“सियाह रात नहीं लेती नाम ढ़लने का यही वो वक्त है सूरज तेरे निकलने का कहीं न सबको संमदर बहाकर ले जाए ये खेल खत्म करो कश्तियाँ बदलने का” [1] आज के समय एवं समाज का मूल्यांकन करे तो हम देखत…
Read moreसमाज , होमोसेक्स्शुलिटी और पितृसत्ता दुनिया की लगभग सभी सभ्यताओं में महिला और पुरुष के रिश्ते को ही स्वीकारा गया और इसे ही वैध और पवित्र माना गया। इसके बावजूद इन रिश्तों के इतर महिला- महिला , …
Read moreभारतीय इतिहास में सामाजिक , धार्मिक एवं साहित्यिक दृष्टी से भक्ति आंदोलन एक युगांतकारी घटना थी। जिसने भारतीय समाज एवं दर्शन को नये सिरे से परिवर्तित किया। यह वही युग था जिसके कारण तुलसीकृत ‘ राम…
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