वीरेन नंदा द्वारा निर्देशित फिल्म 'खड़ीबोली के भगीरथ' उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिंदी भाषा के विकास और उसके मानक स्वरूप निर्धारण के ऐतिहासिक संघर्ष का विस्तृत दस्तावेजीकरण है। यह फिल्म मुख्य रूप से अयोध्या प्रसाद खत्री के उन व्यवस्थित प्रयासों पर केंद्रित है, जिनके माध्यम से उन्होंने खड़ी बोली को काव्य और प्रशासनिक कार्यों की मुख्य भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था। उस समय में भारतीय भाषाई विमर्श का मुख्य केंद्र यह पारंपरिक धारणा थी कि ब्रजभाषा ही काव्य के लिए उपयुक्त है और खड़ी बोली का उपयोग केवल गद्य या सामान्य बोलचाल तक सीमित रहना चाहिए। खत्री जी ने इस स्थापित विचार को ठोस तर्कों के साथ चुनौती दी और यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जिस भाषा में जनसामान्य वार्तालाप करता है, वही भाषा कविता के सृजन के लिए भी सबसे अधिक सक्षम और स्वाभाविक होनी चाहिए।
अयोध्या प्रसाद खत्री के भाषाई शोध का विश्लेषण करते हुए फिल्म उनके द्वारा वर्गीकृत खड़ी बोली के पाँच विशिष्ट रूपों का विवरण देती है। ये पाँच रूप ठेठ, पंडितपुर, मुंशीयाना, मौलवियाना और अंग्रेजीदां थे। 'ठेठ' में उन्होंने शुद्ध ग्रामीण और लोक बोलचाल को रखा, 'पंडितपुर' में संस्कृत निष्ठ शब्दावली का प्रभाव था, 'मुंशीयाना' और 'मौलवियाना' में फारसी-अरबी के प्रचलित शब्दों का समावेश था, जबकि 'अंग्रेजीदां' उस समय के नए शिक्षित वर्ग की भाषा थी। यह वर्गीकरण समाज के विभिन्न वर्गों की भाषाई शैलियों को वैज्ञानिक ढंग से समझने और उन्हें एक सूत्र में पिरोने की एक गंभीर कोशिश थी। फिल्म यह स्पष्ट करती है कि खत्री जी भाषा को एक ऐसे सामाजिक औजार के रूप में देख रहे थे जो हर वर्ग के लिए सुलभ हो। उनके अनुसार, भाषा का यह सरलीकरण ही उसे वास्तव में 'लोकप्रिय' और 'प्रशासनिक' बना सकता था।
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फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खत्री जी के बिहार के मुजफ्फरपुर प्रवास और वहाँ उनके द्वारा किए गए जमीनी संघर्ष पर आधारित है। उस समय बिहार की अदालतों और सरकारी कार्यालयों में फारसी और कैथी लिपि का वर्चस्व था, जिसे सामान्य जनता के लिए समझना कठिन था। खत्री जी ने इस व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक आंदोलन चलाया और देवनागरी लिपि वाली खड़ी बोली को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़ी। फिल्म में दिखाए गए उस समय के सरकारी गजट, आधिकारिक आदेश और खत्री जी द्वारा लिखे गए प्रार्थना-पत्र यह सिद्ध करते हैं कि उनका यह आंदोलन भाषाई स्तर पर एक जनहितैषी सुधार था। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अपनी पैतृक संपत्ति का बड़ा हिस्सा हिंदी के प्रचार और इसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए विज्ञापनों, पुस्तिकाओं और सभाओं पर खर्च किया।
फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खत्री जी के बिहार के मुजफ्फरपुर प्रवास और वहाँ उनके द्वारा किए गए जमीनी संघर्ष पर आधारित है। उस समय बिहार की अदालतों और सरकारी कार्यालयों में फारसी और कैथी लिपि का वर्चस्व था, जिसे सामान्य जनता के लिए समझना कठिन था। खत्री जी ने इस व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक आंदोलन चलाया और देवनागरी लिपि वाली खड़ी बोली को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़ी। फिल्म में दिखाए गए उस समय के सरकारी गजट, आधिकारिक आदेश और खत्री जी द्वारा लिखे गए प्रार्थना-पत्र यह सिद्ध करते हैं कि उनका यह आंदोलन भाषाई स्तर पर एक जनहितैषी सुधार था। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अपनी पैतृक संपत्ति का बड़ा हिस्सा हिंदी के प्रचार और इसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए विज्ञापनों, पुस्तिकाओं और सभाओं पर खर्च किया।
फ़िल्म में भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन विद्वानों के साथ खत्री जी के वैचारिक मतभेदों और पत्राचार को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। फिल्म यह ऐतिहासिक तथ्य सामने लाती है कि उस दौर के अधिकांश प्रतिष्ठित साहित्यकार, जिनमें स्वयं भारतेंदु भी शामिल थे, काव्य के लिए ब्रजभाषा के पक्षधर थे। खत्री जी ने इस जड़ता को तोड़ने के लिए 1889 में 'खड़ी बोली का पद्य' शीर्षक से एक अभूतपूर्व काव्य संग्रह प्रकाशित किया। इस संग्रह के माध्यम से उन्होंने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया कि खड़ी बोली में भी वही प्रवाह और गंभीरता उत्पन्न की जा सकती है जो ब्रजभाषा में मिलती है। फिल्म में राधाचरण गोस्वामी के माध्यम से इस वैचारिक द्वंद्व और उस समय की साहित्यिक गोष्ठियों के वातावरण को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। निर्देशक ने फिल्म में मूल ऐतिहासिक दस्तावेजों, पत्रों की प्रतियों और तत्कालीन समाचार पत्रों की कतरनों का जो व्यापक प्रयोग किया है, वह इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता को और अधिक सुदृढ़ करता है।
निर्देशक ने इस फिल्म को 'डॉक्यू-ड्रामा' की श्रेणी में रखा है। फिल्म में ब्लैक एंड व्हाइट और सेपिया टोन का कलात्मक उपयोग उस ऐतिहासिक कालखंड के वातावरण को जीवंत करने के लिए किया गया है, जिससे दर्शक को उस युग की गंभीरता का अनुभव होता है। फिल्म की गति और संपादन इस तरह रखा गया है कि तथ्यों का बोझ दर्शक पर हावी न हो, बल्कि वह क्रमिक रूप से इतिहास के पन्नों को खुलते हुए देख सके। पार्श्व संगीत को जानबूझकर न्यूनतम और शांत रखा गया है ताकि अयोध्या प्रसाद खत्री के संवादों और उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए भाषाई तर्कों पर एकाग्रता बनी रहे। फिल्म में खत्री जी के व्यक्तिगत जीवन के उन संघर्षपूर्ण पक्षों को भी बिना किसी अतिरंजना के दिखाया गया है, जहाँ वे अपनी विचारधारा को स्थापित करने के लिए तत्कालीन दिग्गज विद्वानों से शास्त्रार्थ करते नजर आते हैं।
फ़िल्म : खड़ी बोली के भगीरथ
फिल्म यह भी रेखांकित करती है कि अयोध्या प्रसाद खत्री का आंदोलन केवल हिंदी के पक्ष में नहीं था, बल्कि वह भाषाई सुगमता का आंदोलन था। वे चाहते थे कि भाषा इतनी बोधगम्य हो कि वह आम आदमी के न्याय और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर सके। मुजफ्फरपुर से संचालित उनके इस अभियान ने कालांतर में पूरे हिंदी प्रदेश में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा का मजबूत आधार तैयार किया। फिल्म के अंतिम भाग में इस तथ्य को स्थापित किया गया है कि आज हम जिस मानक और व्याकरणिक हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं, उसकी जड़ों में खत्री जी का वह संघर्ष निहित है जिसमें उन्होंने साहित्य को जनसामान्य की भाषा के निकट लाने का संकल्प लिया था। इसमें अनावश्यक नाटकीयता से बचते हुए केवल ऐतिहासिक घटनाओं के व्यवस्थित और तर्कपूर्ण वर्णन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
फिल्म यह भी रेखांकित करती है कि अयोध्या प्रसाद खत्री का आंदोलन केवल हिंदी के पक्ष में नहीं था, बल्कि वह भाषाई सुगमता का आंदोलन था। वे चाहते थे कि भाषा इतनी बोधगम्य हो कि वह आम आदमी के न्याय और शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर सके। मुजफ्फरपुर से संचालित उनके इस अभियान ने कालांतर में पूरे हिंदी प्रदेश में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा का मजबूत आधार तैयार किया। फिल्म के अंतिम भाग में इस तथ्य को स्थापित किया गया है कि आज हम जिस मानक और व्याकरणिक हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं, उसकी जड़ों में खत्री जी का वह संघर्ष निहित है जिसमें उन्होंने साहित्य को जनसामान्य की भाषा के निकट लाने का संकल्प लिया था। इसमें अनावश्यक नाटकीयता से बचते हुए केवल ऐतिहासिक घटनाओं के व्यवस्थित और तर्कपूर्ण वर्णन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
यह फिल्म उन शोधार्थियों के लिए एक अत्यंत उपयोगी स्रोत है जो हिंदी साहित्य के इतिहास और विशेष रूप से भाषाई संक्रमण काल के वास्तविक कारणों को गहराई से समझना चाहते हैं। यह हिंदी भाषा के 'आधुनिक' होने की प्रक्रिया का एक विस्तृत विश्लेषण है। फिल्म यह संदेश देती है कि किसी भी मानक भाषा का निर्माण रातों-रात नहीं होता। निर्देशक ने भारतीय सिनेमा में शोध-आधारित वृत्तचित्रों के महत्व को इस फिल्म के माध्यम से पुनः प्रतिपादित किया है।
निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि फ़िल्म 'खड़ीबोली के भगीरथ' एक सूचनात्मक फिल्म है जो अयोध्या प्रसाद खत्री के विस्मृत कर दिए गए योगदान को ठोस ऐतिहासिक संदर्भों के साथ पुनः स्थापित करती है। यह फिल्म दर्शकों को हिंदी भाषा के विकास क्रम के उन अनछुए पहलुओं से परिचित कराती है जो सामान्यतः पाठ्यपुस्तकों में विस्तार से उपलब्ध नहीं होते। यह फिल्म वर्तमान हिंदी के अस्तित्व के प्रति एक गहरा बोध भी पैदा करती है। अपनी सीधी और तथ्यपरक शैली के कारण यह फिल्म एक गंभीर कलाकृति है। इसे मनोरंजन से अधिक ज्ञानवर्धन और भाषाई चेतना के विस्तार को समझने हेतु देखा जा सकता है।
संपर्क : गिरिडीह, झारखंड



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