भारतेंदु युगीन अज्ञात व अल्पज्ञात महिला रचनाकार | महेश सिंह

हिंदी साहित्य को साहित्य के इतिहासकारों द्वारा मुख्यतः आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, और आधुनिककाल के नाम से चार कालखंडो में विभाजित किया गया है। सभी कालखंडों के भी अपने-अपने प्रवृतिगत विभाजन हैं। इन प्रवृतिगत विभाजनों में पुरुष रचनाकारों के अलावा महिला रचनाकारों की उपस्थिति कम ही सही, किन्तु; मुख्यधारा में मिलती है। लेकिन आधुनिककाल के भारतेंदु युग में ‘जिसे नवजागरण काल के साथ-साथ हिंदी साहित्य के अन्य गद्य विधाओं के उद्भव का युग भी कहा जाता है’ महिला रचनाकारों का न मिलना हिंदी-नवजागरण जैसे आन्दोलनकारी और प्रगतिशील शब्द पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाना स्वभाविक सा जान पड़ता है। इस युग से सम्बंधित साहित्यिक सामग्री की काफी जाँच-पड़ताल के बाद डॉ. भवदेव पांडेय, डॉ. धर्मवीर, जगदीश्वर चतुर्वेदी और वीर भारत तलवार के शोध-परक पुस्तकों के माध्यम से कई महिला रचनाकारों का नाम उभरकर सामने आया है। जिनमे ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’, ‘सरस्वती गुप्ता’, प्रियंवदा देवी, हेमंत कुमारी चौधरी, यशोदा देवी, ब्रह्मा कुमारी दूबे, रुक्मणी देवी, हुक्म देवी गुप्ता, लीलावती देवी और बंग महिला जैसी लेखिकाएँ हैं। इनके साथ ही इसी दौर में हरदेवी और सुवर्णकुमारी देवी जैसी लेखिकाओं के नाम भी जुड़ते हैं जो अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री-परतंत्रता की बेड़ियाँ काटने का प्रयास कर रही थीं। भारतेंदु युग का यह समय जिसे हम पुरुषों के सुधारों का युग मानते आए हैं, वास्तव में स्त्रियों के स्व-जागृति का भी काल था।

इन महिला रचनाकारों में से ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ और बंग महिला ही ऐसी रचनाकार हैं जिनकी रचनाएँ क्रमशः ‘सीमान्तनी उपदेश’ और हिंदी साहित्य की पहली कहानी के रूप में ‘दुलाईवाली’ मुख्य रूप से अपनी पहचान बनाने में सफल हो पाई हैं। इनके अलावा कोई भी महिला रचनाकार ऐसा नहीं है जो हिंदी साहित्य के क्षितिज पर अपनी उपस्तिथि दर्ज करा पाया हो। हालाकि सरस्वती गुप्ता का उपन्यास ‘राजकुमार’(1898); साध्वी सती पति प्राणा अबला का उपन्यास ‘सुहासिनीं’(1890); प्रियंवदा देवी का ‘लक्ष्मी’, हेमंत कुमारी चौधरी का ‘आदर्शमाता’ और यशोदा देवी का ‘वीर पत्नी’ नामक कृतियाँ इसी युग में छपीं; लेकिन इनको उतनी पहचान नहीं मिल पाई जितना मिलना चाहिए था। इन सभी उपन्यासों के केंद्र में स्त्री की गरिमा, मान-मर्यादा और अस्मिता के प्रश्न हैं। इनमें वे प्रश्न भी हैं जो तद्युगीन सामाजिक, धार्मिक सुधार अन्दोलोनों ने उठाये थे। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि उस समय की 'कविवचन सुधा' और 'हिन्दी प्रदीप' जैसी विख्यात पत्रिकाओं में पुरुष तो बहुत लिख रहे थे, पर स्त्रियों के लिखे को वह स्थान नहीं मिला जिसका वह हकदार था। इन सभी प्रश्नों के होते हुए भी इन कृतियों का हिंदी साहित्य में नामों-निशान न मिलना भारतेन्दुकालीन स्त्रियों के प्रति पुरुष की मानसिकता को दर्शाता है।


‘सीमान्तनी उपदेश’ देवनागरी लिपि में सबसे पहले 1 फरवरी 1882 को छापी गई थी। इस पुस्तक की लेखिका का नाम अज्ञात है। इसे मुंशी कन्हैया लाल अलखधारी ने प्रकाशित कराया था। लेखिका ने अपना नाम जानबूझ कर छिपाया है। इस प्रकार इस पुस्तक की लेखिका ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ के नाम से जानी जाती हैं। इस पुस्तक का सम्पादन करते हुए डॉ. धरमवीर ने कहा है कि- “सीमान्तनी उपदेश’ से पता चलता है कि यह पुस्तक पहली बार 1 फरवरी, 1882 को मुंशी कन्हैया लाल अलखधारी ने लुधियाने से छापी थी” सीमान्तनी उपदेश अपने आप में अनूठी पुस्तक है। इसकी लेखिका ने तद्युगीन समाज का गहन अध्ययन करते हुए वैचारिक स्तर पर समाज-दर्शन का बड़ा गंभीर चिंतन किया है। वे उस समय की अन्य महिला रचनाकारों से कई मामलों में अलग दीखती हैं। जहाँ अन्य महिला रचनाकार तत्कालीन पुरुष समाज की हाँ में हाँ मिलाती हुई चलती हैं वहीँ इस लेखिका ने क्रांतिकारी रूप धारण किया है। वे न केवल तत्कालीन समाज की बुराइयों पर प्रहार करती हैं, बल्कि परमेश्वर के विधान पर भी सवाल उठाती हैं कि जब सबकी रचना एक सी है, तो सुख-दुःख में इतना भेदभाव क्यों? ‘जबाब एक औरत का’ में लिखती हैं कि- "जब परमेश्वर ने इनको पैदा किया तो सब इन्द्रियां मर्दों के बराबर दीं। यह कुछ बात नहीं कि खाविंद मर जाये तो सब इन्द्रियां अपना असर छोड़ दें। जबतक देह में दम है ये जरुर वक्त पर अपना असर करेंगी। ऐसा कोई दुनियां में पैदा नहीं हुआ जिसने इनके फैल को रोका हो। बड़े-बड़े महात्माओं की इन्द्रियां चलायमान हो गई हैं फिर औरत क्या चीज है जो रोक सके।"


इस प्रकार जो तेवर ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ की रचनाओं में देखने को मिलते हैं, वैसा इस युग की किसी भी लेखिका की रचनाओं में नहीं देखा गया। यहाँ तक कि बंग महिला की रचनाओं में भी नहीं। यह अलग बात है कि बंग महिला हिंदी साहित्य में ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ से कहीं ज्यादा प्रसिद्द रहीं। लेकिन इन दोनो महिला लेखिकाओं की रचनादृष्टि और चिंतन में जमीन- आसमान का अंतर है। उदाहरण स्वरुप हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘कुसुम संग्रह’ में बंग महिला का ‘स्त्रियों की शिक्षा’ नामक लेख में देख सकतें हैं- “यदि लडकियों को और कुछ नहीं तो थोड़ी-सी मातृभाषा की शिक्षा मिल जाया करे तो एक पत्र लिखने के लिए उनको दूसरों का मुह न ताकना पड़े।" बंग महिला के इस वक्तव्य से ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो पुरुष समाज और प्रसाशन से झोली फैलाकर स्त्री शिक्षा के लिए भीख मांग रही हैं। जबकि ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका ने पुरुष, स्त्री, और प्रसाशन सबके लिए आक्रमक रुख अख्तियार किया है। उनकी आक्रमकता किसी भिक्षा की माँग नहीं, बल्कि अपना हक छीनने की पुकार है। ‘पतिव्रता धर्म’ में वे लिखती हैं- “प्रीत समान की समान से होती है। इसका तो बेवकूफ को भी तजुर्बा होगा। देखो, बालक कभी बूढ़े से खुश नहीं रहता हमेशां बालकों में ही खुशी से खेलता है। जवान कभी बूढी स्त्री से राजी नहीं रहेगा। जवान स्त्री कभी बूढ़े से खुश न होगी। बस, यह धर्म इस वक्त के वास्ते नहीं है। आजकल की स्त्रियों को विद्या से महरूम रख, जेलखाने में डाल, तिस पर शक कर, विधवाओं की दूसरी शादी न कर, आप दस-दस शादियाँ करते हैं। क्या ये बेइंसाफी नहीं इनको इस धर्म की राह बताना? क्या जुल्म नहीं अंधे को कुएं में धकेल देना? क्या अंधे के बराबर इनकी हालत नहीं है?”


उपर किये गए दोनों महिला लेखिकाओं की रचनादृष्टि की तुलनात्मक विश्लेषण में मेरा कहीं से भी यह आशय नहीं है कि ‘बंग महिला’ का योगदान कम है, दरअसल यह केवल शालीनता और आक्रमकता का अंतर है। इस सम्बन्ध में वीर भारत तलवार के वक्तव्य का जिक्र करना लाजमी होगा- “सीमंतनी उपदेश और स्त्री-पुरुष तुलना के मुकाबले ‘बंग महिला’ की रचनाओं से स्पष्ट है कि बुनियादी तौर पर वे स्त्री सम्बन्धी परम्परागत दृष्टिकोण की समर्थक थीं” यही दृष्टिकोण ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ से ‘बंग महिला’ को अलग रखता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग- अलग थी; साथ ही समय काल में भी लगभग दो -तीन दशक का अन्तराल है। जहाँ ‘बंग महिला’ का परिवार शिक्षित और आर्थिक रूप से काफी संपन्न था; इसके अलावा वे चार भाइयों के बीच में अकेली बहन थीं; जिससे आजीवन उन्हें प्यार और दुलार मिलता रहा; वहीँ ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ के बारे में अभी तक सब कुछ अज्ञात ही है सिवाय इसके कि वह ‘बाल विधवा’ थीं। पंजाब की भूमि जहाँ आर्य समाज की वजह से विचारों में तर्क अधिक था, वहाँ अज्ञात महिला की भाषा को वह प्रखरता मिली जो बंगाल के उदारवादी ब्रह्म समाज के माहौल में बंग महिला को नहीं मिली होगी। अज्ञात लेखिका के यहाँ शास्त्रार्थ जैसा तीखापन है, जो हर बात को तर्क की कसौटी पर कसता है। अब जिस लेखिका को अपनी पहचान तक छुपाना पड़ा हो, समाज के प्रति उसके अनुभव का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यहीं पर ‘भोगा हुआ यथार्थ’ प्रासंगिक हो उठता है, जो समकालीन विमर्शों अर्थात ‘स्त्री विमर्श’, ‘दलित विमर्श’, ‘आदिवासी विमर्श’ इत्यादि का केन्द्रीय बिंदु है।


“उपेक्षा, अज्ञातवास एवं दमन की मार इतनी गहरी होती है कि स्त्री अपनी पहचान,अधिकार और निजी सत्ता ही भूल गई या भुला दी गई। सामाजिक साहित्यिक इतिहास से पुंसवादी इतिहास दृष्टी ने स्त्री को खदेड़ दिया। यही वजह है कि इतिहास ग्रंथों में स्त्री की सृजनात्मक एवं संघर्षशील इमेज का उल्लेख तक नहीं मिलता।" पुंसवादी समाज व्यवस्था भारतीय समाज का एक ऐसा कोढ़ है जो प्राचीन काल से लेकर अभी तक पुरुष मानस के अतल गहराई में जड़ होकर बैठा हुआ है। यही जड़ हुई पुरुष मानसिकता, स्त्री को कभी भी अपने समकक्ष आने का अवसर उपलब्ध नहीं कराया। अगर कभी कुछ किया तो उन्हें देवी बना डाला। इसके पीछे भी उनका अपना निजी स्वार्थ ही जुड़ा था; क्योंकि देवी की मर्यादा होती है और मर्यादा की सीमा भी। बाकी स्त्री ‘दासी’ रूप में अपना जीवन जी ही रही थी। दासी, जिसे गुलामी का पर्याय समझा जा सकता है।


भारतेन्दुकालीन महिला रचनाकारों को यदि पुरुषों का सहीं सहयोग मिला होता तो हिंदी साहित्य की रूप-रेखा अलग होती; क्योंकि प्रत्येक वर्ग का अपना अलग अनुभव होता है। खैर, जिस प्रकार से भक्ति आन्दोलन का प्रारंभ महिला रचनाकारों ने किया उसी तरह भारतेंदु युग में उपन्यास विधा के विकास में स्त्रियों की निर्णायक भूमिका थी। उपर हमने कई महिला उपन्यासकारों का उल्लेख किया है। उनके उपन्यासों में प्राचीन मर्यादाओं और रिवाजों का ध्यान रखते हुए स्त्री अस्मिता को उभारने का प्रयास दिखाई देता है। उस दौर में 'भारत भगिनी' और 'सुगृहिणी' जैसी पत्रिकाओं ने इन लेखिकाओं को अपनी बात कहने का एक मज़बूत सहारा दिया था। इन पत्रिकाओं में हेमंत कुमारी चौधरी और यशोदा देवी जैसे कलमकारों ने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। लगभग सभी उपन्यासों में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। संवाद की बजाय वर्णन पर ज्यादा जोर है साथ ही इतिवृतात्मकता और उपदेशात्मकता ने भी इनका पीछा नहीं छोड़ा है। यथार्थवादी दृष्टिकोण इन उपन्यासों में देखने को तो नहीं मिलता है लेकिन विचारों की अभिव्यक्ति भरपूर हुई है। यहाँ यह देखना महत्वपूर्ण है कि इन उपन्यासों में जो उपदेशात्मकता है, वह दरअसल समाज को जगाने की एक कोशिश थी। जब स्त्री के पास कोई साधन न हो, तो वह अपनी लेखनी से ही समाज के सामने प्रश्न खड़ा करती है।


यहाँ पर महत्वपूर्ण यह नहीं है कि इनके उपन्यासों में ‘औपन्यासिकता’ है या नहीं; महत्वपूर्ण यह है कि उपन्यास के उद्भव काल में ही स्त्रियों ने ‘उपन्यास’ लिखने का साहस किया; जबकि वे समाज की मुख्य धारा की नहीं थीं। फिर भी इन “उपन्यासों में पति पत्नी संबंधों की सार्थकता, संयुक्त परिवार की सार्थकता, स्त्री-शिक्षा की महता, स्त्री-साहस, स्त्रियों के आपसी सौहाद्रपूर्ण संबंधों, स्त्रियों के त्याग, दान-पुण्य, प्रकृति प्रेम, बाल विवाह निषेध, पुरषों की अधीनता का विरोध, पाश्चात्य जीवन शैली और भारतीय जीवन शैली के अंतर्विरोधों, भारतीय जीवन शैली की सार्थकता एवं श्रेष्ठता, मद्यपान निषेध, दुरावस्था में ईश्वर की प्रार्थना, स्त्री की लोकोपकरिणी छवि, सेविका, पति परायण, कर्तव्यनिष्ठ बहिन आदि इमेजों का रूपायन मिलता है।


‘साध्वी सती पति प्राणा अबला’ का उपन्यास ‘सुहासिनीं’ जिसका प्रकाशन 1890 में हुआ था। इस उपन्यास की नायिका ‘सुहासिनीं’ जिसके माता और पिता नहीं है। शादी के बाद भयानक गरीबी का दंश झेलती है। उसे अपना शहर तक छोड़ना पड़ता है। अकालग्रस्त अवस्था में भिक्षा मांगती है। अंत में एक ब्राह्मण के यहाँ महराजिन का कार्य करती है। इस प्रकार इस उपन्यास में भूख और आकाल के खिलाफ संघर्ष का जीवंत चित्र उभर कर सामने आता है। सुहासिनी का यह संघर्ष केवल धर्म या मर्यादा के लिए नहीं है, वह सीधे-सीधे भूख और रोटी का संघर्ष है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में यथार्थवाद की उस ज़मीन को तैयार करता है जहाँ पुरुष लेखक प्रायः नहीं पहुँच पाए।


इसी प्रकार सरस्वती गुप्ता का उपन्यास ‘राजकुमार’ जो 1898 में छपा। इसकी नायिका ‘ज्ञानलता’ जो एक शिल्पी की बेटी है। बुद्धि और विवेक की तीव्रता के बलबूते उसकी एक राजकुमार के साथ शादी हो जाती है। भविष्य में यही ज्ञान और विवेक राजकुमार के मन में ज्ञानलता के प्रति ईर्ष्या पैदा कर देता है जिससे वह ज्ञानलता को त्याग देता है। ज्ञानलता के दो बेटे हैं। बेटों के बड़े होने पर वह राजकुमार से उनके जरिये अपने अपमान का बदला लेती है। अंत में राजकुमार उससे माफ़ी मागता है। सरस्वती गुप्ता का यह उपन्यास पुरुष के उस अहंकार को दिखाता है जो स्त्री को केवल अपनी छाया के रूप में देखना चाहता है। जब स्त्री अपनी बुद्धि से आगे बढ़ती है, तो पुरुष समाज उससे ईर्ष्या करने लगता है, यह इस उपन्यास का मुख्य सार है।


यशोदा देवी के उपन्यास ‘वीर पत्नी’ की नायिका ‘संयोगिता’ है। दरअसल इसकी कथा पृथ्वीराज चौहान, जयचंद और संयोगिता की ही है। किन्तु इस उपन्यास में कई परिवर्तन किये गए हैं जैसे पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई तथा कैमास तक का जिक्र उपन्यास में कहीं भी देखने को नहीं मिलता। इसके अलावा यह दिखाया गया है कि पृथ्वीराज की मृत्यु हो जाती है। जिसके उपरांत संयोगिता ने मुहम्मद गोरी और जयचंद की सेनाओं हराया। यशोदा देवी ने यहाँ इतिहास के बहाने स्त्री को एक नई छवि दी है, जहाँ वह केवल युद्ध का कारण नहीं बनती बल्कि खुद शस्त्र उठाकर युद्ध का मैदान जीतती है। यह स्त्री के शौर्य को पुनर्जीवित करने का प्रयास था।


यहाँ हुक्म देवी गुप्ता और ब्रह्मा कुमारी दूबे जैसी लेखिकाओं के योगदान को भी देखना चाहिए। हुक्म देवी गुप्ता ने अपने लेखों में स्त्री उत्पीड़न के उन रूपों की चर्चा की है जो घरों के भीतर दबे रहते थे। ब्रह्मा कुमारी दूबे ने संयुक्त परिवारों में स्त्रियों की जो मानसिक स्थिति होती है, उसका सजीव वर्णन किया है। हेमंत कुमारी चौधरी ने अपनी रचना 'आदर्श माता' में स्त्री को केवल परिवार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक जागरूक नागरिक के रूप में गढ़ने की कोशिश की है। ये सभी महिलाएँ कहीं न कहीं एक-दूसरे के विचारों से जुड़ रही थीं और एक-दूसरे का समर्थन भी कर रही थीं।


इस प्रकार इस युग की अनेक अज्ञात व अल्पज्ञात महिला रचनाकारों ने पुंसवादी समाज की चुनौती को स्वीकार कर रचना धर्मिता में लगी रही और अपनी अभिव्यक्ति को शब्दों में पिरोया। इसलिए पुरुष उपन्यासकारों और महिला उपन्यासकारों की दृष्टी में काफी अंतर मिलता है। जगदीश्वर चतुर्वेदी इस बारे में लिखते हैं – “आरम्भ के स्त्री उपन्यासों में स्त्री की वास्तविक दशा के यथातथ्य वर्जन पर जोर है। जबकि अनेक पुरुष उपन्यासकारों ने ‘रोमांस’ को मुख्य विषय बनाया था। यथातथ्य वर्णन एवं इतिवृतात्मक शैली के कारण स्त्री की समस्याओं की तरफ ध्यान खींचना मुख्य लक्ष्य था। इस तरह ये उपन्यास समाज सुधार आंदोलनों से अपना रिश्ता बना रहे थे। स्त्रियों में यह दृष्टिकोण लोकप्रिय था कि समाज सुधार संघर्षों के जरिये ही आधुनिक चेतना का निर्माण संभव है । इसे ही राजनितिक परिवर्तन की कड़ी माना”।


डॉ. धर्मवीर और वीर भारत तलवार ने यह साबित किया है कि उस दौर में 'एक अज्ञात हिन्दू महिला' जैसे छद्म नामों से लिखना केवल डर की बात नहीं थी। यह दरअसल एक सामूहिक पहचान बनाने का तरीका था। जब कोई लेखिका अपना नाम छिपाकर लिखती है, तो वह किसी एक व्यक्ति के दुःख को नहीं बल्कि पूरी स्त्री जाति के दुःख को स्वर देती है। यह उन महिलाओं का एक गुप्त मोर्चा था जो पुरुष सत्ता को अपनी लेखनी से जवाब दे रही थीं।


हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का यह युग कई मायने में आधुनिकता लिए हुए इतिहास के पन्नों में दर्ज है। चाहें वह तमाम गद्य विधाओं के उद्भव काल के रूप में हो, नवजागरण हो, या 1857 की क्रांति हो। इन सभी में कुछ न कुछ नयापन जरुर दीखता है। लेकिन स्त्रियों के प्रति भारतीय समाज नजरिया वही का वही है जो मुगलों का था। अभी तक हुए नये शोध और खोजों के माध्यम से हिंदी साहित्य के इस युग में जितनी महिला रचनाकारों और उनकी रचनाओं का पता चला है। उनमे से कुछेक को छोड़ कर अधिकतर अहिन्दी भाषी क्षेत्रों की ही महिलाएं हैं। उदहारण स्वरुप हम ‘बंग महिला’ और ‘एक अज्ञात हिन्दू महिला’ का नाम ले सकते हैं। बंग महिला जहाँ बंगाल से हैं वहीँ डॉ. धर्मवीर ने एक अज्ञात हिन्दू महिला का सम्बन्ध पंजाब से जोड़ कर देखा है। “इसी पंजाब की धरती पर ‘सीमंतनी उपदेश’ की इस अज्ञात लेखिका ने उन्नीसवीं शताब्दी में काम किया था”। इसी पंजाब में हरदेवी ने 'भारत भगिनी' का संपादन करके यह दिखा दिया था कि उत्तर भारत की स्त्रियाँ भी उतनी ही सजग थीं जितनी बंगाल की।


यदि हम गहराई से देखें तो इन लेखिकाओं का साहित्य केवल रोने-धोने का साहित्य नहीं है, वह एक तरह का आक्रोश है। जहाँ पुरुष लेखकों ने स्त्री सुधार की बात दया के आधार पर की, वहाँ इन स्त्रियों ने अपने हक की बात अधिकार के आधार पर की। यही वह अंतर है जो भारतेंदु युग के साहित्य को एक नया मोड़ देता है। अगर हम केवल मुख्यधारा के लेखकों तक सीमित रह जाते हैं, तो हम उस इतिहास को भूल जाते हैं जिसे इन महिलाओं ने खुद लिखा था। इन अल्पज्ञात लेखिकाओं का यथार्थ ही आज के स्त्री विमर्श की असली जड़ है।


अंततः यही कहा जा सकता है कि भारतीय दृष्टी से स्त्री विमर्श के उद्भव को तलाश कर स्त्री के योगदान का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देखने की आवश्यकता है। यह केवल एक पुरानी खोज नहीं है, बल्कि अपनी उस पहचान को वापस पाने की लड़ाई है जिसे इतिहास ने भुला दिया था। आज के समय में इन अज्ञात कलमकारों को उनका सही स्थान देना ही नवजागरण के असली अर्थ को पूरा करेगा।


अब खोल आखें अपनी दुनियां को देखो तुम,

लाखो तुम्हारी हजों में पुस्तक है छप चुकीं ।


संदर्भ : 

1. सीमान्तनी उपदेश, संपा. डॉ. धरमवीर, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण 2008, पृष्ठ-18

2. वही, पृष्ठ- 71

3. बंग महिलाः नारी मुक्ति का संघर्ष, भवदेव पाण्डेय, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण, 2008 पृष्ठ- 11

4. सीमंतनी उपदेश, संपादक डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण, 2008 पृष्ठ- 107

5. रस्साकशी, वीर भारत तलवार, सारांश प्रकाशन दिल्ली, 2012 पृष्ठ-218

6. स्त्रीवादी साहित्य विमर्श, जगदीश्वर चतुर्वेदी, अनामिका पब्लिशर्स, नई-दिल्ली, 2011 पृष्ठ-118

7. वही, पृष्ठ-120

8. वही, पृष्ठ-122, 123

9. सीमंतनी उपदेश, संपादक डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण, 2008 पृष्ठ-21


संदर्भ ग्रंथ 

 1. वीर भारत तलवार, रैय्यत और राज: उन्नीसवीं सदी का पंजाब, वाणी प्रकाशन।

 2. डॉ. धर्मवीर (सं.), सीमान्तनी उपदेश, वाणी प्रकाशन।

 3. जगदीश्वर चतुर्वेदी, हिंदी उपन्यास का स्त्री पक्ष, राजकमल प्रकाशन।

 4. डॉ. भवदेव पांडेय, हिंदी उपन्यास: उपलब्धि और संभावनाएँ।

 5. तत्कालीन पत्रिकाएँ— भारत भगिनी, सुगृहिणी, हिन्दी प्रदीप और कविवचन सुधा।



लेखक : महेश सिंह

संपर्क : गिरिडीह, झारखंड

ईमेल : mahesh.pu14@gmail.com


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