हो रहा है। हमारा ध्यान इस ओर बिल्कुल भी नहीं है कि उनके विचारों की गहराई और उनके संघर्ष की सार्थकता 'पूजा' में नहीं बल्कि 'पठन और मनन' में निहित है। जब हम किसी व्यक्तित्व को पूजने लगते हैं, तो अनजाने में महज उसे पत्थर की मूर्ति में बदल देते हैं। पत्थर, विराटता और स्थिरता का प्रतीक हो सकता है, गतिशीलता और प्रगतिशीलता का नहीं। पूजने की प्रक्रिया में आलोचना की दृष्टि लुप्त हो जाती है और अंधभक्ति का उदय होता है। यह बात अम्बेडकर के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अंबेडकर का पूरा जीवन गतिशीलता और निरंतर सीखने की प्रक्रिया के अधीन रहा है। उन्होंने स्वयं बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करते हुए 'अप्प दीपो भव' यानी अपना प्रकाश स्वयं बनने की बात कही थी। उनकी चाहत कभी नहीं रही कि उन्हें देवता की तरह स्थापित किया जाए। समाज को उनका यह साफ संदेश था कि शिक्षा और तर्क वह हथियार हैं जिनसे गुलामी की जंजीरें काटी जा सकती हैं। पूजने वाला व्यक्ति अक्सर झुकना सीखता है, जबकि पढ़ने वाला व्यक्ति खड़ा होना और सवाल करना सीखता है।
अंबेडकर को पढ़ने का अर्थ है उनके द्वारा झेली गई अपमानजनक स्थितियों से लेकर उनके वैश्विक स्तर के विद्वान बनने तक के सफर के पीछे के 'तर्क' को समझना। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जो शोध किए, वे भारतीय समाज की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान ढूंढने की कोशिश थे। उदाहरण के तौर पर, उनकी पुस्तक 'द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी' भारतीय अर्थव्यवस्था के उन बुनियादी दोषों को उजागर करती है जो औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीयों का शोषण कर रहे थे। जब हम उन्हें पढ़ते हैं, तब समझ में आता है कि वे केवल एक दलित नेता ही नहीं थे, बल्कि एक वैश्विक दृष्टिकोण वाले अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और विधिवेत्ता थे। उनकी रचना 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' यानी 'जाति का विनाश' किसी भी व्यक्ति को मानसिक क्रांति करने के लिए मजबूर कर देती है। इसमें उन्होंने जाति व्यवस्था से लेकर धार्मिक और सामाजिक आधारों का तार्किक विश्लेषण किया है। पूजा करने वाला व्यक्ति इस किताब के मर्म को नहीं समझ सकता कि जाति व्यवस्था श्रम का विभाजन ही नहीं बल्कि श्रमिकों का भी विभाजन है।
संविधान निर्माण के दौरान अंबेडकर की भूमिका को ध्यान में रखकर 'संविधान के निर्माता' या 'संविधान के पिता' जैसे अलंकरणों तक सीमित करना बहुत ठीक बात नहीं है। हमे उनके भाषणों और संविधान सभा की बहसों को पढ़ना होगा। तभी हम समझ पाएंगे कि वे भारत को किस तरह आधुनिक और न्यायसंगत राष्ट्र बनाना चाहते थे। उन्होंने चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उसे सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र का आधार न मिले। हमारे लिए उनके उस भाषण को पढ़ना अनिवार्य है जो उन्होंने संविधान सभा के अंतिम दिन दिया था, जिसमें उन्होंने 'विभक्ति के युग' और 'भक्ति' के खतरों के बारे में आगाह किया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि राजनीति में भक्ति या व्यक्ति-पूजा पतन और तानाशाही का निश्चित मार्ग है। आज जब हम उनके अनुयायियों या विरोधियों को देखते हैं, तो पाते हैं कि दोनों ही पक्षों ने उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार बाँट लिया है। विरोधियों ने उन्हें एक विशेष वर्ग का नेता मानकर दरकिनार किया, तो समर्थकों ने उन्हें भगवान बनाकर उनकी आलोचनात्मक चेतना को सीमित कर दिया।
महिला अधिकारों के प्रति उनका दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट है। हिंदू कोड बिल के माध्यम से उन्होंने हिंदू महिलाओं को संपत्ति का अधिकार, तलाक का अधिकार और गोद लेने का अधिकार आदि दिलाने के लिए जो संघर्ष किया, वह उस समय के ब्राम्हणवादी सोच के सामंती समाज में बहुत बड़ा जोखिम था। बिल पास न होने पर उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे महिलाओं के अधिकारों के साथ समझौता नहीं करना चाहते थे। जो लोग उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं, वे शायद ही यह जानते होंगे कि भारत में आज महिलाएं जिस कानूनी स्वतंत्रता का उपभोग कर रही हैं, उसकी नींव अंबेडकर ने ही रखी थी। शिक्षा के प्रति उनका आग्रह 'शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो' बहुसंख्यक समाज के लिए विकास की एक क्रमिक प्रक्रिया है। शिक्षा से उनका तात्पर्य केवल साक्षरता से नहीं था, बल्कि उस चेतना से था जो व्यक्ति को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग बनाती है। इस तरह उन्होंने ज्ञान को मुक्ति का साधन माना था।
बाबा साहेब के आर्थिक और संरचनात्मक विचारों को पढ़ना आज के दौर में और भी अनिवार्य हो जाता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि स्वतंत्र भारत में जल प्रबंधन और बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं (जैसे दामोदर घाटी और हीराकुंड परियोजना) की वैज्ञानिक नींव उन्होंने ही रखी थी। उनके लेखन 'स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज' को पढ़ने पर पता चलता है कि वे स्टेट सोशलिज्म के हिमायती थे, जहाँ बुनियादी उद्योगों और भूमि का स्वामित्व राज्य के पास हो ताकि आम आदमी का शोषण न हो सके। हालाँकि उनके इस प्रस्ताव की खूब आलोचना हुई। क्योंकि यह व्यवस्था भारत जैसे देश के लिए व्यवहारिक नहीं कही जा सकती। बहरहाल, वे जानते थे कि केवल छुआछूत खत्म करने से समानता नहीं आएगी, इसीलिए उन्होंने आर्थिक संसाधनों का समान वितरण बहुत जरूरी माना।
इतिहास की पुनर्व्याख्या करने में भी अंबेडकर का योगदान अद्वितीय है। 'शुद्र कौन थे?' और 'अछूत' जैसी उनकी कृतियाँ इतिहास को देखने का एक नया नजरिया प्रदान करती हैं। उन्होंने स्थापित धारणाओं को चुनौती दी और प्रमाणों के आधार पर बताया कि सामाजिक ऊंच-नीच के पीछे कोई दैवीय विधान नहीं बल्कि राजनीतिक और धार्मिक षडयंत्र थे। एक पाठक के तौर पर जब आप इन तर्कों से गुजरते हैं, तो आपके भीतर का अंधविश्वास और हीन भावना समाप्त होने लगती है। पूजने की संस्कृति व्यक्ति को दूसरों पर आश्रित बनाती है, यह उम्मीद जगाती है कि कोई चमत्कार होगा या कोई उद्धारक आएगा। लेकिन अंबेडकर का साहित्य व्यक्ति को स्वयं का उद्धारक बनने की प्रेरणा देता है। वे आत्म-सम्मान के सबसे बड़े पैरोकार थे। उनका मानना था कि आत्म-सम्मान के बिना जीवन निरर्थक है। मंदिर प्रवेश के आंदोलनों से लेकर महाड़ सत्याग्रह तक, उनका उद्देश्य अछूत माने जाने वाले लोगों को यह अहसास कराना था कि वे भी समान मनुष्य हैं।
अंबेडकर को पढ़ने का अर्थ उनकी विदेश नीति और वैश्विक शांति के प्रति विचारों को भी समझना है। उन्होंने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का हमेशा विरोध किया। वे भारत के एक ऐसे वैश्विक नागरिक थे जिन्होंने हर जगह के दमित लोगों के प्रति सहानुभूति रखी। श्रम सुधारों के क्षेत्र में उनके योगदान अतुलनीय हैं। भारत में काम के घंटों को 12 से घटाकर 8 घंटे करने, महंगाई भत्ता देने और महिला श्रमिकों के लिए प्रसूति अवकाश जैसे प्रावधानों के पीछे अंबेडकर की ही सोच थी। जब हम उनके इन कार्यों को पढ़ते हैं, तब समझ आता है कि उनका राष्ट्रवाद कितना समावेशी और प्रगतिशील था। पढ़कर ही समझा जा सकता है कि वे पूरे भारतीय समाज की उत्पादकता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना चाहते थे।
समकालीन समय में अंबेडकर का पठन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आज सूचनाओं और नैरेटिव्स का युद्ध चल रहा है। उनके विचारों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। यदि समाज ने उन्हें पढ़ा होता, तो वह किसी भी राजनीतिक दल के बहकावे में नहीं आता जो उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अंबेडकर का साहित्य एक सुरक्षा कवच की तरह है जो आपको वैचारिक गुलामी से बचाता है। उन्होंने धर्म का विश्लेषण करते हुए उसे 'धम्म' से अलग किया था। उनके अनुसार धर्म जहाँ नियमों का समूह है, वहीं धम्म सिद्धांतों का मार्ग है। यह सूक्ष्म अंतर केवल पढ़ने और गहरे चिंतन से ही समझ आता है। उनकी अंतिम महान कृति 'बुद्ध और उनका धम्म' नैतिकता, करुणा और न्याय पर आधारित एक सामाजिक घोषणापत्र है।
अंबेडकर द्वारा बुद्ध और कार्ल मार्क्स के बीच किए गए तुलनात्मक विश्लेषण को पढ़ना किसी भी छात्र के लिए आँखें खोलने वाला अनुभव हो सकता है। उन्होंने समानता के लक्ष्य को तो स्वीकारा लेकिन हिंसा और तानाशाही के मार्ग को नकारा। वे लोकतांत्रिक मूल्यों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे। उनकी प्रासंगिकता आज के वैश्विक संदर्भ में भी बढ़ गई है। नस्लभेद, असमानता और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ होने वाले अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों में अंबेडकर के विचारों को उद्धृत किया जा रहा है। इसका कारण यह है कि उन्होंने न्याय की बात किसी संकुचित दायरे में रहकर नहीं की थी। वे फ्रांसीसी क्रांति के मूल्यों- 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' को भारतीय मिट्टी में रोपना चाहते थे। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया था कि ये मूल्य उन्होंने किसी विदेशी विचारधारा से नहीं, बल्कि बुद्ध की शिक्षाओं से ग्रहण किए हैं।
आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की ज़रूरत है कि अंबेडकर की तस्वीर को दीवार पर लटकाने से ज्यादा ज़रूरी उनके विचारों को मस्तिष्क में स्थान देना है। पूजा करने से श्रद्धा तो बढ़ती है, लेकिन समझ नहीं बढ़ती। अंबेडकर को पढ़ने से व्यक्ति की तार्किक क्षमता का विकास होता है और वह समाज के जटिल ढांचों को समझने के काबिल बनता है। उनका लेखन हमें एक नैतिक जिम्मेदारी देता है। जब हम उनके शोधपत्रों को पढ़ते हैं, तो हमें उनकी बौद्धिक तपस्या का अहसास होता है। अंबेडकर को 'पढ़ना' उन्हें जीवित रखने का एकमात्र तरीका है। मूर्तियां टूट सकती हैं, तस्वीरें फीकी पड़ सकती हैं, लेकिन विचार अमर होते हैं।
अगर हम वाकई अंबेडकर के प्रति सच्चा सम्मान व्यक्त करना चाहते हैं, तो हमें उनके द्वारा दिए गए 'संवैधानिक नैतिकता' के विचार को अपने आचरण में उतारना होगा। हमें धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व और न्याय के उन पैमानों को समझना होगा जो उन्होंने हमारे लिए तय किए थे। समाज को पूजने की बीमारी से बाहर निकलकर पढ़ने की संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। अंबेडकर ने कहा था कि उन्हें वे लोग पसंद हैं जो पढ़ते हैं और पढ़कर दूसरों को जागृत करते हैं। उन्होंने समाज के वंचित वर्ग को आगाह किया था कि 'शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पिएगा वह दहाड़ेगा।' लेकिन दहाड़ने के लिए तर्क का आधार होना चाहिए, जो केवल अध्ययन से आता है।
अंततः, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर एक व्यक्ति मात्र नहीं हैं, वे एक विचार हैं, एक दर्शन हैं। वे निरंतर चलने वाला एक आंदोलन हैं। इस आंदोलन को आगे ले जाने के लिए हाथ में फूल और धूपबत्ती नहीं चाहिए। इसके लिए चाहिए उनकी लिखी किताबें और तर्कशील मस्तिष्क। 'पूजो मत पढ़ो' का सीधा सा संदेश यही है कि अपनी श्रद्धा को ज्ञान में बदलो, क्योंकि ज्ञान ही वह एकमात्र शक्ति है जो दुनिया को बदल सकती है। 'अप्प दीपो भव'।
लेखक : महेश सिंह
संपर्क : गिरिडीह, झारखंड
ईमेल : mahesh.pu14@gmail.com



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